खोदा पहाड़, निकला कुनबा

    दिनांक 04-सितंबर-2020   
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काले को सफेद बताने के फेर में सबको धोखा देने वाली कांग्रेस नेहरू परिवार से फिर खुद धोखा नहीं खाएगी कहना मुश्किल है, क्योंकि धोखा और असत्य तो ए. ओ. ह्यूम इसकी कुंडली में लिख गए थे। और असत्य का क्या
है, असत्य अपमानित भी होता है, पराजित भी।
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पिता जवाहर लाल नेहरू और बेटों राजीव  व संजय के साथ इंदिरा
 
कहावत है कि पूत के पांव पालने में दिखने लगते हैं। इस कहावत के आइने से कांग्रेस को देखा जाए तो जो सबसे बड़ा शब्दचित्र उभरता है वह है-धोखा!

एक अंग्रेज, ए. ओ. ह्यूम द्वारा अंग्रेजी शासन के हितों की पूर्ति करने और भारतीयों को धोखा देने के लिए ही तो कांग्रेस की स्थापना की गई थी!

कांग्रेस की स्थापना के पीछे अंग्रेजों का उद्देश्य वैसी स्थितियां फिर से उत्पन्न न होने देना था, जो 1857 बन आई थीं। यानी सीमित आक्रोश को ‘दिखाने’ परन्तु वास्तव में उसे ‘दबाने’ वाला ‘ढक्कन’।

विश्लेषकों ने प्यार से इसे ‘सेफ्टी वॉल्व’ कहा, लेकिन चाहे जो कहा ढक्कन, ढक्कन ही रहा।

भला हो राष्ट्रीय विचारों की अलख जगाते लाल-बाल-  पाल जैसे महापुरुषों का, जिन्होंने अंग्रेजी राज के पिट्ठू मंच को भारतीय स्वराज की अलख का मैदान बना डाला। इस मैदान में जुटता जनसमूह गांधीजी के चरखे पर स्वावलंबन बुनने लगा और सुभाष के उद्घोषों पर गुलामी के बंद उधेड़ने लगा।

कांग्रेसी इतिहासकारों को कुनबे से परे जाते ये तथ्य बेचैन कर सकते हैं, परंतु सचाई यही है कि इस पार्टी के प्रारंभिक अधिवेशनों का इतिहास ब्रिटिश राज की चरण-वंदना की पोथी भर है। अपने मूल गुणसूत्रों के साथ कांग्रेस का प्रारंभिक दौर वह था जब अधिवेशनों का प्रारंभ ‘वह महारानी विक्टोरिया, जिनके जूतों के फीते बांधने के भी हम योग्य नहीं..’ से होता था और समापन भी ‘महारानी विक्टोरिया की जय’ के लगातार नारों के साथ किया जाता था।

दरअसल, लाल-बाल-पाल स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे स्तंभ थे, जिनके ऊपर महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के अन्य नेता अपने आंदोलन खड़े कर सके। यह भी ध्यान देने की बात है कि ब्रिटिश शासन से आजादी हासिल करने का विचार कांग्रेस का मुद्दा तब जाकर बना जब कई राष्ट्रीय स्वर और संगठन उभरकर समाज के सामने आने लगे तथा पूर्ण स्वराज की मांग देशभर में गूंजने लगी। तब कई कांग्रेस नेताओं को लगा कि आजादी की मांग न करने से वे कहीं अप्रासंगिक न हो जाएं। कांग्रेस की ओर से पहली बार 1930 में पूर्ण स्वराज की मांग की गई। यह वही कालखंड था जब शहीद भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथी राष्ट्रीय नायक के तौर पर उभर कर आए थे। देश के जनमानस का कांग्रेसी नेताओं से मोहभंग होने लगा था। कांग्रेस एक तरफ देश की आजादी की बात करती थी, तो दूसरी ओर कांग्रेस के कई प्रमुख नेता महारानी विक्टोरिया और ब्रिटिश सरकार के प्रति दासता की हद तक दोस्ताना और लचीले थे।

खैर, भले विभाजन का दंश सहकर ही सही, सभी राष्ट्रभक्तों के संपूर्ण प्रयासों से देश को अन्तत: आजादी मिली।

यह वह पल था जब कांग्रेस पार्टी और इस देश की कमान नेहरू के हाथ आई। इसके साथ ही विलायती सोच को श्रेष्ठ मानने वाले ‘जवाहर’ ने गांधी की सोच का मोल मिट्टी कर दिया।

कांग्रेस अब उस कुनबे के लिए सत्ता की कुंजी थी, जो एक महात्मा के कंधे पर चढ़कर उस तक पहुंचा था।

अचकन पर गुलाब लगाने वालों ने गांधी के नाम का बिल्ला तो लगाया मगर उनके विचारों को साफ कपड़ों को लजाने वाली धूल की तरह झाड़ दिया।

तब नेहरू ने गांधी से कहा था, ‘‘आपके ‘हिंद स्वराज’ को मैं पहले भी पढ़ता था, तब भी मैं उससे सहमत नहीं था। अब तो मेरा पूरा विश्वास है कि उन दकियानूसी विचारों के आधार पर देश की रचना करने से भारत पिछड़ा ही रहेगा। विश्व के देशों की प्रगति की दौड़ में आगे बढ़ने के लिए उसे रूसी मॉडल पर खड़ा करना होगा।’’

स्वतंत्रता के उस उजाले में नेहरू ने गांधी को जो टका-सा जवाब दिया उसके बाद कुनबे की किस्मत चमकी मगर भारत के भविष्य पर अंधेरा गहराता गया।

महात्मा गांधी चाहते थे कि आजादी के साथ ही कांग्रेस को भंग कर दिया जाए, लेकिन नेहरू के नाम पर सियासत का एक दूसरा रूप ही सामने आने लगा। औपनिवेशिक ढर्रे को मुश्किल से त्याग, राष्ट्रीय रंग में रंगती कांग्रेस, कुनबे के मन से चलने लगी।

महात्मा के विचारों को खूंटी पर टांग, नेहरू खानदान ने अपनी राजनीति में गांधी के सिर्फ नाम को जोड़कर भारतीय राजनीति में परिवारवाद का नया अध्याय लिख डाला।

यह बात तब की, अब बात अब की।

क्योंकि समय के झटकों और किंचित अपवादों के बावजूद कुनबे की कड़ियां इस दल के लिए बेड़ियां बनी हुई हैं।

लेकिन कब तक! अब जंजीरें खड़खड़ाने लगी हैं।

कांग्रेस कार्य समिति की हाल ही में हुई बैठक में जब कांग्रेस के 23 प्रमुख नेताओं ने एक पत्र लिखकर कांग्रेस में नेतृत्व का मुद्दा उठाया तो कांग्रेस की आंतरिक कलह पूरे देश के सामने आ गई।

देश ने पहली बार महसूस किया यह पार्टी परिवार का बोझ ढोते-ढोते हांफने लगी है।

सोनिया गांधी 1998 से 2017 तक लगातार 19 साल पार्टी की अध्यक्ष रहीं। यह पार्टी के इतिहास में अब तक का रिकॉर्ड है। 2019 में राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से ही अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर सोनिया के पास ही पार्टी की जिम्मेदारी है।

कहा जाता है कि राजनीति में परिवारवाद आम है। किंतु यह सामान्य नहीं है, विश्व में लोकतंत्र का गला घोटने वाले परिवारवाद की ऐसी मिसाल दुर्लभ है।

आजादी के 73 साल में से 38 साल नेहरू-फिरोज परिवार का सदस्य ही पार्टी का अध्यक्ष रहा है। जबकि, इस परिवार से बाहर के अध्यक्ष के कार्यकाल में ज्यादातर समय नेहरू परिवार का सदस्य प्रधानमंत्री रहा है।

दिलचस्प यह है कि कार्य समिति ने अंतरिम अध्यक्ष पद पर सोनिया गांधी को बने रहने की अपील के साथ ही यह संदेश भी दिया गया कि इस परिवार के बाहर जाकर अध्यक्ष तलाशने की कोशिश की भी गई तो वह ज्यादा दिन तक टिक नहीं सकेगा। वैसे, कुनबे की चरणागत कांग्रेस का इतिहास भी यही बताता है। आजादी के बाद से नेहरू परिवार के संरक्षण के बिना यहां कोई अध्यक्ष टिक नहीं सका है।

कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी अध्यक्ष सीताराम केसरी के अकल्पनीय अपमान का दृश्य आज भी कांग्रेस के आम कार्यकर्ता और देश को याद है।

असल में कांग्रेस के सामने नेता, नीति और नीयत तीनों का संकट है।

जहां तक नेता का सवाल है तो यह बात जगजाहिर है कि मनमनोहन सिंह भले सोनिया गांधी और राहुल गांधी के रहते हुए प्रधानमंत्री बने रहे हों, लेकिन उनकी सरकार के समानांतर सोनिया गांधी दूसरी व्यवस्था चला रही थीं, जिसमें ऐसे विचारक शामिल थे, जो भारत के संविधान और समाज की आकांक्षाओं को ताक पर रख अपने ढंग से देश को चला रहा थे। जिसका परिणाम भ्रष्टाचार, उग्रवाद, नक्सलवाद, खस्ता आधारभूत ढांचे तथा अर्थहीन नीति के रूप में उभरकर सामने आया।

उस दुर्दशा के मूल को यदि चिन्हित करना हो तो यह था - देश के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व की नीयत देश की मजबूती से अधिक कांग्रेस के शीर्ष परिवार की मजबूती पर केंद्रित होना।

हद तो यह कि परिवार चाहे कितना ही उलटा करे उसे सीधा बताना कांग्रेस की मजबूरी है।

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के नाम पर घोर असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक तंत्र जमाने वाली सोनिया माइनो को महान जनतांत्रिक नेत्री के रूप में प्रस्तुत किया गया।

अपने संसदीय क्षेत्र में ही ‘अलोकप्रिय’ हो चुके, अमेठी जैसे गढ़ को गंवाने वाले राहुल को देशभर में लोकप्रिय बताया गया।

भाषा में अभद्र, भाषण में अक्षम और विरोधियों के लिए षड्यंत्र रचने वाले परिवार को सुसंस्कृत, कुशल वक्ता तथा रचनात्मक राजनीतिज्ञ के रूप में बार-बार देश के सामने पेश किया गया।

हालांकि, देश नहीं, खुद कांग्रेस पार्टी खुद से यह झूठ बोलते-बोलते थक चुकी है, किंतु काले को सफेद बताने के फेर में सबको धोखा देने वाली कांग्रेस नेहरू परिवार से फिर खुद धोखा नहीं खाएगी कहना मुश्किल है, क्योंकि धोखा और असत्य तो ए. ओ. ह्यूम इसकी कुंडली में लिख गए थे। और असत्य का क्या है, असत्य अपमानित भी होता है, पराजित भी।  @hiteshshankar