अद्भुत है यह शिक्षा नीति

    दिनांक 09-सितंबर-2020
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मुकुल कानितकर
 
स्वतंत्र भारत में पहली बार एक ऐसी शिक्षा नीति आई है, जो हर छात्र को उसकी रुचि के अनुसार पढ़ने की आजादी दे रही है। वास्तव में यह नीति भारत को भारतीयता से जोड़ने और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने की शक्ति दे रही है
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विश्व के कल्याण की कामना करने वाले हमारे ऋषियों ने घोर तप किया तब राष्टÑ को ओज और बल प्राप्त हुआ। यह तप कैसा था, उसे तो हम लोगों ने नहीं देखा। लेकिन हम सबने पिछले पांच साल में एक तपस्या देखी है और वह तपस्या इस देश के आम लोगों ने की है। उसी तपस्या के बाद नई शिक्षा नीति आई है। बता दें कि 17 जनवरी, 2015 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी के घर पर एक प्रेस वार्ता हुई थी। उसमें 33 बिन्दुओं की चर्चा हुई और उन बिदुओं पर आम लोगों से उनकी राय मांगी गई थी। यह भी कहा गया था कि लोग जो राय भेजेंगे उन्हीं पर आधारित होगी नई शिक्षा नीति। इसके बाद पांच वर्ष तक करोड़ों लोगों ने अपनी राय भेजी। इनमें छात्रों के माता-पिता, अभिभावक, शिक्षक, विद्यार्थी, विधायक, सांसद सभी शामिल थे। इसके साथ ही लगभग 2.5 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों से चर्चा की गई।
दुनिया के 120 देशों में जितनी जनसंख्या निवास करती है उससे अधिक लोगों ने शिक्षा नीति को बनाने के लिए सुझाव दिए। यह इस शिक्षा नीति की व्यापकता का उदाहरण है। यही कारण है कि 29 जुलाई, 2020 को घोषित इस शिक्षा नीति का कहीं से भी कोई सार्थक विरोध अभी तक नहीं हुआ है। हां, कुछ राजनीतिक दलों ने जरूर विरोध किया है, पर यह उनका काम है। वे सरकार की किसी नीति का विरोध करेंगे ही, उनका यह काम है। पर समाज के अन्य किसी वर्ग से इस नीति के विरोध में आवाज नहीं उठी है। कुछ लोगों ने यह कहा कि आपने नीति तो बना ली है, पर इसका कार्यान्वयन कैसे करेंगे? ऐसे लोगों को यह समझना चाहिए कि जो लोग अनुच्छेद 370 को हटा सकते हैं, राम मंदिर बनवा सकते हैं, वे लोग इस नई शिक्षा नीति को भी सफलतापूर्वक लागू कर सकते हैं। कुछ अंग्रेजीदां लोग यह भी कह रहे हैं कि मातृभाषा में शिक्षा देना आसान नहीं है। ऐसे लोगों को एक बात बताना चाहता हूं। पिछले 200 साल से इस देश पर अंग्रेजी थोपने के लिए सारा सरकारी तंत्र एवं पैसा लगा दिया गया।
दुनिया के 120 देशों में जितनी जनसंख्या निवास करती है उससे अधिक लोगों ने शिक्षा नीति को बनाने के लिए सुझाव दिए। यह इस शिक्षा नीति की व्यापकता का उदाहरण है। यही कारण है कि 29 जुलाई, 2020 को घोषित इस शिक्षा नीति का कहीं से भी कोई सार्थक विरोध अभी तक नहीं हुआ है।

उसके बाद भी 2011 की जनगणना में केवल 12 प्रतिशत लोगों ने लिखवाया, ‘‘हमको अंग्रेजी आती है।’’ इनमें से भी कितनों को सच में अंग्रेजी आती है, यह पता नहीं। लेकिन इस देश की 130 करोड़ में से 88 प्रतिशत लोगों ने तो प्रमाणिकता से, निष्ठा से माना कि हमें अंग्रेजी आती ही नहीं है। नई शिक्षा नीति तो मातृभाषा में शिक्षा देने की बात कर रही है। अपनी स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद पहली बार ऐसी शिक्षा नीति आई है, जो सबके समावेश की बात करती है। विद्यालयीय शिक्षा में 10+2 के स्थान पर 5+3+3+4 पाठ्यक्रम का प्रावधान है। यह लचीलापन ही इसकी विशेषता है। जो जिस विषय और क्षेत्र में चाहे उसी में आगे बढ़ सकता है। एक उदाहरण सचिन तेंदुलकर का दिया जा सकता है। उन्होंने 12वीं तक की पढ़ाई की है, लेकिन क्रिकेट में उन्होंने जो किया है, उसी पर उन्हें ‘भारतरत्न’ जैसा सर्वोच्च सम्मान दिया गया। अब नई शिक्षा नीति में चाहे तो कोई खेल विषय को लेकर ही स्नातक या परास्नातक कर सकता है। ऐसी अद्भुत शिक्षा नीति है यह। इसकी एक और विशेषता यह है कि कोई भी छात्र चाहे तो स्नातक और स्नातकोत्तर तक की शिक्षा बिना अंग्रेजी विषय को लेकर ही पूरी कर सकता है।
ऐसी विशेषताओं से भरी यह शिक्षा नीति भारत के लिए हर दृष्टि से कल्याणकारी है।
(लेखक भारतीय शिक्षण मंडल के संगठन मंत्री हैं)