विकास के साथ कश्मीर

    दिनांक 01-जनवरी-2021   
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जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद के चुनाव में लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। मतदाताओं ने गुपकार गठबंधन के नेताओं को करारा जवाब दिया और बता दिया कि वे विकास के साथ हैं, न कि अलगाववाद के साथ  कश्मीर घाटी में डीडीसी चुनाव जीतने वाले भाजपा प्रत्याशी
j_1  H x W: 0 xएजाज अहमद अपने समर्थकों के साथ खुशी मनाते हुए।

पहली बार जम्मू-कश्मीर की जिला विकास परिषद् (डीडीसी) के लिए हुए चुनाव ने बता दिया है कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत मजबूत हैं। पाकिस्तान और अलगाववादियों के लाख विघ्न डालने के बावजूद लोगों ने लोकतंत्र के इस पर्व में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अब डीडीसी के गठन के बाद प्रदेश में विकास की गाड़ी आगे बढ़ सकती है।

5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 और 35ए की समाप्ति के बाद जम्मू-कश्मीर में हुए पहले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी है। इस चुनाव में उसने जम्मू-कश्मीर के 20 जिलों की 280 जिला परिषद् सीटों में से न सिर्फ 75 सीटों पर विजय प्राप्त की है, बल्कि उसके द्वारा प्राप्त मत प्रतिशत में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। 2014 के विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा ने राज्य में हुए मतदान के कुल 22.98 प्रतिशत मत प्राप्त किए थे, वहीं इस बार यह प्रतिशत बढ़कर 24.82 प्रतिशत हो गया है। भाजपा ने न सिर्फ जम्मू संभाग में गुपकार गठजोड़ का सूपड़ा साफ कर दिया है, बल्कि पहली बार कश्मीर घाटी में भी तीन सीट जीतकर उसने अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है। यह वही कश्मीर घाटी है, जहां भाजपा तो क्या, भारत का तिरंगा झंडा उठाने वालों को मौत के घाट उतार दिया जाता था।

इन चुनाव परिणामों ने सच्चे अर्थों में जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी और प्रजा परिषद् के संस्थापक अध्यक्ष पंडित प्रेमनाथ डोगरा की सोच और संघर्ष को सही साबित कर दिया है। भाजपा के बढ़ते दबदबे से आशंकित सात विपक्षी दलों (नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, माकपा आदि) ने ‘पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लरेशन’ के बैनर तले गठबंधन बनाकर यह चुनाव लड़ा था। वस्तुत: यह भाजपा की लोकप्रियता और जनाधार से घबराए हुए चिर-प्रतिद्वंद्वी दलों का मतलबपरस्त और मौकापरस्त गठजोड़ मात्र था। सात दलों के इस गठबंधन ने 110 सीटों पर विजय प्राप्त की है, वहीं  निर्दलीय प्रत्याशियों ने 49 सीटों पर जीत दर्ज की है। कांग्रेस मात्र 26 सीटें ही जीत सकी है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जी.ए. मीर के साहबजादे भी चुनाव हार गए। गुपकार गठबंधन का प्रदर्शन वास्तव में अत्यंत निराशाजनक है। महबूबा मुफ़्ती की पार्टी पीडीपी तो मात्र 27 सीटों पर ही सिमट गई। भाजपा और निर्दलीय प्रत्याशियों द्वारा जीती गई कुल सीटों (124) और उन्हें मिले मत प्रतिशत को जोड़ दें (52 प्रतिशत से अधिक) तो यह जनादेश साफ संकेत देता है कि जम्मू-कश्मीर के लोग बदलाव और विकास चाहते हैं। वे आतंकवाद और अलगाववाद की काली छाया से बाहर निकलकर नई संभावनाओं का सूर्योदय देखना चाहते हैं। वे खून-खराबे और दहशतगर्दी की धरती बन गई कश्मीर की वादियों को एक बार फिर ‘धरती का स्वर्ग’ बनाने की परियोजना में भागीदार बनना चाहते हैं।

इन चुनावों का वास्तविक और सबसे बड़ा संदेश राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली और उसमें व्यापक जन भागीदारी है। इस चुनाव में सबसे पहले और सबसे बढ़कर लोकतंत्र की जीत हुई है। आतंकवादी और अलगाववादी संगठनों को ठेंगा दिखाते हुए लोगों ने न सिर्फ भारी संख्या में चुनाव लड़ा, बल्कि आम मतदाता ने पूर्ववर्ती चुनावों से कहीं ज्यादा मतदान भी किया। इस बार 280 सीटों के लिए कुल 2,178 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा और कुल 51.42 प्रतिशत मतदान हुआ। 30,00,000 से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। स्थानीय लोगों ने निडरतापूर्वक बुलेट का जवाब बैलेट से दिया। चुनाव 28 नवम्बर से 22 दिसम्बर के बीच 8 चरण में हुआ।
 
36û_1  H x W: 0जम्मू संभाग में जहां औसत मतदान 65 प्रतिशत के आसपास रहा, वहीं कश्मीर घाटी में यह 40 प्रतिशत के आसपास था। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में 20 जिले हैं। प्रत्येक जिले को 14 निर्वाचन-क्षेत्रों में बांटा गया था। डीडीसी चुनाव मतपत्रों द्वारा संपन्न कराए गए, ताकि लोकसभा आदि चुनावों की तरह प्रतिकूल परिणाम आने की स्थिति में विपक्ष ईवीएम से छेड़छाड़ का रोना न रोये। इस लोकतांत्रिक उत्सव में जनता की भागीदारी और इसका समयबद्ध, शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से संपन्न होना सबसे बड़ा और निर्णायक संदेश है।
ये चुनाव 5 अगस्त, 2019 और 31 अक्तूबर, 2019 को लिए गए ऐतिहासिक निर्णयों के बाद और उनकी पृष्ठभूमि में संपन्न हुए हैं। गुपकार गठजोड़ इन चुनावों को केंद्र सरकार के इन निर्णयों पर ‘जनमत’ के रूप में प्रचारित करना चाहता था, किन्तु जम्मू-कश्मीर की जनता ने चुनावों में उत्साहजनक भागीदारी करके न सिर्फ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी आस्था व्यक्त की, बल्कि भारतीय संघ में अपना विश्वास और उसके प्रति अपनी एकजुटता भी प्रदर्शित की है।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सभी नागरिकों की विश्वास बहाली और भागीदारी सुनिश्चित करना किसी भी राज्य का सर्वप्रमुख कर्तव्य है और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। आज जम्मू-कश्मीर इस चुनौती को स्वीकार करने में सफल हुआ है। राज्य में त्रि-स्तरीय पंचायती राज्य व्यवस्था के महत्वपूर्ण और सबसे बड़े सोपान जिला विकास परिषद् के चुनाव पहली बार कराए गए। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने अक्तूबर,2020  में पंचायती राज से संबंधित 73वें संविधान संशोधन को जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह लागू कर दिया था। राज्य में यह कानून पिछले 28 वर्ष से लंबित था। पंचायती राज व्यवस्था न सिर्फ लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत नींव है, बल्कि स्वशासन और सुशासन की भी पहचान है। इतिहास में पहली बार पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थी, गोरखा और वाल्मीकि समुदाय के लोगों को अपने लोकतांत्रिक अधिकार मतदान का अवसर प्राप्त हुआ।  अभी तक ये लोग राज्य के चुनावों में मतदान के अपने लोकतांत्रिक अधिकार से सुनियोजित ढंग से वंचित किए गए थे। पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर की नई अधिवास नीति, मीडिया नीति, भूमि स्वामित्व नीति और भाषा नीति में बदलाव करते हुए शेष भारत से उसकी दूरी और अलगाव को खत्म किया गया है। भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर राजभाषा अधिनियम-2020 लागू करते हुए पांच भाषाओं- कश्मीरी, डोगरी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी को राजभाषा का दर्जा दिया है। बहुप्रयुक्त स्थानीय भाषाओं को राजभाषा का दर्जा मिलने से न सिर्फ इन भारतीय भाषाओं का विकास हो सकेगा, बल्कि शासन-प्रशासन में जनभागीदारी बढ़ेगी। बहुत जल्दी जम्मू-कश्मीर की औद्योगिक नीति भी घोषित होने वाली है। ये चुनाव और इनके परिणाम केंद्र सरकार और उपराज्यपाल शासन की उपरोक्त सकारात्मक और संवेदनशील नीतियों पर भी मुहर लगाते हैं।     (लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में अधिष्ठाता (छात्र कल्याण) हैं)