पश्चिम बंगाल में कानून का नहीं कट्टरपंथी ताकतों का राज

    दिनांक 29-सितंबर-2020   
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तृणमूल कांग्रेस यह नहीं बताती कि देश के कानून और संविधान से ऊपर क्या कुछ मौलवी और इमाम हो सकते हैं? जिन बातों को देश का कानून प्रतिबंधित नहीं करता, उसे कुछ कट्टरपंथी ताकतें कैसे प्रतिबंधित कर सकती हैं

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पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहा कि पश्चिम बंगाल में संविधान का नहीं बल्कि पुलिस का शासन चल रहा है। उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चेतावनी देते हुए कहा कि वे अनुच्छेद 154 देखने पर मजबूर न करें, जो कहता है कि राज्य की शक्तियां राज्यपाल में निहित होंगी।
वास्तव में लंबे समय से बंगाल में ऐसा लगता है जैसे कानून का राज नहीं चल रहा। राज्य में विपक्षी पार्टी के 50 से अधिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई और जिसका आरोप तृणमूल पार्टी के कार्यकर्ताओं पर लगा है। उसके बावजूद हत्याओं का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसा लग रहा है, जैसे इन हत्याओं को पश्चिम बंगाल सरकार संरक्षण प्राप्त हो।
राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाने की बात राज्यपाल श्री धनखड़ 28 सितम्बर को एक प्रेस कांफ्रेन्स में कही। श्री धनखड़ में पश्चिम बंगाल में माओवादी और उग्रवादियों की बढ़ रही सक्रियता पर भी अपनी चिन्ता जाहिर की।
जब पश्चिम बंगाल में चल रहे अराजक शासन पर बहस छीड़ी है, ऐसा लगता है कि यह सही समय होगा जब हम पश्चिम बंगाल में जारी होने वाले उल—जुलूल फतवों पर बात करें। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मौलवियों के फतवे सिर्फ पश्चिम बंगाल में जारी होते हैं। बावजूद इसके पश्चिम बंगाल भारत के दूसरे राज्यों से इस मामले में थोड़ा अलग है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ऐसे उल—जुलूल फतवेबाजों को अपना समर्थन देकर उसके कहे को समाज में स्वीकार्यता दिलाने की कोशिश करती हैं। बिना यह सोचे कि इस तरह के समर्थन का समाज के बीच के क्या संदेश जाएगा। जिन मौलवियों को फतवा देने की वजह से जेल के अंदर होना चाहिए। पश्चिम बंगाल में कानून के राज के समानांतर फतवों का राज चलाने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी, इसकी जगह पर ऐसे लोग ममता सरकार के लाडले बन बैठते हैं। इससे उनके फतवेबाजों को हौसला ही मिलता है।

मुर्शिदाबाद से जारी फतवे को मिला तृणमूल का समर्थन
पश्चिम बंगाल स्थित मुर्शिदाबाद के मुस्लिम बहुल गांवों में इसी साल अगस्त के तीसरे सप्ताह में अजीब सा फतवा जारी किया गया था। जिसमें कहा गया, लॉटरी खरीदना फ़ोन या कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर के गाने सुनना, टीवी देखना और कैरम खेलना सब ‘हराम’ माना जाएगा और यह सब गांव के अंदर प्रतिबंधित होगा। मतलब कोई मुर्शिदाबाद के मुसलमान मोहल्लों में टीवी नहीं देख सकता। कैरम नहीं खेल सकता। गाने नहीं सुन सकता था। उल्लेखनीय है कि ये फतवा ‘सोशल रिफॉर्म्स कमिटी’ के बैनर तले जारी किया गया। मतलब समाज सुधार के नाम पर पूरे गांव को अंधेरे कुंए में धकेलने का फतवा लाया गया। इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाला फतवा लाया गया। सोशल रिफॉर्म्स की कथित कमिटी ने कहा कि अगर कोई भी इन फतवों का उल्लंघन करता पाया जाएगा तो उस पर 500 रुपयों से लेकर 7000 रुपए तक का जुर्माना लगाया जाएगा। ये फतवा मुस्लिम युवाओं को कथित तौर पर नैतिक और सांस्कृतिक पतन से बचाने के लिए लाया गया था। इस फतवे से जुड़े पोस्टर-बैनर्स को झारखंड की सरहद से लगे पश्चिम बंगाल के कई गांवों में चिपकाए गए। इस फतवे को बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी का समर्थन प्राप्त था। उनकी पार्टी मानना रहा है कि ऐसे फतवों में कोई बुराई नहीं है।
तृणमूल कांग्रेस यह नहीं बताती कि देश के कानून और संविधान से ऊपर क्या कुछ मौलवी और इमाम हो सकते हैं? जिन बातों को देश का कानून प्रतिबंधित नहीं करता, उसे कुछ कट्टरपंथी ताकतें कैसे प्रतिबंधित कर सकती हैं ? इतना ही नहीं, तृणमूल के राज में वे मौलवी इन कथित अपराधों के लिए जुर्माना भी लगा रहे हैं। जिन अपराधियों की इस वसूली पर गिरफ्तारी होनी चाहिए थी। उन फतवों और उसके जुर्माने को ममता सरकार का मौन समर्थन हासिल है।

प्रधानमंत्री के खिलाफ फतवा देने वाला बरकती भी था ममता का करीबी
बात जनवरी 2017 की है, तृणमूल कांग्रेस के करीबी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के समर्थक कोलकाता के बऊ बाजार स्थित टीपू सुल्तान शाही मस्जिद के शाही इमाम मौलाना नूरूर रहमान बरकती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ फतवा जारी किया था। कोलकता प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम में बरकती ने कहा था कि जो भी प्रधानमंत्री के सिर के बाल व दाढ़ी का मुंडन करेगा, उसे 25 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा। जिस तरीके से नूरूर रहमान ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ फतवा जारी किया था और ममता बनर्जी समेत उनके नेताओं ने उनका समर्थन किया, इससे सवाल तो खड़ा होता है कि क्या पश्चिम बंगाल अब बांग्लादेश हो गया है जहां बिगड़ैल मौलवियों का शासन चलता है। जिस बरकती को जेल के अंदर होना चाहिए था, वह ममता बनर्जी के सबसे प्रिय सलाहकारों में शामिल है।

अपने सांसद के अपमान पर भी खामोश रहीं ममता
पश्चिम बंगाल के बसीरहाट से तृणमूल कांग्रेस की नवनिर्वाचित सांसद नुसरत जहां पर फतवा जारी किया गया था। चुनाव जीतने के बाद निखिल जैन से शादी करने वाली नुसरत पर ये फतवा सिंदूर और बिंदी लगाने व मंगलसूत्र पहनने पर जारी किया गया था। जबकि भारत का संविधान हर एक नागरिक को अपने पसंद का पहनने और जीवन जीने की आजादी देता है। लेकिन नुसरत पर फतवा जारी करने वालों का कहना था कि नुसरत मुस्लिम हैं तो उन्हें मुस्लिम से ही शादी करनी चाहिए थी। इसके बाद इस मुद्दे पर काफी विवाद हुआ। खुद नुसरत ने फतवा जारी होने पर उनके पहनावे पर टिप्पणी करने वालों को करारा जवाब दिया लेकिन पूरे प्रकरण पर ममता बनर्जी खामोश रहीं। अपने सांसद के पक्ष में वे दो शब्द भी नहीं बोल पाई। ममता ने अपनी चुप्पी की वजह से बंगाल के अंदर इस्लामिक कट्टरता को हमेशा हवा ही दी है।
दिलीप घोष को बंगाल से निकालने और पत्थरों से मारने का फतवा
ममता बनर्जी के लिए यदि बयान कोई नेता देता है तो उसके खिलाफ फतवा देने वाले मौलाना भी कोलकाता में बैठे हुए है। ममता की पार्टी का इन फतवाबाजों से रिश्ता क्या है? भाजपा के पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष दिलीप घोष के द्वारा 2016 में जब राज्य के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ बयान दिया गया, इस पर टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम ने फतवा जारी कर दिया। ममता पर लगे आरोप का जवाब ममता को देना चाहिए लेकिन इस काम पर उन्होंने एक मौलवी को लगा दिया। मौलवियों को दीनी मसलों पर अपनी बात रखनी चाहिए। यदि वे पार्टी के एजेन्ट बने फिरेंगे और बदले में पार्टी कट्टरपंथियों के हितों को प्राथमिकता देगी तो ऐसी स्थिति को गंभीर ही माना जाएगा। अपने फतवे में शाही मस्जिद के इमाम ने कहा था कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को बंगाल से बाहर निकाल देना चाहिए और उन्हें पत्थरों से मारना चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस फतवे पर भी मुख्यमंत्री ममता खामोश रहीं।
पश्चिम बंगाल जिस तरह फतवों से चल रहा है और राज्य के अंदर अपराधी बेलगाम है। जहां विधायक तक को बीच बाजार में लटका दिया जाता है और बेशर्मी के साथ ममता बनर्जी—व्यवस्था उसे आत्महत्या ठहराने में लग जाती है। इन सारी परिस्थितियों से जो परिचित है, वह पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री धनखड़ की बात से कैसे इंकार कर सकता है?