दुष्प्रचार तंत्र बन गया है मीडिया

    दिनांक 15-जनवरी-2021
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शाहीन बाग और किसान आंदोलन में अपने मूल्यों को अनदेखा किया सेकुलर मीडिया ने
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हिंदू मंदिरों पर हमले, उन्हें तोड़ना भारत के मुख्यधारा मीडिया के लिए सामान्य घटना है। आंध्र प्रदेश और ओडिशा में मंदिरों पर हो रहे हमलों की मीडिया कवरेज देखकर यही लगता है। वहीं भारत के जिन अखबारों और चैनलों ने ‘चर्च पर हमलों’ को लेकर कई महीने तक अभियान चलाया था उन्हें मानो सांप सूंघ गया है। कुछ जगहों पर समाचार अवश्य दिख जाता है, लेकिन वैसे तेवर नहीं हैं जो चर्च के नाम पर झूठ फैलाने में दिखते थे। दिल्ली के चांदनी चौक में हनुमान मंदिर तोड़ने का समाचार भी अंदरूनी पन्नों में दबा दिया गया। यही कोई छोटी-मोटी अवैध मजार होती तो अंग्रेजी अखबार इसे ‘भारत में मुसलमानों पर अत्याचार’ की घटना की तरह प्रकाशित करते।

यही स्थिति तथाकथित अंतरपांथिक विवाहों को लेकर है। यदि पीड़ित मुसलमान हो तो मीडिया के तेवर देखने योग्य होते हैं, जबकि हिंदुओं के पक्ष को पूरी तरह छुपाया जा रहा है। नोएडा में एक मुस्लिम लड़की से शादी करने वाले हिंदू युवक का शव मिला, लेकिन यह समाचार दिल्ली से छपने वाले ढेरों सेकुलर हिंदी-अंग्रेजी मीडिया संस्थानों तक नहीं पहुंच पाया। कहीं छपा भी तो अंदर के पन्नों पर और यह छिपाते हुए कि संदेह लड़की के रिश्तेदारों पर है। बेंगलुरु के एक मुस्लिम लड़के ने इंटरनेट पर बरेली की हिंदू लड़की से दोस्ती की और मिलने पहुंचा पर लड़की के परिवार वालों ने उसे रोक दिया। इस समाचार को कई अंग्रेजी अखबारों ने प्रमुखता से छापा, लेकिन यह जानकारी छिपा ली कि लड़की अवयस्क है और वह उसे फुसलाकर अपने साथ ले जाने की तैयारी से आया था।

टाइम्स आॅफ इंडिया ने छापा कि उत्तर प्रदेश के अंतरपांथिक युगल प्रदेश छोड़ कर जा रहे हैं। ऐसे बताया गया मानो उनका वहां उत्पीड़न हो रहा हो। यह पूरी रिपोर्ट दिल्ली में एक जिहादी संगठन चलाने वाले व्यक्ति के बयान के आधार पर तैयार की गई। आखिर 'लव जिहाद' को प्रेम बताने वाला मीडिया इस प्रश्न से आंखें क्यों चुराने लगता है कि लगभग 'अंतरपांथिक विवाहों' में लड़की हिंदू, सिख, जैन या ईसाई ही क्यों होती है, जबकि लड़का मुसलमान! उधर, आॅनलाइन शॉपिंग वेबसाइट अमेजन पर हिंदू धर्म विरोधी अश्लील पुस्तकें बेचने का मामला सामने आया। लव जिहाद को बढ़ावा देने वाली इन पुस्तकों के बारे में सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी उजागर हुई।

उधर किसानों की आड़ में चल रहे कमीशन एजेंटों के आंदोलन का मीडिया के माध्यम से महिमामंडन जारी है। जबकि यह स्पष्ट हो चुका है कि आंदोलनकारियों का असली एजेंडा कुछ और है। भारतीय मीडिया कितना भी पक्षपाती रहा, लेकिन उसने एक मर्यादा हमेशा निभाई है कि जिस बात से जनता को परेशानी हो रही हो उसका समर्थन कभी नहीं किया। मुद्दा कितना भी सही क्यों न हो, 'भारत बंद' के समर्थन में कभी खबरें नहीं छपतीं। लेकिन पहले शाहीनबाग और अब कथित किसान आंदोलन, दोनों में मीडिया का रवैया विपरीत ही रहा है। किसान आंदोलन के कारण दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में लाखों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन इसके समाचार अखबारों और चैनलों से पूरी तरह गायब हैं।

उधर, टीआरपी घोटाले के असली आरोपी इंडिया टुडे-आजतक पर शिकंजा कसा जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय ने चैनल के मुख्य वित्तीय अधिकारी से पूछताछ की है। गड़बड़ी की मूल शिकायत इंडिया टुडे समूह के ही विरुद्ध थी, लेकिन मुंबई पुलिस इंडिया टुडे को छोड़ रिपब्लिक टीवी से अपनी निजी दुश्मनी निकालने में जुट गई। यदि सही से जांच हो तो यह पता लगते देर नहीं लगेगी कि चैनलों में नंबर-1 बनने की होड़ का सच क्या है।

अमेरिकी मीडिया में एक रिपोर्ट सामने आई है जिसके अनुसार वहां के कई प्रमुख चैनलों और अखबारों के पत्रकार चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों में दावत उड़ाने जाते हैं और चीन के खर्चे पर दुनिया की सैर करते हैं। इनमें सीएनएन, न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, बीबीसी जैसे लगभग सभी प्रमुख संस्थान शामिल हैं। जिस तरह से पिछले कुछ साल में अमेरिकी मीडिया वामपंथ का प्रचार करता दिख रहा है, उसे देखते हुए यह रिपोर्ट आश्चर्यजनक नहीं है। भारत में भी चीन से उपकृत पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की लंबी-चौड़ी फौज है। कांग्रेस के दौर में ऐसे पत्रकारों की सत्ता के गलियारों में विशेष पहुंच हुआ करती थी। आवश्यकता इस बात की है कि अमेरिका की तरह भारत में भी चीन के टुकड़ों पर पल रहे पत्रकारों की सूची जारी की जाए।