सियाचिन को बचाने वाले कर्नल नरेंद्र ‘बुल’ कुमार नहीं रहे

    दिनांक 01-जनवरी-2021   
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कर्नल नरेंद्र ‘बुल’ नहीं रहे। उन्हीं की रिपोर्ट पर भारतीय सेना ने 1984 में 'ऑपरेशन मेघदूत' चलाकर सियाचिन पर कब्जा किया था
 
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दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर तिरंगा लहराने वाले अदम्य साहस के प्रतीक कर्नल नरेंद्र ‘बुल’ कुमार (87) का बृहस्पतिवार को निधन हो गया। उनकी रिपोर्ट पर ही सेना ने 13 अप्रैल, 1984 को ‘ऑपरेशन मेघदूत’ चलाकर सियाचिन पर कब्जा बरकरार रखा था। यह दुनिया की सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र में पहली कार्रवाई थी। पीएम नरेंद्र मोदी ने उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताया है।
सेना ने उनके निधन की जानकारी देते हुए ट्वीट किया, कर्नल बुल ऐसे सोल्जर माउंटेनियर थे, जो कई पीढ़ियों के प्रेरणास्रोत रहेंगे। आज वह नहीं रहे, लेकिन अपने पीछे साहस, बहादुरी और समर्पण की गाथा छोड़ गए हैं।
'ऑपरेशन मेघदूत' का नेतृत्व करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी (से.नि.) बताते हैं '' पहाड़ों के बारे में जितनी जानकारी उनकी थी उतनी शायद ही किसी को होगी। जब कर्नल नरेंद्र ‘बुल’ कुमार भारतीय सेना में भर्ती हुए तो कुमाऊं रेजीमेंट में गए। कुमाऊं रेजीमेंट का सेंटर रानीखेत में है। वहां आफिसर्स मेस से सामने त्रिशुल, पंजोली, नंदादेवी आदि पहाड़ नजर आते थे। वहीं से उन्हें पर्वतारोही बनने का शौक चढ़ा। इसके बाद उन्होंने सारी चोटियों पर फतेह पाई। 1978 में उनकी उनके एक जर्मन के पर्वतारोही दोस्त से बातचीत हुई।'' उन्होंने बताया '' जब कर्नल बुल की उनसे बात हुई तो उन्होंने पूछा कि कैसे वहां जा रहे हो। इस पर उनके दोस्त ने बताया कि पाकिस्तान से अनुमति दे दी है। उनके क्षेत्र से वहां जाना होगा। कर्नल ने अपने जर्मन दोस्त से नक्शा मांगा। जब उन्होंने नक्शा देखा तो पाया कि पाकिस्तान ने सारे भारतीय क्षेत्र को अपना क्षेत्र बनाया हुआ है। इस बाद उन्होंने सेना से सियाचिन की रेकी करने की अनुमति मांगी। वह वहां गए और सारी सूचनाएं एकत्रित की। इसके बाद भारतीय सेना ने वहां जाना शुरू किया। 13 अप्रैल 1984 को सियाचिन पर कब्जे के इरादे से हम वहां पहुंचे और तब से आज तक सियाचिन हमारा है।
कैसे पड़ा 'बुल' नाम
लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी बताते हैं '' कर्नल नरेंद्र ‘बुल’ कुमार थोड़े छोटे कद के थे, लेकिन काफी चौड़े थे। जब वह कर्नल नहीं डिफेंस एकेडमी में कैडेट थे तो बॉक्सिंग के मैच में उनकी फाइट पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल सुनिथ फ्रांसिस रोड्रिग्स से हुई।
जनरल रोड्रिग्स भी तब कैडेट थे, बाद में वह सेनाध्यक्ष बने, पंजाब के राज्यपाल भी रहे। उस मैच में कर्नल नरेंद्र ने उन्हें हरा दिया। उनकी बुल यानी सांड जैसी ताकत के कारण एकेडमी में उन्हें 'बुल' कुमार कहा जाने लगा, तभी से उनका यह नाम पड़ा।
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर फतह
कर्नल बुल नंदादेवी चोटी पर चढ़ने वाले पहले भारतीय थे। इसके अलावा वह माउंट एवरेस्ट, माउंट ब्लैंक और कंचनजंघा पर भी तिरंगा फहरा चुके थे। शुरुआती अभियानों में चार उंगलियां खोने के बाद भी उन्होंने इन चोटियों पर जीत हासिल की। कर्नल बुल 1965 में भारत की पहली एवरेस्ट विजेता टीम के उपप्रमुख थे। उन्होंने निकनेम ‘बुल’ हमेशा नाम के साथ लिखा। उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा मेडल और कीर्ति चक्र जैसे सैन्य सम्मान के अलावा पद्मश्री तथा अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नल नरेंद्र के निधन पर शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया, 'एक अपूरणीय क्षति! कर्नल नरेंद्र 'बुल' कुमार (सेवानिवृत्त) ने असाधारण साहस और परिश्रम के साथ राष्ट्र की सेवा की। पहाड़ों के साथ उनका विशेष बंधन याद किया जाएगा। उनके परिवार और शुभचिंतकों के प्रति संवेदना। ओम शांति।'