कोरोना महामारी: प्रकृति से ज्ञान अर्जित करें और सकारात्मक रहें

    दिनांक 28-सितंबर-2020
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 केशव प्रसाद मौर्य
प्रकृति माता है, प्रकृति हममें जीने की आस जगाती है। निराशा के क्षण में उम्मीद की किरण देती है। लेकिन, हम अपनी ऋषि-परंपरा को भूल गए, उसमें यह बाद निहित है कि प्रकृति के साथ सहज संबंध ही मनुष्य को पूर्ण बनाता है

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कोरोना महामारी ने हमारे सामने बड़ा प्रश्न खड़ा किया है। या यूं कहें कि इस महामारी ने हमें पुनर्विचार का अवसर दिया है। क्या इस संकट से हम अधिक आत्मिक रूप से समृद्ध होकर निकल पाएंगे? यदि इस प्रश्न का उत्तर हां है, तो यह जरूरी है कि अपनी प्रकृति सम्मत ज्ञान परंपरा का स्मरण करें। उस ज्ञान से चेतना का संचार करें। इसके लिए यह जहां अवसर है, वहीं चुनौती भी है।
इस बात का स्मरण रहे कि घमंड में चूर मानव विज्ञान को कोरोना महामारी ने एक मूल मंत्र दिया है, जिसकी जड़ प्रकृति में निहित हैं। अर्थात हमें प्रकृति की ओर देखना चाहिए। उससे ज्ञान अर्जित करना चाहिए। हम यही करते रहे हैं। भारतीय सभ्यता में प्रकृति का ऊंचा स्थान है। किंतु, सुविधा भोगी संसार में हम रास्ता भटक गए। हमें फिर से प्रकृति सम्मत ज्ञान के पथ पर लौटना होगा। उससे सीखना होगा कि जीवन में आगे कैसे बढ़ा जाए? कैसे आपदाओं से लड़ा जाए ? 21वीं शताब्दी में प्रवेश करते-करते हमने मां-बाप, भाई-बहन, रिश्ते-नाते, गुरु-शिष्य के संबंधों की तासीर को तो एक हद तक याद रख पाए हैं, लेकिन प्रकृति से अपने संबंधों को लेकर पूरी तरह बेफिक्र हो गए। प्रकृति के संबंध में गंभीरता से विचार करना हमने लगभग छोड़ दिया। जबकि, प्रकृति माता है, प्रकृति हममें जीने की आस जगाती है। निराशा के क्षण में उम्मीद की किरण देती है। लेकिन, हम अपनी ऋषि-परंपरा को भूल गए, उसमें यह बाद निहित है कि प्रकृति के साथ सहज संबंध ही मनुष्य को पूर्णतर बनाता है।
मैं समझता हूं कि प्रकृति से अभिभावक तुल्य संबंध ही मानव-दृष्टि का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। पतझड़ के मौसम में वृक्ष के सारे पत्ते टूटकर जमीन पर बिखर जाते हैं। लेकिन, वृक्ष पर उसका कोई असर नहीं होता है। वह तो मौसम के बदलने की राह देखता रहता है। फिर कुछ दिन बाद वृक्ष में पत्ते आने शुरू हो जाते हैं। फिर से वृक्ष पर हरियाली छा जाती है। वही ठूंठ पेड़ फिर से हम सबको छांव देने लगता है। इसी तरह से जीवन में एक समय आता है, जब आशा के सभी पत्ते झड़ जाते हैं। हम तेजी से निराशा की ओर बढ़ने लगते हैं। ऐसी बेला में धैर्य की जरूरत होती है। उसी ठूंठ वृक्ष के समान अविचल रहने की जरूरत आ पड़ती है। उस समय प्रकृति को अपना आराध्य मानकर चिंतन करना चाहिए। ऐसा कर व्यक्ति निराशा के बोझ से बाहर निकल सकता है।
महामारी का यह वक्त संध्या बेला की तरह है। क्षणभर रहने वाली है। स्मरण रहे कि हमारे यहां संध्या को आत्माचिंतन के साथ वंदना की बेला कहा गया है। वह ध्यान में उतरने की बेला है। आराधना के साथ-साथ यह लोक-रीति और गीति की बेला है। संध्या बेला सबके घर लौटने की बेला है। काम पर गया व्यक्ति हो, गउ माताएं हो, चहचहाते पक्षी हों या फिर कोई और। दरअसल, पूरी प्रकृति समस्त ऐन्द्रिय व्या पार सिमटकर अंतर्मुख होने लगती है। समय के साथ इस बेला का अंत हो जाता है। यही प्रकृति का नियम है।
महामारी के इस काल में जैसी खबरें आ रही हैं, उससे लोगों में निराशा पैदा हो रही है। लोग निराशा के भाव में डूबते जा रहे हैं। युवा पीढ़ी की हताशा बढ़ रही है। कुछ आत्महत्या की खबरें भी आई हैं। वहीं घर-परिवार की कलह खुलकर सामने आ रही हैं। हालांकि, यह सब नहीं होना चाहिए। ऐसी विपरीत परिस्थिति में प्रकृति से उन्नयन की प्रेरणा लेनी चाहिए। प्रकृति साक्षात उदाहरण रूप में सामने है। यह सीख लेनी चाहिए कि जिस प्रकार प्रकृति परिवर्तनशील है, उसी तरह जीवन में बदलाव आता है। मानव-जीवन प्रकृति का ही एक छोटा रूप है। जब हम पूजा करते हैं, तब भूमि-पूजन, सूर्य-पूजन, वनस्पति-पूजन, अग्नि-पूजन की चर्चा करते हैं। इसी तरह तुलसी, पीपल, वट सावित्री की पूजा करते हैं। लेकिन इन सबके बीच जब हम अपने जीवन के कुछ बिंदुओं पर चिंतन करते हैं तो निराश होने लगते हैं। यह उचित नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिए कि वह व्यक्ति जो रात से उबरने की आस नहीं संभाल सकता, वह अगले प्रभात तक धीरज नहीं बंध सकता है। संघर्ष के अवसान पर ही सत्वर का उदय होता है।
हम जानते हैं कि प्रकृति अपना संदेश बड़े कोमल और सहज रूप में देती है। हम देखते हैं कि कमल कीचड़ में खिलता है। इसके बावजूद वह अपनी अलग पहचान बनाता है। इस पहचान से आशय यह है कि मनुष्य को भी अपने आसपास के कीचड़ से दूर रहकर अपनी अलग पहचान बनानी होगी। क्योंकि, कमल का संदेश तो यही है- कीचड़ के बीच भी गुण से युक्त रहें। कमल प्रकृति की सुंदर रचना है। इस सुंदर रचना के जरिए प्रकृति हमें सिखाती है कि मुस्कुराते रहिए और भारतीय संस्कृति प्रतीक पुरुष बने रहिए। साथ ही जीवन के आने वाले सुख-दुख का आनंद लेते रहें। इसी तरह नदियां और पहाड़ भी अपने व्यवहार से सुक्ष्म मानवीय गुण की शिक्षा देते हैं। इसलिए प्रकृति के हर रंग और रूप का आनंद लें। साथ ही इस बात की सीख अर्जित करें कि प्रकृति के अनुकूल कैसे जीवन पथ पर आगे बढ़ा जाए। प्रकृति के तौर पर हम तुलसी के पौधे, पीपल और वट के वृक्ष की पूजा करते हैं, जिससे हमारे मन में आत्मविश्वास बढ़ता है। यही आत्मविश्वास आगे बढ़ने का मूल मंत्र होता है।
( लेखक उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं )