विश्व को चाहिए कई वैक्सीन

    दिनांक 28-सितंबर-2020   
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अधूरी कुंठित विचारधाराओं, व्यक्तिगत हितपूर्ति की इच्छाओं पर पलते विषाणुओं का इलाज कोविड जितना ही जरूरी है। विश्व को लोकतंत्र और वैश्विक मानवता की वैक्सीन की जरूरत है। दुनिया में लोकतंत्र कैसे मजबूत हो, दुनिया में समानता के अधिकारों की बात कैसे हो और ये जो छलने वाले लोग हैं, इनकी वैक्सीन अगर नहीं खोजेंगे तो ऐसे वायरस बार-बार आते रहेंगे।
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एक चलचित्र में बहुत सारे स्थिर-चित्र होते हैं, लेकिन देखने वाले को उसमें शामिल किसी खास चित्र के कितने आयाम हैं, इसका अंदाजा तब तक नहीं होता जब तक उसे फ्रीज नहीं किया जाता। वायरस के साथ भी ऐसा ही है। कोविड महामारी का एक असर यह हुआ है कि हमारे सामने वायरस का यह फ्रेम इस साल मार्च से ही फ्रीज हो गया है और हमें इसके तमाम आयाम दिखने लगे हैं। जो दिख रहा है, वह पहले भी था और कभी यहां तो कभी वहां दिख जाता था, लेकिन अब यह एक सीधी रेखा में दिखने लगा है। दिखने लगा है कि वायरस केवल वही नहीं जो हमारे शरीर को खा रहा है, दुनियाभर में लोगों की जान ले रहा है। वायरस वह भी है जो देश को खा रहा है, वायरस वह भी है जो यहां-वहां लोकतंत्र को खा रहा है, वायरस वह भी है जो आंदोलन की आड़ में अहिंसा को खा रहा है।

जैसे, साम्यवाद के चोले में छिपे विस्तारवाद के वायरस को देखें, जिसने समानता और मानवाधिकारों के नाम पर सबसे पहले अपने यहां इन्हीं को खत्म किया। घर के बाद ध्यान पड़ोस पर गया और यह दूसरे देशों की सीमाओं को निगलने लगा। ड्रैगेन के पेट में तिब्बत जैसे कई देश समा गए। तिब्बत के बाद उसने नेपाल के रूईगांव इलाके पर कब्जा किया और अब उसने हुम्ला इलाके में भी वही कहानी दोहरा दी है। अब वहां चीनी इमारतें खड़ी हो गई हैं। हाल-फिलहाल तक चीन के इशारे पर पेशबंदी करने वाले नेपाल के सियासी हल्के का रंग उड़ा हुआ है और लोग सड़कों पर निकल रहे हैं।

दरअसल, यह वायरस मीठी बीमारी है। मधुमेह की तरह, जो शरीर को अंदर ही अंदर खा जाता है। तो ये जो साम्यवादी चोले में विस्तारवाद का 'चीनी वायरस' है वह दोस्ती के संदेश, विकास के वादे, सस्ते कर्ज जैसी मीठी चीजों के साथ जड़ें जमाता है और पीठ में घोंपने के लिए छुरा भी तैयार रखता है। दुनियाभर में ऐसे तमाम देश हैं जिन्हें चीन के इस वायरस ने जकड़ रखा है।
एक और वायरस है। लोकतंत्र को लगा हुआ सैन्यतंत्र का वायरस। इसका उदाहरण भी पड़ोस से ही लें। पाकिस्तान में कभी अलख तो जगाई गई थी लोकतंत्र की, लेकिन सारा इंतजाम ऐसा किया कि मुखौटा रहे लोकतंत्र का, लेकिन पीछे रहे जनरल।
पाकिस्तान में आतंकवाद से लेकर घरेलू उन्माद-कट्टरता को इसी वायरस ने बढ़ाया है। अब उसने गिलगित—बालटिस्तान को अपना नया प्रांत बनाने का दांवपेंच चलना शुरू कर दिया है। आग से खेलने की कोशिश। हाल में पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने राजनीतिक दलों के नेताओं की इस मामले में बैठक भी बुलाई, लेकिन सिर्फ इसलिए ताकि लोकतंत्र का मुखौटा बना रहे।

वायरस के साथ एक और बात है-दो वायरस एक जैसे माहौल में बेहतर तरीके से फलते-फूलते हैं और इसी का नतीजा है कि विस्तारवाद का वायरस और पाकिस्तान में लोकतंत्र को लगा सैन्यतंत्र का वायरस साथ-साथ सपने संजो रहे हैं। डर था कि कहीं भारत अड़ न जाए, कुछ बड़ा कदम न उठा ले। लिहाजा, पाकिस्तान में बाजवा ने इमरान से इतर नेताओं को साधने की कोशिश की। लेकिन इसी क्रम में बिलावल भुट्टो जैसे नेताओं के साथ बाजवा की कहासुनी हो गई। बिलावल ने आगाह किया कि सेना को इस तरह का फैसला राजनीतिक नेतृत्व पर छोड़ देना चाहिए। इसी क्रम में बिलावल ने 1971 का भी जिक्र कर दिया कि इसी तरह पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए थे। खैर, इसी के साथ एक बार फिर पाकिस्तान की सियासत में सेना का चेहरा जरा जाहिर हो गया।

वैसे, वहां के लोगों के लिए भी पाकिस्तानी सेना एक पहेली है-वह सेना है, व्यापारी है, तानाशाह है...क्या है? पाकिस्तान को इस वायरस ने इतना विकृत कर दिया है कि यह आतंकवाद का ढेर दिखाई देता है, मानवाधिकारों को रौंदने वाला मुल्क दिखाई देता है, अव्यवस्था का घूरा नजर आता है। इस वायरस ने पाकिस्तान को लोथड़े जैसा बना दिया है।

अब आस-पड़ोस से बाहर की बात। यूरोप में हमने देखा कि रंगभेद, नस्लभेद के विरुद्ध मानवाधिकारों और समानता की बात करते हुए 'ब्लैक लाइव्स मैटर' (बीएलएम) का जो आंदोलन चला, उनका हथियार ही हिंसा है। वहां वास्तव में न तो समानता की गुंजाइश है और न ही शांति की बात है। यही बात अश्वेत जॉर्ज फ्लायड की दुखद मृत्यु के बाद हुए घटनाक्रम बताते हैं। श्वेत या अश्वेत—अंतर होना ही क्यों चाहिए! और, एक के हक की बात करते हुए दूसरे के साथ हिंसा क्यों!

जॉर्ज फ्लायड अश्वेत थे और जैक गार्डनर श्वेत। जैक गार्डनर अमेरिका में बार चलाते थे। उनके यहां बीएलएम वाले घुस आए और परिवार वालों को बुरी तरह पीटा। जान बचाने में जैक ने गोली चला दी, जिससे एक हमलावर की मौत हो गई। अदालत ने भी उसे निर्दोष माना, लेकिन बीएलएम वाले लगातार हंगामा करते रहे और उनके दबाव में नया अभियोजक नियुक्त हुआ, जिसने जैक के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। हताश जैक ने आत्महत्या कर ली। यह क्या है! अधिकारों की लड़ाई की आड़ में पर्याप्त अव्यवस्था और अराजकता का वायरस! यह वायरस समानता की बात करते हुए सबसे पहले इसी का गला घोंटता है। यह अपराध करते हुए सुरक्षित रहने का अधिकार चाहता है, लेकिन यह नहीं चाहता कि सामने वाला अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उनका प्रतिकार करे।  
 
बात साफ है। अधूरी कुंठित विचारधाराओं, व्यक्तिगत हितपूर्ति की इच्छाओं पर पलते विषाणुओं का इलाज कोविड जितना ही जरूरी है। विश्व को लोकतंत्र और वैश्विक मानवता की वैक्सीन की जरूरत है। दुनिया में लोकतंत्र कैसे मजबूत हो, दुनिया में समानता के अधिकारों की बात कैसे हो और ये जो छलने वाले लोग हैं, इनकी वैक्सीन अगर नहीं खोजेंगे तो ऐसे वायरस बार-बार आते रहेंगे। जब तक इनका इलाज नहीं होगा, कोई भी महामारी व्याप बढ़ाकर वैश्विक आपदा में बदलती रहेगी।क चलचित्र में बहुत सारे स्थिर-चित्र होते हैं, लेकिन देखने वाले को उसमें शामिल किसी खास चित्र के कितने आयाम हैं, इसका अंदाजा तब तक नहीं होता जब तक उसे फ्रीज नहीं किया जाता। वायरस के साथ भी ऐसा ही है। कोविड महामारी का एक असर यह हुआ है कि हमारे सामने वायरस का यह फ्रेम इस साल मार्च से ही फ्रीज हो गया है और हमें इसके तमाम आयाम दिखने लगे हैं। जो दिख रहा है, वह पहले भी था और कभी यहां तो कभी वहां दिख जाता था, लेकिन अब यह एक सीधी रेखा में दिखने लगा है। दिखने लगा है कि वायरस केवल वही नहीं जो हमारे शरीर को खा रहा है, दुनियाभर में लोगों की जान ले रहा है। वायरस वह भी है जो देश को खा रहा है, वायरस वह भी है जो यहां-वहां लोकतंत्र को खा रहा है, वायरस वह भी है जो आंदोलन की आड़ में अहिंसा को खा रहा है।

जैसे, साम्यवाद के चोले में छिपे विस्तारवाद के वायरस को देखें, जिसने समानता और मानवाधिकारों के नाम पर सबसे पहले अपने यहां इन्हीं को खत्म किया। घर के बाद ध्यान पड़ोस पर गया और यह दूसरे देशों की सीमाओं को निगलने लगा। ड्रैगेन के पेट में तिब्बत जैसे कई देश समा गए। तिब्बत के बाद उसने नेपाल के रूईगांव इलाके पर कब्जा किया और अब उसने हुम्ला इलाके में भी वही कहानी दोहरा दी है। अब वहां चीनी इमारतें खड़ी हो गई हैं। हाल-फिलहाल तक चीन के इशारे पर पेशबंदी करने वाले नेपाल के सियासी हल्के का रंग उड़ा हुआ है और लोग सड़कों पर निकल रहे हैं।

दरअसल, यह वायरस मीठी बीमारी है। मधुमेह की तरह, जो शरीर को अंदर ही अंदर खा जाता है। तो ये जो साम्यवादी चोले में विस्तारवाद का 'चीनी वायरस' है वह दोस्ती के संदेश, विकास के वादे, सस्ते कर्ज जैसी मीठी चीजों के साथ जड़ें जमाता है और पीठ में घोंपने के लिए छुरा भी तैयार रखता है। दुनियाभर में ऐसे तमाम देश हैं जिन्हें चीन के इस वायरस ने जकड़ रखा है।
एक और वायरस है। लोकतंत्र को लगा हुआ सैन्यतंत्र का वायरस। इसका उदाहरण भी पड़ोस से ही लें। पाकिस्तान में कभी अलख तो जगाई गई थी लोकतंत्र की, लेकिन सारा इंतजाम ऐसा किया कि मुखौटा रहे लोकतंत्र का, लेकिन पीछे रहे जनरल।
पाकिस्तान में आतंकवाद से लेकर घरेलू उन्माद-कट्टरता को इसी वायरस ने बढ़ाया है। अब उसने गिलगित—बालटिस्तान को अपना नया प्रांत बनाने का दांवपेंच चलना शुरू कर दिया है। आग से खेलने की कोशिश। हाल में पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने राजनीतिक दलों के नेताओं की इस मामले में बैठक भी बुलाई, लेकिन सिर्फ इसलिए ताकि लोकतंत्र का मुखौटा बना रहे।

वायरस के साथ एक और बात है-दो वायरस एक जैसे माहौल में बेहतर तरीके से फलते-फूलते हैं और इसी का नतीजा है कि विस्तारवाद का वायरस और पाकिस्तान में लोकतंत्र को लगा सैन्यतंत्र का वायरस साथ-साथ सपने संजो रहे हैं। डर था कि कहीं भारत अड़ न जाए, कुछ बड़ा कदम न उठा ले। लिहाजा, पाकिस्तान में बाजवा ने इमरान से इतर नेताओं को साधने की कोशिश की। लेकिन इसी क्रम में बिलावल भुट्टो जैसे नेताओं के साथ बाजवा की कहासुनी हो गई। बिलावल ने आगाह किया कि सेना को इस तरह का फैसला राजनीतिक नेतृत्व पर छोड़ देना चाहिए। इसी क्रम में बिलावल ने 1971 का भी जिक्र कर दिया कि इसी तरह पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए थे। खैर, इसी के साथ एक बार फिर पाकिस्तान की सियासत में सेना का चेहरा जरा जाहिर हो गया।

वैसे, वहां के लोगों के लिए भी पाकिस्तानी सेना एक पहेली है-वह सेना है, व्यापारी है, तानाशाह है...क्या है? पाकिस्तान को इस वायरस ने इतना विकृत कर दिया है कि यह आतंकवाद का ढेर दिखाई देता है, मानवाधिकारों को रौंदने वाला मुल्क दिखाई देता है, अव्यवस्था का घूरा नजर आता है। इस वायरस ने पाकिस्तान को लोथड़े जैसा बना दिया है।

अब आस-पड़ोस से बाहर की बात। यूरोप में हमने देखा कि रंगभेद, नस्लभेद के विरुद्ध मानवाधिकारों और समानता की बात करते हुए 'ब्लैक लाइव्स मैटर' (बीएलएम) का जो आंदोलन चला, उनका हथियार ही हिंसा है। वहां वास्तव में न तो समानता की गुंजाइश है और न ही शांति की बात है। यही बात अश्वेत जॉर्ज फ्लायड की दुखद मृत्यु के बाद हुए घटनाक्रम बताते हैं। श्वेत या अश्वेत—अंतर होना ही क्यों चाहिए! और, एक के हक की बात करते हुए दूसरे के साथ हिंसा क्यों!

जॉर्ज फ्लायड अश्वेत थे और जैक गार्डनर श्वेत। जैक गार्डनर अमेरिका में बार चलाते थे। उनके यहां बीएलएम वाले घुस आए और परिवार वालों को बुरी तरह पीटा। जान बचाने में जैक ने गोली चला दी, जिससे एक हमलावर की मौत हो गई। अदालत ने भी उसे निर्दोष माना, लेकिन बीएलएम वाले लगातार हंगामा करते रहे और उनके दबाव में नया अभियोजक नियुक्त हुआ, जिसने जैक के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। हताश जैक ने आत्महत्या कर ली। यह क्या है! अधिकारों की लड़ाई की आड़ में पर्याप्त अव्यवस्था और अराजकता का वायरस! यह वायरस समानता की बात करते हुए सबसे पहले इसी का गला घोंटता है। यह अपराध करते हुए सुरक्षित रहने का अधिकार चाहता है, लेकिन यह नहीं चाहता कि सामने वाला अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उनका प्रतिकार करे। 

बात साफ है। अधूरी कुंठित विचारधाराओं, व्यक्तिगत हितपूर्ति की इच्छाओं पर पलते विषाणुओं का इलाज कोविड जितना ही जरूरी है। विश्व को लोकतंत्र और वैश्विक मानवता की वैक्सीन की जरूरत है। दुनिया में लोकतंत्र कैसे मजबूत हो, दुनिया में समानता के अधिकारों की बात कैसे हो और ये जो छलने वाले लोग हैं, इनकी वैक्सीन अगर नहीं खोजेंगे तो ऐसे वायरस बार-बार आते रहेंगे। जब तक इनका इलाज नहीं होगा, कोई भी महामारी व्याप बढ़ाकर वैश्विक आपदा में बदलती रहेगी।
@hiteshshankar