वामपंथी गढ़ में भाजपा की धमक

    दिनांक 01-जनवरी-2021
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अनु नारायणन

वामपंथी गढ़ में भाजपा की धमक

केरल में संपन्न निकाय चुनाव में कांग्रेस को जबरदस्त पराजय का मुंह देखना पड़ा है। प्रदेश में पार्टी खात्मे के कगार पर है और भाजपा तेजी से अपनी जगह  बना रही । राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ एलडीएफ और भाजपा के बीच सीधी टक्कर होगी 
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केरल के पलक्कड़ में नगर निगम चुनाव में जीत के बाद खुशी जाहिर करते भाजपा कार्यकर्ता

केरल में दिसंबर,2020 में तीन चरणों में संपन्न निकाय चुनावों के परिणाम को भले ही सत्तारूढ़ वामदलों के पक्ष में माना जाए, लेकिन इसका दूसरा आयाम भी है। चुनाव परिणाम यह बताते हैं कि राज्य की राजनीति में भाजपा धीरे-धीरे पांव जमा रही है। वहीं, कांग्रेस की करारी हार से एक बार फिर साबित हो गया कि उसकी अवसरवादी राजनीति अब लोगों को रास नहीं आ रही है। उसकी पराजय संकेत है कि 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में मुकाबला माकपा की अगुआई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और भाजपा के बीच होगा। निकाय चुनाव परिणाम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के लिए एक तगड़ा झटका हैं, क्योंकि वह बड़ी जीत की उम्मीद कर रहा था। इसी के जरिए यूडीएफ विधानसभा चुनावों में एकजुट और मजबूत दावेदारी पेश करने की जुगत में था। 
केरल में शुरू से ही सत्ता की चाबी बारी-बारी से एलडीएफ और कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ के पास रही है।  एलडीएफ 11 दलों का गठबंधन है, जबकि यूडीएफ में 8 दल शामिल हैं। कुछ साल पहले तक राज्य की राजनीति में भाजपा का नामोनिशान तक नहीं था। 2014 के बाद से हर चुनाव में भाजपा का कद बढ़ा है। 2015 के निकाय चुनाव में भाजपा ने यूडीएफ के गढ़ में सेंध लगाते हुए तिरुअनंतपुरम नगर निगम में सफलता हासिल की थी। उस समय भाजपा ने 100 में से 33 पर जीत दर्ज की थी, जबकि एलडीएफ को 42 और कांग्रेस को 20 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। दिलचस्प बात है कि स्थानीय सांसद होने के बावजूद कांग्रेस फिसड्डी रही। 2015 के निकाय चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 13.28 था। भाजपा ने पहली बार 2016 विधानसभा चुनाव में तिरुवनंतपुरम की नेमम सीट पर दर्ज की और 6 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही, पर 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोटबैंक 16 प्रतिशत से अधिक हो गया। इस निकाय चुनाव में यह बढ़कर 17.2 प्रतिशत हो गया है।

इस बार निकाय चुनाव में सत्तारूढ़ एलडीएफ कई विवादों में घिरा रहा। मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के पूर्व सचिव और उनके मंत्रिमंडल सहयोगियों पर सोने की तस्करी जैसे गंभीर आरोप लगे। इस मामले में तो केंद्रीय जांच एजेंसियों ने मुख्यमंत्री के सचिव को गिरफ्तार भी किया था। इसके अलावा, इसी साल अक्तूबर में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने ड्रग रैकेट में माकपा के राज्य सचिव कोडियरी बालाकृष्णन के छोटे बेटे बिनिश कोडियरी को गिरफ्तार किया था, जिसके बाद उन्हें पार्टी सचिव पद से इस्तीफा देना पड़ा था। कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा अवसर था, लेकिन वह निकाय चुनाव में इन मुद्दों को भी भुना नहीं पाई। भाजपा को हराने के चक्कर में उसने अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार ली। दरअसल, निकाय चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक उम्मीद तिरुअनंतपुरम नगरपालिका से थी। पिछली बार निकाय चुनाव में वह सत्ता के करीब पहुंच चुकी थी। इस बार भाजपा, माकपा को कड़ी चुनौती दे रही थी। इसलिए उसने तिरुअनंतपुरम की चुनिंदा सीटों पर सीपीएम का समर्थन कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस की अगुआई वाला यूडीएफ 10 सीटों पर सिमट गया। 

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन का मानना है कि निकाय चुनाव परिणाम को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि केरल में कांग्रेस का अस्तित्व खत्म हो रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘चुनाव के पहले मैंने कहा था कि मुकाबला एलडीएफ और भाजपा के बीच में हो रहा है।’’ ग्राम, ब्लॉक, जिला और नगरपालिका में भाजपा को कुल 35,75,000 वोट मिले।  केरल के इतिहास में पहली बार भाजपा को दो नगरपालिकाओं में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है। पिछली बार पलक्कड़ नगरपालिका पर भले ही भाजपा ने जीत दर्ज की थी, लेकिन उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। लेकिन इस बार 52 में से 28 सीटों पर उसने कब्जा जमाया है। लेकिन चौंकाने वाले परिणाम पंतलम नगरपालिका के हैं। पंतलम को माकपा का गढ़ माना जाता है। शबरीमला आंदोलन का सबसे अधिक विरोध यहीं हुआ था। यहां का राजपरिवार सीपीएम से जुड़ा हुआ था, लेकिन शबरीमला मामले में सीपीएम के अत्याचार से दुखी था, इसलिए उसने खुलकर भाजपा का समर्थन किया। पिछली बार यहां एलडीएफ ने जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार 33 में से 18 सीटें जीतकर भाजपा पूर्ण बहुमत में है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बार चुनाव में भाजपा को न केवल ईसाई समुदाय का समर्थन मिला, बल्कि 200 ईसाई प्रत्याशी भी चुने गए हैं। भाजपा ने मुस्लिम प्रत्याशियों को भी मौका दिया है।

38a_1  H x W: 0पंतलम के अलावा भाजपा ने त्रिपूणितुरा, कोडुंगल्लूर, मावेलिक्कारा, वरक्कला, आटिंगल, ओट्टापालम, कासरगोड जैसे राज्य के उत्तर-दक्षिण क्षेत्रों में काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। मध्य केरल के ईसाई और पुराने तिरुवितामकूर के उच्च जाति के नायर कांग्रेस के परंपरागत वोटबैंक थे, लेकिन कट्टरपंथी वेलफेयर पार्टी के साथ गठबंधन के बाद उसका यह वोटबैंक छिटक गया। केरल के राजनीतिक विश्लेषक ए. जयशंकर के अनुसार, ईसाइयों और हिन्दुओं का सबसे अधिक वोट एलडीएफ को मिला। हालांकि भाजपा को भी इसका फायदा हुआ, लेकिन एलडीएफ की तुलना में यह अधिक असरदार नहीं रहा। जयशंकर का कहना है कि सांगठनिक स्तर पर कांग्रेस अभी सबसे कमजोर है और अगर एलडीएफ फिर से सत्ता में आई तो यह पूरी तरह खत्म हो जाएगी। उस खालीपन को भाजपा ही भर सकती है। लेकिन निकाय चुनाव के नतीजों को देखकर ऐसा लग रहा है कि भाजपा समय पूर्व ही मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल कर लेगी।

केरल सरकार अभी केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही लोक कल्याण योजनाओं को अपना बता कर लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर रही है। संगठनात्मक स्तर पर एलडीएफ काफी मजबूत है और उसकी पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों तक है। अगर भाजपा को सफल होना है तो उसे निचले स्तर तक अपने संगठन को मजबूत बनाना होगा और एलडीएफ सरकार के भ्रामक प्रचार की पोल खोलने के लिए सच लोगों तक पहुंचाना होगा। 

भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि कांग्रेस अभी सबसे कमजोर स्थिति में है। यही नहीं, मध्य केरल ईसाई बहुल है, ईसाई कांग्रेस से नाराज हैं इस बार उन्होंने भाजपा पर भरोसा जताया है। भाजपा को उन्हें पूरी तरह अपने पाले में लाना होगा। इसके अलावा, कचेरी मामले में दो ईसाई गुटों के बीच जारी खींचतान का भाजपा अगर समाधान निकाल लेती है तो उसके लिए यह बहुत बड़ी सफलता होगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि विवाद का हल निकालने के लिए ईसाई पक्ष ने प्रधानमंत्री के समक्ष चर्चा का प्रस्ताव रखा है।