राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 : आधार नए भारत का

    दिनांक 08-सितंबर-2020
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प्रो. रमाशंकर दूबे

नई शिक्षा नीति में वह सब कुछ है, जिसकी आवश्यकता वर्तमान भारत को है। युवाओं को कौशलयुक्त बनाने के लिए नवाचार पर जोर दिया गया है, वहीं उन्हें अपनी परंपरा और जड़ों से जोड़ने की भी व्यवस्था की गई है। इसमें नए भारत के सपनों को उड़ान देने की क्षमता है
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पनी परम्परा और विज्ञान के साथ बच्चों को जोड़ने वाली शिक्षा का एक प्रतीकात्मक चित्र

भारत सरकार द्वारा घोषित ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ भारत को सशक्त ज्ञान आधारित राष्ट्र बनाने का एक मसौदा है। यह  21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को प्रतिस्पर्धात्मक रूप से ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभाने की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं प्रशंसनीय प्रयास है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता थी, जो अपने पूरे परिदृश्य में प्राचीन काल से संजोए हुए भारतीय सभ्यता में निहित सांस्कृतिक एवं मानवीय मूल्यों को समावेशित करते हुए शारीरिक, नैतिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक रूप से विकसित कौशल-युक्त युवाओं का सृजन कर सके। समाज के हर वर्ग से गहन विचार-विमर्श के पश्चात् तैयार यह शिक्षा नीति स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक क्रान्तिकारी कदम है। इससे 185 वर्ष से चली आ रही मैकाले की दासता भरी शिक्षा व्यवस्था से मुक्ति तो मिलेगी ही, भारतीयता से ओतप्रोत राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप ज्ञान में प्रवीण ऐसे क्रियाशील एवं उद्यमी युवा तैयार हो सकेंगे, जो सशक्त एवं समर्थ भारत के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाएंगे तथा वैश्विक स्तर पर सुयोग्य एवं सफल नागरिक के रूप में भारतीय समाज का नेतृत्व कर सकेंगे।

यह शिक्षा नीति स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक क्रान्तिकारी कदम है। इससे 185 वर्ष से चली आ रही मैकाले की दासता भरी शिक्षा व्यवस्था से मुक्ति तो मिलेगी ही, भारतीयता से ओतप्रोत राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप ज्ञान में प्रवीण ऐसे क्रियाशील एवं उद्यमी युवा तैयार हो सकेंगे, जो सशक्त एवं समर्थ भारत के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाएंगे।

इस शिक्षा नीति के प्रारूप को अंतिम रूप देने से पहले, पूर्व की शिक्षा नीतियों में अपनाई गई परामर्श प्रक्रियाओं के विपरीत एक अत्यंत व्यापक और गहन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत समाज के हर वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए, एक लंबे समय तक, समयबद्ध क्रम में सभी से सुझाव आमंत्रित किए गए। ऐसा पहली बार हुआ जब लोकतंत्र की सच्ची भावना के अनुरूप वर्षों तक किसी नीति के निर्धारण में समाज के नागरिक, अभिभावक, शिक्षक, प्रशासक, विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर, उद्योगपति, शिक्षाविद् सभी ने एक साथ विशेषज्ञों के साथ भागीदारी की हो। केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’  के अनुसार, ‘‘शिक्षा नीति के इस प्रारूप पर देश के 2.5 लाख ग्राम पंचायत, 6600 प्रखंड, 6000 शहरी निकाय एवं 676 जिलों के नागरिकों ने सक्रिय भागीदारी की, जिसके फलस्वरूप 2,00000 से अधिक सुझाव प्राप्त हुए। ये सुझाव लगभग 70,000 पृष्ठों में थे। इस प्रकार भारत के हर नागरिक की इच्छा को ध्यान में रखते हुए अभूतपूर्व प्रयास और श्रम के द्वारा बनाई गई यह शिक्षा नीति भारत की आत्मा को प्रतिबिंबित करती है।’’

भारत के महान राजनेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, शिक्षाविद् महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, महर्षि अरविंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, स्वामी विवेकानंद के सपनों को साकार करती हुई यह शिक्षा नीति सर्वांगीण रूप से विकसित ऐसे युवाओं के सृजन का मार्ग प्रशस्त करती है जो विद्यालयीय अवस्था से ही मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा ग्रहण कर, भारत के पारंपरिक ज्ञान का अध्ययन कर, भारतीय मूल्यों एवं मान्यताओं को आत्मसात करते हुए जिज्ञासु एवं कौशलयुक्त उद्यमी बनकर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी के विविध आयामों में दक्षता प्राप्त करें तथा एक सुयोग्य, चरित्रवान एवं संस्कारी राष्ट्रभक्त बनकर देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकें।

प्राचीन भारत वैदिक, उपनिषदिक काल से ही ज्ञान आधारित उन्नत समाज था, जहां गुरु-शिष्य परम्परा पर आधारित गुरुकुल के रूप में शिक्षा की गौरवशाली व्यवस्था थी। शिक्षा का उद्देश्य चारित्रिक उन्नयन तथा व्यक्तित्व के समग्र विकास के साथ-साथ अंतर्निहित सारी शक्तियों का विकास था। प्राचीनकाल में तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालय भारत में थे, जहां संस्कृत एवं भारतीय भाषाओं में ही ज्ञान-विज्ञान की विविध विधाओं में शिक्षा दी जाती थी।  विश्व ज्ञान को भारतीय भाषाओं के माध्यम से समृद्ध करने वाले प्रकाण्ड विद्वान आचार्य कणाद, चरक, सुश्रुत, पतंजलि, चाणक्य, नागार्जुन, वराहमिहिर, आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य आदि भारत में थे, जिन्होंने कला, धर्म, दर्शन, गणित, खगोल विज्ञान, रसायन, आयुर्विज्ञान, प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व एवं अभिनव योगदान देते हुए पूरे विश्व को आलोकित किया। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं को आत्मसात करती शिक्षा व्यवस्था के कारण ही भारत विश्वगुरु था।

18वीं सदी तक भारत के प्रत्येक गांव में एक गुरुकुल था।   उस समय गुरुकुलों की संख्या 7, 32,000 से ऊपर थी और साक्षरता 97 प्रतिशत थी। पूरे देश में सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकता थी। भारतीय भाषाओं में गुरुकुल में दी जा रही शिक्षा-व्यवस्था को ध्वस्त करते हुए 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अपना ‘स्मरण-पत्र’ प्रस्तुत किया और उसी वर्ष ‘अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम’ पारित कर भारत के सभी विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी किया गया तथा भारतीय ज्ञान-विज्ञान और भाषाओं की जगह पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान और अंग्रेजी साहित्य का वर्चस्व स्थापित हुआ। गौरवशाली भारतीय शिक्षा व्यवस्था में संक्रमण का दौर 1835 से ही प्रारंभ हुआ और धीरे-धीरे हमारी कला, ज्ञान-विज्ञान, इतिहास संबंधी सभी पुस्तकें, जिनमें भारतीय संस्कृति की समृद्धि परिलक्षित होती थी, उनका लेखन पाश्चात्य दृष्टि के आधार पर होने लगा। मैकाले का मानना था कि भारत की संस्कृति, सभ्यता और शिक्षा व्यवस्था इतनी समृद्ध है कि बिना इसको छिन्न-भिन्न किए भारत पर शासन करना संभव नहीं है। ठीक इसी प्रकार भारतीय दर्शन एवं प्राच्यविद्या में महारत हासिल कर चुके पाश्चात्य विद्वान मैक्समूलर ने तत्कालीन भारतीय राज्य के सचिव जॉर्ज कैम्पबेल को 1868 में लिखा था, ‘‘भारत पर हम एक बार विजय प्राप्त कर चुके हैं, लेकिन हमें पुन: इस पर विजय प्राप्त करना होगा और वह दूसरी विजय शिक्षा व्यवस्था पर विजय से ही संभव है।’’


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शिक्षा नीति के इस प्रारूप पर देश के 2.5 लाख ग्राम पंचायत, 6600 प्रखंड, 6000 शहरी निकाय एवं 676 जिलों के नागरिकों ने सक्रिय भागीदारी की, जिसके फलस्वरूप 2,00000 से अधिक सुझाव प्राप्त हुए। ये सुझाव लगभग 70,000 पृष्ठों में थे। इस प्रकार भारत के हर नागरिक की इच्छा को ध्यान में रखते हुए अभूतपूर्व प्रयास और श्रम के द्वारा बनाई गई यह शिक्षा नीति भारत की आत्मा को प्रतिबिंबित करती है।— डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’


बाल्यावस्था से विदेशी भाषा में और ब्रिटिश शिक्षा पद्धति के अनुसार अध्ययन करने से हमारे युवाओं में मानसिक प्रदूषण और सांस्कृतिक संक्रमण का खतरा लगातार बना रहता है तथा छात्रों को मौलिक चिंतन तथा नवोन्मेष की आजादी नहीं मिल पाती है। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ मैकाले द्वारा स्थापित 185 वर्ष पुरानी शिक्षा नीति को समाप्त करके भारत की आत्मा के अनुरूप एक ऐसी शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करती है जिससे बालक तीन वर्ष की अवस्था से ही कम से कम कक्षा पांच तक और संभव हो तो उच्च शिक्षा तक की पढ़ाई अपनी मातृभाषा में ग्रहण कर सकेगा। अब से पहले किसी ने भी तीन से पांच वर्ष के बच्चे की शिक्षा के बारे में नहीं सोचा था, जबकि इस उम्र में बच्चे के मस्तिष्क का विकास बड़ी तेजी से होता है।

इस शिक्षा नीति में विद्यालय स्तर से ही छात्र की समग्र बोधगम्यता का पूरा ध्यान रखा गया है। आयु के अनुसार उचित शिक्षा का प्रावधान है। यह विशेष ध्यान रखा गया है कि शिक्षा उद्देश्यपूर्ण हो,  छात्र के अंदर शिक्षा ग्रहण करने के लिए जुनून पैदा हो तथा गहन नवाचार-युक्त सोच विकसित हो। त्रिभाषा फार्मूले के अंतर्गत सभी भारतीय भाषाओं और विशेषकर देवभाषा संस्कृत की उन्नति होगी। इस शिक्षा नीति के माध्यम से पहली बार भारतीय भाषाओं को समुचित सम्मान मिलेगा। विद्यालय स्तर की प्रारंभिक कक्षाओं से ही मातृभाषा में अध्ययन से चिंतन, मनन की शक्ति तो बढ़ेगी ही भारतीय मूल्यों एवं कौशल के समावेश से समग्र विकसित व्यक्तित्व का निर्माण होगा और उद्यमिता का विकास होगा। विद्यालयीय शिक्षा में 10+2 की जगह 5+3+3+4 पाठ्यक्रम का प्रावधान है। इसी स्तर से छात्र के अंदर रचनात्मकता, जिज्ञासा और प्रतिबद्धता का विकास होगा। पूछताछ, अन्वेषण तथा विचार-विमर्श आधारित सीख का विकास होगा। भारतीय भाषा में शिक्षा ग्रहण करने से छात्र भारत की अस्मिता की पहचान बनेंगे तथा भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं के सच्चे वाहक होंगे। इस शिक्षा नीति में शिक्षण संस्थाओं और छात्रों का समाज के प्रति जिम्मेदारी का स्पष्ट संदेश है। छात्र विद्यालय स्तर से ही अपने सामाजिक अंत:संबंधों तथा समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को समझ सकेंगे।

छात्र के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करते हुए इस शिक्षा नीति में परंपरागत ज्ञान के पाठ्यक्रमों के साथ व्यवसाय केंद्रित विषयों के भी संतुलित ढंग से पढ़ने की व्यवस्था है। क्षेत्रीय भाषाओं में ई-पाठ्यक्रम तथा ‘वर्चुअल लैब्स’ विकसित करने की व्यवस्था है। कक्षा छह से ही छात्र पाठ्यक्रम में  व्यावसायिक शिक्षा की पढ़ाई कर सकेंगे। विद्यालय स्तर से ही बच्चों के कौशल विकास का पूरा ध्यान रखा गया है।

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नई शिक्षा नीति में नवाचार पर दिया गया है जोर

इस शिक्षा नीति के अनुसार छात्र 18 वर्ष की आयु के पश्चात् उच्च शिक्षा ग्रहण करते समय अपनी रुचि एवं सामर्थ्य के अनुसार रचनात्मक विषयों का चुनाव कर सकेंगे। सभी उच्च शिक्षण संस्थाएं बहु-विषयक होंगी। भावी योजनाओं एवं प्रदर्शन के आधार पर शिक्षण संस्थाओं को धनराशि आवंटित हो सकेगी। चार वर्षीय डिग्री पाठ्यक्रम में किसी भी वर्ष में प्रवेश या निकास की व्यवस्था रहेगी। हर स्तर पर छात्र का समाज के साथ संवाद बना रहेगा तथा छात्र का सतत मूल्यांकन उसकी समस्त गतिविधियों के सम्यक् आंकलन के आधार पर होगा। एक परिसीमा के अंतर्गत महाविद्यालयों को स्वायत्तता देने का प्रावधान है। शिक्षकों के गुणवत्तायुक्त तथा सम्यक् प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया गया है। इस शिक्षा नीति में गुणात्मक शिक्षण और शोध दोनों पर जोर दिया गया है। पूरे देश में गुणवत्तापूर्ण शोध के क्रियान्वयन, नियमन और प्रबंधन के लिए एक ‘राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन’ के गठन का प्रावधान है। इसके अंतर्गत विज्ञान, तकनीकी, सामाजिक विज्ञान तथा कला और मानविकी के सभी क्षेत्रों में शोध का विकास होगा। इससे राष्ट्रीय स्तर पर शोध को बढ़ावा मिलेगा तथा समाज की आवश्यकता के अनुरूप गुणवत्तापरक शोध की संस्कृति का विकास होगा।

वास्तव में नई शिक्षा नीति भारतीय दृष्टि के अनुरूप कौशल एवं दक्षतायुक्त ऐसे संवेदनशील, समग्र रूप से विकसित, बहुआयामी व्यक्तित्व वाले ऐसे युवाओं के सृजन का मार्ग प्रशस्त करती है, जिनकी जड़ें भारतीयता में हों, जो भारतीय भाषाओं के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान की विविध विधाओं में प्रवीण हों, जो 21वीं सदी की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में भारत का सफल नेतृत्व कर सकें।


यह शिक्षा नीति समावेशी है जिसमें समाज के हर वर्ग का ख्याल है तथा श्रम की गरिमा का ध्यान रखा गया है। आॅनलाइन शिक्षण हेतु इस शिक्षा नीति में विशेष प्रावधान है। आधारभूत डिजिटल संरचनाओं के सृजन की व्यवस्था है। इस शिक्षा नीति के लागू होने से 2030 तक विद्यालयीय शिक्षा में 100 प्रतिशत तथा 2035 तक उच्च शिक्षा में 50 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात (जी ई आर) सुनिश्चित हो सकेगा। व्यक्तित्व के समग्र विकास को समर्पित इस शिक्षा नीति में शिक्षा के क्षेत्र में देश के सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत खर्च होने की व्यवस्था है। इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी कार्यान्वयन पर बल देते हुए  प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 7 अगस्त, 2020 को आयोजित उच्च शिक्षा सम्मेलन के अंतर्गत अपने उद्घाटन  भाषण में देश की समस्त जनता, सभी शिक्षण संस्थानों तथा सभी हितधारकों से आह्वान किया कि हम सभी संकल्पबद्ध होकर गहन विचार-विमर्श करें, संगोष्ठियों का आयोजन करें, मंथन करें जिससे इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।

वास्तव में यह ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ भारतीय दृष्टि के अनुरूप कौशल एवं दक्षतायुक्त ऐसे संवेदनशील, समग्र रूप से विकसित, बहुआयामी व्यक्तित्व वाले युवाओं के सृजन का मार्ग प्रशस्त करती है, जिनकी जड़ें भारतीयता में हों, जो भारतीय भाषाओं के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान की विविध विधाओं में प्रवीण हों, जो मानवीय मूल्यों और भारत की गौरवशाली संस्कृति एवं परंपराओं को आत्मसात करते हुए एक सफल वैश्विक नागरिक बनते हुए, 21वीं सदी की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में भारत का सफल नेतृत्व कर सकें। ऐसे सशक्त एवं समर्थ युवाओं के सृजन से निश्चित रूप से भारत के विकास का मार्ग तेजी से प्रशस्त होगा, जिससे भारत आत्मनिर्भर तो बनेगा ही, पूरे विश्व में एक ज्ञान-शक्ति के रूप में भी पहचान बनाकर ‘विश्व गुरु’  के रूप में प्रतिष्ठित हो सकेगा। (लेखक गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर के कुलपति हैं)