आरक्षण की मारी महिलाएं

    दिनांक 09-सितंबर-2020
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महेश शर्मा
मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग 1998 के एक पत्र के आधार पर महिलाओं की मेधा सूची तैयार करता है। इससे महिलाओं को लाभ नहीं, बल्कि नुकसान हो रहा है। अब राज्य सरकार इसका निदान निकालने की बात कर रही है

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मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग का मुख्यालय
मध्य प्रदेश में महिला होना गुनाह है क्या? यह सवाल आज मध्य प्रदेश की वे युवतियां पूछ रही हैं, जो मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित विभिन्न परीक्षाओं के माध्यम से नौकरी की तलाश में हैं। दरअसल, यह सवाल शासन द्वारा महिला आरक्षण को लेकर लिए गए एक नीतिगत निर्णय से उठ खड़ा हुआ है। इसलिए ऐसी अनेक युवतियों ने मिलकर देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर महिला आरक्षण बंद करने की मांग की है। राष्ट्रपति सचिवालय ने उक्त पत्र को स्वत: स्पष्ट करार देते हुए तुरंत प्रदेश के मुख्य सचिव को इस संबंध में आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। इस विषय में वास्तविकता उजागर करने के लिए एक व्हाट्सअप ग्र्रुप ‘महिला आरक्षण बंद करो’ भी बनाया गया है, जिसमें प्रदेश की सैकड़ों महिलाएं जुड़ी हैं।
उल्लेखनीय है कि महिला सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए 1997 से प्रदेश में सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 30 फीसदी आरक्षण लागू किया गया, लेकिन कतिपय नियमों की वजह से यह आरक्षण ही प्रतिभावान महिलाओं के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। 2017 की सहायक प्राध्यापक परीक्षा के परिणामों के अनुसार जैव रसायन विषय में सामान्य श्रेणी के लिए विज्ञापित दो पदों में से एक महिला के लिए आरक्षित था। तस्नीम रंगवाला ने 316 अंक प्राप्त कर मेधा सूची में प्रथम स्थान प्राप्त किया। महिलाओं के लिए आरक्षण नहीं होता तो भी उनका चयन सुनिश्चित था, लेकिन उन्हें मेधा के बावजूद महिलाओं के लिए आरक्षित सीट पर चुना गया। इससे महिलाओं के लिए दूसरी सीट नहीं बची और दूसरे स्थान पर काबिज महिला शिल्पी पांडे चयन से वंचित रह गर्इं, क्योंकि बची सीट पुरुष अभ्यर्थी को दे दी गई। 2017 की सहायक अध्यापक परीक्षा समाजशास्त्र में महिलाओं का ‘कट आॅफ’ 196 और पुरुषों का 160 यानी 195 अंक लेकर भी महिला नहीं चुनी गई, जबकि पुरुष 160 अंक लेकर चयनित हो गए। राजनीतिशास्त्र में पुरुष 122 अंक पाकर नौकरी पा गए, जबकि महिलाएं 145 अंक पाकर भी वंचित रहीं।

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महिलाओं द्वारा शुरू किया गया व्हाट्सअप ग्र्रुप, जिसमें मांग की जा रही है कि महिला आरक्षण बंद करो।
सहायक लोक अभियोजन अधिकारी परीक्षा 2015 में अनारक्षित वर्ग में 544 अंक प्राप्त कर आशीष अस्ती चुन लिए गए, जबकि 544 अंक प्राप्त करने वाली स्नेहलता बैस को नहीं चुना गया, क्योंकि महिलाओं के लिए 547 अंक लाना अनिवार्य था। राज्य सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही नेपानगर निवासी कविता पंवार कहती हैं, ‘‘मेधा के आधार पर चुनी जाने वाली महिलाओं पर भी आरक्षण का अहसान लादा जा रहा है और आरक्षण के नाम पर महिलाओं को छला जा रहा है। इसलिए इसे तुरंत बंद कर देना चाहिए।’’ आम तौर पर आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवार से ज्यादा अंक हासिल करते हैंं तो उन्हें अनारक्षित वर्ग में स्थान दिया जाता है, लेकिन महिलाओं के मामले में मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग ऐसा नहीं कर रहा। दरअसल, मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग ने 30 मई, 1997 को एक पत्र द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग को यह स्पष्ट करने को कहा था कि मेधा के आधार पर यदि कोई महिला आवेदक पुरुष से ऊपर स्थान पाती है तो ऐसी स्थिति में उसे अनारक्षित पद के विरुद्ध गिना जाए अथवा महिलाओं के लिए आरक्षित पदों की संख्या में गिना जाए? इस पत्र क्रमांक 17510/24/85/अनु़ 6 के जवाब में सामान्य प्रशासन विभाग के अवर सचिव के़ एल़ दीक्षित ने 28 अगस्त, 1998 को पत्र लिखकर मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग के सचिव को परामर्श दिया कि जो भी महिलाएं चयनित हों उन्हें 30 प्रतिशत आरक्षण के विरुद्ध ही गिना जाए। इसीलिए आयोग इसे आधार बनाकर सूची बनाए जाने की बात कहता है, जबकि इससे महिलाओं की अधिकतम संख्या तय हो गई और पुरुषों से अधिक अंक हासिल करने के बाद भी वे चयन से वंचित रहने लगीं। सामान्य प्रशासन विभाग के राज्यमंत्री इन्दर सिंह परमार कहते हैं, ‘‘मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग द्वारा 1998 के एक पुराने पत्र के आधार पर महिला आरक्षण पर निर्णय लिए जा रहे हैं। इस विषय पर तुरंत ध्यान दिया जाएगा।’’

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मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग द्वारा 1998 के एक पुराने पत्र के आधार पर महिला आरक्षण पर निर्णय लिए जा रहे हैं। इस विषय पर तुरंत ध्यान दिया जाएगा।
— इन्दर सिंह परमार, राज्यमंत्री, सामान्य प्रशासन विभाग, म.प्र.

मेधा के आधार पर चुनी जाने वाली महिलाओं पर भी आरक्षण का अहसान लादा जा रहा है और आरक्षण के नाम पर महिलाओं को छला जा रहा है। इसलिए इसे तुरंत बंद कर देना चाहिए। 
— कविता पंवार, अभ्यर्थी, राज्य सेवा परीक्षा
 
आरक्षण संबंधी यह विसंगति 2007 में ही उजागर हो गई थी जब प्रशासनिक सेवाओं में जाने की इच्छुक मध्य प्रदेश के रतलाम की सुनीता जैन ने कड़ी मेहनत के बाद मप्र लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित ‘राज्य सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2003’ में सफलता प्राप्त की, लेकिन वे साक्षात्कार का अवसर नहीं पा सकीं। जब उन्हें परिणाम की घोषणा के बाद अंक सूची प्राप्त हुई तो उन्होंने देखा लिखित परीक्षा में उन्हें 2100 में से 1249 अंक प्राप्त हुए थे, फिर भी उन्हें साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया, जबकि उनके एक परिचित अभ्यर्थी आशीष मिश्र को 1240 अंक प्राप्त हुए थे लेकिन उन्हें साक्षात्कार में शामिल किया गया। सुनीता की तरह कुल 67 महिला अभ्यर्थी साक्षात्कार के लिए आमंत्रित पुरुषों से ज्यादा अंक लाने के बावजूद साक्षात्कार हेतु नहीं बुलाई गर्इं और उन्हें इस अन्याय की भनक तक नहीं लगी। सुनीता जैन कहती हैं, ‘‘मुझे संयोग से यह जानकारी मिल गई अन्यथा किसी को इस अन्यायपूर्ण कदम की जानकारी ही नहीं है।’’ इसके पीछे जो कारण सामने आया वह विस्मित कर देने वाला था। वह कारण था महिलाओं के लिए आरक्षण। यदि आरक्षण न होता तो संभवत: यह भेदभाव न होता। थांदला की सीमा शाहजी कहती हैं, ‘‘महिला आरक्षण तुरंत बंद कर देना चाहिए, क्योंकि गलत नीतियों से यह महिलाओं को नुकसान पहुंचा रहा है।’’
सुनीता ने आयोग को पत्र लिखकर चयन न किए जाने का कारण पूछा तो आयोग ने उन्हें बताया कि वे महिला वर्ग के ‘कट आॅफ मार्क्स’ से ज्यादा अंक न लाने के कारण साक्षात्कार में नहीं बुलाई गर्इं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि पुरुष वर्ग के ‘कट आॅफ मार्क्स’ अलग होते हैं। दरअसल, आयोग ने महिला और पुरुषों की अलग-अलग सूची इसलिए बनाई, क्योंकि महिलाओं के लिए 30 फीसदी आरक्षण लागू किया गया था और आयोग का तर्क था कि अलग-अलग श्रेणी के उम्मीदवारों की भिन्न-भिन्न मेधा सूची बनाई जाती है। ऐसे में आरक्षण होने के कारण महिलाओं की भी अलग सूची बनी, जिसमें आरक्षित पद संख्या के अनुसार साक्षात्कार के लिए बुलावा पत्र भेजे गए और ऐसी अनेक महिलाओं को साक्षात्कार से वंचित रहना पड़ा जिनके अंक पुरुषों से तो ज्यादा थे लेकिन महिलाओं की संख्या पूरी हो गई थी। सुनीता अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहती हैं, ‘‘इस तरह महिलाओं की अधिकतम संख्या निश्चित कर पुरुषों को आरक्षण प्रदान किया गया।’’
महिलाओं से भेदभाव का यह मामला तब विधानसभा में भी उठा और स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जवाब देते हुए इसके लिए 1995 में लागू ‘रुल्स आॅफ प्रोसिजर’ को कारण बताया जिसके अनुसार किसी भी श्रेणी में कुल पद संख्या के तीन गुना अभ्यर्थियों को साक्षात्कार हेतु बुलाया जाता है और अंतिम आमंत्रित अभ्यर्थी के प्राप्तांक ही उस वर्ग के ‘कट आॅफ’ होते हैं। सुनीता ने 2003 में जो परीक्षा दी थी उसमें अनारक्षित महिला वर्ग के ‘कट आॅफ मार्क्स’ 1251 थे अर्थात् इससे कम अंक वाली महिलाओं को साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया, जबकि पुरुष वर्ग के ‘कट आॅफ मार्क्स’ 1231 थे। 2005 की राज्य सेवा परीक्षा में भी महिला वर्ग के ‘कट आॅफ मार्क्स’ 1226 थे, जबकि पुरुषों के 1212। इसी तरह 2008 में सामान्य श्रेणी की 1170 अंक लाने वाली महिलाओं को साक्षात्कार का अवसर नहीं दिया गया, जबकि 1143 अंक पाने वाले पुरुषों को साक्षात्कार में बुलाकर चयन का अवसर दिया गया। ऐसा ही अनुसूचित जाति एवं जनजाति की महिलाओं के साथ हुआ। अनुसूचित जाति वर्ग की महिला 1105 अंक लाने पर साक्षात्कार के लिए बुलाई गई, जबकि इस वर्ग के पुरुष 1094 अंक पर ही बुला लिए गए। अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिला 961 अंक लाने पर साक्षात्कार में आमंत्रित की गई, जबकि इस वर्ग के पुरुष 941 अंक पर ही बुला लिए गए। आयोग द्वारा आयोजित हर परीक्षा में ऐसी ही विसंगति सामने आई। यह तो विधानसभा में सवाल उठने पर आंकड़े सामने आ गए, अन्यथा मप्र लोकसेवा आयोग तो ‘कट आॅफ मार्क्स’ की जानकारी सार्वजनिक ही नहीं करता है।

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सुनीता जैन
रतलाम की सुनीता जैन ने ‘राज्य सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2003’ में सफलता प्राप्त की, लेकिन वे साक्षात्कार का अवसर नहीं पा सकीं। उन्हें 2100 में से 1249 अंक प्राप्त हुए थे, फिर भी उन्हें साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया, जबकि उनके एक परिचित अभ्यर्थी आशीष मिश्र को 1240 अंक प्राप्त हुए थे, लेकिन उन्हें साक्षात्कार में शामिल किया गया। यह विसंगति है, इसे दूर करने की आवश्यकता है।
विडम्बनापूर्ण तथ्य यह है कि मप्र लोक सेवा आयोग में सचिव और उप सचिव दोनों पदों पर महिलाएं पदस्थ हैं, लेकिन लगातार संपर्क करने पर भी आयोग सचिव आईएएस वंदना वैद्य बात करने को राजी नहीं हुर्इं। महिला आरक्षण संबधी विषय की जानकारी होने पर भी उन्होंने किसी टिप्पणी से इनकार करते हुए प्रभारी उप सचिव संघमित्रा गौतम से बात करने को कह दिया। लगातार संपर्क करने पर भी उप सचिव फोन पर नहीं आर्इं। कर्मचारी द्वारा उनके बैठक में होने का हवाला दिया जाता रहा। महिलाओं के प्रति इस भेदभाव का एक कारण यह भी है कि उन्हें आरक्षित पद के विरुद्ध आवेदन करना है या नहीं, इसका कोई विकल्प नहीं दिया जाता, जबकि अन्य वर्ग के अभ्यर्र्थी को आवेदन के समय यह विकल्प होता है कि उन्हें आरक्षण लेना है या नहीं। इस कारण महिलाओं को पुरुषों से अधिक अंक लाने पर भी उन्हें महिला कोटे में ही स्थान बनाने की जद्दोजहद करनी पड़ती है। स्कूली शिक्षा विभाग का भी राज्यमंत्री के तौर पर स्वतंत्र प्रभार संभाल रहे इन्दर सिंह परमार कहते हैं, ‘‘अन्य वर्ग की तरह महिलाओं को भी आरक्षण लेने और न लेने का विकल्प दिया जा सकता है।’’ अब देखना यह है कि राष्ट्रपति के निर्देश के बाद भी स्थिति बदलती है या नहीं?