आतंकियों के निशाने पर सिख-हिंदू

    दिनांक 03-सितंबर-2020   
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अफगानिस्तान में भी अब सिख और हिंदू सुरक्षित नहीं रहे। आतंकी उन्हें निशाना बना रहे हैं। अगवा कर उनका कन्वर्जन कर रहे हैं और उनकी बच्चियों का बलात मुसलमानों के साथ निकाह करा रहे हैं। पलायन करने वाले सिखों और हिंदुओं की संपत्ति पर भू-माफिया का कब्जा है। हाल ही में वहां के 11 सिखों ने भारत में शरण ली है

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आतंकवादियों की प्रताड़ना से त्रस्त अफगानिस्तान के 11 सिख भारत आए हैं, जिनमें आतंकवादियों द्वारा अगवा किए जाने वाले निदान सिंह भी हैं।

‘हिन्दुस्थान को मां बोलूं, बाप बोलूं...क्या बोलूं? हिन्दुस्थान में कोई कमी नहीं। आतंकवादी कहते थे-मुसलमान बनो। मैं बोलता था-वाहेगुरू जी दा खालसा वाहेगुरू जी दी फतेह।’ यह कहना है हाल में आतंकवादियों के चंगुल से छूटकर भारत आए निदान सिंह का। उनके साथ दस और अफगानी सिख आतंकवादियों की प्रताड़ना से परेशान होकर भारत आए हैं। इनमें 16 साल की वह नाबालिग लड़की सुनमित कौर भी है, जिसके अपहरण, कन्वर्जन और यहां तक कि किसी मुसलमान से उसका निकाह कराने की पूरी व्यवस्था कर ली गई थी।
 
लगभग ऐसी ही कहानी अफगानिस्तान में रह रहे सवा सौ परिवारों के सात सौ सिखों और हिंदुओं की है। वे सभी हर हालत में उस देश से पलायन करने को आमादा हैं, जहां उनका जन्म हुआ और पले-बढ़े। हालांकि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के प्रवक्ता सादिक सिद्दिकी सिखों के पलायन पर चिंता प्रकट करते हुए उन्हें अपने देश की आत्मा बता रहे हैं। बावजूद इसके उनकी सरकार ने अब तक सिखों और हिंदुओं का विश्वास जीतने को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं।
 
परिणामस्वरूप 25 मार्च को काबुल के स्टॉक एक्सचेंज के निकट गुरुद्वारा पर हमले के बाद कोई भी सिख अब वहां रहना नहीं चाहता। आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के इस हमले में 27 सिखों की जान चली गई थी। तब से वहां रह रहे सिख और हिंदू बेहद भयभीत हैं। वैसे, अफगानिस्तान में सिखों पर हमले का यह कोई पहला मामला नहीं है। 1983 में भी एके-47 से लैस अफगानी आतंकियों ने जलालाबाद स्थित गुरुद्वारा पर हमला कर 13 सिखों को मौत के घाट उतार दिया था। इसी तरह, 1989 में जलालाबाद स्थित गुरुद्वारा गुरु तेग बहादुर सिंह पर रॉकेट लांचर से हमलाकर 17 सिखों को मौत की नींद सुला दिया गया था। तब इन घटनाओं से वहां के सिख इतने डर गए कि अफगानिस्तान सरकार द्वारा गैंग यात्रा योजना शुरू करते ही एक झटके में तकरीबन 50,000 सिखों ने देश छोड़ दिया। उनमें से बड़ी संख्या में सिख भारत चले आए। अभी 18,000 के करीब अफगानिस्तान के सिख दिल्ली में शरण लिए हुए हैं। बाकी बचे सिख एवं हिंदू भी भारत आने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा यहां उनकी पैरवी कर रहे हैं। उन्होंने विदेश मंत्रालय से छह सौ सिखों को कुछ नियम-शर्तों के साथ छह महीने के लिए वीजा देने को राजी भी कर लिया है। स्थिति अनुकूल हुई तो पिछले साल से देश में लागू संशोधित नागरिकता कानून के तहत उन्हें भारत की नागरिकता दिलाने की व्यवस्था की जाएगी। यह कानून ही बना है पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत में बसाने के लिए। अभी वहां 25 हिंदू परिवार रह रहे हैं।

किसी जमाने में अफगानिस्तान के काबुल, कंधार, गजनी, घुस, पकतिया में सिखों की न केवल अच्छी-खासी जनसंख्या थी, बल्कि उनकी गिनती वहां के प्रमुख व्यापारियों में होती थी। अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए एक संसदीय सीट आरक्षित है, जहां से अभी नरेंद्र सिंह खालसा सांसद हैं। लेकिन कट्टरपंथियों के आगे उनकी भी नहीं चलती। पहले तालिबानी आतंकियों ने उन्हें देश छोड़ने को मजबूर किया। अब पाकिस्तान में पलने वाले आतंकी संगठन उनके पीछे पड़े हुए हैं
 
हाल में आतंकवादियों के चंगुल से छूटकर भारत आए अफगानिस्तान के सिख समुदाय के नेता निदान सिंह कहते हैं कि अब उनके लिए अफगानिस्तान में रहना असंभव है। पाकिस्तान में पलने वाले आतंकवादियों ने फिर से वहां पैर पसारना शुरू कर दिया है। आतंकवादियों ने काबुल के पकतिया स्थित गुरुद्वारा से उनका अपहरण कर लिया था। आतंकियों की कैद में बिताए दिन याद करते हुए वह कहते हैं कि उन्हें पेड़ से बांध कर पीटा जाता था। आतंकवादी उन पर बार-बार इस्लाम कबूलने का दबाव बना रहे थे। लेकिन जान की परवाह किए बगैर उन्होंने कहा कि मर जाएंगे पर धर्म नहीं बदलेंगे। अमेरिका के अफगानिस्तान सिख समुदाय के नेता परमजीत सिंह कहते हैं कि अफगानिस्तान में माहौल अब उनके समाज के अनुकूल नहीं है। किसी जमाने में वहां करीब ढाई लाख सिख और हिंदू परिवार रहते थे। रूस से जंग के समय उनमें से बड़ी संख्या में सिख भारत, कनाडा, अमेरिका सहित अन्य देशों में पलायन कर गए। उनकी संपत्तियों पर भूमि माफिया ने कब्जा किया हुआ है। आतंकवादियों से मिलकर वे अब अफगानिस्तान में ऐसे हालात बनाना चाहते हैं कि बाकी बचे सिख परिवार भी देश छोड़ दें ताकि उनकी जमीन, जायदाद पर कब्जा किया जा सके।
 
बीबीसी के काबुल स्थित संवाददाता सईद अनवर की माने तो किसी जमाने में अफगानिस्तान के काबुल, कंधार, गजनी, घुस, पकतिया में सिखों की न केवल अच्छी-खासी जनसंख्या थी, बल्कि उनकी गिनती वहां के प्रमुख व्यापारियों में होती थी। अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए एक संसदीय सीट आरक्षित है, जहां से अभी नरेंद्र सिंह खालसा सांसद हैं। लेकिन कट्टरपंथियों के आगे उनकी भी नहीं चलती। पहले तालिबानी आतंकियों ने उन्हें देश छोड़ने को मजबूर किया। अब पाकिस्तान में पलने वाले आतंकी संगठन उनके पीछे पड़े हुए हैं। यह बात राष्ट्रपति अशरफ गनी के प्रवक्ता सिद्दिकी भी मानते हैं। वह खुले तौर पर इसके लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराते हुए कहते हैं कि उनका देश कतई नहीं चाहता कि सिख या हिंदू कहीं जाएं। बावजूद इसके यदि वे यहां से पलायन करते हैं तो उनकी संपत्ति सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जाएगी। उन्हें दोबारा लाने का प्रयास भी किया जाएगा।                 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)