कृषि सुधार कानून पर झूठ की खेती कर रहा विपक्ष, किसानों को किया जा रहा भ्रमित

    दिनांक 30-सितंबर-2020
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 डॉ. विशाल मिश्रा
मोदी सरकार किसानों की उन्नति के लिए क्रांतिकारी सुधार और किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए तीन बिल लाई। वहीं इन बिलों के विरोध में विपक्षी दल अपनी स्वार्थपरक राजनीति के लिए झूठी, भ्रामक और गलत सूचनाओं को प्रचारित एवं प्रसारित कर रहे हैं

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भारत गांवों का देश है। कृषि प्रधान देश है और कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसकी बागडोर हमारे किसानों के हाथ में है। गांव, किसान और कृषि आत्मनिर्भर भारत के आधार हैं। ये जितने सशक्त होंगे आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना उतनी ही सार्थक होगी।
आजादी के समय कृषि का भारत के राष्ट्रीय आय में 50 प्रतिशत का योगदान था और यह लगभग 70 प्रतिशत से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता था। 2019 तक आते आते कृषि का भारत के राष्ट्रीय आय में योगदान लगभग 16.5 प्रतिशत घटकर रह गया परन्तु अभी भी यह लगभग 42 प्रतिशत से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है। बीते सोमवार को किसान बिल के विरोध में एक घटना सामने आयी जिसमें यह दिखाया गया कि किसान ने विरोध में अपने ट्रैक्टर को आग लगा दी। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारा आम किसान वास्तव में इतना सम्पन्न हो चुका है कि वह अपने ट्रैक्टर को जला सके ? यदि हम वस्तुःस्थिति का अवलोकन करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे अन्नदाता की स्थिति में कोई वस्तुनिष्ठ उन्नति नहीं हुई है।
आखिर वे कौन से कारक हैं, जिन्होंने किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं किया ? कारण स्पष्ट है कि किसानों के नाम पर कई सरकारें बनी परन्तु किसानों को केवल झूठे वादों और कानूनों का एक ऐसा अंतःजाल दिया गया, जो हमारे किसान भाइयों की समझ से परे था।
वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य को लेकर चल रही है और इसी संदर्भ में वह कृषि क्षेत्र और किसानों की उन्नति के लिए क्रांतिकारी सुधार और किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए तीन बिल लाई। पर इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहेंगे है कि इन बिलों के विरोध में विपक्षी दल अपने स्वार्थपरक राजनीतिक के लिए झूठी, भ्रामक और गलत सूचनाओं को प्रचारित एवं प्रसारित कर रहे हैं। जबकि यही लोग किसानों के नाम पर खूब बड़े-बड़े नारे लगाते थे और अपने चुनावी घोषणा-पत्र में बड़े-बड़े वादे किया करते थे।
इनमें से पहला विधेयक देश के अन्नदाता को बिचौंलियों के चंगुल से आजादी और किसान को अपनी उपज को अपने इच्छानुसार मूल्य पर बेचने की आजादी देता है। अभी तक किसानों के लिए बाजार केवल स्थानीय मण्डी तक सीमित था, मूल्यों में कोई पारदर्शिता नहीं थी। खरीदार भी सीमित थे और साथ ही साथ आधारभूत संरचना की कमी भी थी। यही नहीं परिवहन की लागत और स्थानीय माफिया का डर भी उनकी स्थिति को और निर्बल बनाता था। इस बिल के कारण अब हमारे अन्नदाताओं को एक राष्ट्रीय बाजार मिलेगा और बिचौलियों से मुक्ति भी। यही नहीं किसानों के लिए एक देश, एक बाजार का सपना भी चरितार्थ होगा।
नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में कई कदम उठाये हैं। जैसे स्वामीनाथन समिति की सिफारिश को लागू कर उत्पादन की लागत पर एमएसपी- न्यूनतम समर्थन मूल्य को कम से कम 50 प्रतिशत मुनाफा पर तय करना, पिछले कार्यकाल से लेकर वर्तमान तक कृषि बजट को 11 गुना बढ़ाना, आत्म-निर्भर भारत की संकल्पना के अन्तर्गत 1 लाख करोड़ रुपए का कृषि आधारभूत ढांचा का कोष तैयार करना, 10,000 एफपीओ के गठन की घोषणा जिसकी लागत लगभग 6,685 करोड़ रुपये होगी, ई—एनएम पोर्टल, जैसे-देश भर की 1000 विनिमय थोक मंडियों में उच्चतम मूल्य पर फ़सल बेचने की सुविधा इसमें 1.44 लाख से अधिक विक्रेता और 1.67 करोड़ से अधिक किसान पंजीकृत हुए हैं, इत्यादि शामिल है।
जिस प्रकार भारत विविधताओं का देश है, उसी प्रकार यहां की कृषि का आकार, कृषि की मौसम पर निर्भरता, प्रकृति की अनिश्चितता, बाजार की अनिश्चितता कृषि को विविधता से परिपूर्ण करती है। आज यह समय की मांग है कि किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा से पूर्ण एक वैकल्पिक व्यापारिक चैनल का माध्यम उपलब्ध कराया जाए, जो किसानों को उनके पारिश्रमिक और लागत के अनुसार अवरोध मुक्त स्वतंत्र बाजार उपलब्ध करा सके और साथ ही साथ अंतरराज्यीय वाणिज्य को भी बढ़ावा दे सके। यही नहीं स्वामीनाथन समिति ने भी सिफारिश की थी कि मण्डी कर को हटाया जाय, एकल बाजार का निर्माण किया जाए और अनुबंध खेती को सुविधाजनक बनाया जाए, परन्तु पूर्वोत्तर सरकारों ने इन सिफारिशों को नजरंदाज कर दिया।
दूसरे किसान सुधार बिल में फसल के करार का भी प्रावधान है। यह बिल खेत को संविदा पर रखने के लिए नहीं है। खेत का मालिक और उपज का मालिक किसान है लेकिन नए विधेयक से अब किसान को बुआई से पूर्व ही फसल के मूल्य की गारंटी मिल सकेगी। किसानों को किसी भी समय यदि उनको प्रतीत होता है, तो वे इस करार से बाहर आ सकते हैं। इस बिल के अन्तर्गत अब किसान अपनी इच्छानुसार कृषि आधारित उद्योगों, थोक विक्रेताओं, निर्यातकों के साथ करार कर सकेंगे। उन्हें तकनीकी सहायता, अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। अब कृषि क्षेत्र में निजी निवेश भी किया जा सकेगा।
कई राज्यों में बडे़ किसान कार्पोरेट्स के साथ मिलकर नगदी फसलों के उत्पादन में लाभ ले रहे थे। अब जब यह लाभ छोटे और मझोले किसानों को भी मिलने का समय आया है, तो विपक्षी दलों को यह भा नहीं रहा है। विपक्षी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि सरकार किसानों को बड़े कार्पोरेट्स घराने के साथ अनुबंध करके समाप्त कर देगी, जबकि सचाई यह है कि कई दशकों से कई राज्यों द्वारा अनुबंध खेती लागू की गई है। जैसे- पंजाब, पश्चिम बंगाल। यहां तक की पंजाब, तमिलनाडु, ओडिसा ने भी अनुबंध खेती से संबंधित अधिनियम पारित किये हैं। कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार ने अनुबंधित खेती को बढ़ावा दिया और राज्यों को इसे लागू करने के लिए तैयार किया। ये कानून किसानों की उन्नति और उनके हितों की रक्षा के लिए ही हैं।
एक और मिथ्या और दिगभ्रमित आरोप लगाया जा रहा है कि ये विधेयक किसानों को एमएसपी- न्यूनतम समर्थन मूल्य से बाहर निकालने की साजिश है। साथ ही साथ यह भी कि केन्द्र सरकार राज्य सरकारों द्वारा अधिनियमित एपीएमसी-कृषि उपज विपणन समिति कानून को निरस्त कर रही है। जबकि बिल में स्पष्ट प्रावधान है कि व्यापार क्षेत्र में कृषि उपज के व्यापार पर कोई कर नहीं लगेगा। इससे किसानों को बेहतर दाम मिलेगा। मंडियों के बारे में भ्रामक दुष्प्रचार किया जा रहा है, जबकि वास्तविक्ता यह है कि राज्यों के एपीएमसी-कृषि उपज विपणन समिति अधिनियमों के अन्तर्गत मंडियां अपना काम जारी रखेंगी। यह बिल राज्य एपीएमसी-कृषि उपज विपणन समिति अधिनियमों को आच्छादित नहीं करता है। जबकि एपीएमसी की तुलना में वैकल्पिक व्यापारिक चैनलों के माध्यम से बेहतर कीमत के बारे में पता लगाया जा सकेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने और कृषि मंत्री ने कई बार स्पष्ट किया है कि एमएसपी-न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद जारी रहेगी। ये बिल एमएसपी-न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित नहीं है। वास्वत में इसी सरकार ने धान और गेंहू के लिए पिछले 5 वर्षों में एमएसपी क्रमशः 2.5 गुना और 1.7 गुना अधिक बढ़ाया है।
एमएसपी- न्यूनतम समर्थन मूल्य एक प्रशासनिक निर्णय है, जो कि वर्तमान में लागू है और भविष्य में भी रहेगा। यह बिल किसानों को अधिकतम तीन दिन में भुगतान प्राप्त करने को सुनिश्चित करता है। बीते सालों में सरकार द्वारा यह निरंतर प्रयास किया गया है कि किसान को बैंकों से सीधे जोड़ा जाए। साथ ही इस बिल में किसानों की सुरक्षा के अन्य उपाय भी किए गए हैं—जैसे किसानों की भूमि, बिक्री, पट्टे, बन्धक पर रोक लगाना आदि शामिल है।
इस सबके साथ ही किसी भी प्रकार के विवादों का समाधान एक सुलह बोर्ड के माध्यम से किया जाएगा, जिसका गठन उप-विभागीय मजिस्ट्रेट- एसडीएम द्वारा किया जाएगा। सरकार ने इसके लिए एक निर्धारित समय सीमा तय कर दी है। बोर्ड को 30 दिन के अन्दर विवाद का निपटारा करना होगा। यह बोर्ड राशि की वसूली का आदेश दे सकता है, जुर्माना लगा सकता है और व्यापारी को अनुसूचित किसानों की उपज के व्यापार वाणिज्य के लिए एक निश्चित अवधि के लिए प्रतिबंधित कर सकता है।
तीसरे बिल के अन्तर्गत अब आवश्यक वस्तुएं जैसे- दाल, प्याज, आलू इत्यादि कृषि उत्पाद तय किये गए भण्डारण सीमा से बाहर हो जाएंगी। यह कृषि विपणन के लिए अति आवश्यक कदम था। इस पर विरोधियों द्वारा यह अनर्गल आरोप और भ्रम फैलाया जा रहा है कि इससे काला बाजारी को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन वे यह आरोप लगाते समय भूल जाते हैं कि जब आजादी के बाद तत्कालीन सरकार द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम—1955 पास करके भण्डारण की सीमा तय की गई थी, उस समय हमारे देश में खाद्यान्न की कमी थी, जबकि वर्तमान में परिस्थितियां बदल गयी हैं और आज भारत में अधिशेष उत्पादन होता है।
किसानों को वास्तव में आर्थिक विकास का कोई लाभ बीते दशकों से नहीं मिला। कांग्रेस अगर इन बिलों का विरोध कर रही है, तो उसे पहले अपने घोषणा पत्र से मुकरने की घोषणा भी करनी चाहिए। क्योंकि उन्होंने 2019 के अपने घोषणापत्र में कहा था कि एपीएमसी- कृषि उपज विपणन समिति कानून को बदलेगी, किसानों के व्यापार पर कोई कर नहीं होगा और अन्तर्राज्यीय व्यापार को बढ़ावा दिया जायेगा। आज विपक्ष ने दुर्भावना में ग्रसित होकर एक झूठे प्रपंच का सहारा लिया है, जिसमें यह अनर्गल आरोप लगाया जा रहा है कि यह बिल एमएसपी- न्यूनतम समर्थन मूल्य को हटाने, किसानों की भूमि को हड़पने और उन्हें व्यापारिक कम्पनियों का गुलाम बनाये रखने का प्रावधान करता है। यही नहीं 2019 के घोषणा पत्र में कांग्रेस ने कहा था कि एमएसपी- न्यूनतम समर्थन मूल्य अधिनियम में बदलाव, आवश्यक वस्तु अधिनियम को रदद् करने और किसानों के लिए एक बाजार स्थापित करने का भी बादा किया था, जहां किसान अपनी उपज को बिना किसी दबाव या नियंत्रण के स्वतंत्रता पूर्वक बेच सकते हैं।
आज कांग्रेस का झूठा विरोध यह सिद्ध करता है कि इसके घोषणा पत्र का वादा कितना खोखला था और सिर्फ किसानों को वोट बैंक के लिए उपयोग करने की साजिश थी। यही नहीं विपक्षी दलों का यह प्रयास है कि किसानों को समाज की मुख्य धारा से काटकर गरीबी में ही रखा जाये, स्पष्ट प्रतीत होता है।

( लेखक राजधानी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं )