सांस्कृतिक स्वतंत्रता का सूर्योदय

    दिनांक 18-जनवरी-2021
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गोपाल शर्मा

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर बनने जा रहा मंदिर भारतीयों के लिए सांस्कृतिक स्वतंत्रता का सूर्योदय सिद्ध होगा। हिंदू बरसों से अपने आराध्य भगवान श्रीराम का मंदिर बनाना चाहते थे, लेकिन वह शुभ घड़ी अब आई है 
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5 अगस्त, 2020 को अयोध्या में श्रीराम मंदिर के लिए भूमिपूजन करते प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत

इन दिनों पूरे देश में अयोध्या में बनने वाले श्रीराम मंदिर के लिए निधि समर्पण अभियान चल रहा है। यह बहुत ही पुनीत अवसर है। इस अवसर पर श्रीराम मंदिर के लिए चले अभियान को याद करना जरूरी लगता है। राम मंदिर निर्माण का अवसर राष्ट्र जागरण के महामंत्र के रूप में उपस्थित हुआ है। 2025 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी समारोह से पूर्व यह राजनीतिक-सांस्कृतिक स्वतंत्रता का जयघोष है, जिसका स्वप्न संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने हिंदू समाज की आंखों से देखा था। विश्व के इतिहास में यह सबसे लंबा और बड़ा आंदोलन है, जिसमें किसी न किसी रूप में करोड़ों नागरिकों ने सक्रिय भूमिका निभाई और उसका आधार हिंसा और वैमनस्यता को नहीं बनने दिया। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की जन्मभूमि पर आक्रमण से मंदिर निर्माण कार्य शुरू होने तक के 500 साल चले महाभियान में रामभक्तों ने मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया।

रामजन्मभूमि ने सैकड़ों वर्षों तक अवहेलना, गौरव हनन, अपमान और हिंसा से बहने वाले आंसू देखे। अनगिनत आंखों में बह रहे खुशी के आंसुओं से अतीत की कालिमा धुल गई। इस ऐतिहासिक घटना के माध्यम से युगों-युगों तक, दिग-दिगन्त तक भारत की कीर्ति पताका फहराती रहेगी। हर भारतीय सौभाग्यशाली है कि वह अपनी आंखों से भव्य राम मंदिर के साथ-साथ दिव्य राष्ट्र मंदिर का निर्माण होते हुए भी देख रहा है। कोटि-कोटि बंधु-बांधवों का स्वप्न साकार होता दिख रहा है। राम मंदिर का निर्माण राष्ट्र को जोड़ने का उपक्रम है। विश्वास को विद्यमान से, नर को नारायण से, लोक को आस्था से, वर्तमान को अतीत से और समाज को संस्कार से जोड़ने का महोत्सव।

राम का अर्थ है हृदय में प्रकाश
राम मंदिर का अर्थ हृदय में प्रकाश यानी आदर्शों को सुस्थापित करना भी है। 11 मई, 1951 को सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा के समय तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कहे वाक्य स्मरणीय हैं, ‘‘जिसे जनता प्यार करती है, जिसके लिए जनता के हृदय में अक्षय श्रद्धा और स्नेह है, उसे संसार में कोई भी नहीं मिटा सकता।’’ पुनर्निर्माण की शक्ति हमेशा विनाश की शक्ति से अधिक होती है।

राम के चरित्र ने स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरित किया है। उस समय की रामलीलाओं में महारानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह के बलिदान और जलियावालां बाग कांड की झांकियां चलती थीं। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। उनके सामने भी भयंकर संकट आए, लेकिन उन्होंने अपने लाभ के बारे में सोचने के बजाए मर्यादा की रक्षा के बारे में सोचा। राजसिंहासन की जगह उन्होंने 14 वर्ष का वनवास भोगा, अपनी प्रिय अयोध्या से दूर चले गए। सीता हरण हुआ, भयंकर युद्ध लड़ना पड़ा। उन पर आक्षेप लगे, कटु आलोचना हुई, ‘जनता माफ नहीं करेगी’ जैसे ताने मारे गए, उनका प्रियजन से बिछोह हो गया, लेकिन उन्होंने अपने हित, सम्मान, यश को दांव पर लगाकर मर्यादा की रक्षा की। उन्होंने विपत्तियों से ऊपर उठकर अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, कर्मठता और साहस से सफलता के पथ का निर्माण किया।

सदियों लंबी प्रतीक्षा का परिणाम
इस अभूतपूर्व वेला की प्रतीक्षा में लगभग पांच शताब्दियां और दर्जनों पीढ़ियां लग गर्इं। कितनी ही सरकारें आर्इं और गर्इं लेकिन देश के इतने महत्वपूर्ण विषय को लटकाए रखा गया। लेकिन वास्तव में दीर्घकालीन, दृढ़प्रतिज्ञ, संघर्षमय और कारुणिक प्रतीक्षा की परिणति सुखद ही होती है। 1947 में देश को राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त हुई लेकिन देश सांस्कृतिक स्वतंत्रता को तरसता रहा। सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भी तत्कालीन सरकार को पसंद नहीं था। पं. जवाहरलाल नेहरू ने कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी से कहा था, ‘‘मुझे सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाना पसंद नहीं है।’’ भारतीय विद्याभवन की पत्रिका ‘भवन्स जर्नल’ के 1 जनवरी, 1967 के अंक में मुंशी के पत्र से उद्धृत)। सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के निर्णय से ही अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने के विषय ने जोर पकड़ा। अयोध्या के साधु-संत पं. नेहरू से मिले। लेकिन सरकार राम मंदिर के पक्ष में नहीं थी। (26 दिसंबर, 1949 को नेहरू का पंत को तार)। यहां तक कि रामलला की प्रतिमा हटाने के भी निर्देश दे दिए गए थे। लेकिन सरदार पटेल की इच्छाशक्ति और हस्तक्षेप के कारण ऐसा नहीं किया जा सका। (9 जनवरी, 1950 को सरदार पटेल का मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत को पत्र) यहां तक कि न्यायालय को लिखकर दे दिया गया कि उसकी इस विवाद में कोई रुचि नहीं है। (10 दिसंबर, 1992 के इलाहाबाद के निर्णय का अंश)

देश का संकल्प है कि तुलसीदासजी की पुण्यतिथि के 400 वर्ष पूरे होने पर 2023 में यहां भव्य राम मंदिर आकार ले लेगा।

आजादी और राम जन्मभूमि आंदोलन
ब्रिटिश हुकूमत के दौर में राम जन्मभूमि परिसर पर हिंदू समाज के दावे को खारिज किया जाता रहा। देश की आजादी के बाद नई जनचेतना का संचार हुआ। सदियों पहले विदेशी आक्रांता द्वारा मंदिर तोड़कर बनाए गए ढांचे का विरोध और मुखर होने लगा। इसी दौरान जन्मभूमि परिसर में रामलला का प्राकट्य हुआ। वहां श्रद्धालु इकट्ठे हो गए और भजन-कीर्तन होने लगा। अयोध्या थाने में कुछ लोगों के खिलाफ अभियोग पंजीबद्ध हुआ। उधर, मुसलमानों में रोष फैलाया गया और जिस ढांचे में नमाज नहीं पढ़ी जा रही थी, वहां से हिंदुओं को हटाकर नमाज पढ़ने का फैसला किया गया। इससे कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर हो गई और दोनों वर्गों के लोगों की गिरफ्तारियां हुर्इं। हिंदुओं ने रामलला की प्रतिमा नहीं छोड़ी और वहीं बैठे रहे। परिसर को कुर्क कर लिया गया और वहां एक रिसीवर नियुक्त कर दिया गया। गुंबद के नीचे पूजा चलती रही और द्वार पर ताला लगा दिया गया। अयोध्या के गोपालसिंह विशारद ने फैजाबाद की अदालत में पुलिस अधीक्षक, उत्तर प्रदेश सरकार और कुछ स्थानीय मुसलमानों को प्रतिवादी बनाते हुए मांग की, ‘‘मूर्तियों को हटाने, प्रवेश बंद करने तथा पूजा-पाठ व दर्शन में विघ्न डालने से उन्हें रोका जाए।’’ सिविल जज ने अंतरिम आदेश विशारद के पक्ष में पारित करते हुए टिप्पणी की, ‘‘यह बात प्रत्येक ओर से सिद्ध है कि मुकदमा दायर करने के पहले से ही ढांचे में मूर्ति स्थापित थी और कुछ मुसलमानों ने भी अपनी दलील में कहा था कि ढांचे  को 1936 से मुसलमानों के द्वारा नमाज आदि में प्रयुक्त नहीं किया गया था और हिंदू निरंतर इस विवादास्पद स्थान पर पूजा-अर्चना आदि करते रहे थे।’’ इस निषेधाज्ञा के खिलाफ प्रतिवादी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में गए। वहां भी फैजाबाद सिविल अदालत के फैसले को बहाल रखा गया। शुरुआत में ही इस तरह के स्पष्ट फैसले मिल जाने के बावजूद, यह विवाद दशकों तक कानूनी दावपेंच में उलझा रहा।

सरकार और मीडिया की दोहरी भूमिका
पुख्ता साहित्यिक-पुरातात्विक साक्ष्य मिलने के बाद भी न्यायसम्मत फैसला लागू करवाने की दृढ़ता के बजाए राम जन्मभूमि के राष्ट्रवादी आंदोलन को चोट पहुंचाई गई। मीडिया का एक बड़ा वर्ग हर मामले में तत्कालीन सरकारों का अनुगामी बना रहा। मंदिर निर्माण समर्थक संगठनों ने न्यायालय की अवमानना नहीं करने और विवाद के हल के प्रति सकारात्मक रुख दिखाया, तो यह कहते हुए उन्हें कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई कि वे झुक गए हैं। उनसे पूछा गया, ‘‘आप मंदिर कब बनाएंगे? आपके जनादेश का क्या हुआ?’’ और, जब वे अपने निर्णय पर अड़े रहे तो उन्हें मध्ययुगीन और अड़ियल बताया गया। राम मंदिर निर्माण समर्थक कार्यक्रम सफल हुए तो उन्हें सांप्रदायिकता भड़काने वाला प्रयास बताया गया और यदि कोई कार्यक्रम कमजोर रहा तो यह कहकर कचोटा गया कि उन्होंने अपना असर खो दिया है और जनता उनकी चाल को समझ गई है। दिसंबर, 1992 के प्रथम सप्ताह, जब तक विवादित ढांचा सुरक्षित रहा, तब तक अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद के नेताओं से बार-बार पूछा गया, ‘‘यहां बड़ी संख्या में मौजूद युवक ढांचे को क्षतिग्रस्त करने को ही कारसेवा मानते हैं तथा आपके अनुशासन से बंधे हुए नहीं हैं। उनके बारे में आपका क्या कहना है?’’ और जब ढांचा ध्वस्त हो गया तो इसके लिए परिषद को ही दोषी ठहरा दिया गया। विशेष बात यह कि इस विवाद के हल की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि विवादित ढांचे के मलबे से प्राचीन मंदिर के शताधिक अवशेषों का निकलना था, लेकिन इसे ज्यादातर समाचार पत्रों ने खबर नहीं माना।

 वोट बैंक का लालच देश को जर्जर कर रहा था और इतनी-सी बात का फैसला नहीं किया जा रहा था कि मीर बाकी ने 1528 में ढांचे को बनवाया, तो वहां खाली स्थान था या उस स्थान पर कोई मंदिर या भवन बना हुआ था। देश के प्रमुख पुरातत्वविदों ने इस दिशा में रुचि ली और निष्कर्ष निकाला तो उनसे बात तक नहीं की गई। जिस विवादित ढांचे के ध्वस्त होने को ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताया गया, उसके लिए कांग्रेस की सरकार ने ही 1962 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय को लिखकर दे दिया था कि ‘उसकी इस विवाद में कोई रुचि नहीं है।’ राम शिलापूजन को सांप्रदायिकता भड़काने की कोशिश करार दे दिया गया।

विश्व हिंदू परिषद का सशक्त नेतृत्व
विश्व हिंदू परिषद राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की पर्यायवाची संस्था के रूप में उभरी।  8 अप्रैल, 1984 को दिल्ली में आयोजित प्रथम धर्मसंसद के बाद परिषद की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। 18 जून, 1984 को परमहंस रामचंद्रदास के अयोध्या स्थित दिगम्बर अखाड़े में साधु-संतों की बैठक करके श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति अभियान समिति का गठन किया गया। 21 जुलाई, 1984 को अयोध्या में राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। तय किया गया कि राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति आंदोलन की सूत्रधार होगी और परिषद इसी समिति के माध्यम से आंदोलन का संचालन करेगी। 25 सितम्बर, 1984 को माता सीता के जन्मस्थान सीतामढ़ी (बिहार) से राम-जानकी रथयात्रा की शुरुआत हुई। यह रथ 6 अक्तूबर की रात अयोध्या पहुंचा। अगले दिन सरयू नदी के किनारे संकल्प दिवस मनाया गया और प्रस्ताव पारित करके राम जन्मभूमि पर लगा ताला अविलंब खोलने की मांग की गई। इस रथ को 31 अक्तूबर, 1984 को गाजियाबाद पहुंचना था। उसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या हो गई और राम-जानकी रथयात्रा स्थगित कर दी गई।

विश्व हिंदू परिषद ने महसूस किया कि राम जन्मभूमि की मुक्ति बिना बलिदानों के नहीं होगी। इसलिए 50,00,000 रामभक्तों का ऐसा जत्था तैयार करने का निर्णय हुआ, जो आवश्यकता पड़ने पर जान देने में भी पीछे नहीं रहे। 18 अप्रैल, 1985 को परमहंस रामचंद्रदास ने घोषणा की कि 8 मार्च, 1986 से पहले जन्मभूमि पर लगा ताला नहीं खोला गया तो वे आत्मदाह कर लेंगे। परिषद के कार्यवाहक अध्यक्ष न्यायमूर्ति शिवनाथ काटजू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह से मिलकर कहा कि राम जन्मभूमि पर लगा हुआ ताला अनधिकृत है क्योंकि वह किसी भी न्यायालय के आदेश से नहीं लगा हुआ है। लेकिन सरकार ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई। वर्षभर से रुके हुए रथों की 22 अक्तूबर, 1985 से उत्तर प्रदेश की विभिन्न दिशाओं में एक साथ फिर से यात्राएं शुरू कर दी गर्इं। 9 नवम्बर तक सभी विकास खंडों तक राम-जानकी रथ पहुंचे और लगभग 1500 धर्म सम्मेलन आयोजित किए गए। दूसरी ओर, 31 अक्तूबर को उडुप्पी (कर्नाटक) में धर्मसंसद हुई, जहां 851 प्रमुख संतों के 36 प्रस्तावों में सबसे अधिक जोर राम जन्मभूमि मुक्ति के आंदोलन पर रहा। इसमें ‘जन्मभूमि ताला तोड़ो’ समिति का गठन किया गया। 19 दिसम्बर को बजरंग दल ने उत्तर प्रदेश बंद का आयोजन किया, जिसे पूरी सफलता मिली। 19 जनवरी, 1986 को लखनऊ में साधु-संतों का सम्मेलन हुआ, जहां आगामी शिवरात्रि (6 मार्च) से संघर्ष शुरू करने का निर्णय हुआ। इस बीच 1 फरवरी को फैजाबाद के वकील उमेशचंद्र की याचिका पर जिला अदालत ने ताला खोलने का आदेश दे दिया।

आमने-सामने की लड़ाई

ताला खुलने के बाद राम मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए रामजन्मभूमि न्यास का गठन किया गया। देश भर में राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समितियां बनाई गर्इं और राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति का गठन किया गया। दूसरी ओर, जामा मस्जिद के इमाम और मुस्लिम नेताओं ने ताला खुलने को इस्लाम पर आक्रमण बताया। बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन हुआ और 14 फरवरी, 1986 को मुसलमानों ने काला दिवस मनाया। कश्मीर में अनेक मंदिर तोड़ दिए गए। सैयद शहाबुद्दीन ने 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस के बहिष्कार का आह्वान किया। साथ ही, 1 फरवरी को भारत बंद और 30 मार्च को दिल्ली में विशाल रैली की घोषणा हुई। इनमें इन्हें विफलता हाथ लगी और गणतंत्र दिवस के बहिष्कार की घोषणा वापस लेनी पड़ी। राम जन्मभूमि और बाबरी ढांचे के समर्थक आमने-सामने हो गए। 4 जुलाई, 1988 को हरिद्वार में संत सम्मेलन में राम जन्मभूमि मुक्ति के प्रश्न पर अडिग रहने और बाबरी समर्थक मोर्चों का विरोध करने का निर्णय हुआ। इसके बाद बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति ने मिनी मार्च की घोषणा कर दी और लांग मार्च करके विवादित स्थान पर (जहां पूजा-अर्चना हो रही थी) नमाज अदा करने की घोषणा कर दी। बजरंग दल मुकाबले पर सामने आया। उसने घोषणा की कि उसके कार्यकर्ता जामा मस्जिद सहित देश की विभिन्न मस्जिदों में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। 13 अक्तूूबर को सैयद शहाबुद्दीन ने बिना शर्त लांग मार्च की घोषणा वापस ले ली।

श्रीराम मंदिर न्यास कार्यालय का उद्घाटन

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उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए स्वामी अवधेशानंद गिरी जी। साथ में हैं (बाएं से) श्री आलोक कुमार और डॉ. कृष्णगोपाल

गत 14 जनवरी को नई दिल्ली के कैलाश कॉलोनी में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के कैंप कार्यालय का उद्घाटन जूनापीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरी जी महाराज के करकमलों से हुआ। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल तथा विश्व हिन्दू परिषद के कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार के साथ अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। कार्यालय के उद्घाटन के उपरांत दिल्ली के कुछ गणमान्य उद्योगपतियों के साथ राजधानी के दो सांसदों ने भी श्रीराम जन्मभूमि मंदिर हेतु पूज्य स्वामी जी के कर कमलों में निधि समर्पित की। इस अवसर पर डॉ. कृष्णगोपाल ने कहा कि यह मात्र एक मंदिर नहीं, अपितु हिन्दू समाज के पिछले 1,000 वर्ष के तिरस्कार, उपेक्षा व गुलामी का परिमार्जन कर सम्पूर्ण देश को भारतीय संस्कृति व स्वाभिमान से जोड़ने का अभियान है। 110 करोड़ हिंदुओं को लगाना चाहिए कि यह उनका मंदिर है। इसके लिए उन सभी का इस हेतु समर्पण आवश्यक है। श्री आलोक कुमार ने कहा कि हम देश के 5.25 लाख गांवों व शहरों के 13 करोड़ परिवारों के लगभग 65 करोड़ लोगों को इस अभियान से जोड़ेंगे। एक ओर जहां अभियान के प्रथम दिन, देश के प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति से हम शुभकामनाएं लेंगे वहीं, दूसरी ओर इसी दिन पूज्य अवधेशानन्द गिरी जी महाराज स्वयं बाबा साहेब आंबेडकर की दीक्षा भूमि नागपुर में वंचित समाज के समक्ष जाकर राम मंदिर के लिए भिक्षा मांगेंगे। इसी दिन दीदी मां ऋतंभरा जी भी मुंबई में अनुसूचित जाति के समाज के बंधु-भगिनियों को इस अभियान से स्वयं जोड़कर सामाजिक समरसता का एक और स्तम्भ खड़ा करेंगीं। अपने आशीर्वचन में स्वामी अवधेशानन्द गिरी जी महाराज ने कहा कि हम उस समाज के प्रतिनिधि हैं जिसके पूज्य संतों ने अपनी हड्डियों तक को दान कर दिया। गिलहरी की भांति सम्पूर्ण हिन्दू समाज को इस राष्ट्र-मंदिर से जोड़ना हम सबकी जिम्मेदारी है। हालांकि दिल्ली प्रांत में निधि समर्पण अभियान का प्रारंभ आगामी 1 फरवरी से होगा किन्तु मकर संक्रांति पर श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के दक्षिणी दिल्ली स्थित इस कैंप कार्यालय के उद्घाटन अवसर पर हुए इस विशिष्ट कार्यक्रम में लगभग दो दर्जन महानुभावों ने अपना समर्पण पूज्य स्वामी जी के समक्ष किया। इस अवसर पर अनेक गणमान्य जन उपस्थित थे।     


मंदिर वहीं बनाएंगे

राम मंदिर निर्माण के लिए प्रत्यक्ष कार्यक्रमों की शुरुआत 1989 में हुई। प्रयाग में महाकुंभ के अवसर पर संत महासम्मेलन और तृतीय धर्मसंसद हुई। 30-31 जनवरी को धर्मसंसद में घोषणा की गई, ‘‘श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए भारत के हर गांव से एक-एक श्रीराम शिला (र्इंट) और हर हिंदू से सवा-सवा रुपया लिया जाए।’’ 1 फरवरी को साधु-संतों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के सामने देवरहा बाबा ने विश्व हिंदू परिषद से कहा कि वह संतों के मार्गदर्शन में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का जीर्णोद्धार करे। इसी महासम्मेलन में कार्यक्रम बना कि देश के प्रत्येक गांव के प्रत्येक घर से पूजित शिलाएं प्रखंडों, विकास खंडों, ब्लॉक या पंचायत स्तर पर श्रीराम महायज्ञ का आयोजन करते हुए अयोध्या पहुंचेंगी। नवरात्र से शुरू हुए रामशिला पूजन के कार्यक्रम भारत के अधिकांश गांवों-नगरों के साथ विदेशों में भी हुए। ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आॅस्ट्रेलिया, जर्मनी, रूस, चीन सहित 34 देशों से रामशिलाएं भारत आर्इं। राम जन्मभूमि न्यास ने राम मंदिर निर्माण के लिए धन एकत्रित करने की योजना भी बनाई। उसमें, 8,29,31,000 रुपए एकत्रित हुए। विश्व के अनेक देशों में रहने वाले हिंदुओं ने मंदिर के निर्माण के लिए धनराशि भेजी थी, लेकिन केंद्र सरकार ने विश्व हिंदू परिषद और राम जन्मभूमि न्यास को यह राशि प्राप्त करने की अनुमति नहीं दी। कुल 2,97,633 स्थानों पर रामशिला पूजन हुआ, जिसमें 10 करोड़ 98 लाख लोग शामिल हुए। 4,251 स्थानों पर श्रीराम महायज्ञ हुए, जिनमें 3 करोड़ 24 लाख लोग उपस्थित हुए।

कारसेवकों का बलिदान

30 अक्तूबर, 1990 को अयोध्या को पुलिस छावनी में बदल दिए जाने के बावजूद राम जन्मभूमि परिसर में कारसेवा हुई। इसके बाद तय हुआ कि 2 नवम्बर को कारसेवक फिर कारसेवा के लिए प्रस्थान करेंगे। 1 नवम्बर की शाम अर्धसैनिक बलों की और कंपनियां वहां पहुंचने लगीं। रात तक कोई पचास ट्रक सशस्त्र जवान अयोध्या में प्रविष्ट हो चुके थे। इन्हीं तैयारियों के साथ 2 नवम्बर का सूर्य निकला। कार्तिक पूर्णिमा के इस पवित्र दिन, जब हजारों लोग सरयू स्नान के लिए अयोध्या आते हैं, अयोध्या खून से नहा उठी...रामभक्तों के लहू से, निहत्थे और अहिंसक कारसेवकों के लहू से। ऊंची इमारतों की छत से निशाना साधे खड़े सशस्त्र बलों ने कारसेवकों पर गोलियों की बरसात कर दी। जो गोलियों से बचने के लिए मकानों में छिपे, उन्हें दरवाजे तोड़-तोड़ कर निकाला गया और निशाना लगा-लगाकर गोली मार दी गई। गोलियों की बरसात के बाद भी कारसेवक जन्मभूमि की ओर प्रस्थान कर रहे थे। यहां फिर बर्बरता का नंगा नाच हुआ। कमलनयन शास्त्री के मकान में चार-पांच कारसेवक छिपे थे। इन सभी को दरवाजा तोड़कर निकाला गया और गोली मार दी गई। यहीं पर थे प्रवासी राजस्थानी भाई रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी। वे अपने दो और चचेरे भाइयों के साथ कारसेवा में आए थे। शास्त्री के मकान से पुलिस वालों ने रामकुमार कोठारी को बाहर निकाला और सिर में गोली मार दी। सगा भाई शरद यह दृश्य देख नहीं पाया। भ्रातृत्व और अपनत्व से ओतप्रोत होकर गोलियों की परवाह किए बिना अपने भाई के ऊपर जा गिरा, लेकिन उसे भी गोली मार दी गई।


स्व. देवेन्द्र स्वरूप की पेंशन मंदिर निर्माण को समर्पित
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श्रीमती सुषमा अग्रवाल से चेक प्राप्त करते हुए श्री आलोक कुमार

वरिष्ठ इतिहासकार, लेखक और पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक स्व. देवेन्द्र स्वरूप की पुण्यतिथि 14 जनवरी को पड़ती है। इस दिन उनके परिवार ने उनकी पेंशन के कोष से कुछ राशि अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए विहिप को सौंप दी। इस राशि को लेने के लिए विहिप के कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार भिवाड़ी गए। उन्होंने स्व. देवेन्द्र जी की धर्मपत्नी श्रीमती सुषमा अग्रवाल से 2,51,000 रु. का चेक प्राप्त किया। इस अवसर पर देवेन्द्र जी के पुत्र श्री रंजन अग्रवाल, पुत्री श्रीमती पुनीता, दामाद श्री आशुतोष अग्रवाल और संघ एवं विहिप के वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित थे।    


भक्त नहीं भूले मर्यादा

इस आंदोलन की सबसे बड़ी निर्णायक तिथि 6 दिसंबर, 1992 का पल-पल इतिहास था। 468 वर्ष पुराने बाबरी ढांचे के मलबे से प्राचीन मंदिर के शताधिक अवशेष निकले। मंदिर निर्माण समर्थक संगठनों की वर्षों की साध पूरी हुई। श्री रज्जू भैया ने कहा, ‘‘हमारी योजना शांतिपूर्ण कारसेवा करने की थी, लेकिन दुर्भाग्य से केंद्र सरकार ने जिस तरीके से समस्या को उलझाया और उत्तर प्रदेश सरकार को बर्खास्त करने के तेवर दिखाए एवं उच्च न्यायालय ने निर्णय लेने में जिस तरह से देरी की, उससे कारसेवक क्रुद्ध हो गए। हां, यह ठीक है कि हमारे मतानुसार इस ढांचे को एक दिन वहां से हटना ही था, परंतु हमारी योजना और इस तरह यह सब करने की नहीं थी। यह थोड़ा जल्दी और एकपक्षीय हो गया।’’ उस दिन की कार्रवाई का यह एक महत्वपूर्ण पक्ष था कि 2.5 लाख कारसेवकों की मौजूदगी और बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद बने माहौल के बावजूद, राम जन्मभूमि परिसर के निकट स्थित मुस्लिम मुहल्ले, मस्जिद या अन्य आने-जाने वाले मुसलमानों पर हमले या मारपीट की कोई घटना नहीं हुई।

नए भारत का उदय

सदियों लंबे संघर्ष, सैकड़ों कारसेवकों के बलिदान और करोड़ों हिंदुओं के अडिग समर्थन का यह सुखद परिणाम है कि संवैधानिक रूप से राम जन्मभूमि को मुक्ति मिल चुकी है। 5 अगस्त, 2020 को प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण कार्य का शुभारंभ हुआ, तो पूरा देश राममय हो गया और हर हिंदू ह्रदय में आस्था के दीप जगमगा उठे। रामभक्तों ने उस दिन को एक ऐसे पावन पर्व के रूप में मनाया, जिसे भारत के सांस्कृतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। राममंदिर निर्माण की प्रकिया राष्ट्र को जोड़ने का उपक्रम है। आज हमारा देश हर क्षेत्र में कल्याणकारी परिवर्तन ला रहा है और एक महाशक्ति के रूप में वैश्विक मंच पर पदार्पण कर रहा है।
    (लेखक ‘जयपुर महानगर टाइम्स’ के संपादक हैं)