ढांचा विध्वंस फैसला: अब वे जवाब दें...

    दिनांक 30-सितंबर-2020   
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अदालत का फैसला आने के बाद ढांचा विध्वंस मामले का पटाक्षेप हो गया। अब सवाल उन पर उठना चाहिए जो दशक दर दशक देश की भावनाओं का अनादर करते हुए सत्य को भटकाने और देश को धमकाने की कोशिशें करते रहे। जिन्होंने हिंदू समाज के असीम धीरज का दशकों तक तिरस्कार किया। अब वे जवाब दें..l1_1  H x W: 0
ढाँचा विध्वंस मामले में अदालत का फैसला आ गया। 28 वर्षों से बन रही और बनाई जा रही सुर्ख़ियों का पटाक्षेप हो गया है। हालाँकि “लिबरल-सेकुलर” ब्रिगेड के कुछ छुटभइयों ने इस फैसले को लेकर भी उन्माद भड़काने और संदेह खड़ा करने की हलचलें तेज कर दी हैं, लेकिन लगता नहीं है कि वे इसे हवा देने की बहुत अधिक कोशिशें कर सकेंगे, क्योंकि अब इससे उनका सियासी गणित सधने वाला नहीं है। एक जमाने में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी उनके निशाने पर हुआ करते थे। अब उनके निशाने बदल गए हैं। फिलहाल उनकी प्राथमिकताएं कुछ और हैं और आम देशवासी अपने गौरव और संस्कृति को लेकर मुखर है। लेकिन फैसला आने के बाद अब इस बात पर बहस होनी चाहिए कि आखिर ढाँचे के विध्वंस की परिस्थितियां निर्मित करने के पीछे कौन लोग हैं?  सत्ता प्रतिष्ठान में जमे ऐसे कौन लोग थे, जिन्हें सत्य से ज्यादा सियासी फायदे की फ़िक्र थी, जिनके लिए करोड़ों लोगों की आस्था का कोई मोल नहीं था। जिन्होंने एक बार भी विचार नहीं किया कि पांच सदियों से चले आ रहे हिंदू समाज के असीम धीरज का सम्मान करते हुए सच को सामने लाने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए। जो दशक दर दशक मामले को लटकाए रखना चाहते थे। जिनकी छाया में पल रहे छद्म इतिहासकार देश और अदालत को गुमराह करने की कोशिश करते रहे और फटकारे जाते रहे।

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फैसले तक पहुंचने के लिए अदालत और जांच एजेंसियों की अपनी प्रक्रिया होती है, लेकिन यदि  ढांचा विध्वंस के वीडियो फुटेज को देखें तो ध्यान में आता है कि मंच पर मौजूद नेतागण लगातार आक्रोशित भीड़ से ढाँचे से उतर आने और शांतिपूर्ण ढंग से कारसेवा करने की अपील कर रहे थे। इसके पूर्व देशभर में निकाली गई रथयात्रा के दौरान आडवाणी जी के भाषणों के अनेक वीडियो उपलब्ध हैं। उस समय के समाचार पत्रों में भी उनके भाषणों के विवरण छपे हैं। श्री मुरली मनोहर जोशी, स्वर्गीय अशोक सिंहल आदि के भी सार्वजनिक भाषण-साक्षात्कार प्रकाशित हुए हैं। उसी समय के संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के वक्तव्य भी मौजूद हैं। इनमें कहीं भी विद्वेषपूर्ण अथवा संविधान विरोधी एक शब्द भी नहीं है। इन सभी वक्तव्यों का विषय ऐतिहासिक प्रमाण, जनभावना, संविधान की मूलभावना और भारत का प्राचीन सर्वपंथ समभाव ही रहा है। जिनमें बार-बार कहा गया है कि भारत के मुसलमानों की रगों में भी हिंदू पूर्वजों का ही रक्त दौड़ रहा है। रक्त और संस्कृति के नाते हम सब भारतवासी एक हैं और हममें से किसी का भी विदेशी हमलावरों से कोई संबंध नहीं है। चुनौतीपूर्वक कहा जा सकता है कि स्वर्गीय अशोक सिंहल, श्री आडवाणी, श्री जोशी अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ अधिकारियों के वक्तव्यों में एक भी शब्द देश की एकात्मता और संविधान के सम्मान के परे नहीं है।

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लेकिन दूसरी ओर ऐसे बयान और धमकियां मौजूद हैं, जो देश, संविधान और न्यायव्यवस्था को चुनौती देते हैं। जैसे “बाबरी की एक ईंट भी हटाई तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे..”, “एक बार मस्जिद बन गई तो क़यामत तक वह मस्जिद ही रहती है...”, “हम केवल खुदा का क़ानून मानते हैं...”, “महमूद गजनवी और बाबर हमारे हीरो हैं...” आदि। देश में गृहयुद्ध की धमकी और देश के टुकड़े कर देने की बातें भी खुलेआम कही गईं। छद्म सेकुलर राजनैतिक दल और सरकारें राम के अस्तित्व पर सवाल उठाते रहे। हिंदुओं के जले पर नमक छिड़कते हुए राम जन्मभूमि पर पार्किंग, अस्पताल और कॉलेज बनाने की सलाहें दी जाती रहीं। मानो राम जन्मस्थान के अलावा अन्य कोई स्थान कॉलेज–पार्किंग-अस्पताल आदि बनाने के लिए उपलब्ध न हो।

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विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में राम-सीता- लक्ष्मण और हनुमान पर क्षुद्र मानसिकता से लिखी गई अत्यंत आपत्तिजनक सामग्री पढ़ाई जाती रही। इन बातों पर तत्कालीन सत्ताधीशों और पत्रकारिता – बुद्धिजीविता के ठेकेदारों ने कभी आपत्ति नहीं उठाई। ये मानसिकता 6 दिसंबर की घटना के बाद भी नहीं बदली। बाटला हाउस के सिमी के गुर्गे, इशरतजहां और सोहराबुद्दीन जैसे आतंकियों के एनकाउंटर पर तूफ़ान खड़ा करने वाले और आँसू बहाने वालों ने कभी भी निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाने पर सवाल नहीं खड़े किए। आतंकी याकूब मेमन, अफजल और कसाब के लिए मर्सिया गाने वालों का दिल बलिदानी कोठारी बंधुओं के लिए कभी नहीं पिघला।

षडयंत्र नहीं आक्रोश था...
फैसले के बाद यह साफ़ हो गया है कि 6 दिसम्बर की घटना सदियों से पनप रहे आक्रोश के कारण घटी। विघ्नसंतोषी तत्व माहौल बनाएँगे, अदालत और सीबीआई पर उँगली भी उठाएँगे, लेकिन अपने दुष्प्रचार को हवा देने के लिए उन्हें बेहतर बहाने खोजने होंगे, क्योंकि पिछले तीन दशकों से यह मामला चल रहा था। इन तीन दशकों में कांग्रेस व तथाकथित सेकुलर दलों की सरकारें रहीं। वामपंथी बैसाखियों पर टिके कई प्रधानमंत्री कुर्सी पर बैठे। पर सच सिर चढ़कर बोलता है। 


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लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत ने मामले में फैसला सुनाते हुए लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह, नृत्यगोपाल दास सहित सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि ढांचा विध्वंस सुनियोजित नहीं था और  'अराजक तत्वों ने ढांचा गिराया था, जबकि उपरोक्त आरोपी नेताओं ने लोगों को ढाँचा गिराने से रोकने का प्रयास किया था।' 28 साल तक चले इस मामले की सुनवाई में 351 लोगों ने गवाही दी। 600 दस्तावेज पेश किए गए।


17 आरोपियों की मौत मुकदमे की सुनवाई के दौरान हो गई। शेष 32 आरोपियों के नाम इस प्रकार थे- लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, महंत नृत्य गोपाल दास, डॉ. राम विलास वेदांती, चंपत राय, महंत धर्मदास, सतीश प्रधान, पवन कुमार पांडेय, लल्लू सिंह, प्रकाश शर्मा, विजय बहादुर सिंह, संतोष दुबे, गांधी यादव, रामजी गुप्ता, ब्रज भूषण शरण सिंह, कमलेश त्रिपाठी, रामचंद्र खत्री, जय भगवान गोयल, ओम प्रकाश पांडेय, अमर नाथ गोयल, जयभान सिंह पवैया, महाराज स्वामी साक्षी, विनय कुमार राय, नवीन भाई शुक्ला, आरएन श्रीवास्तव, आचार्य धर्मेंद्र देव, सुधीर कुमार कक्कड़ और धर्मेंद्र सिंह गुर्जर।

फैसला सुनाते हुए जज ने निम्नलिखित पांच अहम टिप्पणियां की हैं-
  1. 'बाबरी' विध्वंस सुनियोजित घटना नहीं थी।
  2. मामले में आरोपियों के खिलाफ ठोस और पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
  3. उपलब्ध कराए गए ऑडियो-वीडियो टेप की प्रामाणिकता साबित नहीं हो सकी।
  4. जो लोग 'बाबरी' के गुंबद पर चढ़े थे, वे सभी असामाजिक तत्व थे।
  5.  भाषण का ऑडियो क्लिप स्पष्ट नहीं है.

इन नेताओं के अलावा लाखों रामभक्त कारसेवकों के खिलाफ भी मामला बनाया गया था, जिसमें आईपीसी की धारा 153 ए (सांप्रदायिक आधार पर दुश्मनी फैलाना), 297 (श्मशान में अतिक्रमण करना), 332 (सरकारी कर्मचारी को उसके कर्तव्य से डिगाने के लिए जानबूझकर चोट पहुंचाना), 337 (दूसरों की जिंदगी और निजी सुरक्षा को खतरे में डालना), 338 (जिंदगी खतरे में डालकर गंभीर चोट पहुंचाना), 395 (डकैती) और 397 (लूटपाट, मौत का कारण बनने की कोशिश के साथ डकैती) के तहत केस दर्ज किया गया था। अब यह सब इतिहास का हिस्सा बन चुका है। श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण का कार्य जारी है।  ‘सत्यमेव जयते’ साकार हो रहा है। नया भारत अपने अतीत के गौरव के साथ यश गगन में उदित हो रहा है।

 
  सत्य,धर्म फिर हुआ प्रतिष्ठित


  सत्य,धर्म फिर हुआ प्रतिष्ठित, उसको न्याय मिला है।
  मुगलों,चुगलों की साज़िश का पर्वत आज हिला है।
  बरी हो गये सभी ढांचा प्रकरण के आरोपित,
  आज वस्तुतः अन्तर्मन में खुलकर कमल खिला है।

  न्यायपीठ के धर्मस्वी निर्णेताओं की जय हो।
  जोशी, साध्वी, अडवाणी-से नेताओं की जय हो।
  जय हो सत् के प्रबल पक्षधर अधिवक्ता-बान्धव की
  शूर-वीरता के वाहक युग-चेताओं की जय हो। 
-आचार्य देवेन्द्र देव