डल चुकी है ‘इस्लामी यूरोप’ की नींव!

    दिनांक 08-सितंबर-2020
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प्रशांत बाजपेई

गत दिनों यूरोपीय देश स्वीडन जल उठा। जलाने वाले वे मुसलमान थे, जिन्हें कुछ वर्ष पहले ही वहां शरण दी गई थी। इन मुसलमानों का एक गुट ‘इस्लामी यूरोप’ का सपना देखने लगा है और उसे पूरा करने के लिए वह सब करने लगा है, जो एक जिहाद के लिए जरूरी है
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स्वीडन के एक शहर में आगजनी करते शरणार्थी मुसलमान। 


मानव विकास सूचकांक में दुनिया के शीर्ष देशों में गिना जाने वाला स्वीडन ‘अल्लाहो अकबर’ के नारे लगाते दंगाइयों से आतंकित है। वे स्वीडिश लोगों और पुलिस पर  पत्थर बरसा रहे हैं। सड़कों पर आगजनी कर रहे हैं। स्वीडन वह देश है जिसने किसी भी यूरोपीय देश की तुलना में सबसे ज्यादा आगे बढ़कर इस्लामी देशों से आ रहे शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे। इस बात की परवाह किए बिना कि इन इस्लामी शरणार्थियों के आचार-विचार स्वीडन के सामाजिक, सांस्कृतिक ढांचे के बिल्कुल विपरीत थे। उनके लिए स्वीडन का खुलापन, महिलाओं की आजादी, लोकतंत्र, सेकुलर संविधान, प्रेस और कला की आजादी आदि एक ‘काफिर’ व्यवस्था थी, जिसे अब वे बदलना चाहते हैं। वे स्वीडन के नीले झंडे को हरा करना चाहते हैं। स्वीडन सुलग रहा है।

कैसे मानें गलती
स्वीडन क­ी सरकार को समझ आ गया है कि उससे बहुत बड़ी गलती हो चुकी है, लेकिन वह सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। यूरोप के अन्य देश भी इसी तरह की समस्याओं को झेल रहे हैं, लेकिन कोई भी इकबाल-ए-जुर्म नहीं करना चाहता। न वहां की सरकारें और न ही यूरोपीय संघ। उन्होंने परिणाम की परवाह किए बिना इन लोगों को मुफ्त घर, मुफ्त भोजन, मुफ्त स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं और भत्ते दिए। लेकिन बदले में यहां के करदाताओं और उनके बच्चों को मजहबी कट्टरता, हिंसा और यौन अपराध की सौगात मिली। मामूली बातों पर ये शरणार्थी दंगे कर रहे हैं, कत्ल हो रहे हैं। बार-बार कर्फ्यू लग रहा है। स्वीडिश लोग अपने पड़ोस-सड़कों-बाजारों में आधुनिक हथियारों से लैस जिहादियों को देखकर हतप्रभ हैं।

प्रतिरोध के स्वर

इसलिए  प्रतिरोध के स्वर उठ रहे हैं। लोगों में आक्रोश है, और वे मांग कर रहे हैं कि स्वीडन को स्वीडिश लोगों के लिए ही रहना चाहिए। उनका नारा है कि जो लोग वहां शरण लेने पहुंचे हैं उन्हें स्वीडिश संस्कृति को अपनाना होगा। यहां के पहनावे, खानपान और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की इज्जत करनी होगी। स्वीडिश लोगों के लिए ईसाई आस्था या अन्य कोई मजहबी आस्था जीवन का केंद्र नहीं है। पंथ वहां बड़ा व्यक्तिगत मामला है। वहां खुलकर ईसाइयत की रूढ़ियों की आलोचना होती है, सवाल उठाए जाते हैं। इसलिए स्वाभाविक ही लोग इस्लामी विचार और कुरआन व हदीस पर सवाल उठा रहे हैं। वो कुरआन की ‘काफिर’ और ‘जिहाद’ की आयतों पर स्पष्टीकरण मांग रहे हैं। अब यूरोपीय समाज के विरोध करने के अपने तरीके हैं। इसी के चलते एक समूह ने प्रदर्शन करते हुए कुरआन की एक प्रति को आग के हवाले कर दिया। वे ईसाई तौर-तरीकों का भी इसी तरह विरोध करते आए हैं, लेकिन इस घटना को यहां के मुस्लिम शरणार्थियों ने आग के खेल का अवसर बना लिया और एक बार फिर सड़कों पर हिंसा का नंगा नाच शुरू हो गया।

केवल स्वीडन ही नहीं, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, ब्रिटेन, हॉलैंड, बेल्जियम सभी कमोबेश इन्ही हालातों से दो-चार हैं। सस्ते श्रमिकों के लालच में यहां की सरकारों ने अरब, अफगानी, पाकिस्तानी, अफ्रीकी कामगारों को बेहिसाब वीसा और नागरिकता बांटी। नतीजा विनाशकारी साबित हो रहा है। पिछले 30 साल से यूरोपीय शहरों में जनसंख्या असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है।


चरमरा रही हैं व्यवस्थाएं
अरब देशों से आ रहे मुस्लिम शरणार्थियों और कामगार प्रवासियों की बाढ़ के नीचे स्वीडन का सामाजिक कल्याण योजनाओं का ढांचा चरमरा रहा है। स्कूल, अस्पताल, नगर निगम सभी बढ़ी चली आ रही इस भीड़ से आक्रांत हैं। कुछ नगर निगम दीवालिया होने की कगार पर हैं।  बढ़ते हुए संगठित अपराधों से पुलिस हलकान है। छुरेबाजी और गोलीबारी की घटनाएं बढ़ रही हैं। राजनीतिक तंत्र पर भी इन अरब ‘शरणार्थियों’ का दबाव बढ़ता जा रहा है। ये लोग स्वीडन की उन्नत जीवनशैली की सारी सुख-सुविधाओं का लाभ मुफ्त में उठा रहे हैं, लेकिन स्वीडन की सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक परंपराओं को अपनाना नहीं चाहते, बल्कि दंगा-फसाद और दबाव बनाकर उन्हें अरबी-इस्लामी तौर-तरीकों में ढालना चाहते हैं। स्वीडन के राजनीतिक विज्ञान के प्राध्यापक टॉमी मोलर चेतावनी दे रहे हैं, ‘‘इन शरणार्थियों के इस रवैये और तौर-तरीकों के कारण स्वीडन की सामाजिक व्यवस्था जल्दी ही ढह जाएगी, क्योंकि मिस्र, सीरिया, लेबनान, मोरक्को आदि देशों से आए ये प्रवासी स्वीडन के समाज के हिसाब से ढलना नहीं चाहते।’’

महामारी बना बलात्कार
स्वीडन के अस्पतालों में हुए सर्वेक्षण के अनुसार 50 प्रतिशत नर्स-चिकित्सक इन शरणार्थियों के आक्रामक और हिंसक व्यवहार को भुगत चुके हैं। नर्सें आत्मरक्षा का प्रशिक्षण लेने को मजबूर हुई हैं। ये बताती हैं कि अपराधी किस्म के लोग छुरे या गोली का घाव लेकर अस्पताल पहुंचते हैं और फिर उनके पीछे उनके परिवार-गिरोह के लोग और विरोधी गिरोह पहुंच जाते हैं, जो चिकित्सा कर्मियों को बलात्कार और हत्या की धमकी देते हैं। कई चिकित्साकर्मियों ने ऐसे मरीजों के परिजनों द्वारा चाकू दिखाकर धमकाए जाने और उनके (कर्मियों के) परिवारजन और बच्चों को मारने की धमकियों की शिकायत की है। सिर्फ 5 साल में स्वीडन बलात्कार के मामलों में दुनिया में दूसरे क्रमांक पर पहुंच गया है।

थानों में शिकायतकर्ताओं में महिलाओं का प्रतिशत ज्यादा है। ज्यादातर उनके खिलाफ यौन अपराध अथवा बलात्कार की रपट लिखवाने आ रही हैं। ये बलात्कार दिन-दहाड़े हो रहे हैं। शिकार होने वालों में 12 साल की बच्चियां भी हैं। यूरोप की पहचान बन चुके म्यूजिक कंसर्ट्स में लड़कियां जाने से बचने लगी हैं। इन आयोजनों में ये लोग गिरोह बनाकर अपराध करते हैं। भीड़ में ये लोग किसी महिला या लड़की को चारों ओर से घेर लेते हैं। घेरे के अंदर के पुरुष बलात्कार करते हैं, जबकि घेरे के बाहर के पुरुष लोगों का ध्यान बंटाने और सहायता के लिए आने वाले से निपटने का काम करते हैं। फिर अंदर वाले बाहर और बाहर वाले अंदर, और यह क्रम चलता है। ठीक उसी तरह जैसा अरब स्प्रिंग के दौरान महिला पत्रकारों व राह चलती महिलाओं के साथ किया गया था। इन घटनाओं के कारण यूरोप के कई मशहूर म्यूजिक बैंड स्वीडन में कार्यक्रम न करने की घोषणा कर चुके हैं।

जिहादियों के बौद्धिक रक्षक
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जिस स्वीडन में करीब 20 साल पहले तक न के बराबर मुसलमान थे, अब वहां ऐसी मस्जिदें बनने लगी हैं।


स्वीडन वह देश है जिसने किसी भी यूरोपीय देश की तुलना में सबसे ज्यादा आगे बढ़कर इस्लामी देशों से आ रहे शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे। इस बात की परवाह किए बिना कि इन इस्लामी शरणार्थियों के आचार-विचार स्वीडन के सामाजिक, सांस्कृतिक ढांचे के बिल्कुल विपरीत थे। अब वही शरणार्थी मुसलमान स्वीडन के नीले झंडे को हरा करना चाहते हैं।

पूरे स्वीडन में 100 के लगभग ऐसे ‘संवेदनशील’ क्षेत्र बन गए हैं, जहां स्वीडिश लोग जाने से डरने लगे हैं। पुलिस भी स्वीडिश लोगों, विशेषकर महिलाओं को इन इलाकों से दूर रहने को कहने लगी है। हद तो यह है कि पुलिस की जान को खतरे के चलते इन इलाकों से कुछ छोटी पुलिस चौकियों को ही स्थानांतरित कर दिया गया है। यदि कोई  ‘शरणार्थी’ किसी का पर्स या चेन छीनकर भाग रहा है, और वह भागता हुआ ऐसे ‘संवेदनशील’ क्षेत्र में घुस जाता है तो पुलिस भी उसका पीछा छोड़कर लौट आती है।  इसके पीछे दो कारण होते हैं। एक, वहां कई गुना ज्यादा हथियारबंद गुर्गे मौजूद होते हैं। दूसरा, यदि कोई पुलिस वाला या प्रशासन का व्यक्ति सख्ती दिखाता है तो उसे नफरत फैलाने वाला नस्लवादी ठहराने के लिए लोग तैयार बैठे हैं। इनमें यहां के वामपंथी-समाजवादी-उदारवादी-प्रगतिशील नेता, बुद्धिजीवी और पत्रकार शामिल हैं। यह वही जमात है जिसने आज से 5-7 साल पहले बड़े-बड़े बैनर तख्तियां लेकर इन शरणार्थियों को शरण देने की मांग की थी। आज भी ये लोग और लोगों को आने देने की वकालत करते हैं। वे इन विदेशियों द्वारा किए जाने वाले बलात्कारों को ‘पुरुष मानसिकता’ से उपजी समस्या कहकर टाल देते हैं, और जब पूछा जाता है कि यह ‘पुरुष मानसिकता’ 5 -6 पहले क्यों नहीं थी? तो सवाल पूछने वाले को ‘नस्लवादी’ कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है।

बदलता जनसांख्यिकी-सांस्कृतिक नक्शा 
स्वीडन के संवेदनशील इलाकों में मीडिया के लोगों पर भी हमले होते हैं। कभी अचानक सड़कों पर खड़ी कारें जलने लगती हैं। चाहे जब 50-60 या 100 कारें फूंक दी जाती हैं। मीडिया की रपट में आगजनी करने वालों के लिए ‘यूथ गैंग’ शब्द का उपयोग किया जाता है, जबकि सभी जानते हैं कि इस ‘यूथ गैंग’ में सिर्फ और सिर्फ शरणार्थी मुस्लिम युवा होते हैं। स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले एम्बुलेंस चालक इन इलाकों में जाने के लिए विशेष सुरक्षा और हथियारों के लाइसेंस की मांग कर रहे हैं। इन इलाकों में काम करने वाली स्वीडिश महिलाओं ने अपनी नौकरियां छोड़ दी हैं। भारतीय सिनेमा निमार्ताओं ने हमें यूरोप के शहरों के एक दृश्य को अनगिनत बार दिखाया है जिसमें यहां की सड़कों, पार्क या  रेस्त्रां के बाहर खड़े होकर वायलिन या गिटार बजाते हैं, लोग घेरा बनाकर उन्हें सुनते हैं, और उनकी टोपी में पैसे डालकर आगे बढ़ते जाते हैं। अब ये दृश्य गायब हो रहे हैं। वायलिन या बांसुरी बजाते ये कलाकार अचानक पीठ या पेट अथवा सर पर पड़ने वाले घूंसों से भयभीत हैं, क्योंकि ‘संगीत इस्लाम के खिलाफ है।’ 
इस सबसे गुजरने वाला स्वीडन अकेला नहीं है। फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, ब्रिटेन, हॉलैंड, बेल्जियम सभी कमोबेश इन्ही हालातों से दो-चार हैं। सस्ते श्रमिकों के लालच में यहां की सरकारों ने अरब, अफगानी, पाकिस्तानी, अफ्रीकी कामगारों को बेहिसाब वीसा और नागरिकता बांटी। नतीजा विनाशकारी साबित हो रहा है। पिछले 30 साल से यूरोपीय शहरों में जनसंख्या असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है। यूरोपीय देशों के मूल नागरिकों से इन अरब प्रवासियों की जन्मदर 4 से 5 गुना ज्यादा है। इसलिए फें्रच, ब्रिटिश, जर्मन, डच , स्वीडिश लोग अपने ही शहरों में अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। तेजी से बढ़ती हुई मुस्लिम जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा कट्टरता की खुराक पर पला है। वह 2030-40 तक एक नए इस्लामी यूरोप का सपना देख रहा है।