पालघर हत्याकांड : सीबीआई जांच से क्यों कतरा रही है उद्धव सरकार

    दिनांक 07-सितंबर-2020   
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पालघर की घटना से उपजे सवाल अब भी जवाब की मांग कर रहे हैं। विवेक विचार मंच की तथ्यान्वेषी समिति ने साधुओं की निर्मम हत्या की उस घटना की गहन खोजबीन करके राज्य सरकार से सीबीआई जांच कराने की मांग की है
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पुलिस वाहन में ‘भीड़ की हिंसा’ के शिकार दो साधुओं की मृत देह ( फाइल चित्र)


तिलमिलाए हुए हैं सेकुलर राजनीति के हथकंडेबाज, इस्लामी-चर्च पोषित मीडिया, तथाकथित बुद्धिजीवी और इन सबके झांसे में आकर समाज में दरार डालने के हस्तक बने आम सेकुलर मानसिकता वाले लोग। तिलमिलाहट ये कि, करीब 60 साल से झूठी पंथनिरपेक्षता के फंदे में जिस हिन्दू मन को कसा जाता रहा, हिन्दुओं को हर व्यावहारिक रीति—नीति से दोयम दर्जे का नागरिक दिखाया जाता रहा, जिसके पैसों पर जिहादी, अलगाववादी पाले जाते रहे, जिसको किताबों में मुगलों की ‘महानता’ और हिन्दू योद्धाओं की ‘भीरुता’ के सबक पढ़ाए जाते रहे, जिसके पुरखों की देन का मखौल उड़ाकर विदेशी ज्ञान-विज्ञान को ‘सर्वश्रेष्ठ’ का तमगा दिया जाता रहा, जिसके त्योहारों पर शिकंजे कसे जाते रहे और मंदिर की घंटियों पर अंकुश लगाया जाता रहा, वह हिन्दू मन पिछले करीब 6 साल से अपने स्वाभिमान के प्रति सचेत क्यों हो रहा है! क्यों वह अपने संतों को पूज रहा है, क्यों वह अपने मंदिर बना रहा है, क्यों वह सेकुलरवाद का हमारा पढ़ाया पाठ रटने से मन कर रहा है!

जवाब तलाशते प्रश्न
    • क्यों और कैसे लगभग 400 या उससे अधिक आदिवासियों की भीड़ रात के समय एकत्र हो सकती है?     
    • तथ्यात्मक बात क्या थी, जो आदिवासी गांवों के निवासियों के बीच प्रचारित की गई जिसके परिणामस्वरूप लोग घटनास्थल पर पहुंच गए?
    • क्या गढ़चिंचले और आसपास के गांवों में संचार का कोई तंत्र मौजूद है, जिसके परिणामस्वरूप दो घंटे के भीतर लगभग चार सौ लोग एकत्र हो सकते हैं?
    • क्या विभिन्न गांवों से गढ़चिंचले में लगभग 400 व्यक्तियों को पहुंचाने के लिए कोई परिवहन सहायता मौजूद थी?
    • यदि जांच में परिवहन सहायता के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलते, तो क्या संदेश की 'गंभीरता' के कारण इतने लोग स्वयं घटनास्थल पर पहुंच गए?
    • क्या केंद्र शासित प्रदेश दादरा नगर हवेली के ग्राम चिसाड़ा के आदिवासियों को कोई संदेश भेजा गया था और किसके द्वारा, जिसके फलस्वरूप सड़क को अवरुद्ध किया गया और गढ़चिंचले की ओर जा रही पुलिस की वैन/बस को रोका गया?
    • वे कौन से कारण हो सकते हैं कि घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मी प्रत्यक्ष रूप से निष्क्रिय बने रहे, और अपराध को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया?
    • जिस व्यक्ति के आगमन पर भीड़ ‘दादा आला-दादा आला’ (दादा आ गया है-दादा आ गया है) कहते हुए खुशी जताने लगी, उसको निर्णायक रूप से पहचाना जा सकता है?
    • क्या किसी स्थानीय व्यक्ति द्वारा घटना को रोकने के लिए कोई प्रयास किया गया था?
    • ग्रामीणों के मानस को कौन नियंत्रित कर रहा है?
    • क्या दहानू और तलासरी आदिवासी पट्टी में हिंसा का कोई इतिहास मौजूद है?
    • क्या 16 अप्रैल 2020 को हुई घटना सीधे या दूर-दूर तक भी अतीत में हुई हिंसा की घटनाओं से संबंधित हो सकती है?
    •  क्या दो संन्यासियों और उनके ड्राइवर को लक्षित करके आदिवासी एकता परिषद और काश्तकारी संघटना के दीर्घकालिक लक्ष्य के रूप में विभाजनकारी भूमिका का कोई सीधा संबंध है?
    • क्या काश्तकारी संघटना और आदिवासी एकता परिषद की विभाजनकारी गतिविधियों को साधुओं की हत्या के विशेष संदर्भ के साथ सीबीसीआई से किसी भी रूप में समर्थन प्राप्त है?
      (तथ्यान्वेषी समिति की रपट से)

2014 के बाद से तो, देश भर में एक ‘सेकुलर असहिष्णुता’ का माहौल बनाने में और तेजी से जुट गई हैं उन-उन राज्यों की सरकारें जो अब भी ‘सेकुलर’ होने का दम भरते हुए ‘हिन्दू दमन’ को अपनी सत्ता का मंत्र मानती आ रही हैं। खासकर गैर भाजपा शासित राज्यों में खुलेआम मुस्लिम-ईसाई तुष्टीकरण किया जाता है और पूरी बेशर्मी के साथ किया जाता है। एक तरह से हिन्दुओं को चिढ़ाने वाले फैसले लिए जाते हैं। हिन्दू आहत हों तो शिकायत का रजिस्टर मुंह पर बंद करके ऐसा भाव दिखाया जाता है चेहरे पर कि ‘जा, जो करना है कर ले! हम तेरी न सुनने के!’ प. बंगाल में ममता को जयश्रीराम से नफरत है पर इमामों को आम करदाताओं की गाढ़ी कमाई से बेमतलब महीने के 18 हजार रु. देने से गुरेज नहीं। हिन्दुओं के गांव के गांव फूंक दिए जाते हैं, और अपराधियों के खिलाफ चूं तक नहीं कर सकता कोई, क्योंकि मुस्लिम तमगा लगा मिलता है उन पर! केरल में पिनरई को मंदिरों में आरतियों से नफरत है, पर मस्जिदों की तय हद से तेज अजान से कोई फर्क नहीं पड़ता। दिल्ली में केजरीवाल को गणेश उत्सव पर पर्यावरण ध्यान आता है लेकिन ईद पर बकरों की कुर्बानी से प्रदूषण पर खींसें निपोरते हैं। झारखंड में अपराधियों को सिर्फ इस वजह से रिहाई देने की बात की जाती है क्योंकि वे ईसाई हैं।

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घटनास्थल पर घायल अवस्था  एक साधु ( फाइल चित्र)

हिंदू विरोधी गतिविधियां
  •  आदिवासी एकता परिषद और आदिवासी श्रमिक संघटना जैसे संगठनों ने दशहरे के अवसर पर रावण के पुतले को जलाने से रोकने की कोशिश की। उन्होंने जनजातीय समाज की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और उन्हें आहत करने के लिए रावण का पुतला फूंकने का प्रयास करने पर विभिन्न कानूनों के तहत शिकायतें दर्ज करने की धमकी दी। वे उनके सामने मिथ्या प्रचार और तर्क  देते हैं कि ‘रावण आदिवासियों का देवता है’।
  •  ग्राम शिश्ने के निवासी छगन वावरे बताते हैं कि वामपंथी संगठनों द्वारा आदिवासियों में झूठ फैलाया जाता है कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं। इन संगठनों द्वारा विभाजनकारी गतिविधि के एक उपकरण के रूप में रावण पूजा की प्रथा का आग्रह किया जा रहा है। वे युवाओं पर दबाव बनाते हैं कि हिंदू देवता आदिवासियों के भगवान नहीं हैं। राम नहीं, बल्कि रावण उनके देवता हैं। गणेश उत्सव के दौरान ये संगठन युवाओं में सोशल मीडिया के माध्यम से झूठी कहानी फैलाकर गणपति की पूजा करने से रोकते हैं और जनजातीय जनसंख्या की पहचान के बारे में भ्रम पैदा करते हैं। स्थानीय जनजातीय समाज में रोष है क्योंकि वे समुदाय पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। (तथ्यान्वेषी समिति की रपट से)
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मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे
इसी कड़ी में महाराष्ट्र की उद्धव सरकार है। महाराष्ट्र विकास अघाड़ी नाम से कुर्सी पकड़े रहने का जो इंतजाम किया गया है उसमें भी ‘सेकुलर मूल्यों’ का मंत्र रटाया जाता है। तीन दलों के इस घालमेल में तालमेल मजाक का विषय लगता है! और इसी वजह से हिन्दुओं के खिलाफ साजिशें रचती आ रहीं ताकतों को खुला मैदान मिला हुआ है इन-इन राज्यों में!

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गृहमंत्री अनिल देशमुख

ये हैं समिति की सिफारिशें
    • ‘स्वतंत्र आदिवासी क्षेत्र’ दोहराने की घटना, जैसी पत्थलगढ़ी, झारखंड में हुई थी, नक्सली आंदोलन के साथ गुप्त संबंधों की संभावना को स्थापित करती है। इसलिए, एनआईए के माध्यम से इस घटना की जांच हो।
    • हिंसात्मक साधनों के साथ सांप्रदायिक घृणा और जनविरोधी एजेंडा फैलाने वाले संगठनों की एनआईए एवं सीबीआई जैसी राष्ट्रीय स्तर की जांच एजेंसियों से जांच होनी चाहिए।
    • मुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री के बयान के कारण जांच की दिशा भटकनी नहीं चाहिए, और व्यक्तियों एवं काश्तकारी संघटना, आदिवासी एकता परिषद सहित संस्थाओं की भूमिका तथा भागीदारी की गहन जांच व छानबीन होनी चाहिए।
    •  वास्तविक चश्मदीद गवाहों की पहचान होनी चाहिए और उन्हें सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।
    • हिंसा के इतिहास को देखते हुए गवाहों को उचित संरक्षण और सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
    • निर्दोष आदिवासियों को, राजनीतिक साठगांठ और क्योंकि वे आदिवासी एकता परिषद और काश्तकारी संघटना के अनुयायियों में से नहीं हैं, के कारण बेवजह फंसाया नहीं जाना चाहिए।       
      (तथ्यान्वेषी समिति की रपट से)

महाराष्ट्र में जनजातीय बहुल पालघर तालुका। गढ़चिंचले गांव। 16 अप्रैल 2020. लॉकडाउन का काल! अपने साधु भाई महंत रामगिरी के अंतिम संस्कार के लिए जा रहे थे दो साधु, पंच दशनाम जूना अखाड़े के। भगवा वेश। 70 वर्षीय संत कल्पवृक्ष गिरी और 35 वर्षीय सुशील गिरी। गाड़ी का चालक था नीलेश तेलगढ़े। पालघर के पास महामार्ग पर बेरीकेडिंग से उन्हें एक सुनसान रास्ते पर बढ़ा दिया गया। क्या पता था उन्हें कि यह सब कथित साजिश के तहत हो रहा था। आगे गढ़चिंचले गांव के पास जानलेवा हथियारों से लैस भीड़ रास्ते में आ गई। हिंसक झड़प हुई। गाड़ी पलटने और भीड़ जमा होने की ‘खबर पाकर’ रात 11.10 बजे मुट्ठीभर पुलिस वाले स्थानीय कासा पुलिस थाने से आए। 11.30 बजे दोनों साधुओं और उनके वाहन चालक को पलटी गाड़ी से निकालकर अपनी गाड़ी में बैठाया। लेकिन तभी ‘दादा आला-दादा आला’ (दादा आया-दादा आया) चिल्लाते हुए हिंसक उन्माद में भर गई हथियारों से लैस 400—500 लोगों की भीड़! पुलिस वालों की आंखों के सामने, दोनों साधुओं को पीटना शुरू कर दिया उसने। साधु पुलिस से बचाने की चिरौरी करते रहे और पुलिस वाले उन्हें भीड़ के आगे लगभग ठेलते रहे। शायद मारने वालों को उकसा भी रहे थे। हथियार थे पुलिस के पास, पर निहत्थों से गए-गुजरे लग रहे थे। जैसे, कहीं से ‘कुछ न करने’ की हिदायत हो! एक गवाह श्रीमती चित्रा चौधरी ने बताया कि ये ‘दादा’ हैं काशीनाथ चौधरी। पालघर जिला परिषद में राकांपा से चुने गए सदस्य।  दो दिन बाद 18 अप्रैल को इस घटना का वीडियो वायरल हुआ तब जाकर बाकी देश को पता चला कि ऐसी वीभत्स घटना हुई है। दो दिन बाद मुख्यमंत्री ने बड़ी मासूमियत भरा बयान दिया कि गांव में बच्चा चोर गिरोह की अफवाह फैली हुई थी, लिहाजा चोर समझकर भुलावे में साधुओं को मारा। ‘इसमें कोई सांप्रदायिक कोण न ढूंढा जाए’। सरकारी खानापूर्ति! सेकुलर मंत्र की लीक पर!
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वीडियो से लिए इस चित्र में साफ दिखता है कि वृद्ध साधु को पुलिस संरक्षण देने में नाकाम रही और उन्हें बेरहमी से मारा गया

पालघर में पत्थलगढ़ी
पता चला है कि झारखंड में नक्सल नेतृत्व वाले पत्थलगढ़ी आंदोलन की तर्ज पर पालघर में काम करने वाले वामपंथी संगठन संवैधानिक ढांचे और गतिविधियों के प्रति घृणा को बढ़ावा देने में लिप्त रहे हैं। सरकार के सभी रूपों के लिए गांवों की पूर्ण स्वायत्तता का दावा करते हुए संसद या राज्य सरकार द्वारा अधिनियमित कानून का पालन न करने और अनुसूचित क्षेत्र के भीतर संविधान के लागू नहीं होने की घोषणा की गई। चिखले ग्राम पंचायत ने मई 2017 में ग्राम सभा में इसी तरह का एक प्रस्ताव पारित किया। जिस व्यक्ति ने प्रस्ताव रखा, वह आदिवासी एकता परिषद का सदस्य है।
 (तथ्यान्वेषी समिति की रपट से)

यह कहती है दादरा नगर हवेली पुलिस की एफआइआर
दादरा नगर हवेली के खानवेल पुलिस थाने में 18 अप्रैल, 2020 को दर्ज सी.आर. संख्या 906 की एफआईआर से पता चलता है कि तलासरी पुलिस स्टेशन को पालघर पुलिस स्टेशन से रात लगभग 11.30 बजे फोन आया। तद्नुसार, 17 अप्रैल, 2020 को पुलिस डायरी में इसे दर्ज करने के बाद पांच पुलिस अधिकारी और आरसीपी पलटन के जवान दादरा नगर हवेली होकर गढ़चिंचले के रास्ते में थे, लेकिन लगभग 00.45 बजे ग्राम चिसाडे में स्कूल के पास पुलिस की गाड़ी को लाठी, पत्थरों तथा कुल्हाड़ी से लैस 200 लोगों की भीड़ द्वारा रोका गया था। भीड़ ने पुलिसकर्मियों को पुलिस वाहन से बाहर नहीं निकलने दिया और उन्हें सुबह 3.00 बजे तक चिसाडे गांव में बंधक बनाकर रखा।                        
(तथ्यान्वेषी समिति की रपट से)

इस बयान और इतनी बड़ी घटना से उठते सवालों पर न पुलिस ने हरकत की, न राज्य सरकार ने आगे कुछ ठोस करने की बात की। हिन्दू साधु जो मारे थे ‘भीड़’ ने।
लेकिन गैर सरकारी संगठन विवेक विचार मंच चुप नहीं बैठा। उसने तुरत एक तथ्यान्वेषी समिति बनाई और जनजातीय बहुल इलाके पालघर में हुई उस घटना की तह में जाने की ठानी। उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अंबाप्रसाद जोशी की अध्यक्षता में बनी उक्त सामिति में तरुण भारत, मुंबई के संपादक किरण शेलार, पालघर जिले के सामाजिक कार्यकर्ता संतोष जनाठे, पूर्व सहायक पुलिस आयुक्त लक्ष्मण खारपड़े, सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती माया पोद्दार, अधिवक्ता समीर कांबले और अधिवक्ता प्रवर्तक पाठक सम्मिलित रहे। समिति की जांच में जो बातें सामने आर्इं, वे चौंकाने वाली हैं। कई दिन की मेहनत के बाद साक्ष्यों के आधार पर काफी सामग्री जुटाने के बाद समिति ने रपट सौंपी मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, पुलिस आयुक्त और राज्यपाल को। सरकार ने रजिस्टर में नोट करके ‘देखने’ की बात की तो आयुक्त कार्यालय ने भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। गत 29 अगस्त को इस समिति ने वेब कार्यक्रम में उक्त रपट पर चर्चा की और  कई अनुत्तरित सवालोंं पर उद्धव सरकार से जवाब तलब किए।

भरोसा नहीं होता कि महाराष्ट्र जैसे राज्य में आज के दौर में ऐसे स्थान भी हैं जहां खुलेआम देशद्रोह का सबक दिया जा रहा है दशकों से। ऐसा संभव नहीं है कि सत्ताधारियों को इसकी जानकारी न हो। लेकिन बात फिर वहीं आ जाती है-सेकुलरवाद! हिन्दू के विरुद्ध है तो होने दो! समिति की रपट आंखें खोलेगी सरकार की अगर वह इसे पढ़ेगी!रपट  मजबूर करेगी कानून की रखवाली एजेंसियों को कि हरकत में आओ!

गढ़चिंचले गढ़ रहा है माकपा, चर्च पोषित तत्वों, नक्सली तत्वों का। ये सब मिलकर भोले-भाले जनजातीय समाज को डरा-धमकाकर मनमानी करते आ रहे हैं वर्षों से। समानांतर सरकार चलाते हैं वे एक तरह से। खुलेआम हिन्दू धर्म को त्यागने, संविधान को ठुकराने, सरकार की विकास योजनाओं को बंद कराने, किसी हिन्दू संगठन को न पनपने देने, शिक्षा से विमुख होने और न जाने कितनी सड़ी-गली सोच पर चलने के लिए उकसाते हैं उन्हें। एक पुराना चर्च मिशनरी तो प्रदीप प्रभु नाम रखकर किसानों के बीच दशकों से सक्रिय है। एक पादरी निकोलस बारला यूएन तक में उपस्थिति दर्ज करा चुका है चर्च के पैसे से। चर्च की ही कथित शह पर नक्सली झारखंड जैसा ही पत्थलगढ़ी आंदोलन चला रहे हैं यहां। माने, न सरकार, न संविधान! न पुलिस, न कानून!

पालघर में माकपा-चर्च की आपत्तिजनक गतिविधियां
  • भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की विस्तृत बैठक रिपोर्ट-2015, पालघर-ठाणे और नासिक के ग्रामीण क्षेत्रों में जनजातियों के बीच मजबूत पकड़ का दावा करती है।
  • कम्युनिस्ट वहां लोगों, अशिक्षित जनजातीय युवाओं और अन्य जनजातीय बंधुओं को सरकार की विकास परियोजनाओं, हिंदुओं द्वारा शुरू गईं शैक्षिक तथा अन्य विकास परियोजनाओं, हिंदू संतों-साधुओं के विरुद्ध नफरत करने के लिए उकसाते हैं।
  • आदिवासी एकता परिषद, भूमिसेना, काश्तकारी संघटना, माओ वैचारिक संगठन व उनके कार्यकर्ता हिंदुओं और सरकार के खिलाफ जनजातीय समाज में नफरत फैलाने के लिए कड़ा प्रयास कर रहे हैं।
  •  26 अप्रैल 2018 को कैथोलिक बिशप चर्च आफ इंडिया के जनजातीय मामलों के एक कार्यकारी सचिव फादर निकोलस बारला ने यूएनओ में आदिवासी एकता परिषद का प्रतिनिधित्व किया था। आदिवासी एकता परिषद द्वारा आयोजित सम्मेलन को कैथोलिक बिशप चर्च आफ इंडिया द्वारा प्रायोजित किया गया था। सीबीसीआई जनजातीय अधिकारों एवं सम्मान के नाम पर जनजातीय समाज को एकजुट करती है। आदिवासी एकता परिषद ने सीबीसीआई के कार्यक्रमों में से एक के लिए एक प्राथमिक बैठक का समन्वय किया।            
    (तथ्यान्वेषी समिति की रपट से)

भरोसा नहीं होता कि महाराष्ट जैसे राज्य में आज के दौर में ऐसे स्थान भी हैं जहां खुलेआम देशद्रोह का सबक दिया जा रहा है दशकों से। ऐसा संभव नहीं है कि सत्ताधारियों को इसकी जानकारी न हो। लेकिन बात फिर वहीं आ जाती है-सेकुलरवाद! हिन्दू के विरुद्ध है तो होने दो! समिति की रपट आंखें खोलेगी सरकार की अगर वह इसे पढ़ेगी! रपट मजबूर करेगी कानून की रखवाली एजेंसियों को कि हरकत में आओ! सुशांत की सीबीआई जांच हो ही रही है। समिति ने पालघर घटना की भी सीबीआई जांच की मांग की है। उद्धव देंगे इजाजत? मुश्किल लगता है! गृहमंत्री अनिल देशमुख शरद पवार की राकांपा से हैं। वे इसे ‘गलतफहमी’ से हुई घटना मानते हैं। शायद इसीलिए करीब 104 लोगों की गिरफ्तारी के बाद आनन-फानन में अधिकांश की जमानत भी हो गई। लेकिन हैरानी की बात है कि जो ‘दादा’ के नाम से जाने जाते हैं इस इलाके में, जिनके इशारे पर कथित
भीड़ उन्माद में भरी, उनको नामजद तक नहीं किया गया है। समिति की रपट बताती है, मुख्यमंत्री के साथ खुलेआम घूमते दिखते हैं ‘दादा’!