खेती से खिलवाड़ बंद

    दिनांक 28-सितंबर-2020
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नरेश सिरोही

हाल ही में केंद्र सरकार ने लोकसभा और राज्यसभा में तीन कृषि सुधार विधेयकों को पारित कराया है, जिसे लेकर हंगामा मचा हुआ है। विपक्षी दल यह कह कर किसानों को गुमराह कर रहे हैं कि नया कानून एमएसपी प्रणाली के तहत उन्हें प्राप्त सुरक्षा कवच को कमजोर करेगा और बड़ी कंपनियों को किसानों के शोषण का मौका देगा। किसानों के बीच यह भ्रम भी फैलाया गया है कि सरकार एमएसपी व्यवस्था समाप्त करने जा रही है। वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार अपने पहले कार्यकाल से ही कृषि व्यवस्था में सुधार के जरिए कृषि क्षेत्र को समृद्ध और कल्याणकारी योजनाओं से किसानों को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध रही है। सरकार ने किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए हाल ही में कई फैसले लिए हैं। सरकार द्वारा 6,685 करोड़ रुपये की लागत से 10,000 एफपीओ यानी किसान उत्पादक संगठन गठित किए जाएंगे। एफपीओ के माध्यम से किसानों की बाजार, वित्त और उत्पादन तकनीकों तक पहुंच बढ़ेगी। इसी तरह, एक लाख करोड़ रुपये की लागत वाला कृषि अवसंरचना कोष सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों और फसल कटाई के उपरांत प्रबंधन से जुड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण करेगा। सरकार ने 2022 तक कृषि निर्यात को दोगुना बढ़ाकर 60 अरब डॉलर करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके अलावा, सरकार ने कृषि सुधारों की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए ‘कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक-2020’, ‘कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन’ एवं कृषि सेवा करार विधेयक-2020 और ‘आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक-2020’ नामक तीन विधेयको को संसद के दोनों सदनों से पारित कराकर एक महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर लिया है।

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक-2020: यह विधेयक जहां कृषि उपज की विक्रय-व्यवस्था को बिचौलियों/आढ़तियों को  एकाधिकार वाली नीति से मुक्त कराने का मार्ग प्रशस्त करेगा, वहीं बाजार के उतार-चढ़ाव से भी किसानों को सुरक्षा कवच प्रदान करेगा। किसानों को मंडियों में अव्यवस्था के कारण परिवहन लागत, लंबी कतारों, नीलामी में देरी और स्थानीय माफिया के गठजोड़ से होने वाले नुकसान से भी छुटकारा मिलेगा। यह विधेयक किसानों को अपनी उपज को देश में कहीं भी, किसी भी व्यक्ति या संस्था को बेचने की इजाजत देता है। किसानों की लंबे समय से ‘एक देश एक बाजार’ की लंबित मांग भी पूरी हो सकेगी। इससे किसान अपने उत्पाद को खेत में या व्यापारिक प्लेटफार्म पर देश में कहीं भी बेच सकेंगे।

कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवा करार विधेयक-2020: यह विधेयक फसल की बुआई से पहले किसान को अपनी फसल को तय मानकों और तय कीमत के अनुसार बेचने का अनुबंध करने की सुविधा प्रदान करता है। इससे किसान के उत्पादन और मूल्य, दोनों से जुड़े जोखिम घटेंगे।  इसके तहत किसान कृषि आधारित उद्योगों, थोक-विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं, निर्यातकों आदि के साथ अनुबंध कर सकेंगे। अनुबंधित किसानों को ऋण की सुविधा, तकनीकी सहायता, बीज की उपलब्धता, फसल बीमा सुविधाएं आदि भी उपलब्ध कराई जाएंगी। कृषि क्षेत्र में निजी निवेश आने से वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज, परिवहन तथा एग्रो इंडस्ट्री लगने का रास्ता भी खुलेगा, जिसका किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। यह अधिनियम किसानों के जमीन पर उनके मालिकाना हक और खेती के अधिकार को पूरी तरह से सुरक्षित रखेगा। किसानों को किसी भी समय इस करार से बिना कोई जुर्माना दिए निकलने की आजादी होगी। कई राज्यों में बड़े किसान कॉरपोरेट घरानों के साथ मिलकर नकद फसल उत्पादन कर रहे थे। अब यह लाभ छोटे किसान भी ले सकेंगे।

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मैं पहले भी कह चुका हूं और एक बार फिर कहता हूं, एमएसपी की व्यवस्था जारी रहेगी। सरकारी खरीद जारी रहेगी। हम यहां अपने किसानों की सेवा के लिए हैं। हम अन्नदाताओं की सहायता के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे और उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करेंगे। — नरेंद्र मोदी,प्रधानमंत्री


कृषि में आया एक बड़ा फर्क
 तिलहन
  • 4,573.57 करोड़ रुपये की सरसों खरीदी गई राजग के कार्यकाल में किसानों से 2019-20 के दौरान
  •  शून्य खरीद हुई 2013-14 के दौरान मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सरसों की
दलहन
  • 1168.71 करोड़ रुपये की मूंग खरीदी गई किसानों से 2019-20 के दौरान
  •  शून्य खरीद हुई 2013-14 के दौरान किसानों से मूंग की
अनाज
  • 62,802.88 करोड़ रुपये की गेहूं की खरीद की गई 2019-20 के दौरान किसानों से
  •  33,871.50 करोड़ रुपये का गेहूं खरीदा गया था संप्रग के कार्यकाल में 2013-14 के दौरान
  •  85 प्रतिशत अधिक गेहूं खरीदा गया राजग के कार्यकाल में संप्रग कार्यकाल के मुकाबले
 प्याज निर्यात
  • 5 से बढ़ाकर 10 प्रतिशत की गई प्याज उत्पादकों के लिए निर्यात प्रोत्साहन राशि
आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम-2020: इस विधेयक के पारित हो जाने के बाद अब दाल, प्याज, आलू और खाद्य तेल आदि सहित विभिन्न कृषि उत्पाद स्टॉक सीमा की परिधि से बाहर हो जाएंगे। कृषि विपणन में सुधार के लिए इस विधेयक का पारित होना जरूरी माना जा रहा था। सरकार द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 के माध्यम से भंडारण सीमा तब तय की गई थी, जब देश में खाद्यान्न की कमी थी, लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं। आज देश में किसानों द्वारा खाद्यान्नों का अत्यधिक उत्पादन हो रहा है। विधेयक में संशोधन के बाद कृषि क्षेत्र की आपूर्ति शृंखला में निजी कारोबारी या निवेशक आसानी से निवेश कर सकेंगे। इससे भंडारण क्षमता बढ़ेगी और किसानों को अपनी पैदावार के अच्छे दाम मिल सकेंगे। सरकार द्वारा विभिन्न जिंसों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को अब केवल बेहद खास परिस्थितियों में ही लगाया जा सकेगा। अब केवल युद्ध, भीषण सूखा, आसमान छूती महंगाई और प्राकृतिक आपदाओं आदि के समय ही इन प्रावधानों को लागू किया जा सकेगा।

कांग्रेस ने भी सुधार का वादा किया था
किसानों के हितों की रक्षा के लिए बने कायदे-कानूनों में बदली कृषि परिस्थितियों के मद्देनजर लंबे समय से बदलावों की जरूरत महसूस की जा रही थी। 6 फरवरी, 1990 में भानु प्रताप सिंह की अध्यक्षता में बनी एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति ने 26 जुलाई, 1990 को एक रिपोर्ट भारत सरकार को सौपी थी। इसमें तीनों अध्यादेशों में सुधार करने की संस्तुति की गई थी। केंद्रीय कैबिनेट ने समिति की संस्तुतियों को स्वीकार भी कर लिया था, लेकिन वी.पी. सिंह की सरकार गिर जाने के कारण इनका क्रियान्वयन नहीं हो पाया। इसके बाद 2003 में अटल बिहारी वाजयपेयी सरकार ने मंडियों में व्याप्त विसंगतियों को खत्म करने के लिए एक मॉडल कानून तैयार कर राज्यों को भेजा था। आज कांग्रेस इन तीनों अध्यादेशों का विरोध कर रही है, लेकिन इसी ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में किसानों के हित के लिए तीनों अध्यादेशों में सुधार की बात की थी। आजादी से पहले 1938 में सर छोटूराम के नेतृत्व में संयुक्त पंजाब सरकार द्वारा किसानों को व्यापारियों के चंगुल से बचाने के लिए मंडी समितियों का निर्माण किया गया था तथा आजादी के बाद 1950 से 1956 के बीच देश के लगभग सभी राज्यों में किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) कानून बनाया गया था।
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किसानों से जुड़े तीनों विधेयक क्रांतिकारी साबित होंगे। इससे किसानों को उपज के लिए लाभकारी मूल्य दिलाना तय होगा। इन  विधेयकों से राज्य के कानूनों का अधिग्रहण नहीं होता।
— नरेंद्र सिंह तोम,केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री
कृषि बजट
19,819 करोड़ रुपये का कृषि बजट था 2013-14 के दौरान

57,600 करोड़ रुपये  का कृषि बजट हो गया 2018-19 में 

1,30,485 करोड़ रुपये  तक पहुंच गया कृषि बजट 2020-21 में

6 गुना से अधिक वृद्धि हुई कृषि बजट में 2013-14 के मुकाबले 2020-21 में

140% से अधिक की वृद्धि हुई बजट में इस एक साल के दौरान
क्या हैं किसानों की मांगें?
देश के आंदोलित किसानों की वैसे तो कई मांगें हैं, लेकिन इनमें दो प्रमुख हैं। पहला, सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैधानिक बनाया जाए ताकि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने का कानूनी अधिकार मिले। दूसरा, कृषि मूल्य एवं लागत आयोग को संवैधानिक मान्यता प्रदान कर उसे एक स्वाधिकार प्राप्त आयोग का दर्जा दिया जाए और सरकार आयोग की सिफारिशों को मानने के लिए बाध्य हो। इसके अलावा, किसान सरकार से यह आश्वासन भी चाहते हैं कि सरकार कर विषमता के माध्यम से ऐसी कोई भी परिस्थिति तैयार नहीं करेगी, जिससे विकल्प के रूप में स्थापित मंडियों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। सरकार ने अनुबंध खेती के तहत होने वाले विवादों को सुलझाने के लिए एसडीएम अदालत को अधिकृत किया है और इसके लिए समयसीमा भी तय कर दी है। एसडीएम अदालत को 30 दिन के अंदर विवाद का निबटारा करना होगा। लेकिन सरकार द्वारा समयसीमा तय करने के बावजूद भी देशभर के किसानों को आशंका है कि एसडीएम अदालत में उन्हें समय पर न्याय नहीं मिल पाएगा। इसलिए किसान चाहते हैं कि सरकार विधेयक में सुधार करे। उनका कहना है कि अगर विवाद का निबटारा तय समयसीमा में नहीं हुआ तो उस स्थिति में एसडीएम के लिए व्यक्तिगत सजा या दंड का प्रावधान हो। साथ ही, अपील की स्थिति में भी समयसीमा और दंड के नियम तय किए जाएं। किसानों का कहना है कि वह उत्पादक ही नहीं, बल्कि उपभोक्ता भी है, इसलिए महंगाई पर नियंत्रण रखने के साथ जमाखोरों पर शिकंजा कसने के लिए सरकार को ऐसा पोर्टल बनाना चाहिए, जिससे देश में खाद्यान्न भंडारण की निगरानी की जा सके।

विकसित देशों में कृषि व्यवस्था को सरकारी संरक्षण
भारत ही नहीं, दुनियाभर के विकसित देशों की कृषि व्यवस्था पर नजर डालें तो यह स्पष्ट है कि किसी भी देश की कृषि व्यवस्था सरकारी संरक्षण तथा भारी-भरकम सब्सिडी के बिना नहीं चल रही है। चूंकि हमारे देश में कृषि क्षेत्र सबसे अधिक रोजगार देता है, इसलिए इसे संरक्षण देना अत्यावश्यक है। भारत के किसानों को संरक्षण प्रदान करने के लिए 1950 के दशक में एपीएमसी एक्ट तथा 1966 में न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली लागू की गई थी। 1930 में वैश्विक आर्थिक मंदी से अपने किसानों को बचाने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने कीमत समर्थन नीति बनाई थी। वर्तमान समय में भी अमेरिका 210 बिलियन डॉलर नई सब्सिडी सहित लगभग 800 बिलियन डॉलर से अधिक सब्सिडी दे रहा है। अमेरिका सहित सभी यूरोपीय देश एवं जापान जैसे सभी विकसित देश अपने किसानों को संरक्षण प्रदान करने के लिए भारी कृषि सब्सिडी दे रहे हैं। अमेरिका ने कृषि क्षेत्र में लगभग सात दशक पहले बाजार सुधारों की शुरुआत की थी। वहां पूरी तरह से खुला बाजार है, जहां बड़ी कंपनियों के लिए कोई भंडार सीमा नहीं है। अनुबंध खेती और वादा बाजार भी है।

कृषि व्यापार अध्यादेश पर भाकियू का सुझाव
केंद्र सरकार ने इस साल जून में कृषि व्यापार-2020 से संबंधित तीन अध्यादेश जारी किए हैं, जिनका उद्देश्य किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाना है। भारतीय किसान संघ (भाकियू) शुरू से ही इस बात का पक्षधर रहा है कि किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिले। साथ ही, भाकियू चाहता है कि किसानों की उपज का समर्थन मूल्य तय किया जाए तथा उन्हें अपनी फसल कहीं भी बेचने की स्वतंत्रता हो। लेकिन इन अध्यादेशों से यह उद्देश्य कितना सफल होगा, इस पर भाकियू ने आशंका जताई है। करार अध्यादेश में भी केवल खरीदार पक्ष के हित का ही ख्याल रखा गया है। किसानों को फसल का पूरा लाभ मिले, उनका शोषण न हो तथा उपभोक्ताओं को भी उचित मूल्य पर कृषि उत्पाद मिल सके, इसके लिए भाकियू के राष्ट्रीय महामंत्री बद्रीनारायण चौधरी ने अध्यादेशों में संशोधन के लिए केंद्र सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं-
  1.  सभी प्रकार की फसलों की खरीद ‘कम से कम समर्थन मूल्य पर’ होने का कानूनी प्रावधान किया जाए।
  2.  निजी व्यापारियों का ‘राज्य एवं केंद्र स्तर पर पंजीयन’ अनिवार्य हो तथा उनकी बैंक सुरक्षा हो। यह सरकारी पोर्टल या वेबसाइट के जरिए सभी को उपलब्ध हो।
  3. फसल से जुड़े विवाद के निबटारे के लिए स्वतंत्र ‘कृषि न्यायालय’ की स्थापना की जाए तथा सभी विवादों का निबटारा किसान के गृह जिले में ही किया जाए।
  4. सरकार द्वारा जारी अध्यादेशों में ‘किसान’ की परिभाषा में कॉरपोरेट कंपनियां भी एक किसान के तौर पर आ रही हैं। इसे तर्कसंगत बनाया जाए और जो केवल कृषि पर निर्भर हैं, उन्हें ही किसान माना जाए।
अमेरिका में एक देश, एक बाजार की अवधारणा नहीं है, बल्कि एक दुनिया, एक बाजार व्यवस्था लागू है। वहां के किसान दुनिया के किसी भी देश में निर्यात कर सकते हैं। इन सब के बावजूद भी अमेरिका में कृषि पर गंभीर संकट है। इस साल अमेरिका के किसानों पर 425 अरब डॉलर कर्ज हो गया है। बहुत से यूरोपीय देश तो अपने किसानों को संकट से बचाने के लिए प्रति हेक्टेयर भारी सब्सिडी तक दे रहे हैं।
भारत सरकार को इन सब कृषि सुधारों के इतर किसानों के संरक्षण के लिए भी सजग रहना होगा। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों को भरोसा दिया है कि कृषि सुधार से संबंधित कानून उनके हितों की पूरी तरह से रक्षा करेंगे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि एमएसपी व्यवस्था किसी भी सूरत में खत्म नहीं की जाएगी और सरकारी खरीद पहले की तरह जारी रखी जाएगी। उन्होंने किसानों को यह आश्वासन भी दिया है कि विकल्प के रूप में एपीएमसी मंडियों को खत्म नहीं किया जाएगा। यह सुधार 21वीं सदी की जरूरत है। यह किसानों को आत्मानिर्भर बनाने का प्रयास है।