​शिक्षक दिवस: विलक्षण थी प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति

    दिनांक 04-सितंबर-2020
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 पूनम नेगी
भारत की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में "शिक्षक" को ऐसी मार्गदर्शक सत्ता माना जाता था जो भ्रम व अज्ञान के सभी आवरण हटाकर शिष्य के अन्तस को आत्मज्ञान की ज्योति से आलोकित कर देती थी

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प्राचीन भारत में शिक्षा को व्यवस्थित रूप देने के क्रम में हमारे तत्वदर्शी मनीषियों के समक्ष सर्वप्रथम दो प्रश्न उभरे थे। प्रथम ‘क्या’ सिखाया जाए तथा द्वितीय ‘कैसे’ सिखाया जाए? इन प्रश्नों पर व्यापक चिंतन के फलस्वरूप वैदिक भारत में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की नींव पड़ी थी। इस चिर पुरातन गुरु-शिष्य परम्परा के कारण प्राचीन काल में हमारा भारत आत्मविद्या के शीर्ष पर था। आधुनिक समाज सुशिक्षित मनुष्य का आकलन इस बात से करता है कि ‘‘तुम्हारे पास क्या है! ’’ जबकि प्राचीन भारतीय चिंतन में विद्यावान व्यक्ति को इस तराजू पर तौला जाता था कि ‘‘तुम क्या हो!’’ शिक्षा व विद्या, भोग व योग, भौतिकता व आध्यात्मिकता तथा प्रकृति व परमात्मा आदि के सन्तुलित समन्वय पर आधारित वैदिक भारत की शिक्षा व्यवस्था ने ही हमारे देश को ‘‘सोने की चिड़िया’’ व ‘‘विश्वगुरु’’ बनाया था।
शाश्वत जीवन मूल्यों और सुसंस्कारों के सतत बीजारोपण की इस अमूल्य परम्परा के पोषक भारतीय ऋषियों की मान्यता थी- ‘‘विद्या सा या विमुक्तये’’ अर्थात विद्या वह जो मुक्ति प्रदान करे। भारत की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में "शिक्षक" को ऐसी मार्गदर्शक सत्ता माना जाता था जो भ्रम व अज्ञान के सभी आवरण हटाकर शिष्य के अन्तस को आत्मज्ञान की ज्योति से आलोकित कर देती थी। संस्कृति के पुण्य प्रवाह में हमारी आध्यात्मिक धरा के तप:पूत आचार्यों व शिक्षकों के आत्मज्ञान की प्रखर ऊर्जा ने न केवल समूचे राष्ट्रजीवन को प्रकाशमान किया था अपितु अपने सुपात्र शिष्यों के माध्यम से इस दिव्य आत्म विद्या के सतत प्रवाहमान बने रहने की व्यवस्था भी सुनिश्चित की थी।
प्राचीन भारतीय वांग्मय में हमें गुरुकुल शिक्षण परम्परा की तमाम विलक्षणताओं विहंगम दिग्दर्शन होते हैं। नगरों और गांवों से दूर शान्त, स्वच्छ और प्रकृति की सुरम्य गोद में संचालित होने वाले वैदिक भारत के इन गुरुकुलों का मुख्य उद्देश्य कोरे पुस्तकीय ज्ञान के स्थान पर शिक्षा, विद्या और दीक्षा के समन्वय पर केन्द्रित था। राजाश्रय व जनसहयोग से चलने वाले इन गुरुकुलों में हर वर्ण के छात्र साथ पढ़ते थे। इन शिक्षा केन्द्रों में अमीर-गरीब सबको समान सुविधाएं दी जाती थी, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। गुरुकुल में प्रवेश करने के आठ साल की उम्र निर्धारित थी। गुरुकुल में छात्रों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता था-1. वासु - 24 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले। 2. रुद्र- 36 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले। 3. आदित्य- 48 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले। भोजन के लिए विद्यार्थियों को भिक्षाटन करना होता था पर निर्धारित नियमों के साथ। दिन में एक बार सिर्फ एक दरवाजे पर झोली फैलाना। इन गुरु आश्रमों में विद्यार्थियों को शाकाहार व ब्रह्मचर्य का पालन कठोरता से करना होता था। इस गुरुकुलीय शिक्षा का मूल उद्देश्य आध्यात्मिक विकास और चरित्र निर्माण के साथ विद्यार्थी को स्वावलंबी बनाना तथा भावी जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करना था। शिक्षा पूरी होने पर बच्चे के अभिभावक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु को जो भी देते थे, वे उसे प्रेम से स्वीकार करते थे। वह गांवों की जागीर से लेकर लौंग के दो दाने तक कुछ भी हो सकता था। शिक्षा पूर्ण हो जाने पर गुरु शिष्य की परीक्षा लेते थे। शिष्य अपने सामर्थ्य अनुसार दीक्षा देते थे किंतु गरीब विद्यार्थी उससे मुक्त कर दिए जाते थे और समावर्तन संस्कार संपन्न कर उसे अपने परिवार को भेज दिया जाता था।
बताते चलें कि इन गुरुकुलों में सहशिक्षा का भी प्रचार था। स्त्री और पुरुषों की समान शिक्षा को लेकर यह गुरुकुल कितने अधिक सक्रिय थे, इसके कई उदाहरण मिलते हैं। मनुस्मृति में लड़के व लड़की दोनों की शिक्षा पर काफी बल दिया गया है। उत्तर रामचरित में वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश के साथ पढ़ने वाली आत्रेयी नामक स्त्री का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार आठवीं शताब्दी के कवि भवभूति के समय भी बालक-बालिकाओं की सह-शिक्षा का प्रचलन था। अपने ग्रन्थ मालती-माधव में भवभूति ने भूरिवसु एवं देवराट के साथ कामन्दकी नामक स्त्री के एक ही पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करने का वर्णन किया है। इसी प्रकार पुराणों में कहोद और सुजाता, रूहु और प्रमदवरा की कथाएं वर्णित हैं।
हमारे ये गुरुकुल कई मायनों में विशिष्ट थे। यहां दी जाने वाली शिल्प, वास्तु, संगीत, नृत्य, कला आदि ज्ञान की विभिन्न लौकिक धाराओं की शिक्षा दीक्षा पर कभी भी ब्राह्मणों का एकाधिकार नहीं रहा। यहां अन्य वर्णों के लोग भी गुरु के गरिमामय पद पर बैठने के अधिकारी थे। पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास में सबसे अधिक संख्या शूद्र सन्तों की रही जिनको तत्कालीन समाज के सभी वर्णों से मान्यता मिली तथा भरपूर सम्मान भी। मीरा बाई क्षत्राणी थीं और शिष्य बनी सन्त रविदास की। सन्त कबीर जुलाहे थे और बहुत सारे ब्राह्मण-क्षत्रियों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था।
प्राचीन भारत में तक्षशिला, पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, मिथिला, धारा, तंजोर, काशी, कर्नाटक, नासिक आदि की शिक्षा संस्थाएं समूचे आर्यावर्त में प्रसिद्ध थीं। सार्वजनिक शिक्षण संस्थाएं सर्वप्रथम बौद्ध विहारों में स्थापित हुई थीं। इनमें नालन्दा विश्वविद्यालय ( 450 ई.), वल्लभी (700 ई.), विक्रमशिला (800 ई.) प्रमुख शिक्षण संस्थाएं थीं। इन संस्थाओं का अनुसरण करके हिन्दुओं ने भी मन्दिरों में विद्यालय खोले जो आगे चल कर मठों के रूप में परिवर्तित हो गए। ‘पृथ्वीराज विजय’ (10 वीं सदी) में अजमेर के आसपास की अनेक शिक्षा संस्थाओं के उल्लेख मिलते हैं। चीनी यात्री हुएनसांग के अनुसार विश्वविख्यात शिक्षा केन्द्र नालंदा के लिए 500 व्यापारियों ने 10 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देकर जमीन खरीदी थी।
प्राचीन भारत की शिक्षण प्रणाली की महत्ता को उजागर करता पाश्चात्य दार्शनिक शोपेनहॉवर का यह कथन वाकई काबिले गौर है कि विश्व में यदि कभी कोई सर्वाधिक प्रभावशाली व सर्वव्यापी सांस्कृतिक क्रांति हो सकती है तो केवल उपनिषदों की भूमि-भारत से। जिज्ञासु शिष्यों ने ज्ञानी गुरु के समीप बैठकर उनके प्रतिपादनों को क्रमबद्ध कर उपनिषदों के रूप में दुनिया को जो दिव्य धरोहर दी है, उसका कोई तोड़ नहीं है। उनका कहना था कि यदि मुझसे पूछा जाए कि आकाश मंडल के नीचे कौन सी वह भूमि है, जहां के मानव ने अपने हृदय में देवीय गुणों का पूर्ण विकास किया तो मेरी उंगली भारत की ओर ही उठेगी। यदि मैं स्वयं से पूछूं कि वह कौन सा साहित्य है जिससे अब तक ग्रीक, रोमन व यहूदी विचारों में पलते आये यूरोपवासी प्रेरणा ले सकते हैं तो मेरी उंगली केवल भारत की ओर ही उठेगी। वहीँ प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत आए यूनानी राजदूत मैगस्थनीज भी भारत की तद्युगीन की शिक्षा-दीक्षा से बेहद प्रभावित थे। उनके यात्रा वृत्रांत ‘‘इण्डिका’’ में स्पष्ट उल्लेख मिलता है, ‘‘मैं यह देख कर आश्चर्यचकित था कि भारत में रात्रि के समय भी कोई अपने मकान में ताला नहीं लगाता था। मकान के भीतर केवल चांद की सत्यनिष्ठ किरणें ही प्रवेश कर सकती थीं, कोई संदिग्ध व्यक्ति नहीं। सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत के व्यापारियों के ईमान की सौगंध खाई जाती थी।’’ इसी तरह विश्वमंच से भारत की पुरातन ज्ञान सम्पदा का गौरवगान करने वाले स्वामी विवेकानंद का कहना था, ‘‘हमें गर्व है कि हम अनंत गौरव की स्वामिनी उस भारतीय संस्कृति के वंशज हैं, जिसके महान शिक्षकों ने सदैव दम तोड़ती मानव जाति को अनुप्राणित किया है। समय की प्रचण्ड धाराओं में जहां यूनान, रोम, सीरीया, बेबीलोन जैसी तमाम प्राचीन संस्कृतियां बिखरकर अपना अस्तित्व खो बैठीं, वहीं एकमात्र हमारी भारतीय संस्कृति इन प्रवाहों के समक्ष चट्टान के समान अविचल बनी रही क्योंकि हमें हमारी आत्मज्ञान सम्पन्न दिव्य-विभूतियों का सशक्त मार्गदर्शन सतत मिलता रहा।"
शिक्षा के व्यवसायीकरण के कट्टर विरोधी थे डॉ. राधकृष्णन

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एक सर्वप्रिय आदर्श शिक्षक के रूप में अपने जीवन के 40 साल अध्यापन कार्य को समर्पित करने वाले भारतरत्न सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का मानना था कि पश्चिमी जगत मनुष्य का आकलन इस बात से करता है कि तुम्हारे पास क्या है! क्योंकि उनका जीवन दर्शन भोगप्रधान है। जबकि भारतीय चिंतन में व्यक्ति को इस तराजू पर तौला जाता है कि तुम क्या हो! क्योंकि हमारा भारतीय दर्शन आत्मप्रधान है। हम भारतीय सदा से ज्ञान के उपासक रहे हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ज्ञान की प्रतिष्ठापना करना हमारी विशेषता रही है। देश के प्रथम शिक्षा आयोग के अध्यक्ष के रूप में विश्वविद्यालयीय व माध्यमिक शिक्षा के उत्थान के लिए अनेक सुधारवादी कदम उठाने वाले डॉ. राधकृष्णन शिक्षा के व्यवसायीकरण के कट्टर विरोधी थे।
सनद हो कि मैकाले प्रणीत शिक्षा पद्धति के आज कारण हमारी नई पौध अपनी जड़ों से कटती जा रही है। स्थिति यह है कि अध्य्यापन शिक्षक की नौकरी बन गयी है और छात्र जानकारियों का यह पुलंदा महज इसलिए बटोर रहे हैं ताकि भविष्य में मोटी कमाई कर सके। दूसरे शब्दों में कहें तो सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान, सूचना संग्रह और डिग्रियों तक सीमित आज शिक्षा की शिक्षा व्यवस्था का मूल मकसद केवल मोटा पैसा कमाना हो गया है। समूचे देश में कुकुरमुत्तों की तरह उगे पांच सितारा स्कूल व कालेजों की भरमार ने पुरातन भारत के दिव्य शैक्षिक लक्ष्यों को पलीता लगा दिया है। देश के शिक्षा केन्द्र आज भ्रष्टाचार, ट्यूशन, नकल, नंबर बढ़ाने और हिंसक आंदोलन जैसी प्रवृत्तियों के साथ नग्नता, गुंडागर्दी, दलाली और राजनीति के अड्डे बन रहे हैं। इनमें केवल अधिकारों की बात होती है, कर्त्तव्य भावना की नहीं। आर्थिक उदारीकरण ने शिक्षा जगत का कबाड़ा कर दिया है। बताते चलें कि शिक्षा के व्यावसायीकरण की इस समस्या को कुछ साल पहले आयी शबाना आजमी और जूही चावला अभिनीत एक संदेशपरक फिल्म "चाक एंड डस्टर" में अत्यन्त बारीकी से दर्शाया गया था। आज जितना अधिक शिक्षा का प्रभाव बढ़ रहा है, उतना ही मानसिक प्रदूषण भी बढ़ रहा है। शिक्षा बढ़ रही है पर जीवन विद्या घट रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बनी हालिया शिक्षा नीति के नए प्रावधान इस दिशा में कारगर कदम साबित हो सकेंगे।
शिक्षा में उच्च नैतिक मूल्यों के प्रबल हिमायती थे डॉ. कलाम

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गौरतलब हो कि भारत में "मिसाइलमैन" के नाम से विख्यात देश के ग्यारहवें राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की भी जिंदगी शिक्षा को समर्पित रही। डॉ. राधाकृष्णन की ही भांति उनको भी शिक्षक की भूमिका बेहद पसंद थी। उनका मानना था कि शिक्षा कारोबार की वस्तु नहीं हो सकती। उनकी मान्यता थी कि मूल्यपरक शिक्षा, ज्ञान और प्रकाश की ऐसी अंतहीन यात्रा है जो हमें सत्य की खोज में ले जाती है। अगर व्यक्ति अपने जीवन में शिक्षा के इस मूल यथार्थ को हर अंगीकार कर ले तो यह दुनिया रहने के लिए सबसे बेहतरीन जगह बन जाए। डॉ. कलाम शिक्षा प्रणाली को उच्च नैतिक मूल्यों से जोड़कर उपयोगी और रोजगारोन्मुख बनाने के प्रबल हिमायती थे। उनका मानना था कि विकसित राष्ट्र बनने की प्रक्रिया शिक्षा के बिना असंभव है। पिता से ईमानदारी व आत्मानुशासन तथा माता से ईश्वर-विश्वास और करुणा की विरासत का उपहार पाने वाले इस महामानव ने ऐसे स्वर्णिम भारत का स्वप्न देखा था जहां महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध न हों, जहां समाज में कोई भी व्यक्ति खुद को अलग थलग महसूस न करे, जहां गांव और शहर के बीच बहुत कम अंतर हो और जहां का शासन पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त हो।