एफसीआरए : गोरखधंधे का खुला फंदा

    दिनांक 29-सितंबर-2020
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डॉ. अजय खेमरिया

सामाजिक कार्य और अन्य अनेक मुद्दों पर एनजीओ बनाकर विदेशों से करोड़ों रुपए का चंदा लेकर भारत विरोधी गतिविधियों और अपने सेकुलर एजेंडे पर लगातार काम कर रहे अनेक फर्जी संगठनों पर एफआरसीए कानून में संशोधन के बाद लगाम कसेगी। ‘अल्पसंख्यकों और गरीबों के हितों पर चोट’ का नाम लेकर इस कानून के विरोध में उतरा ‘सेकुलर ईकोसिस्टम’ 
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पिंजरा तोड़ गुट ने दिल्ली दंगों में मुसलमानों को पड़ोसी हिन्दुओं के खिलाफ भड़काने का काम किया। इसकी दो कार्यकर्ता पकड़ी भी गई थीं
लोकसभा में गत 23 सितम्बर को पारित एफसीआरए (फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट यानी विदेशी अभिदाय कानून) संशोधन कानून को लेकर सेकुलर लॉबी में फिर खलबली मची हुई है। मनीष तिवारी, अधीर रंजन चौधरी, सौगत राय, बी.बी. पाटिल जैसे नेताओं ने इस विधेयक का विरोध करते हुए इसे हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे से जोड़ा। यह नया विदेशी अभिदाय कानून भारत की धरती पर भारत के ही कुछ नागरिक समूहों की राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को निषिद्ध करने का विधिक प्रावधान स्थापित करता है। ध्यान से देखें तो मानवाधिकार, गरीबी, शिक्षा, कुपोषण और नागरिक अधिकारों के नाम पर भारत में विदेशी षड्यंत्र लंबे समय से फल-फूल रहे हैं। कमोबेश ये मुद्दे वामपंथी विचारसरणी का हिस्सा भी हैं।  इन मामलों पर भारत विरोधी रुख जेएनयू, एएमयू, जामिया, जाधवपुर जैसे तमाम शैक्षणिक संस्थानों के अलावा अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आनन्द ग्रोवर, इंदिरा जयसिंह, स्वामी अग्निवेश, अरुणा राय, बी.डी. शर्मा, तीस्ता सीतलवाड़, राजगोपाल पीवी, विनायक सेन, हर्ष मंदर, हेनरी टिफेन, मार्टिन मेकवान, अपूर्वानन्द, रवीश कुमार जैसे लोगों के आचरण में सार्वजनिक  रहा है।

वस्तुत: बुद्धिजीवी और एनजीओ आधारित अध्ययन मण्डली एक ‘अभिजन गिरोह’ है, जिसका दर्शन वामपंथ पर टिका है। केन्द्र की मोदी सरकार के सामने यह गिरोह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। पूर्व में भी इनकी करतूतें देश के लिए खतरा बन चुकी हैं। मामला चाहे नक्सलियों के समर्थन का हो या परमाणु, बिजली, कोयले से जुड़ी विकास परियोजनाएं,  इस गिरोहबंदी ने भारत के विकास को अवरुद्ध करने का काम किया है। वामपंथ के सेकुलर एजेंडे के अनुरूप देश की बदनामी और सौहार्द को दूषित करने में इस अभिजन गिरोह ने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी है। हाल ही का दिल्ली दंगा और बेंगलुरू की घटनाओं  के बरअक्स इसे समझने की जरूरत है।

मोदी सरकार ने इस ‘एनजीओवाद’ के पीछे छिपे राष्ट्र विरोधी गठबंधन को बेनकाब करने का काम मौजूदा एफसीआरए संशोधन विधेयक के माध्यम से किया है। इस नए कानून के बाद अब सभी गैर सरकारी संगठनों को विदेशी चंदा प्राप्त करने के क्रम में अपने सभी पदाधिकारियों के आधार नम्बर दर्पण पोर्टल पर प्रविष्ट कराने होंगे। इस मद में मिलने वाली रकम एसबीआई के एक विशिष्ट खाते में जमा कर इसका व्यय प्रतिवेदन भी सरकार को निर्धारित प्रपत्र पर सौंपना होगा। अभी सरकार के समक्ष ऐसे तमाम प्रकरण आए हैं जिनमें विदेशों से प्राप्त धन का इस्तेमाल मद-परिवर्तित कर भारत में सरकार और विकास परियोजनाओं के विरुद्ध लोगों को भड़काने में किया गया है। 2010 से 2019 की अवधि में विदेशी चंदे की वार्षिक आमद दोगुनी हुई है। खास बात यह है कि 2016-17 और 2018-19 में 58 हजार करोड़ रुपये विदेशों से भारतीय एनजीओ के खातों में आये हंै। यह राशि भारत सरकार के कई कल्याणकारी विभागों से अधिक है।

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भारत में मानवाधिकार शिक्षा के लिए ‘असाधारण काम’ करने के लिए ‘पीपुल्स वॉच’ एनजीओ के प्रमुख हेनरी टिफेन को एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 8वें मानवाधिकार सम्मान से सम्मानित किया था। देश के 10 राज्यों में इस संगठन के 5 हजार स्कूल होने का दावा किया जाता है। छत्तीसगढ़ में संगठन की भड़काऊ भूमिका विवादों में रही है। मोदी सरकार ने इसका एफसीआरए निरस्त किया तो हेनरी उच्च न्यायालय तक गए थे। गुजरात सरकार ने तीस्ता सीतलवाड़ के संगठन के विरुद्ध केंद्र सरकार के पास सप्रमाण शिकायत दर्ज कराई थी।

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2009 से 2014 तक संप्रग सरकार में भारत की अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रहीं इंदिरा जयसिंह के एनजीओ ‘लॉयर्स कलेक्टिव’ पर भी विदेशी मदद के दुरुपयोग का संगीन आरोप विचाराधीन  है। इस संस्था को 2006 से 2014 के मध्य एफसीआरए से 33.39 करोड़ रु. की मदद मिली थी, जिसमें से 7.2 करोड़ फोर्ड फाउंडेशन, 4.1 करोड़ अमेरिका की विवादित संस्था ओपन सोसायटी के अलावा लाबीस्ट्रॉस से धन मिला था। इस दौरान इंदिरा जयसिंह की विदेश यात्राओं पर हुआ करीब एक करोड़ रुपये का खर्च एनजीओ द्वारा उठाया गया।
आज देश में करीब 22,500 ऐसे संगठन है जो इस धनराशि को अपने कार्यक्रमों के नाम पर अमेरिका, चीन, जापान, यूरोप से लेकर इस्लामिक देशों से प्राप्त करते हंै। गौर करने वाली बात यह है कि हाल ही में राजीव गांधी फाउंडेशन, राजीव गांधी चेरिटेबल ट्रस्ट, राजीव गांधी इंस्टीट्यूट आॅफ कंटेपरेरी स्टडीज को दुश्मन देश चीन से प्राप्त लाखों डॉलर के खर्च की जांच ईडी को सौंपी गई है। ‘स्टडीज’ के नाम पर इन ‘थिंक टैंकों’ ने  यूरोपीय आयोग, आयरलैंड सरकार, और सयुंक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम जैसे संगठनों से भी बड़ा चंदा हासिल किया है। पिछली मनमोहन सिंह सरकार के दौरान प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष रहे बिबेक देवरॉय इसी राजीव गांधी कंटम्परेरी स्टडीज के निदेशक रहे हंै। पिछले साल गृह मंत्रालय ने 12 एनजीओ को चिन्हित किया था जो रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में अवैध रूप से प्रवेश कराने, उन्हें सयुंक्त राष्ट्र शरणार्थी प्रावधानों के अनुरूप कतिपय दस्तावेज उपलब्ध कराने का काम कर रहे थे। इन संगठनों में  एमनेस्टी इंटरनेशनल के भारतीय पदाधिकारियों के अलावा कोलकाता का ‘बोन्दी मुक्ति संगठन’ शामिल था। रोहिंग्या के मामले में सक्रिय अधिकतर एनजीओ दिल्ली में समाजकर्म के नाम पर पंजीकृत हैं। इस गिरोह में जामिया के एक प्रोफेसर के साथ भारतीय विदेश सेवा के एक पूर्व अधिकारी प्रमुख भूमिका में थे। दिल्ली दंगा मामले में भी एनजीओ ‘पिंजरा तोड़’ और प्रोफेसर अपूर्वानन्द की भूमिका जांच के घेरे में है। नए कानून में लोकसेवकों की गैर सरकारी संगठनों में भागीदारी पर नकेल कसने की व्यवस्था की गई है। साथ ही संगठन के प्रशासनिक व्यय की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 फीसदी कर दी गई है।

स्वाभाविक तौर पर देश में सिविल सोसायटी के नाम पर षड्यंत्र रचने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों को यह संशोधन रास नहीं आ रहा है, क्योंकि विदेशी धन पर जिहादी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग ऐशोआराम के साथ सरकार और देश के विरुद्ध खड़ा रहता आया है। प्रो.अपूर्वानन्द ही नहीं, देश में ऐसे सैकड़ों वामपंथी शिक्षक हैं जो लाखों रु. का वेतन सरकारी खजाने से लेने के बावजूद विदेशी चंदे पर ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ बन देश के विरुद्ध खड़े रहते हंै। पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म पर इनकी तगड़ी मौजूदगी दर्ज हुई है।

मुख्यधारा मीडिया से बाहर हुए बड़े पत्रकार अब कांग्रेस एवं वामपंथियों के ‘इको सिस्टम’ में काम कर रहे हंै। नंदनी सुंदर, हनी बाबू, प्रो. जी एन सांई, अपूर्वानन्द जैसे शिक्षक विभिन्न एनजीओ के थिंक टैंक सदस्य बन गए हैं। अल्पसंख्यक, मानवाधिकार हनन, आदिवासी, कश्मीर, पूर्वोतर मुद्दों पर ‘अध्ययन’ के नाम पर भारत को बदनाम करना इनका मुख्य व्यवसाय बन गया है। नंदनी सुंदर के पति सिद्धार्थ वरदराजन ‘द वायर’ जैसी प्रोपेगैंडा वेबसाइट चलाते हंै। इस वेबसाइट को ‘आईपीएसएमएफ-इंडेक्सडेंट एंड पब्लिक स्प्रिटिड फाउंडेशन’ से आर्थिक सहायता मिलती है। इस एनजीओ को आमिर खान, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, नंदन नीलकेणि, किरण मजूमदार चंदा देते हंै। जाहिर है, 50 फीसदी प्रशासनिक व्यय जब घटकर 20 फीसदी रह जायेगा तो अब इन एनजीओ के लिए बुद्धिजीवियों की आड़ में मौजूद वामपंथियों के शाही खर्चे उठाना बन्द हो जाएगा। यहां उल्लेखनीय है कि सरकार ने शोध मद पर कोई प्रतिबंध इस विधेयक में नहीं लगाया है। लेकिन शोर मचाया जा रहा है कि ‘मोदी सरकार अल्पसंख्यक संस्थानों को डराने में लगी है’। जबकि हकीकत यह है कि जकात, सबरंग, सफदर हाशमी ट्रस्ट, सद्भावना,  कंपैशन इंटरनेशनल, यंग मैन्स क्रिश्चियन एसोसिएशन, पीएफआई, नव सर्जन ट्रस्ट, पीपुल्स वॉच, अनहद जैसे तमाम संगठन विदेशी धन पर कन्वर्जन और समाज तोड़ने के कुत्सित एजेंडे पर लगातार काम करते आ रहे हैं।
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तीस्ता की संस्था सबरंग पर करोड़ों रु. के हेरफेर के आरोप लगे हैं।
तीस्ता ने संस्था में आए ‘चंदे’ को अपने ऐशोआराम और सुविधाओं पर खर्च किया था

अब इन एनजीओ के लिए बुद्धिजीवियों की आड़ में मौजूद वामपंथियों के शाही खर्चे उठाना मुश्किल  हो गया है। शोर मचाया जा रहा है कि ‘मोदी सरकार अल्पसंख्यक संस्थानों को डराने में लगी है’। हकीकत यह है कि जकात, सबरंग, सफदर हाशमी ट्रस्ट, सद्भावना, कंपैशन इंटरनेशनल, यंग मैन्स क्रिश्चियन एसोसिएशन, पीएफआई, नव सृजन ट्रस्ट, पीपुल्स वॉच, अनहद जैसे तमाम संगठन विदेशी धन पर कन्वर्जन और समाज तोड़ने के कुत्सित एजेंडे पर लगातार काम करते आ रहे हैं।
कुछ समय पूर्व एक सरकारी  रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आ चुका है कि विदेशी सहायता धन का 13 फीसदी कन्वर्जन पर खर्च किया गया। यह आंकड़ा तीन गुना भी हो सकता है, अगर इस पूरी राशि का बारीकी से स्वतंत्र अध्ययन किया जाए, क्योंकि अधिकांश बड़े एनजीओ शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और आश्रय के नाम पर छोटे एनजीओ को यह राशि भेज देते हैं। मुख्य एनजीओ मैदानी संगठनों के जरिये ही अपना एजेंडा पूरा कराते हंै। उदाहरण के लिए, राजगोपाल पीवी द्वारा संचालित एकता परिषद ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, ओडिशा, झारखण्ड जैसे जनजातीय बहुल राज्यों के अधिकतर जिलों में जिला समन्वयक सवैतनिक रखे हुये हंै जिन्हें फोर्ड फाउंडेशन मदद करता रहा है। एकता परिषद ‘जल, जंगल, जमीन के मुद्दों पर काम’ का दावा करती है, लेकिन उसका एजेंडा पूरी तरह से भाजपा और रा.स्व.संघ के विरुद्ध है। तथ्य यह है कि लोकतांत्रिक विरोध के नाम पर ऐसे संगठनों का एजेंडा विदेशों से नियंत्रित होता है। भारत में मानवाधिकार शिक्षा के लिए ‘असाधारण काम’ करने के लिए ‘पीपुल्स वॉच’ एनजीओ के प्रमुख हेनरी टिफेन को एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 8वें मानवाधिकार सम्मान से सम्मानित किया था। देश के 10 राज्यों में इस संगठन के 5 हजार स्कूल होने का दावा किया जाता है। छत्तीसगढ़ में संगठन की भड़काऊ भूमिका विवादों में रही है। मोदी सरकार ने इसका एफसीआरए निरस्त किया तो हेनरी उच्च न्यायालय तक गए थे। गुजरात सरकार ने तीस्ता सीतलवाड़ के संगठन के विरुद्ध केंद्र सरकार को सप्रमाण फंड का दुरुपयोग कर साम्प्रदायिक दुष्प्रचार करने में लिप्त होने की शिकायत की थी। नवसृजन ट्रस्ट भी गुजरात मे दलितों को भड़काने में अग्रणी है।
 
    नए कानून में अब ये हैं प्रावधान

  • विदेशी सहायता के दुरुपयोग पर व्यापक लगाम लगेगी
  • आधार से जुड़ने के बाद सभी पदाधिकारियों की भूमिका स्पष्ट होगी।
  • प्रशासनिक खर्च 50 से घटाकर 20 फीसदी होने से बुद्धिजीवियों के कथित अध्ययन
    और उनके शाही खर्चों पर अंकुश लगेगा।
  • लोकसेवकों की सहायता प्रतिबंधित होने से शासन तंत्र में जवाबदेही की स्थिति
    निर्मित होगी।
  • विदेशी धन को स्थानांतरित करने की कार्रवाई रोकने में कारगर साबित होगा
    नया संशोधित कानून, क्योंकि अभी गरीबी या शिक्षा के नाम पर ली गई
    विदेशी सहायता को बिना किसी रोक-टोक के दूसरे एनजीओ को ‘अन्य कामों’
    के लिए दे दिया जाता था।
  • एक अलग खाते में रखना होगा सहायता में मिला धन
  • व्यय मद का ब्योरा निर्धारित प्रपत्र पर सरकार को देना होगा
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अण्णा आन्दोलन मूलत: सिविल सोसायटी के नाम पर खड़ा किया गया था जिसकी हकीकत को देश की जनता अभी भी समझ नहीं पाई है। मनीष सिसौदिया के एनजीओ ‘कबीर’ को फोर्ड फाउंडेशन से एक लाख 97 हजार डॉलर की मदद मिली थी। अरुंधति राय खुद इसकी बन्दरबांट से असन्तुष्ट होकर इस पर पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगा चुकी हैं। यानी जिस फोर्ड फाउंडेशन की गतिविधियां देश के विरुद्ध हैं, उसकी मदद से खड़े लोग आज राष्टÑीय राजधानी क्षेत्र की सरकार चला रहे हैं।
एनजीओ के गठबंधन ने देश के मैदानी क्षेत्रों में तो अपना प्रभाव स्थापित किया ही, समानान्तर रूप से शासन और राजनीति को भी लंबे समय से अपनी जकड़ में ले रखा है। अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के उदय को गहराई से समझने की आवश्यकता है, क्योंकि अण्णा आन्दोलन मूलत: सिविल सोसायटी के नाम पर खड़ा किया गया था जिसकी हकीकत को देश की जनता अभी भी समझ नहीं पाई है। मनीष सिसौदिया के एनजीओ ‘कबीर’ को फोर्ड फाउंडेशन से एक लाख 97 हजार डॉलर की मदद मिली थी। अरुंधति राय खुद इसकी बन्दरबांट से असन्तुष्ट होकर इस पर पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगा चुकी हैं। यानी जिस फोर्ड फाउंडेशन की गतिविधियां देश के विरुद्ध हैं, उसकी मदद से खड़े लोग आज राष्टÑीय राजधानी क्षेत्र की सरकार चला रहे हैं। 2009 से 2014 तक संप्रग सरकार में भारत की अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रहीं इंदिरा जयसिंह के एनजीओ ‘लॉयर्स कलेक्टिव’ पर भी विदेशी मदद का दुरुपयोग का संगीन आरोप विचाराधीन  है। इस संस्था को 2006 से 2014 के मध्य एफसीआरए से 33.39 करोड़ रु. की मदद मिली थी, जिसमें से 7.2 करोड़ फोर्ड फाउंडेशन, 4.1 करोड़ अमेरिका की विवादित संस्था ओपन सोसायटी के अलावा लाबीस्ट्रॉस से धन मिला था। इस दौरान इंदिरा जयसिंह की विदेश यात्राओं पर हुआ करीब एक करोड़ रुपये का खर्च एनजीओ द्वारा उठाया गया। महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि भारत का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी क्यों और किस उद्देश्य से  विदेशी धन का उपभोग कर रहा था? संप्रग सरकार में जिस एनएसी को ‘शेडो कैबिनेट’ का दर्जा प्राप्त था, उसमें सोनिया गांधी के साथ ज्यां द्रेज, हर्ष मंदर, अरुणा रॉय जैसे ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ देश की नीतियों का निर्माण कर रहे थे। इसी एनएसी ने साम्प्रदायिक लक्षित हिंसा निवारण विधेयक का मसौदा तैयार कर भारत में जातीय एवं पांथिक अलगाव की नींव रखी थी। ग्रीन पीस और फोर्ड फाउंडेशन समेत अनेक मिशनरी और जिहादी उद्देश्यों वाले एनजीओ भारत में न केवल गरीबी और अशिक्षा का फायदा उठा रहे हैं बल्कि भारतीय शासन और राजनीति को भी सीधे-सीधे प्रभावित कर रहे हैं। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देशभर में माहौल को विषाक्त करने में इसी चिन्हित वर्ग का हाथ था।

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जकात फाउंडेशन खुलेआम रोहिंग्या घुसपैठियों के समर्थन में खड़ी रही है और 
उसने मोदी सरकार के खिलाफ हर तरह के दुष्प्रचार को हवा देने का काम किया है

मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, ओडिशा, झारखण्ड, पूर्वोतर, बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु,  दिल्ली जैसे राज्यों में अब राजनीतिक एजेंडे को भी यह एनजीओ पर टिका सेकुलर गिरोह अपने हिसाब से चलाने की कोशिश कर रहा है। गुप्तचर ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक कुछ बड़े वकीलों एवं एनजीओ का आपस में समझौता है जिसके तहत परमाणु बिजली घर, कोयला बिजलीघर, यूरेनियम खदान, जीएम तकनीकी, पनबिजली परियोजना के मामलों में पहले ‘अध्ययन’ के नाम पर मिथ्या रिपोर्ट तैयार कर प्रचारित की जाती है, फिर उसे सर्वोच्च न्यायालय/उच्च न्यायालय में जनहित याचिकाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस रिपोर्ट के अनुसार कुछ गैर सरकारी संगठनों का माओवादियों से सीधा रिश्ता है। एफसीआरए के जरिये  जर्मनी, फ्रांस, हॉलैंड, तुर्की, इटली से मिलने वाले फंड का उपयोग माओवादियों के जरिए हिंसा फैलाने में किया जाता है। प्रशांत भूषण, इंदिरा जयसिंह जैसे वकील भारतीय उद्यमियों के विरुद्ध न्यायालय में एक एजेंडे के तहत ही जनहित याचिकाओं को लाते हैं। एक अध्ययन में दावा किया गया है कि एनजीओ आधारित कानूनी अड़ंगों, धरना-प्रदर्शन के चलते भारत के सकल घरेलू उत्पाद को 3 फीसदी का घाटा उठाना पड़ता है। कुछ नामी वकीलों और एनजीओ गिरोहों  के मध्य औद्योगिक घरानों के साथ टेबल के नीचे परियोजना लागत के तय प्रतिशत के सौदे होने का दावा भी किया
जाता है।  

मोदी सरकार द्वारा एफसीआरए

के तहत विभिन्न राज्यों में रद्द
किए गए इतने लाइसेंस

राज्य           संख्या
दिल्ली             1178
जम्मू-कश्मीर     68
हरियाणा            174
कर्नाटक           708
ओडिशा          1361
केरल               1581
बिहार              1127
उत्तर प्रदेश       1916
आंध्र प्रदेश       2484
प. बंगाल         2089
महाराष्ट्र           2374
गुजरात          853
अरुणाचल प्रदेश    53
असम                  219
(इनके अलावा करीब 2700 संगठनों के
लाइसेंस भी देश के अन्य हिस्सों से
पूर्व में रद्द किए गए हैं)

मोदी सरकार ने 2014 से ही इन संस्थाओं की संदिग्ध गतिविधियों को खंगालने की कार्रवाई आरम्भ की और अभी तक 20673 एनजीओ के लाइसेंस रद्द किए हंै। सरकार के स्तर पर इन्हें मिलने वाले संरक्षण का नतीजा ही है कि देश मे 33 लाख एनजीओ में से केवल 10 फीसदी ही सरकार को नियमित रिपोर्ट करते है। खुद पी. चिदम्बरम ने गृह मंत्री के रूप में संसद में स्वीकार किया था कि आधे से अधिक एफसीआरए  प्राप्त संगठन न केवल धन का दुरुपयोग कर रहे है बल्कि सरकार को कोई रिपोर्ट भी नहीं करते हैं। इसके बावजूद कांग्रेस द्वारा नए कानून का विरोध केवल मोदी विरोध के नाम पर किया जा रहा है।

गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि एफसीआरए  एक राष्ट्रीय तथा आंतरिक सुरक्षा कानून है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन भारत के सार्वजनिक जीवन, राजनीति तथा सामाजिक विमर्श पर हावी न हो पाए। इस कानून के माध्यम से समाजकर्म को भारतीय प्रतिबद्धता के साथ खड़ा करना सरकार का लक्ष्य है, लेकिन सेकुलर लॉबी इस मुद्दे को भी ‘असहिष्णुता’ और ‘अल्पसंख्यकवाद’ के खांचे में रखने में जुट गई है।     (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)