संसद का मानसून सत्र : सुधारों को गति देना वाला सत्र

    दिनांक 30-सितंबर-2020
Total Views |
मनोज वर्मा

p30_1  H x W: 0
10 दिनों तक चले संसद के छोटे से मानसून सत्र के दौरान 25 विधेयक पारित हुए, जो एक नया कीर्तिमान है। 
 
उत्पादकता की दृष्टि से 17वीं लोकसभा का मानसून सत्र कई मायने में ऐतिहासिक रहा। कोरोना वैश्विक महामारी काल में पूरी सतर्कता के साथ मानसून सत्र का आयोजन हुआ और उत्पादकता के नए कीर्तिमान बने। सत्र के दौरान अनेक महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए। होम्योपैथी और दवाओं से जुड़े चार विधेयक पारित हुए। बैंकिंग नियमन एवं कराधान सहित अन्य विधेयक तथा दिवालियापन से जुड़े हुए विधेयक पारित हुए। सांसदों के वेतन एवं पेंशन में संशोधन तथा मंत्रियों के वेतन में संशोधन, फॉरेंसिक विश्वविद्यालय एवं रक्षा विश्वविद्यालय से संबंधित विधेयक भी पारित हुए। साथ ही, महामारी, जम्मू-कश्मीर राजभाषा, श्रम संहिता, एनआरसीए, कम्पनी जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को भी पारित किया गया। 10 दिनों के इस छोटे से सत्र के दौरान कुल 25 विधेयक का पास होना एक नया कीर्तिमान रहा।

मानसून सत्र की खास बात यह रही कि कोरोना काल में सांसदों ने देश को संदेश दिया कि कैसे काम करने के साथ हमें शारीरिक दूरी का पालन करना है और देश को इस वैश्विक महामारी से बचाना है। यदि आॅनलाइन प्रश्नों की बात की जाए तो 23 सितम्बर तक कुल 7,648 प्रश्न आए, जिनमें 2300 प्रश्नों के उत्तर सदन में दिए गए। इस तरह संकट काल में जहां आॅनलाइन कामकाज के तरीके को लेकर देशभर में नई परंपरा विकसित हुई है, वहीं पढ़ाई-लिखाई से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियों और सरकारी कामकाज तक आनलाइन की राह पर आगे बढ़ रहा है। हालांकि, संसद में कामकाज को कागज मुक्त बनाने की कवायद बहुत पहले से हो रही है। कागज मुक्त का मतलब ही आॅनलाइन कामकाज को बढ़ावा देना है। मानसून सत्र जहां कोरोना के चलते व्यवस्थागत कारणों के लिए इतिहास में याद किया जाएगा, वहीं कृषि—किसान, श्रम सुधार, बैकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य से जुड़े विधेयकों का पारित होना नीतियों पर दीर्घकालिक प्रभाव के चलते याद किए जाएंगे। कृषि विधेयकों के जरिए कृषि सुधार से संबंधित तीन विधेयक (कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन व सरलीकरण) विधेयक, कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवा पर करार विधेयक, आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन विधेयक के जरिए नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में कृषि क्षेत्र में सुधार की पहल कर दी ताकि किसान आर्थिक दृष्टि से मजबूत हो सकें और मंडी के अलावा भी अपनी फसल बेचने के बेहतर विकल्पों का लाभ उठा सकें।

श्रम सुधार के तीन विधेयक महत्वपूर्ण
श्रम सुधार संबंधित विधेयक महत्वपूर्ण रहा। इस सत्र में श्रम सुधार के तीन कानूनों, व्यवसायगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियां संहिता विधेयक, औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक, श्रम कानून तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता विधेयक को भी पारित किया गया। इनमें श्रम क्षेत्र के 29 पुराने कानूनों के अच्छे प्रावधानों को समाहित करने के साथ प्रवासी श्रमिकों की बेहतरी के लिए भी प्रावधान किए गए हैं। नई श्रम संहिताओं में 50 करोड़ से अधिक संगठित, असंगठित तथा स्व-नियोजित कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा आदि का प्रावधान किया गया है। इसके जरिए महिला कामगारों को पुरुष कामगारों की तुलना में वेतन की समानता सुनिश्चित होगी। इसके अलावा, प्लेटफॉर्म कामगारों सहित असंगठित क्षेत्र के 40 करोड़ कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा कोष की स्थापना से सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा दायरे के विस्तार में सहायता मिलेगी। श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने श्रम सुधार विधेयकों पर एक साथ हुई चर्चा के जवाब में कहा, ‘श्रम सुधारों का मकसद बदले हुए कारोबारी माहौल के अनुकूल पारदर्शी प्रणाली तैयार करना है।’ 16 राज्यों ने पहले ही अधिकतम 300 कर्मचारियों वाली कंपनियों को सरकार की अनुमति के बिना बंद करने और छंटनी करने की इजाजत दे दी है। रोजगार सृजन के लिए यह उचित नहीं है कि इस सीमा को 100 कर्मचारियों तक बनाए रखा जाए, क्योंकि इससे नियोक्ता अधिक कर्मचारियों की भर्ती से कतराने लगते हैं और जान-बूझकर कर्मचारियों की संख्या कम रखते हैं। इस सीमा को बढ़ाने से रोजगार बढ़ेगा और नियोक्ताओं को नौकरी देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा। ये विधेयक कर्मचारियों के हितों की रक्षा करेंगे और भविष्य निधि संगठन तथा कर्मचारी राज्य निगम के दायरे में विस्तार करके श्रमिकों को सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेंगे। सरकार ने 29 से अधिक श्रम कानूनों को चार संहिताओं में मिला दिया था और उनमें से एक संहिता (मजदूरी संहिता विधेयक, 2019) पहले ही पारित हो चुकी है।

व्यवसायगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियां संहिता विधेयक कंपनियों को लोगों को अनुबंध पर रोजगार देने की छूट प्रदान करता है। अनुबंध के लिए कोई सीमा तय नहीं की गई है। मौजूदा कर्मचारी को अनुबंध के दायरे में लाने पर रोक वाला प्रावधान भी हटा दिया गया है। महिलाओं के लिए काम के घंटे सुबह 6 से शाम 7 बजे के बीच ही रहेंगे। शाम 7 बजे के बाद काम लेने पर सुरक्षा की जिम्मेदारी कंपनी की होगी। कर्मचारी हफ्ते में 6 दिन से ज्यादा काम नहीं करेगा और ओवर टाइम पर ज्यादा भुगतान करना होगा।

सामाजिक सुरक्षा विधेयक-2020
इसमें सामाजिक सुरक्षा संहिता एक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के निर्माण का प्रस्ताव करती है जो असंगठित श्रमिकों, गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए उपयुक्त योजना तैयार करेगा। यह श्रमिकों के इन वर्गों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में भी लाता है, जिसमें जीवन और विकलांगता बीमा, भविष्य निधि, स्वास्थ्य व मातृत्व लाभ और कौशल उन्नयन शामिल हैं। इस संहिता में श्रमिकों के तीन वर्गों को सामाजिक सुरक्षा रकम प्रदान करने के लिए एक सामाजिक सुरक्षा कोष के गठन का भी प्रस्ताव है। व्यवसायगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियां संहिता विधेयक कंपनियों को यह छूट देगा कि वे अधिकतर लोगों को अनुबंध पर नौकरी दे सकें। अनुबंध को कई बार और कितने भी समय के लिए बढ़ाया जा सकेगा। इसके लिए कोई सीमा तय नहीं की गई है। उस प्रावधान को भी हटा दिया गया है, जिसके तहत किसी भी मौजूदा कर्मचारी को अनुबंध के दायरे में लाने पर रोक थी। महिलाओं के लिए काम के घंटे सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के बीच ही रहेंगे। शाम 7 बजे के बाद अगर उनसे काम लिया जा रहा है तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कंपनी की होगी। कोई भी कर्मचारी एक हफ्ते में 6 दिन से ज्यादा काम नहीं कर सकता। ओवर टाइम पर ज्यादा भुगतान करना होगा। बिना नियुक्ति पत्र के किसी की भर्ती नहीं होगी।

70 साल बाद जम्मू-कश्मीर को मिली अपनी भाषा

मानसून सत्र में जम्मू-कश्मीर आधिकारिक भाषा विधेयक पारित होने के बाद अब वहां की सरकारी भाषा कश्मीरी, डोगरी और हिंदी हो गई है। अनुच्छेद-370 की समाप्ति के बाद भाषा से संबंधित इस विधेयक का पारित होना जम्मू-कश्मीर को लेकर मोदी सरकार की नीति को दशार्ता है। जैसा कि सदन में गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया कि जम्मू-कश्मीर के 74 प्रतिशत लोगों की भाषा कश्मीरी और डोगरी है, किंतु इन भाषाओं को 70 साल तक राज्य की आधिकारिक भाषा नहीं बनाकर लोगों को उनकी आकांक्षाओं से वंचित रखा गया। इस विधेयक के माध्यम से कश्मीरी, डोगरी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं को जम्मू-कश्मीर की आधिकारिक भाषा घोषित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में बड़ी संख्या में लोग कश्मीरी, डोगरी और हिंदी बोलते और समझते हैं। रेड्डी ने बताया, ‘2011 की जनगणना के अनुसार, देश में जितने लोग कश्मीरी बोलने वाले हैं, उनमें से 53.26 प्रतिशत जम्मू-कश्मीर में हैं। लेकिन 70 साल तक कश्मीरी आधिकारिक भाषा नहीं थी। यह ऐतिहासिक भूल थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ऐतिहासिक गलतियों को सुधारा जा रहा है। राज्य में 2.3 प्रतिशत लोगों की भाषा हिंदी है।’ सदन ने ध्वनिमत से जम्मू-कश्मीर आधिकारिक भाषा विधेयक-2020 को मंजूरी प्रदान कर दी।

स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में सुधारवादी कदम

स्वास्थ्य की दृष्टि से होम्योपैथी सेंट्रल काउंसिल (संशोधन) विधेयक और इंडियन मेडिसिन सेंट्रल काउंसिल (संशोधन) विधेयक को स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनके पारित होने के बाद अब आयोग बनाने का रास्?ता भी साफ हो गया है। भारतीय चिकित्सा पद्धति के लिए राष्ट्रीय आयोग और होम्?योपैथी के लिए राष्ट्रीय आयोग गठित करने का उद्देश्य भारतीय चिकित्सा पद्धति और होम्?योपैथी में सुधार लाना होगा। इसके अलावा संक्रामक रोग (संशोधन) विधेयक के जरिए डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले हमलों को रोका जा सकेगा। इस तरह की किसी भी गतिविधियों में लिप्त होने को अब संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध माना गया है। हिंसा के ऐसे कामों को अंजाम देने या बढ़ावा देने पर तीन महीने से लेकर पांच साल तक कैद के अलावा जुमार्ने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, निजी संपत्ति को नुकसान या किसी तरह की क्षति की पहुंचाने पर दोषी व्यक्ति क्षतिपूर्ति के रूप में पीड़ित पक्ष को उचित बाजार मूल्य से दोगुना रकम देने के लिए भी उत्तरदायी होगा। इस साल अप्रैल में देश के स्वास्थ्य कर्मचारियों पर हमलों को देखते हुए भी सरकार ने महामारी रोग अधिनियम, 1897 में संशोधन कर इसमें कड़ी सजा का प्रावधान करने वाला एक अध्यादेश लागू किया था। इस अध्यादेश को कानून की शक्ल देने के लिए अब विधेयक लाया गया है, जिसे राज्यसभा ने पारित कर दिया है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि कोरोना वायरस महामारी के दौरान डॉक्टरों और पैरामेडिकल सहित स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों को कई तरह से अपमानित किया गया। इसे देखते हुए केंद्र सरकार को इस संबंध में एक कानून बनाने की जरूरत महसूस हुई। इसी के बाद यह विधेयक लाया गया है।

संसद का मानसून सत्र अब तक का दूसरा सबसे छोटा सत्र था, लेकिन यह कामकाज के लिहाज से उत्पादकता  से भरा रहा। विशेष रूप से कृषि और श्रम सुधार सहित कुल 25 विधेयकों का पारित होना सरकार के बुलंद इरादों का गवाह बना तो लोकसभा में 167 प्रतिशत उत्पादकता के साथ इतिहास में सबसे अधिक उत्पादकता वाला सत्र रहा 

रक्षा शक्ति विश्वविद्यायल का रुतबा बढ़ेगा
राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय विधेयक के तहत गुजरात के गांधीनगर स्थित रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय को उन्नत करके राष्ट्रीय महत्व की संस्था का दर्जा देने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय अनुसंधान एवं विभिन्न पक्षकारों के साथ सहयोग के माध्यम से नई जानकारियां सृजित करेगा तथा पुलिस एवं व्यवस्था, दंड न्याय प्रणाली एवं प्रशासन सुधार के संबंध में विशेष ज्ञान एवं नए कौशल, प्रशिक्षण जरूरतों को पूरा करेगा। इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय के संबंध दुनिया के अन्य देशों के विश्वविद्यालयों के साथ होंगे, जो समकालीन अनुसंधान के आदान-प्रदान, शैक्षणिक सहयोग, पाठ्यक्रम डिजाइन, तकनीकी जानकारी व प्रशिक्षण तथा कौशल विकास प्रयोजनों पर आधारित होंगे। ट्रिपलआईटी (संशोधन) विधेयक के तहत शेष 5 आईआईआईटी-पीपीपी के साथ-साथ सार्वजनिक निजी भागीदारी वाले 15 मौजूदा भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों को डिग्रियां प्रदान करने की शक्ति देने सहित राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के रूप में घोषित किया जा सकेगा। इससे वे किसी विश्वविद्यालय अथवा राष्ट्रीय महत्व के संस्थान की तरह प्रौद्योगिकी स्नातक अथवा प्रौद्योगिकी स्नातकोत्तर अथवा पीएचडी के नामकरण का इस्तेमाल करने के लिए अधिकृत हो जाएंगे। इससे ये संस्थान सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश में एक सशक्त अनुसंधान सुविधा विकसित करने के लिए आवश्यक पर्याप्त छात्रों को आकर्षित करने में भी सक्षम हो जाएंगे।

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन व सरलीकरण) विधेयक-2020
  • कृषक कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020
  • आवश्यक वस्तु अधिनियम (संशोधन) विधेयक-2020
  • व्यवसायगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियां संहिता विधेयक
  • औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक
  • श्रम कानून तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता विधेयक कर सुधारों से संबंधित विधेयक
  • एफसीआरए (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) विधेयक
  • होम्योपैथी सेंट्रल काउंसिल विधेयक
  • इंडियन मेडिसिन सेंट्रल काउंसिल (संशोधन) विधेयक
  • संक्रामक रोग (संशोधन) विधेयक
  • बैंकिंग नियमिन (संशोधन) विधेयक
  • राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय विधेयक
  • ट्रिपलआईटी (संशोधन) विधेयक
  • जम्मू-कश्मीर आधिकारिक भाषा विधेयक
  •  एयरक्राफ्ट संशोधन विधेयक
  •  संसद सदस्य वेतन,भत्ता और पेंशन (संशोधन) विधेयक-2020

विमानन नियामक निकाय के गठन का रास्ता साफ
संसद से पारित वायुयान संशोधन विधेयक की सबसे खास बात यह है कि देश में विमानन सुरक्षा रेटिंग में सुधार लाने और नागर विमानन महानिदेशालय सहित अन्य नियामक संस्थानों को वैधानिक दर्जा देने का रास्ता साफ हो गया है। अब नागरिक विमानन मंत्रालय के तहत तीन अलग-अलग नियामक संस्?थाएं गठित की जा सकेंगी। ये तीनों एक महानिदेशक के मातहत काम करेंगी, जिनकी नियुक्ति सरकार करेगी। इन तीन निकायों में नागरिक उड्डयन महानिदेशक (डीजीसीए), ब्यूरो आॅफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी (बीसीएसए) और एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट्स इंवेस्टिगेशन ब्यूरो (एएआईबी) शामिल होंगे, जिन्हें वैधानिक दर्जा देना है। इसके अलावा, इसके तहत मौजूदा जुमार्ने की अधिकतम सीमा को 10 लाख रुपये से बढ़ाकर एक करोड़ रुपये कर दिया गया है। ये विधेयक विमानों के उत्पादन, इनके अधिकार, विमानों को बेचना, विमानों का आयात-निर्यात और हवाईअड्डों के बेहतर रख-रखाव के लिए कंपनियों को लाइसेंस प्रदान करने का भी रास्ता साफ करता है।

सहकारी बैंकों में नहीं डूबेगा पैसा! 
बैंकिंग नियमिन (संशोधन) विधेयक के जरिए सहकारी बैंकों को रिजर्व बैंक की निगरानी में लाने का प्रस्ताव किया गया है। इस संशोधन के जरिए जमाकतार्ओं को सुरक्षा देने की भी कोशिश की गई है। हालांकि यह विधेयक सहकारी बैंकों का नियमन नहीं करता है। विधेयक में संशोधन सहकारी बैंकों को केंद्र सरकार द्वारा अधिग्रहण करने को लेकर नहीं है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी प्रावधान के जरिए रिजर्व बैंक को अधिक शक्तियां दी गई हैं। केंद्रीय वित्तमंत्री सीतारमन के अनुसार, यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि केंद्र सरकार सहकारी बैंकों पर निगरानी रखना चाहती है। कोविड-19 के समय में कई स्थितियां सामने आ रही हैं। जमाकतार्ओं की सुरक्षा बेहद जरूरी थी। कई सहकारी बैंकों में जमाकर्ता परेशानी का सामना कर रहे थे। सरकार नहीं चाहती कि पंजाब महाराष्ट्र को-आॅपरेटिव बैंक (पीएमसी) जैसी स्थिति का सामना करना पड़े। बकौल सीतारमन, इसके दायरे में केवल ऐसी सहकारी सोसाइटी आएंगी जो बैंकिंग क्षेत्र में काम रही हैं। राज्यों के सहकारिता कानूनों को नहीं छुआ गया है और प्रस्तावित कानून इन बैंकों में वैसा ही नियमन लाना चाहता है, जैसे दूसरे बैंकों पर लागू होते हैं। यह विधेयक भारतीय रिजर्व बैंक को आवश्यकता पड़ने पर सहकारी बैंकों के प्रबंधन में बदलाव करने का अधिकार देता है। इससे सहकारी बैंकों में अपना पैसा जमा करने वाले आम लोगों के हितों की रक्षा होगी। कृषि सहकारी समितियां या मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र में काम करने वाली सहकारी समितियां इस विधेयक के दायरे में नहीं आएंगी।

माननीयों के वेतन में 30 प्रतिशत की कटौती
मंत्रियों के वेतन और भत्ते में 30 प्रतिशत की कटौती वाला विधेयक सुर्खियों में रहा। कोविड-19 से निपटने के संसाधन जुटाने की मुहिम में सांसदों के वेतन में 30 प्रतिशत की कटौती करने वाले संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन (संशोधन) विधेयक 2020 पर भी संसद ने मुहर लगा दी है। संसद सदस्यों के वेतन, भत्ता एवं पेशन अधिनियम-1954 में संशोधन के बाद इस विधेयक को लाया गया है। कोरोना वायरस महामारी के बीच इस अध्यादेश को 6 अप्रैल, 2020 को मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली थी और यह 7 अप्रैल, 2020  को लागू हुआ था। इस विधेयक पर चर्चा में भाग लेते हुए अधिकतर विपक्षी सदस्यों ने कहा कि सांसदों के वेतन में कटौती से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन सरकार को सांसद निधि के निलंबन पर पुनर्विचार करना चाहिए। संसदीय मामलों के मंत्री प्रह्लाद जोशी ने का कहना था कि कोविड-19 के कारण उत्पन्न अभूतपूर्व स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। यह कदम उनमें से एक है। परोपकार की शुरूआत घर से होती है। ऐसे में संसद के सदस्य यह योगदान दे रहे हैं और यह छोटी या बड़ी राशि का सवाल नहीं है, बल्कि भावना का है।
 
यदि आनलाइन प्रश्नों की बात की जाए तो 23 सितम्बर तक कुल 7,648 प्रश्न आए, जिनमें 2300 प्रश्नों के उत्तर सदन में दिए गए। इस तरह संकट काल में जहां आनलाइन कामकाज के तरीके को लेकर देशभर में नई परंपरा विकसित हुई है, वहीं पढ़ाई-लिखाई से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियों और सरकारी कामकाज तक आॅनलाइन की राह पर आगे बढ़ रहा है। हालांकि, संसद में कामकाज को पेपरलेस बनाने की कवायद बहुत पहले से हो रही है। पेपरलेस का मतलब ही आनलाइन कामकाज को बढ़ावा देना है।

कुल मिलाकर कोरोना काल में संसद के मानसून सत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने भागीदारी कर जिस भावना का प्रदर्शन किया है उसने दुनिया के सामने भारतीय संसदीय व्यवस्था की नई मिसाल पेश की है। साथ ही, कोरोना काल की चुनौतियों के बावजूद सरकार ने आर्थिक, कृषि और श्रमिक क्षेत्र में सुधारों को गति देकर अपने इरादों को साफ कर दिया है। मानसून सत्र में 25 विधेयकों का पारित होना इसका ही संकेत है।