ममता से मुकरे नेता

    दिनांक 01-जनवरी-2021
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प्रमोद भार्गव
ममता बनर्जी का कुनबा सिमट रहा है। उनकी पार्टी के बड़े-बड़े नेता उन्हें छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। इन सबसे ममता परेशान हो रही हैं और  प्रधानमंत्री और अन्य भाजपा नेताओं को अपशब्द कह कर  अपनी भड़ास निकाल रही हैं
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प. बंगाल में एक जनसभा के दौरान अमित शाह की उपस्थिति में भाजपा में शामिल होते शुभेंदु अधिकारी (मध्य में)


केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दो दिवसीय पश्चिम बंगाल दौरे ने तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। क्रांतिकारी खुदीराम बोस के स्मारक को नमन करके जहां शाह ने राष्ट्रवाद का संदेश दिया, वहीं काली और महामाया मंदिरों में पूजा करके सनातन-धर्मियों में एक नया उत्साह जगाया। दिल्ली सीमा पर किसान कृषि कानूनों को लेकर आंदोलनरत हैं, इसके उत्तर में शाह ने एक किसान के घर बंगाली भोजन करके यह जताने की कोशिश की कि अन्नदाता सरकार की प्राथमिकता में हैं। तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद, 10 विधायक, नौ पार्षद, 45 सहकारी बैंक और निकायों के अध्यक्ष तथा दो जिला पंचायत अध्यक्षों ने अमित शाह की मिदनापुर की सभा में भाजपा में शामिल होकर यह जता दिया कि तृणमूल चौतरफा टूट रही है। शुभेंदु अधिकारी के भाजपा में शामिल होने से पार्टी को करीब 80 विधानसभा सीटें प्रभावित होने की आस को बंधी है। ये वही शुभेंदु हैं, जो नंदीग्राम व सिंगूर के शिल्पकार थे और जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर आर्इं ममता को बंगाल के सत्ता-सिंहासन पर बिठाने का काम किया था। किंतु वंशवाद की राजनीति का अभिशाप अब ममता समेत समूची तृणमूल को झेलना पड़ रहा है। दरअसल, ममता ने शुभेंदु की जगह अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को सत्ता व संगठन का हकदार बनाने का द्वार खोल दिया, जो ममता समेत समूची तृणमूल पर भारी पड़ रहा है। इसलिए शाह का यह कहना सही लगता है कि चुनाव आने तक ममता अकेली रह जाएंगी।     

एक ओर तो पश्चिम बंगाल में हिंसा चरम पर है, दूसरी ओर  तृणमूल कांग्रेस के सांसद, विधायक व अन्य कार्यकर्ता एक के बाद एक भाजपा के पाले में जा रहे हैं। कभी वामपंथियों की मांद में घुसकर दहाड़ने वाली ममता अपने ही घर में अकेली पड़ती दिखाई दे रही हैं। राज्य में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह एक-एक करके तृणमूल के दिग्गज नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, उससे लगता है, ममता घोर राजनीतिक संकट से घिरती जा रही हैं। ममता ने जब वामपंथियों के जबड़े से सत्ता छीनी थी, तब उम्मीद बनी थी कि वे अनूठा नेतृत्व देकर बंगाल में विकास और रोजगार को बढ़ावा देंगी। लेकिन 10 साल के शासन में अविवाहित होने के बावजूद वे वंशवाद, मुस्लिम तुष्टीकरण, भ्रष्टाचार और हिंसा से बंगाल को मुक्ति नहीं दिला पार्इं। यही कारण रहा कि अमित शाह और कैलाश विजयवर्गीय की रणनीति के चलते आज तृणमूल और ममता का भविष्य अंधेरे की ओर बढ़ रहा है। ममता को सबसे बड़ा झटका शुभेंदु अधिकारी के अलग होने से लगा है। इसके बाद ममता की देहरी फलांगने का सिलसिला चल पड़ा है। इसकी एक वजह उनका तानाशाही आचरण तो है ही, राजनीति में तकनीक के जरिए जीत के खिलाड़ी माने जाने वाले प्रशांत किशोर का पार्टी में बढ़ता दखल भी है।

हाल के दिनों में तृणमूल को जिन दिग्गज नेताओं ने छोड़ा हैै, शुभेंदु अधिकारी उनमें सबसे ताकतवर हैं। शुभेंदु का इस्तीफा ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। शुभेंदु के पिता शिशिर अधिकारी भी विधायक और सांसद रह चुके हैं। शुभेंदु के एक भाई सांसद और दूसरे नगरपालिका अध्यक्ष हैं। इस तरह इनके परिवार का छह जिलों की 80 से ज्यादा सीटों पर असर है। उनके समर्थक जितेंद्र तिवारी ने भी आसनसोल में नगर निगम के प्रशासक सहित पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। तिवारी पांडेबेश्वर विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे। तीसरे स्थान पर शीलभद्र दत्त आते हैं, जो 24 परगना जिले के बैरकपुर से विधायक हैं। उन्होंने प्रशांत किशोर के काम करने के तरीके को लेकर नाराजगी जताई है। वहीं कबीरुल इस्लाम ने पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के महासचिव पद से इस्तीफा दिया है। इनसे पहले पार्टी छोड़ने वाले दिग्गज नेता मुकुल रॉय हैं। मुकुल रॉय को हाल ही में भाजपा का उपाध्यक्ष बनाया गया है। शोभन चटर्जी ने भी भाजपा का दामन थामा है। मिहिर गोस्वामी टीएमसी के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले नेता हैं। उन्होंने नवंबर में भाजपा का दामन थामा था। वे कूच बिहार दक्षिण से विधायक थे। अनुपम हाजरा बोलपुर से टीएमसी सांसद रह चुके हैं। वे अब भाजपा में राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अर्जुन सिंह, ममता बनर्जी के साथ अनबन के बाद 2019 में आम चुनाव से ठीक पहले टीएमसी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए और अब बैरकपुर लोकसभा सीट से भाजपा के सांसद हैं। इसी कड़ी में शंकुदेब पांडा, सब्यसाची दत्ता, सौमित्र खान, बनाश्री मैती, सैकत पंजा, आदि ने भाजपा का दामन थाम लिया है। शाह की सभा में तृणमूल के ही नहीं, भाकपा के अशोक डिंडा, माकपा के तापसी मंडल और दिपाली विश्वास तथा कांग्रेस के सुदीप मुखर्जी भी भाजपा में शामिल हुए। मसलन विचारधारा चाहे वामपंथी रही हो या गांधीवादी अब सब भाजपा की राष्ट्रवादी वैचारिकता के अनुयायी बनने में ही अपना उज्जवल भविष्य देख रहे हैं। 

41a_1  H x W: 0सर्वहारा और किसानों की पैरवी करने वाले वाममोर्चा ने जब सिंगूर और नंदीग्राम के किसानों की खेती की जमीन टाटा को दीं तो इस जमीन पर अपने हक के लिए उठ खड़े हुए किसानों के साथ ममता आ खड़ी हुर्इं। ममता कांग्रेस की पाठशाला में ही पढ़ी थीं। जब कांग्रेस उनके कड़े तेवर झेलने और संघर्ष में साथ देने से बचती दिखी तो उन्होंने कांग्रेस से पल्ला झाड़ा और तृणमूल कांग्रेस को अस्तित्व में लाकर वामदलों से भिड़ गर्इं। इस दौरान उन पर कई जानलेवा हमले हुए, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। जबकि 2001 से लेकर 2010 तक 256 लोग सियासी हिंसा में मारे गए। यह काल ममता के रचनात्मक संघर्ष का चरम था, जिसके मुख्य रचनाकार शुभेंदु अधिकारी थे, जो अब भाजपा के पाले में हैं। इसके बाद 2011 में बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए। ममता ने मां, माटी और मानुष का नारा लगाकर वाममोर्चा का लाल झंडा उतारकर तृणमूल की विजय पताका फहरा दी।

किंतु अब बंगाल की माटी पर एकाएक उदय हुई भाजपा ने ममता के वजूद को संकट में डाल दिया है। बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इनमें 90 फीसदी तृणमूल के खाते में जाते हैं। इसे तृणमूल का पुख्ता वोट बैंक मानते हुए ममता ने अपनी ताकत मोदी व भाजपा विरोधी छवि स्थापित करने में लगा दी है। इसमें मुस्लिमों को भाजपा का डर दिखाने का संदेश भी छिपा था। किंतु इस क्रिया की विपरीत प्रतिक्रया हिंदुओं में स्व-स्फूर्त धु्रवीकरण के रूप में दिखाई देने लगी है। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए एनआरसी के लागू होने के बाद भाजपा को अपने वजूद के लिए खतरा मानकर चल रहे हैं, नतीजतन बंगाल में राजनीतिक हिंसा का उबाल आया हुआ है। इस कारण बंगाल में जो हिंदी-भाषी समाज है, वह भी भाजपा की तरफ झुका दिखाई दे रहा है। हैरानी इस बात पर भी है कि जिस ममता ने परिवर्तन का नारा देकर वामपंथियों के कुशासन और अराजकता को चुनौती दी थी वही ममता इसी ढंग की भाजपा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बौखला गई हैं। उनके बौखलाने का एक कारण यह भी है कि 2011-2016 में उनके सत्ता परिवर्तन के नारे के साथ जो वामपंथी और कांग्रेसी कार्यकर्ता आ खड़े हुए थे, वे भविष्य की राजनीतिक दिशा भांपकर भाजपा का रुख कर रहे हैं।

2011 के विधानसभा चुनाव में जब बंगाल में हिंसा का नंगा नाच हो रहा था, तब ममता ने अपने कार्यकर्ताओं को विवेक न खोने की सलाह देते हुए नारा दिया था, ‘बदला नहीं, बदलाव चाहिए।’ लेकिन बदलाव के ऐसे ही कथन अब ममता को असामाजिक और अराजक लग रहे हैं।   
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)