सावरकर मशाल तो ज्वाला भगत सिंह

    दिनांक 28-सितंबर-2020
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डॉ. नीरज देव


जिन करतार सिंह सराभा को भगतसिंह अपना गुरु मानते थे उन साराभा में उत्कट देशभक्ति की लौ जलाई थी वीर सावरकर ने। भगत सिंह ने कई लेखों में सावरकर को ‘वीर’ कहकर संबोधित किया था और उनको अनूठी विभूति बताया था


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वीर सावरकर के विरोधियों द्वारा बार-बार अमर हुतात्मा भगतसिंह की शहादत की दुहाई देकर वीर सावरकर की ‘माफीवीर’ कहकर भर्त्सना की जाती है। वास्तव में सरदार भगतसिंह गांधी, गांधीवाद तथा उनकी कांग्रेस से कोसों दूर थे, वे वीर सावरकर के विचारों, व्यक्तित्व एवं कृत्यों से प्रभावित थे। यहां हम इसी पर कुछ चर्चा करेंगे।

जन्म से क्रांतिकारी
चाफेकर बंधुओं के बलिदान के पश्चात 14 वर्षीय विनायक मन ही मन सोचने लगा, ‘चाफेकर तो चले गये, अब उनके कार्य का क्या होगा ?’ उसी दौरान उसने अनेक समाचार पत्र पढ़े। लगभग सभी ने चाफेकर के साहस, देशप्रेम को किसी ने किसी कारण से गलत ठहराया था। यह सब पढ़कर विनायक के चिंतनशील मन में विचार आया कि अगर देश के लिए हौतात्म्य पाने जैसे महान कार्य की सार्वजनिक रूप से इतनी आलोचना होती रहेगी, तो चाफेकर जैसा देशकार्य करने को कौन तैयार होगा? अगर लोग बस आवेदन, विनतियों को ही देश का काम समझेंगे तो यह गलत होगा। चाफेकर का कार्य किसी को तो संभालना होगा। लेकिन कौन? इसी से उसके मन में विचार आया ‘कोई और क्यों, मैं क्यों नहीं?’ और बस, मात्र 14 साल की आयु में विनायक ने सशस्त्र क्रांतिकार्य की प्रतिज्ञा ली, जो भारत के स्वाधीन होने तक निभायी।

क्रांतिकारियों के पुरोधा
इतिहास का परिशीलन करने के पश्चात सावरकर ने पाया कि केवल भावना से ओत-प्रोत होकर, एकाध अंग्रेज को मारकर स्वतंत्रता प्राप्ति का कठिन कार्य संभव नहीं होगा, अपितु संगठन बनाना पड़ेगा। श्रीकृष्ण, शिवाजी, रामदास, मैजिनी, गैरिबाल्डी आदि विभूतियों ने जिस प्रकार युक्ति व शक्ति दोनों का प्रयोग किया, वैसा ही कुछ करना होगा। साथ ही क्रांति की यह ज्वाला सेना से लेकर सामान्य व्यक्ति तक, पूरे भारत में धधकानी होगी। अंग्रेज का शत्रु यानी हमारा मित्र, फिर वह चाहे कोई हो, उसकी सहायता लेनी होगी। इन सभी का तथा अन्य संबंधित चीजों के संपूर्ण विवरण का तत्वज्ञान सशस्त्र क्रांतिकार्य को प्रदान करना होगा।

इन्हीं उद्देश्यों को लेकर 1900 में उन्होंने अभिनव भारत संगठन की नींव रखी तथा सशस्त्र क्रांतिकार्य को दर्शन प्रदान करने हेतु ‘जोसेफ मैजिनी का चरित्र व कार्य’ एवं ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’, ये दो ग्रंथ लिखे। सावरकर ने ये ग्रंथ इतिहास कथन हेतु नहीं, अपितु सशस्त्र क्रांति में मार्गदर्शन हेतु एक समान सूत्र लेकर लिखे थे। अभिनव भारत संगठन तथा ये तीनों ग्रंथ उनके प्रभावी व्यक्तित्व का ही अविष्कार थे। सावरकर के ही प्रभाव में आकर 1906-07 में मदनलाल ढींगरा, लाला हरदयाल, अय्यर, वीरेंद्र चट्टोपाध्याय, सेनापति बापट, भाई परमानंद सरीखे प्रतिभाशाली युवा सशस्त्र क्रांति में सम्मिलित हुए। इस संदर्भ में उन दिनों लंदन में सावरकर के सहयोगी रहे एम. पी. टी. आचार्य लिखते हैं-‘‘उनका व्यक्तिगत तेज ऐसा था कि उनसे सिर्फ हाथ मिलाने भर से वी.वी. अय्यर और लाला हरदयाल जैसे जिद्दी व्यक्ति न सिर्फ रूपांतरित हुए बल्कि पूरी प्रखरता से सामने आए।’’ (मराठा, 27 मई,1938)

सावरकर से सशस्त्र क्रांति की दीक्षा प्राप्त ये सभी युवा सशस्त्र क्रांति की अलख जगाते विश्व के कोने-कोने में पहुंचे व अपने कार्य से नये-नये देशभक्त तैयार करते गये। इन्हीं में से दो सशस्त्र क्रांतिकारी लाला हरदयाल व भाई परमानंद अमेरिका पहुंचे। वहां बाबा सोहन सिंह भकना व उनके साथी कनाडा व अमेरिका में बसे भारतीय युवाओं का एक बड़ा संगठन बना रहे थे। लेकिन संगठन का उद्देश्य क्या हो, आगे क्या व कैसे करना चाहिए, इस संदर्भ में दिशा खोजने हेतु उन्होंने लाला हरदयाल को बुलावा भेजा। लालाजी, भाई परमानंद को लेकर वहां पहुंचे और  वहां के भारतीय युवाओं में भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अलख जगायी। उसी से प्रेरित होकर बाबा सोहन सिंह तथा उनके सहयोगियों ने गदर आंदोलन को जन्म दिया। गदर नामक पत्रिका के माध्यम से सावरकर का साहित्य व चरित्र छपवाकर युवाओं में देशप्रेम की चेतना जगायी। हुतात्मा विष्णु गणेश पिंगले के निर्देशानुसार सावरकर की ‘1857 का स्वतंत्रता संग्राम’ पुस्तक ‘गदर’ में क्रमश: छपने लगी।

यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी जान पड़ता है कि बाबा सोहनसिंह तथा अन्य क्रांतिकारी बाद में वामपंथी विचारधारा से जुड़ गये और इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी जड़ तक को भुला दिया। साथ ही, आगे चलकर उन्होंने गदर आंदोलन में लाला हरदयाल के वास्तविक योगदान को भी नकारा, ऐसे में वे लाला हरदयाल के प्रेरणास्रोत सावरकर को भला क्यों याद रखते ? उनकी इस कृतघ्नता की उन्हीं के साथी गदरी बाबा पृथ्वीसिंह आजाद ने अपनी आत्मकथा ‘क्रांति के पथिक’ में इन शब्दों में भर्त्सना की-‘‘बाबा सोहनसिंह भकना ने भी अपने लेखों, भाषणों व चर्चाओं के द्वारा लाला हरदयाल का अपमान करने का ही प्रयास किया है।

बाबा सोहनसिंह का व्यक्तित्व ऋषितुल्य है, इसलिए उनके जैसे लोगों को किसी से द्वेष करना शोभा नहीं देता।’’(क्रांति पथ का पथिक, पृ. 63) अस्तु! लाला हरदयाल से प्रेरित अनेक युवा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित हुए, उन्हीं युवाओं में से एक थे करतार सिंह सराभा। उस समय मात्र 16 साल के रहे करतार सिंह सराभा ‘गदर’ के संपादन विभाग में शामिल हो गये। उस जमाने के युवा लाला हरदयाल के बयानों व व्यक्तित्व से किस कदर प्रभावित थे, इसका वर्णन करते हुए बाबा पृथ्वीसिंह आजाद लिखते हैं, ‘‘हर शिक्षित भारतीय, विशेषकर पंजाबी युवा लालाजी के तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित हो चुके थे।’’ (क्रांति पथ का पथिक, पृ.63) वीर सावरकर से दीक्षित लाला हरदयाल व भाई परमानंद की देशभक्ति से उपजे करतार सिंह सराभा आगे चलकर गदर के एक शीर्ष नेता बने।

भगतसिंह के गुरु करतार सिंह सराभा
प्रथम विश्व युद्ध का फायदा उठाकर भारत में, विशेषकर पंजाब में सेना व जनता में विद्र्रोह उत्पन्न करने हेतु करतार सिंह भारत पहुंचे। भारत आते ही वे क्रांतियुद्ध के लिए कुशल नेता ढूंढने लगे। तब उन्हें याद आई रासबिहारी बसु की। रासबिहारी स्वयं सावरकर से प्रभावित थे। हिंदुस्तान पत्र के 27 जनवरी, 1946 अंक में प्रकाशित समाचार के अनुसार रासबिहारी ने सावरकर का अभिवादन करते हुए कहा था, ‘सावरकर, आकाशवाणी से आपको प्रणाम करते समय मुझे मेरे वरिष्ठ साथी को प्रणाम करने का आनंद मिल रहा है। आपको वंदन करना यानी साक्षात् त्यागमूर्ति का वंदन करने जैसा है। आपका दिखाया मार्ग ही स्वातंत्र्य प्राप्ति का सच्चा मार्ग है।’

करतार सिंह सराभा गदर में संपादन विभाग में होने के कारण सावरकर साहित्य से अवगत थे और जिनके नेतृत्व में वे काम कर रहे थे, वे रासबिहारी बसु सावरकर को अपना मार्गदर्शक मानते थे। (टू ग्रेट इंडियन रिवोल्यूशनरीज-उमा मुखर्जी, पृ. 157) उनके दूसरे मार्गदर्शक साथी भाई परमानंद सावरकर के शिष्य थे। बाद में उनके साथ फांसी के फंदे पर झूलने वाले विष्णु गणेश पिंगले सावरकर-परंपरा से ही थे। इस प्रकार सभी ओर से सावरकर से जुडेÞ करतार सिंह जैसे देशभक्त का  सावरकर के प्रभाव से बच पाना असंभव था। एक दृष्टि से देखें तो करतार सिंह भी सावरकर की प्रतिभा की ही उपज थे। लेकिन क्रांतिकार्य में बरती जाने वाली गोपनीयता व बहुत छोटी आयु में हुतात्मा बनने के कारण करतार सिंह शायद अपने व वीर सावरकर के संबंधों को चित्रित न कर पाये हों, यह भी संभव है। करतार सिंह के बलिदान से भगतसिंह काफी प्रभावित थे। 1928 के आरंभिक मास में प्रकाशित ‘शहीद करतार सिंह सराभा’ लेख में भगतसिंह करतार सिंह के बारे में लिखते हैं, ‘‘भारतवर्ष में बहुत कम ऐसे इंसान पैदा हुए हैं, जिन्हें सही अर्थों में विद्रोही कहा जा सकता है। इन गिने-चुने नेताओं में करतार सिंह का नाम सबसे ऊपर है।’’(भगत सिंह, संपूर्ण दस्तावेज 7-138)


अंततोगत्वा हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वीर सावरकर व हुतात्मा भगतसिंह दो पूर्णत: अलग विचारों वाले व्यक्ति नहीं थे। अपितु सरदार भगतसिंह वीर सावरकर की परंपरा के वाहक ही थे। वीर सावरकर को भी अपनी परंपरा के संवाहक पर, वारिस पर, हुतात्मा भगतसिंह पर गर्व था।

यह लेख दिखाता है कि भगतसिंह करतार सिंह सराभा से बहुत प्रभावित थे। फिर भी यहां पर यह स्पष्ट करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि प्रस्तुत दस्तावेज के संपादक आलेख के शीर्ष में ही टिप्पणी करते हैं, ‘‘शहीद करतार सिंह सराभा को भगतसिंह अपना प्रेरणास्रोत मानते थे। वह उनका चित्र अपने पास रखते थे, और कहते थे, ये मेरे गुरु, साथी व भाई हैं।’’(भगतसिंह, संपूर्ण दस्तावेज 7-138) अब देखिए, वीर सावरकर से लाला हरदयाल, भाई परमानंद, रासबिहारी, पिंगले से करतार सिंह और करतार सिंह से सरदार भगतसिंह तक, यह कड़ी स्पष्ट रूप से देखने मिलती है। सावरकर जी के जिस अद्भुत प्रभाव की बात एम.पी.टी. आचार्य करते हैं, उसे ध्यान में रखते हुए सावरकर के प्रभाव से बच पाना भगतसिंह जैसे युवा के संबंध में बिल्कुल असंभव था।

भगतसिंह के साथी सावरकर-प्रभाव में
सरदार भगतसिंह के  साथी महाराष्ट्र में जन्मे राजगुरु बचपन से ही सावरकर कथा सुनते आये थे। आगे चलकर उनकी मुलाकात वीर सावरकर के बड़े भाई क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर से हुई। उन्होंने ही राजगुरु को क्रांतिकार्य की दीक्षा दी। (राजगुरु: द इन्विजीबल रिवोल्युशनरी-अनिल वर्मा, पृ.94) बाबाराव सावरकर व चंद्र्रशेखर आजाद के संबंध सर्वविदित हैं। आजाद के बलिदान से दो दिन पहले ही उनकी बाबाराव से अंतिम मुलाकात हुई थी। (क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर-द. न. गोखले, पृ.108) यशपाल तो अपनी आत्मकथा में सावरकर बंधुओं के प्रति अपनी श्रद्धा का वर्णन करते दिखाई देते हैं। वे स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि किसी भी महापुरुष को देखकर उसके पैर छूने की इच्छा उन्हें कभी नहीं हुई... लेकिन बाबाराव सावरकर को देखकर ऐसी इच्छा हुई और उन्होंने झुककर उनके पैर छुए। (सिंहावलोकन, पृ. 110)

भगतसिंह सावरकर-प्रभाव में
सरदार भगतसिंह के लगभग सभी वामपंथी जीवनीकार सावरकर के प्रभाव को नकारते हुए भगतसिंह को लेनिन की छाया में खड़ा करते हैं। लेकिन अगर भगतसिंह के उपलब्ध साहित्य का अवगाहन करें तो पता चलता है, उन्होंने चित्रगुप्त द्वारा लिखी सावरकर की जीवनी ‘लाइफ आॅफ बेरिस्टर सावरकर’ पढ़ी थी और उससे वे काफी प्रभावित थे। (भगतसिंह के दस्तावेज, पृ.171) सावरकर के ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’, ‘हिंदू पदपादशाही’ जैसे ग्रंथ तो उन्होंने पढेÞ ही थे, साथ ही वे सावरकर का ‘श्रद्धानंद’ नियमित पढ़ते थे। (तत्रैव 243)

अगर सावरकर से हाथ मिलाते ही लाला हरदयाल जैसों के सावरकर के कायल हो जाने के बारे में सोचें तो समझ आता है, सावरकर चरित्र व साहित्य पढ़ने के पश्चात सावरकर प्रभाव से बच पाना कितना कठिन रहा होगा। और तो और और अगर पाठक सरदार भगतसिंह जैसा प्रतिभाशाली व संवेदनशील देशभक्त युवक था, तब तो ऐसा बिल्कुल भी संभव नहीं था।

सावरकर परंपरा के वाहक भगत सिंह
सरदार भगत सिंह सावरकर साहित्य के मात्र पाठक नहीं थे, अपितु वाहक भी थे। पाठक होना सामान्य बात है। पाठक होने का अर्थ यह नहीं है कि हम उन विचारों से जुड़ गये। उसका अर्थ मात्र इतना होता है कि हम उन विचारों से अवगत हैं, हम उन विचारों को जानते हैं। लेकिन वाहक होने का अर्थ है उस परंपरा से जुड़ना, उसका प्रचार करना। इस दृष्टि से देखा जाये तो भगतसिंह वीर सावरकर के विचारों के वाहक, प्रचारक भी रहे। उन्होंने सावरकर की उस समय दुर्लभ पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ का प्रकाशन भी किया था। यह बात तो सब जानते हंै, लेकिन यह बात कम लोग ही जानते हैं कि श्रद्धानंद में प्रकाशित लेखों का प्रभाव भगतसिंह पर बहुत था। सावरकर के एक लेख ‘अत्याचार शब्दाचा अर्थ’ को भगतसिंह ने ‘आतंक के असली अर्थ’ नाम से ज्यों का त्यों प्रकाशित किया था, जो आज भी उनके संपूर्ण दस्तावेज में उपलब्ध है। (12-243) श्रद्धानंद में सावरकर ने जिस प्रकार काकोरी प्रकरण पर लेख लिखे थे वैसे ही भगतसिंह ने भी किरती में लिखे थे। इतना ही नहीं, जिस प्रकार सावरकरजी ने मई 1928 को ‘वीरमाता क्षीरोदवासिनी देवी’(तेजस्वी तारे, पृ. 77) शीर्षक से शचींद्रनाथ सान्याल की माता को श्रद्धांजलि अर्पित की, उसी प्रकार उसके पश्चात सितम्बर 1928 में भगतसिंह ने ‘युगांतकारी मां’ लेख लिखकर शचींद्रनाथ की माताजी को श्रद्धांजलि अर्पित की थी। (भगतसिंह दस्तावेज, पृ.276)। यह मात्र एक संयोग नहीं था, बल्कि उनका सावरकर विचार परंपरा से जुड़ाव था।

भगतसिंह का सावरकर की भांति सशस्त्र क्रांतिकारी होने मात्र का ही रिश्ता नहीं था, बल्कि सुधारवादी होने, मुस्लिमों की अलगवाद की प्रवृत्ति अखरने, भारत को जोड़ने वाली एक भाषा की आवश्यकता लगने आदि में भी उन दोनों में समानता पाई जाती है। भगतसिंह की जेल डायरी में ‘हिंदू पदपादशाही’ के कुछ अंश पाये जाते हैं। गुमशुदा पन्नों में हिंदुत्व के भी अंश होने की संभावना हो सकती है। भगतसिंह और अधिक जीवन जी पाते तो शायद सावरकर के अत्यधिक करीबी होते।

सावरकर के मुरीद भगत सिंह
सरदार भगतसिंह ने गांधी, नेहरू, सुभाषचंद्र्र, कांग्रेस...यहां तक कि जिनके लिए उन्होंने सांडर्स को मारा, उन लाला लाजपत राय की भी किसी न किसी कारण आलोचना की थी। लेकिन उनके पूरे साहित्य में सावरकर की किसी भी प्रकार की आलोचना देखने को नहीं मिलती। इसके बजाय उनमें उनके प्रति आदर और सम्मान ही पाया जाता है।

वामनराव चव्हाण बताते हैं कि 12 फरवरी 1928 को सरदार भगत सिंह राजगुरु के साथ सावरकर से मिलने रत्नागिरि पहुंचे थे। (रत्नागिरी पर्व-बाल सावरकर, पृ. 190) वह दोनों मिले थे, उनमें क्या चर्चा हुई थी, इस तथ्य पर सावरकर व भगतसिंह दोनों मौन हैं। लेकिन सावरकर के व्यक्तित्व के भगतसिंह कितने कायल थे, उसके अनेक उदाहरण भगतसिंह के साहित्य में पाये जाते हैं।

‘1857 का स्वातंत्र्य समर’, सावरकर के इस क्रांतिकारी ग्रंथ को पढ़ने के पश्चात भगतसिंह उनसे और ज्यादा प्रभावित हुए, इसका वर्णन करते हुए उनके साथी राजाराम शास्त्री लिखते हैं, ‘‘वीर सावरकर द्वारा लिखित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक ने भगतसिंह को बहुत अधिक प्रभावित किया था। यह पुस्तक तत्कालीन भारत सरकार द्वारा जब्त कर ली गई थी। मैंने इस पुस्तक की बहुत प्रशंसा सुनी थी और इसे पढ़ने का बहुत ही इच्छुक था। पता नहीं, कहां से भगतसिंह को यह पुस्तक प्राप्त हो गई थी। वह एक दिन इसे मेरे पास ले आये। जिससे पुस्तक ली होगी, उसे वह जल्द वापस करनी होगी, इसलिए वह मुझे बहुत कहने पर भी उसे देने को तैयार नहीं हो रहे थे। पर जब मैंने पढ़कर उसे जल्दी और अवश्य लौटा देने का पक्का वादा किया, तब उन्होंने वह मुझे केवल 36 घंटे के लिए पढ़ने को दी। उस बात को मैं कभी नहीं भुला सकता। एक वक्त खाना नहीं खाया और रात-दिन उसे पढ़ता रहा। पुस्तक ने मुझे बहुत ज्यादा प्रभावित किया। भगतसिंह के आने पर मैंने उनके सामने पुस्तक की बहुत प्रशंसा की।’’(अमर शहीदों के संस्मरण, पृ. 89,90) राजाराम शास्त्री आगे विस्तृत रूप से भगतसिंह द्वारा ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक के गुप्त रूप से प्रकाशन की बात करते हैं। इस पुस्तक के संदर्भ में भगत सिंह लिखते हैं, ‘‘जहां तक हमें पता है, इस आजादी की जंग का एकमात्र स्वतंत्र इतिहास लिखा गया, जो कि बैरिस्टर सावरकर ने लिखा था और जिसका नाम है ‘1857 की आजादी की जंग का इतिहास’ (द  हिस्ट्री आॅफ इंडियन वार आॅफ इंडिपेंडेंस1857)।’’(भगतसिंह दस्तावेज, पृ.172) ‘श्री मदनलाल ढींगरा’ शीर्षक से अपने लेख में वे सावरकर के कारण ढींगरा के देशभक्त बनने की कहानी बताते हैं। सावरकर जी ने ढींगरा की परीक्षा कैसे ली, यह बताते हुए वे लिखते हैं-‘‘हम दुनियादार क्या जानें, मौत के विचार तक से डरने वाले हम कायर लोग क्या जानें कि देश की खातिर कौम के लिए प्राण दे देने वाले वे लोग कितने ऊंचे, कितने पवित्र और कितने पूजनीय हैं।’’(भगतसिंह दस्तावेज, पृ. 167)

यहां गौर करने वाली बात है कि भगतसिंह स्वयं को ‘कायर’ व सावरकर, मदनलाल को ‘पवित्र व पूजनीय’ करार देते हैं। वे सावरकर को ‘वीर’ कहकर संबोधित करते हैं। वे लिखते हैं, ‘‘बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए उनकी निंदा में। पर उस समय भी एक सावरकर वीर थे, जिन्होंने खुलेआम उनका (मदनलाल का) पक्ष लिया।’’ (भगतसिंह दस्तावेज, पृ. 167) इस प्रकार की सावरकर पर पामर द्वारा प्रहार करने की, उसको सावरकर के साथी द्वारा मार गिराने की बात बड़े गौरव से लिखी गई, फिर भी सावरकर कैसे अविचल, अडिग रहे, उसका वे वर्णन करते हैं।

मतवाला में 15 व 22 नवम्बर 1924 को प्रकाशित ‘विश्वप्रेम’ नामक लेख में सावरकर के प्रति अपना आदर दिखाते हुए वे लिखते हैं, ‘‘विश्वप्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी, कट्टर अराजकतावादी कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नहीं समझते। वही वीर सावरकर। विश्वप्रेम की तरंग में आकर घास पर चलते-चलते रुक जाते कि कोमल घास पैरों तले मसली जायेगी।’’ (भगतसिंह दस्तावेज, पृ. 93)

हुतात्मा भगतसिंह सावरकर जी को बड़े सम्मान से बार-बार वीर कहते हैं, यह तथ्य भगतसिंह को वीर कहकर सावरकर को कायर करार देने वालों को ध्यान में रखना चाहिए। वीर सावरकर का इतना सटीक वर्णन सावरकर के साथ लंदन में रहने वाले निरंजन पाल के अलावा शायद ही किसी अन्य क्रांतिकारी ने किया हो। इसका अर्थ साफ है, सावरकर के केवल सशस्त्र क्रांतिकारी विचारों से ही नहीं, बल्कि उनकी मानवतावादी दृष्टि से भी वे अवगत थे। उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि भगतसिंह वीर सावरकर के गहरे प्रशंसक थे।

भगत सिंह का बलिदान और सावरकर
सावरकर पर यह झूठा आरोप लगाया जाता है कि भगतसिंह की शहादत पर वे मौन थे। पर तथ्य बताते हंै कि भगतसिंह को फांसी की सजा हुई, यह समाचार सावरकर को रत्नागिरि के पास वरंवडी गांव में मिला। उस समय वे एक विद्यालय के समारोह में थे । ‘‘जैसे ही यह समाचार सुना, सावरकर जी की आंखें आंसुओं से भर गईं। उनके चेहरे पर विलक्षण शोक झलक रहा था।’’ इस प्रकार का वर्णन उस समय वहां पर उपस्थित स. दी. पाटिल करते हैं। (सावरकर यांच्या आठवणी, पृ. 48)

भगतसिंह की फांसी के दूसरे दिन सावरकर शहादत पर मराठी में एक कविता लिखी थी, जो दूसरे दिन प्रभात फेरी में युवाओं द्वारा गाई गई थी। (समग्र सावरकर साहित्य, खंड 7 पृ. 22) उसकी कुछ पंक्तियों का हिंदी रूपांतरण इस प्रकार है-
अधम है वह कौन जो ?
हेतु तेरी वीरता की,
जो न गाये शुद्धता।
जाओ, हुतात्माओ!
सुन लो!
कसम तुम्हारी;
हम हैं बाकी, देख लो।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस प्रकार की कविता उन्होंने मात्र चाफेकर बंधुओं की फांसी पर लिखी थी। उस कविता में भी यही भाव था कि ‘आप जाओ, हम संभाल लेंगे’। यह कविता दिखाती है कि उनका भगतसिंह के प्रति कितना गहरा लगाव था। अभिनव भारत समापन कार्यक्रम में भी वे भगतसिंह का गौरवपूर्ण उल्लेख करते हैं। (समग्र सावरकर साहित्य, खंड 8 पृ. 23) इसके अलावा भगतसिंह की माताजी का सावरकर के कार्यक्रम में आना व सावरकर जी द्वारा उनके पैर छूकर प्रणाम करना आदि उनके गहरे लगाव का ही परिचायक है। अंततोगत्वा हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वीर सावरकर व हुतात्मा भगतसिंह दो पूर्णत: अलग विचारों वाले व्यक्ति नहीं थे। अपितु सरदार भगतसिंह वीर सावरकर की परंपरा के वाहक ही थे। वीर सावरकर को भी अपनी परंपरा के संवाहक पर, वारिस पर, हुतात्मा भगतसिंह पर गर्व था।
(लेखक मनोचिकित्सक हैं एवं पी.एचडी. के समकक्ष उपाधि दशग्रंथी सावरकर से सम्मानित हैं)