राजस्थान: कांग्रेस राज में किसान बेहाल

    दिनांक 07-सितंबर-2020   
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राजस्थान में हठधर्मी सरकार की असंवेदनशीलता के चलते किसान संघ का 35 दिनों तक प्रदेशव्यापी आंदोलन चला। एक किसान की मौत भी हो गई लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। सरकार ने किसान की मौत को कोरोना से होने वाली मौत बता दिया

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विभिन्न मांगों को लेकर किसानों ने 35 दिनों तक आंदोलन किया लेकिन राजस्थान सरकार ने मांगे नहीं मानी।
किसानों को दिया जाने वाला विद्युत अनुदान पुन: शुरू करने की मांग व दस दिनों तक हजारों किसानों का महापड़ाव और एक किसान की मौत, ‘लेकिन सरकार इतनी हठधर्मी हो सकती है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।’ हठधर्मिता व असंवेदनशीलता एक ऐसा ही वाकया देखने को मिला है राजस्थान में, जहां भारतीय किसान संघ के बैनर तले 35 दिनों तक चले किसान आंदोलन में हजारों किसानों ने 21 सूत्रीय मांगों को लेकर आंदोलन किया।
मुख्यमंत्री के गृह जिले जोधपुर में हजारों किसानों ने महापड़ाव किया, जिसमें एक किसान की मौत हो गई। इसके बावजूद सरकार ने किसानों की एक नहीं सुनी और मृतक किसान की कोरोना रिपोर्ट कथित तौर पर पॉजिटिव बताकर किसानों को आंदोलन स्थगित करने के लिए मजबूर कर दिया। इससे किसान हितैषी होने का दावा करने वाली कांग्रेस पार्टी की राजस्थान सरकार का किसान विरोधी चेहरा उजागर हो गया है।
किसान आंदोलन से जुड़े पूर्व विधायक भैराराम सियोल ने मृतक पुखराज की रिपोर्ट पर संदेह जताते हुए कहा कि हमें पहले से ही पता था कि सरकार मृतक किसान पुखराज की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव बताकर किसान आंदोलन को दबाना चाहेगी। उन्होंने रिपोर्ट पुन: जांच के लिए एम्स भेजने की मांग की है। लेकिन फिलहाल एक बार आंदोलन समाप्त हो गया है लेकिन आगे की रणनीति सभी किसान नेता बैठकर बनाएंगे।
भारतीय किसान संघ द्वारा राजस्थान में किसानों ने कोरोना संक्रमण काल के दौरान के 6 महीने के बिजली के बिल माफ करने व 833 रुपए प्रति माह विद्युत अनुदान देने समेत किसान हितों की कई मांगों को लेकर प्रदेशव्यापी आंदोलन कर सरकार के खिलाफ बिगुल फूंका था। किसानों ने एक हजार से अधिक ज्ञापन मुख्यमंत्री को भेजे, लगातार 35 दिनों तक धरना-प्रदर्शन किए, लेकिन सरकार ने किसानों की एक नहीं सुनी और सरकार की इसी अकर्मण्यता के चलते जोधपुर में आंदोलनकारी एक किसान पुखराज की मौत हो गई। जोधपुर समेत प्रदेशभर में हुए किसान आंदोलन ने सरकार को बेचैन तो किया, लेकिन इसके बावजूद आंख-कान मूंदकर बैठी रही।
जोधपुर के आंदोलन में शामिल किसान मालाराम बताते हैं, ‘पूर्ववर्ती सरकार बिजली बिलों पर अनुदान देती थी, लेकिन कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार ने अनुदान बंद कर गरीब किसानों के हितों पर कुठाराघात किया है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए थे, जिन्हें भूलकर बिजली कंपनियों की जेब भरने के लिए किसानों का शोषण किया जा रहा है। वे बताते हैं कि हजारों किसान पिछले 25 दिनों से शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे, ज्ञापन देने रोका गया तो बारिश के मौसम में खुले आसमान के नीचे सडक़ पर बैठकर 10 दिन तक शांतिपूर्वक आंदोलन किया, लेकिन सरकार ने किसानों की मांगों को नजरअंदाज करते हुए समस्या का समाधान नहीं किया।
प्रदेश में भारतीय किसान संघ द्वारा 21 सूत्रीय मांगों को लेकर 21 जुलाई से तहसील व जिला मुख्यालयों पर धरना-प्रदर्शन शुरू किए तथा मुख्यमंत्री के नाम एक हजार से अधिक ज्ञापन भेजे। जयपुर, कोटा, बीकानेर, भरतपुर व अजमेर समेत जिला मुख्यालयों पर किसानों ने रैली निकाल प्रदर्शन किए। वहीं जोधपुर में विद्युत डिस्कॉम कार्यालय पर महापड़ाव के लिए गांव-ढ़ाणियों से जुटे हजारों किसानों को पुलिस बल ने जोधपुर में प्रवेश से पूर्व रोक दिया, तो किसानों ने 10 दिन तक माणकलाव गांव के पास महापड़ाव किया। प्रशासन की समझाइश के बाद भी किसान लगातार अपनी मांग मंगवाने के लिए अड़े रहे। किसान नरेश व्यास ने कहा कि धरने के दौरान तबीयत बिगडऩे से पुखराज की हुई मृत्यु दु:खद है। सभी किसान मृतक पुखराज के परिवार के साथ खड़े हैं। सरकार की असंवेदनशीलता के चलते पहले भी क्षेत्र में किसानों ने आत्महत्या की है और अब सरकार की हठधर्मिता से धरने के दौरान तबीयत बिगडऩे से किसान की मृत्यु हुई है।
भारतीय किसान संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष सांवरमल ने कहा कि काफी समय से किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है। ब्लॉक, तहसील और जिला मुख्यालय के स्तर पर 1100 ज्ञापन देने के बावजूद भी सरकार किसानों की सुनवाई नहीं कर रही इसलिए मजबूर होकर किसान आंदोलन करने को मजबूर हैं। प्रदेश में फसल कटाई के समय ओलावृष्टि, टिड्डी हमला, आदि कारणें से किसानों की फसल खराब हो गई है। जिसके चलते किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। किसान संघ ने मांग की है कि कोरोना काल में किसानों को भारी नुकसान हुआ है, इसलिए किसानों के 6 महीने के बिजली के बिल माफ किए जाएं।
विधायकों के ऐश ओ आराम के लिए पैसा है, लेकिन किसानों के लिए नहीं : शेखावत

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राजस्थान में हुए किसान आंदोलन कर पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय जल शक्ति मंत्री व जोधपुर सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि उस वक्त में जब देश ही नहीं वरन पूरा विश्व एक महामारी से जूझ रहा है और सरकारें हर तरीके से समाज के हर वर्ग को सम्बल और सहायता प्रदान कर ये सुनिश्चित कर रही है कि किसी भी स्थिति में हर व्यक्ति तक खाने पीने की आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति हो, ऐसे में अगर किसी राज्य के किसान को ही सड़कों पर उतरना पड़े तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है। लोग जहां कोरोना महामारी के चलते अभी भी घरों से बाहर आने में कतरा रहे है, इस समय में भी राजस्थान का किसान राज्य की कांग्रेस सरकार के कुशासन की वजह से पीड़ित और व्यथित है। राज्य की कांग्रेस सरकार द्वारा बिजली के दामों में की गई बढ़ोतरी किसानों के लिए दोहरी मार है जहां वो पहले से ही इस भीषण आपदाकाल में अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए जूझ रहे है। जो सरकार बिजली के दाम न बढ़ाने और किसानों का कर्ज़ माफ करने के वादे के साथ सत्ता में आई थी, वो सरकार आज उन्हीं किसानों के लिए एक दुःस्वप्न बन गई है। आज प्रदेश का किसान कर्ज़ माफी के नाम पर छले जाने का दुःख परे रखकर बिजली के बिल माफ करने के लिए सड़कों पर उतर आया है लेकिन राजस्थान की गहलोत सरकार ने धृतराष्ट्र की तरह अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली है। मुख्यमंत्री के पास अपने विधायकों को पांच सितारा होटलों में ऐश-ओ-आराम कराने के लिए पर्याप्त धन है लेकिन उस अन्नदाता के लिए नहीं जो इस विपत्ती में भी सभी का पेट भरने के लिए दिन रात खेत में मेहनत कर रहा है। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार द्वारा बिजली बिल पर दिए जाने वाले अनुदानों को हटाकर गहलोत जी ने बिजली के बिलों में ही बढ़ोतरी कर दी जो उनकी असंवेदनशीलता को दर्शाता है। आज भी प्रदेश के 22 लाख किसान भाई अपने कर्ज़ माफी की प्रतीक्षा में है।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद राजस्थान का किसान अपने परिश्रम और धैर्य से धरती को हरा भरा करने में सफल रहता है। विपरीत प्राकृतिक स्थितियों में प्रशासनिक सहायता उसके लिए संबल का कार्य करती है परन्तु जब खुद चुनी हुई सरकार ही मुश्किल में पीछे हट जाए तो किसान सहायता के लिए किसके पास जाएगा! ऐसी परिस्थितियों में किसान के पास एक ही विकल्प बनता है। लेकिन प्रश्न यह भी उठता है कि ऐसी परिस्थितियों को जन्म देने वाली राजनीति कहां तक सही है ? साथ ही ये भी कि सरकार बचाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाने वाले मुख्यमंत्री जी के पास क्या किसानों के बिजली बिल माफ करने के लिए धन का अभाव है ?