गेशे जम्पा की ग्यारवीं कड़ी

    दिनांक 30-सितंबर-2020
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नीरजा माधव

हमारे भारत देश में तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की ग्यारवीं कड़ी
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वो क्या है मैदम कि मेरे घर में दूध नहीं है। सोने से पहले लामाजी को दूध देना जरूरी रहता है, सो दे दिया। क्या पता था कि इस समय कोई आ जाएगा। मेरी बेटी का पति आया है। चाय बनाने के लिए यदि...पेमा भी अभी तक नहीं आया है। एक ही सांस में लोब्जंग अपनी पूरी बात कह गई थी मानो रुकते ही वह आगे नहीं बोल पाएगी।

हां, हां, क्यों नहीं। मां, जरा दूध दे देना लोब्जंगजी को। और कुछ चाहिए तो संकोच न करिएगा। देवयानी ने पूछा था। नहीं, और सब तो है। बस, सोने के लिए  यदि आप दीपेश भैयाजी के कमरे में जगह दे दें तो मेहरबानी होगी। मेरे कमरे में किचेन का सामान और पेमा का बिस्तर है। एक में हम लोग रहते हैं। लोब्जंग के स्वर में अनुनय थी।
ठीक, ठीक। कोई चिंता की बात नहीं। दीपेश के कमरे में दो चौकियां हैं। एक पर ढोंढप्जी सो जाएंगे। देवयानी ने स्वीकृति दे दी थी। दूध लेकर लोब्जंग वापस चली गई तो दीपेश उखड़ पड़ा-‘क्या दीदी, मेरे कमरे में सुलाने के लिए क्यों कहा? महीनों वे सब नहाते नहीं हैं।  दूर से बदबू करते हैं।’ चुप रहो। बिना सोचे-समझे सुनी-सुनाई बातें करते हो। कौन कहता है कि वे लोग महीनों नहीं नहाते? तिब्बत के भी कुछेक क्षेत्रों को छोड़ दें तो बाकी हिस्सों में कमोबेश मौसम हमारी ही तरह है। देवयानी ने एक लम्बा वक्तव्य दे डाला था।

अच्छा, अच्छा, रहने दो वकालत। संस्थान में नौकरी क्या करने लगीं कि उनकी हर चीज अच्छी हो गई तुम्हारे लिए। दीपेश भुनभुना उठा। ऐसी बात नहीं है कि मैं नौकरी के कारण उनमें अच्छाई खोज रही हूं, बल्कि उनकी कमियों पर भी अपनी आंखें खुली रखती हूं। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम उनके साथ उठना-बैठना, खाना-पीना बंद कर दें। नहीं, नहीं, क्यों खाना-पीना बंद करोगी। मोमो खाया करो उनके साथ। छाड् पिया करो। दीपेश बच्चों की तरह बड़बड़ा रहा था। देख रही हो न मां इसको। क्या-क्या बक रहा है पगला कहीं का। देवयानी दूसरे कमरे की ओर बढ़ी थी टनचू ढोंढप् का बिस्तर ठीक करने के लिए। मैं तो नहीं सोऊंगा वहां। तुम दोनों में से जिसे सोना हो, सोए। दीपेश ने अपना फैसला सुनाते हुए मां से कहा था। किसी की मजबूरी समझते हैं दीपेश। बेचारी लोब्जंग ने किस तरह प्रार्थना की है। उसी का घर है। हम तो किरायेदार हैं। न देती मकान तो? मां ने समझाया था। तो क्या खाती? एहसान थोड़े ही कर रही हैं हम पर।

श्श्श...चुप! शायद वो आ रहा है। सुन लेगा तो क्या सोचेगा कि इनके यहां अतिथियों के बारे में इस तरह की भी बातें होती हैं। मां ने धीरे-से अपना माथा ठोका था। दीपेश गुस्से में वहीं पड़े बिस्तर पर धम्म से पसर गया। आइए, आइए, ढोंढप्जी। देखिए, आप लोगों के घर में हम लोगों ने शरण ले रखी है। देवयानी ने लोब्जंग के साथ आते ढोंढप् को देखते हुए विनम्रता जताई थी। ढोंढप् ने भी उतनी ही विनम्रता दिखाते हुए कहा-नहीं दीदी, हम लोगों को तो स्वयं आप लोगों ने शरण दी है। हम लोग आपको उसके बदले क्या दे सकते हैं, कुछ भी तो नहीं।

लीजिए, आपने तो मेरी बात ही पलट दी। वह हंसते हुए बोल पड़ी। ढोंढप् द्वारा दीदी का संबोधन उसे अच्छा लगा था। उम्र में वह उसी के आसपास का होगा, परंतु दीदी के संबोधन ने एकाएक उसे स्नेह का पात्र बना दिया था। देवयानी स्टूल खींचकर स्वयं बैठ गई थी। ढोंढप् बिछी चौकी पर पैर लटकाकर बैठ गया था। लोब्जंग पास ही पड़ी कुर्सी पर अपना आसन ग्रहण कर चुकी थी।

आपका क्या स्वागत करूं ढोंढप्जी। देवयानी पूछ बैठी। उसके ओठों पर एक स्नेह-सिक्त मुस्कराहट फैली थी। कुछ नहीं दीदी। गेस्ट हाउस से खाना खाकर चला हूं। बस, एक कृपा करें। क्या? मैं दीदी कह रहा हूं तो आप मुझे इतनी दूरी न दें आप-आप कहकर। दोनों हाथ जोड़कर वह हंस पड़ा। कोई बात नहीं। अब से सिर्फ ढोंढप्। ठीक? वह झेंपी हुई बोल उठी। मां भी आकर दूसरी वाली चौकी पर बैठ गई थीं। दीपेश कहां है मां? देवयानी को दीपेश का न आना अप्रिय लगा था। शायद सो गया है। मां संकोच से भर उठी। इतनी जल्दी दीपेश भैया सो गया? पढ़ता नहीं क्या रात में? लोब्जंग ने पूछा तो देवयानी को सफाई देनी पड़ी थी। दरअसल, आज उसके सिर में दर्द था हल्का। हमारे आने से आप लोगों को कष्ट हुआ न दीदी? ढोंढप् औपचारिकता में पूछ बैठा।

नहीं, नहीं, कैसा कष्ट बेटा? तुम ऐसा न सोचो। आराम से सोओ। यहां सब एक परिवार की तरह ही हैं। देवयानी से पहले ही मां बोल उठी। सोना कहां, मां। अभी रात में कुछ देर जागकर कल के लिए एजेंडा तैयार करना है। हाथ में पकड़े पीले रंग के कढ़ाईदार झोले को अपने सिरहाने रखते हुए ढोंढप् ने जेब से अपना चश्मा निकाला था। क्या कल भी मीटिंग है? देवयानी की उत्सुकता जागी। हां, तीन दिन की है। कहां-कहां से लोग आ रहे हैं? जहां-जहां हम लोग हैं वहां के कुछेक प्रतिनिधि और वहीं के स्थानीय समर्थक।

दुनिया के पास बुद्धिमता की कमी नहीं है, संपत्ति और भौतिक संसाधनों की भी कमी नहीं है, फिर भी पूरी मानवता क्यों पीड़ा से कराह रही है? किस बात की कमी है जो मनुष्य को हिंसक बना रही है? उत्तर स्पष्ट है-भौतिक प्रगति के साथ उसकी आध्यात्मिक प्रगति भी होगी तभी वह शांत हो सकेगा

मतलब? देवयानी और भी उत्सुक हो उठी। इसीलिए न कह रहा हूं दीदी कि आप लोगों का बहुत एहसान है हम पर। हमारी मुक्ति-साधना को स्थानीय लोगों का भी समर्थन प्राप्त है। इस समर्थन-समिति में कई सदस्य होते हैं जो हमारे मुक्ति-आंदोलन को मार्गदर्शन और सुझावों से प्रेरणा तो देते ही हैं, साथ ही अपने स्तर से भारत सरकार और विश्व के तमाम देशों को भी अपने पत्रों, लेखों आदि के द्वारा हमारे उद्देश्यों की जानकारी देते हैं, उन पर दबाव डालते हैं। क्या तुम्हें विश्वास है कि उनकी बातों का कुछ प्रभाव पड़ेगा? देवयानी की रुचि बढ़ रही थी। बिल्कुल पड़ना चाहिए। पहले हम अकेले थे, अब स्थानीय लोग भी हमारे साथ जुड़ गए हैं। ऐसा इसलिए भी है कि हमारा आंदोलन बिल्कुल अहिंसक है। हम अपने कार्यक्रमों में चीनी शासकों समेत किसी के भी प्रति असंसदीय एवं अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं करते। सभी लोगों के प्रति प्रेम और करुणा ही हमारे इस अभियान की आधारशिला है।

ढोंढप् बता रहा था और देवयानी ध्यान से सुन रही थी। लोब्जंग और मां भी उसकी ओर एकटक देख रही थीं। आप ही सोचिए, भगवान बुद्ध ने कहा था कि इस दुनिया में घृणा के द्वारा कभी भी घृणा समाप्त नहीं होती, सिर्फ प्रेम से ही यह संभव है, परंतु सामान्यत: मनुष्यों में अहिंसा के प्रति आस्था में कमी हो जाती है, क्योंकि अहिंसा की ओर दुनिया का ध्यान शीघ्र आकृष्ट नहीं हो पाता। आवश्यक है कि पहले हम अहिंसा में विश्वास रखने वाले लोगों को विश्व स्तर पर एकजुट करें और फिर अपना अभियान चलाएं।

पर क्या सोच रहे हो ढोंढप् कि अहिंसा में विश्वास रखने वाले लोगों के एकजुट हो जाने से ही तुम्हारा अभियान सफल हो जाएगा? द्वितीय विश्वयुद्ध का विध्वंसक परिणाम देखने के बाद तीसरे विश्वयुद्ध से दुनिया को बचाने के लिए संयुक्त राष्टÑसंघ की स्थापना की गई। नि:संदेह अंधेरे में एक आशा की किरण थी यह। परंतु उसके गठन के आधी शताब्दी के भीतर ही अनेक राष्ट्रों और प्रजातियों के बीच हुई खूनी टकराहटों ने इसके अस्तित्व को ही झुठलाने का प्रयास किया है। युद्ध हो रहे हैं, मानव अधिकारों का उल्लंघन भी खुलेआम हो रहा है। देवयानी ने एक प्रश्न फेंका था।

बिल्कुल सही कहा दीदी आपने। इसी से सिद्ध होता है कि दुनिया के पास बुद्धिमता की कमी नहीं है, संपत्ति और भौतिक संसाधनों की भी कमी नहीं है, फिर भी पूरी मानवता क्यों पीड़ा से कराह रही है? किस बात की कमी है जो मनुष्य को हिंसक बना रही है? उत्तर स्पष्ट है-भौतिक प्रगति के साथ उसकी आध्यात्मिक प्रगति भी होगी तभी वह शांत हो सकेगा। स्थायी शांति के लिए भौतिकता एवं आध्यात्मिकता, दोनों के बीच संतुलन होना आवश्यक है। मानव की पीड़ा वस्तुत: एक आध्यात्मिक अभाव है, जिसके लिए वह छटपटाता है और अज्ञानतावश भौतिक सुख-सुविधाओं में उसकी तलाश करता है।

तुम तो दार्शनिक भी हो ढोंढप्। देवयानी उसकी भावना से प्रभावित थी। नहीं दीदी, मैं तो एक छोटा-सा कार्यकर्ता हूं, बस। इस कथन में विश्वास रखता हूं कि तटस्थता सदैव जालिम की सहायक होती है, यह कभी पीड़ित की सहायता नहीं करती। मौन से अन्यायी उत्साहित होता है, कभी भी दमन के शिकार का मनोबल नहीं बढ़ता। हम लोगों ने इसी आधार पर तटस्थ लोगों को जागृत करने का संकल्प लिया है। उनके मौन को तोड़ना चाह रहे हैं ताकि हमारा दमन बंद हो। अन्यायी का मनोबल गिरे। हमारी शुभकामनाएं आप सबके साथ हैं, आपके इस अभियान के साथ हैं। लेकिन इस बार की मीटिंग का मुख्य एजेंडा क्या है? देवयानी ने पूछा था।  (जारी...)