हल्दीघाटी युद्ध- मुगलों के माथे पर लिखी थी इस हार की कहानी

    दिनांक 19-जनवरी-2021
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के.एस. गुप्ता
नाथद्वारा से करीब 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। गोगुन्दा और खमनोर की पहाड़ी श्रेणियों के मध्य यह इतनी संकरी घाटी थी कि दो आदमी भी इसमें साथ-साथ नहीं चल सकते थे। एक घोड़े को भी इसे पार करने में दिक्कत आती थी। यहां की मिट्टी के रंग के हल्दी जैसा पीला होने के कारण इस स्थान को हल्दीघाटी कहा गया है। यह स्थान 18 जून, 1576 को प्रताप और मुगलों के मध्य निर्णायक युद्ध के कारण प्रसिद्ध हुआ।
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हल्दीघाटी 
राजा उदयसिंह की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रताप 28 फरवरी, 1572 को मेवाड़ के महाराणा बने। उस समय मेवाड़ की राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न थी। उसके समस्त उपजाऊ भाग पर मुगलों का अधिकार था। प्रताप को मेवाड़ राज्य के कुल क्षेत्रफल का 3 प्रतिशत भाग ही विरासत में मिला था। यह सम्पूर्ण क्षेत्र पहाड़ी इलाका था जहां कृषि उत्पादन आसान नहीं था। अकबर ने 1568 के तुरन्त पश्चात् मेवाड़ के अधीनस्थ हिस्से को अजमेर सूबे का भाग बना चित्तौड़ सरकार बना दी और वहां एक नया प्रशासकीय तंत्र स्थापित कर दिया। इस प्रकार राज्य के लिए परिस्थितियां एकदम प्रतिकूल थीं। साथ ही 16वीं शताब्दी में भारत में घटित तीन घटनाओं का भारतीय जनमानस पर व्यापक प्रभाव पड़ा था। प्रथम 1527 में खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की बाबर के हाथों पराजय, तालीकोटा द्वितीय युद्ध में विजयनगर साम्राज्य का पतन तथा 1568 में अकबर का चित्तौड़ पर अधिकार। उपर्युक्त तीनों युद्धों में पराजित पक्ष को अत्यधिक जन-धन की क्षति उठानी पड़ी। इससे भी परे सर्वाधिक प्रभाव भारतीय जनता के मनोबल पर पड़ा। जनता के सभी वगार्ें में, चाहे शासक हो या सामन्त अथवा सामान्यजन, इन निरन्तर और निर्णायक पराजयों से यह बात घर करने लगी कि उनकी नियति पराधीनता ही है। स्वतंत्रता की कल्पना एक स्वप्नमात्र प्रतीत होने लगी। स्वतंत्रता और संस्कृति की रक्षा करने वाला अब कोई नहीं रहा। भारतीय समाज नेतृत्वहीन हो गया व जनता में उत्साह एवं उमंग का पूर्णत: अभाव हो गया। देश में संकटमय स्थिति व्याप्त थी। इससे उद्धार की संभावना दूर-दूर तक दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी। आक्रान्ता विजेताओं ने देश की जनता को आतंकित करने में कोई कमी नहीं रखी। खानवा के युद्ध के पश्चात् युद्ध में मृत भारतीय सैनिकों के सिरों को एकत्रित कर पिरामिड सा बनाया गया और बाबर ने उसके सम्मुख गाजी की उपाधि धारण की। तालीकोटा युद्ध के पश्चात् बहमनी सेना ने विजयनगर को लूटा। उसे तहस-नहस कर दिया और वहां के अनगिनत नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। यह मात्र विजयनगर की पराजय नहीं थी, अपितु इससे दक्षिण में भारतीय प्रभुत्व की संभावना सदैव के लिए समाप्त हो गई। इसी प्रकार चित्तौड़ धावे के पश्चात् अकबर चित्तौड़गढ़ में तीन दिन ठहरा। इन तीन दिनों में उसने दुर्ग में उपस्थित निदार्ेष असैनिक जनता के कत्लेआम का आदेश दिया। माना जाता है कि 30,000 से अधिक स्त्री, पुरुष एवं बालकों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस क्रूरतापूर्ण एवं अमानुषिक कार्य का उद्देश्य शासकों तथा वहां की जनता को आतंकित करना था। अकबर इस अनीति, अन्यायपूर्ण तथा लोमहर्षक कृत्य को भूलना प्रताप के लिए संभव नहीं था। प्रताप को ज्ञात था कि अगर वह ऐसा करता है तो मेवाड़ ही नहीं, अपितु समस्त भारतीय जनता के प्रति अन्याय होगा। इस प्रतिकूल परिस्थिति में समस्त जनमानस की निगाहें प्रताप की ओर टिकी हुई थीं। वही आशा की एक किरण थे। उन्हें मात्र एक किरण ही नहीं अपितु प्रखर सूर्य के ताप से मुगल साम्राज्य को गलाना था। अत: प्रताप के सामने उद्देश्य स्पष्ट था। आवश्यकता थी- नीति निर्धारण व उद्देश्य प्राप्ति के अनुकूल मार्ग निश्चित करना।
उधर अकबर की मान्यता थी कि मेवाड़ मंे अव्यवस्था की स्थिति के बाद भी प्रताप से युद्ध करना आसान नहीं है। अत: उसने मेवाड़ को घेरने की नीति अपनाई। 1572 तक अकबर ने मेवाड़ की उत्तर-पूर्वी और पश्चिमी सीमा की घेराबन्दी कर दी। अकबर का गुजरात पर अधिकार होने से मेवाड़ की दक्षिण-पश्चिमी सीमा पर भी मुगल प्रभाव बढ़ गया। अकबर ने प्रताप के भाई जगमाल को जहाजपुर में स्थापित कर दिया तो पूर्वी भाग में स्थित मेवाड़ के हुरड़ा, शाहपुरा, बदनौर आदि को अजमेर की दरगाह को आर्थिक सहायता के रूप में प्रदान किया। वह इन सारी घटनाओं का प्रताप पर एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ने का अनुमान लगाने लगा। उसने सोचा कि इन समस्त घटनाओं से प्रताप का मनोबल गिरेगा और वह अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश होगा। उसे प्रताप से बिना युद्ध के अधीनता में लाने की संभावना प्रतीत हुई और उसने अपनी ओर से पहल कर समझौते के लिए एक-एक करके एक वर्ष की अवधि में चार शिष्टमंडल इस उद्देश्य से भेजे।
ऐसा प्रतीत होता है कि अकबर ने प्रताप के चरित्र को समझने में भूल की। वह एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालना चाह रहा था, किन्तु प्रताप कुछ अलग ही मिट्टी के बने थे, जिसका अनुमान वह नहीं लगा सका। समस्याओं से कतराना प्रताप के स्वभाव में नहीं था, वह तो उनका सामना करने के लिए तत्पर रहते थे। समस्याएं उन्हें चिंतित नहीं करती थीं अपितु दृढ़ता प्रदान करती थीं। शिष्टमंडलों की असफलता के उपरान्त भी प्रताप के विरुद्ध अकबर द्वारा तत्काल सैनिक अभियान न चलाना अकबर की चारित्रिक विशेषताओं के अनुरूप प्रतीत नहीं होता, क्योंकि उसमें इच्छापूर्ति के लिए धैर्य रखने की प्रवृत्ति न थी। शायद इसका एक मात्र कारण यही था कि अकबर जानता था कि प्रताप के विरुद्ध सैनिक अभियान एक साधारण कदम नहीं होगा। असाधारण कार्य के लिए उसी के अनुरूप तैयारियों की आवश्यकता थी।
मेवाड़ की ओर मुगल सेना
वास्तव में प्रताप की दृढ़ता, साहस, शौर्य और उद्देश्य के प्रति निष्ठा को अकबर समझने में एकदम असफल रहा। प्रताप का मुख्य उद्देश्य किसी भी मूल्य पर स्वतंत्रता और संस्कृति की रक्षा करना था तथा साथ ही विश्व के सर्वशक्तिमान शासक से अपनी सार्वभौमिक स्थिति को बनाए रखना था। वह इसे अपना एक ऐतिहासिक दायित्व मानते थे। गत अनेक शताब्दियों से विदेशी आक्रान्ताओं से देश को बचाने में मेवाड़ का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। वह इसको कभी भुला नहीं सकते थे और अकबर की अधीनता स्वीकार कर अपने पूर्वजों की गरिमा को कलंकित नहीं कर सकते थे। इसलिए राणा ने राज्य की रक्षा के लिए तैयारियां प्रारम्भ कर दीं और जनता को पहाड़ी क्षेत्रों में जाने की आज्ञा दे दी। साथ ही मैदानी क्षेत्र नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया ताकि मुगल सैनिकों को किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री तथा उनके जानवरों को घास प्राप्त न हो सके।
उन्होंने सभी प्रमुख सामरिक स्थानों की किलाबंदी की। उधर अकबर जब प्रताप के विरुद्ध की कार्रवाई से सन्तुष्ट हो गया और भारत के अन्य क्षेत्रों से बेफिक्र हो गया तब उसका ध्यान मेवाड़ की ओर गया। वह इसी उद्देश्य से 18 मार्च, 1576 को फतेहपुर सीकरी से अजमेर के लिए रवाना हुआ और अजमेर पहुंच विभिन्न स्तरों पर विचार विमर्श करते हुए मुगल अभियान के नेतृत्व का उत्तरदायित्व मानसिंह को सौंपने की घोषणा की। एक गैर मुस्लिम को मुस्लिम सेना का नेतृत्व सौंपना आश्चर्यजनक था। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस घोषणा को लेकर मुगल दरबारियों में विरोध था। अबुल फजल के अनुसार तो मानसिंह की योग्यता तथा अकबर से व्यक्तिगत सम्बन्धों के कारण यह उत्तरदायित्व उसे दिया गया था। लेकिन अनेक अन्य फारसी इतिहासकार इसे स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार, मानसिंह को मेवाड़ के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व देने के पीछे दो प्रमुख कारण थे। एक तो प्रताप को अपना सुरक्षित स्थान छोड़ युद्ध के लिए मैदानी क्षेत्र में लाना क्योंकि मुगल सेनाओं को मैदानी युद्ध क्षेत्र में अपनी सफलता की संभावना दिखती थी। किन्तु प्रताप ने युद्ध के लिए उपयुक्त स्थान को छोड़ना उचित न मान मुगल सेना को मेवाड़ के आन्तरिक भाग में आने को बाध्य किया। इस प्रकार मानसिंह को भेजने की निरर्थकता सिद्ध हो गई।
मानसिंह को नेतृत्व सौंपने का दूसरा कारण यह बताया जाता है- मेवाड़ के विरुद्ध लड़ने की राजपूतों की इच्छा को समाप्त करना। किन्तु इसमें भी सफलता नहीं मिली। कच्छवाहों के अतिरिक्त अन्य राजपूत वंश प्रताप के विरुद्ध लड़ने को लेकर उदासीन ही रहे। मानसिंह दो मास तक माण्डलगढ़ में ठहरा रहा। यहां विभिन्न स्थानों से मुगल सेनाएं आकर मिलीं और फिर बनास नदी के किनारे-किनारे मोलेला गांव में आकर मानसिंह ने अपना शिविर स्थापित किया। यहां से उसका उद्देश्य कुछ दिनों विश्राम कर स्थिति का जायजा लेते हुए गोगुन्दा पहुंचने का था।
उधर प्रताप अपने गुप्तचरों के माध्यम से मुगल गतिविधियों से बराबर परिचित हो रहे थे। प्रताप ने कुम्भलगढ़ से गोगुन्दा होते हुए लोसिंग पहुंंचकर अपना पड़ाव डाला। इसके पूर्व गोगुन्दा में रणनीति तय करने के लिए युद्ध परिषद् आमंत्रित की गई। मुगल सेना के विरुद्ध किस सामरिक नीति का अनुसरण किया जाए? यहां भी दो स्पष्ट मत थे। नवयुवक वर्ग चाहता था कि मानसिंह से आमने-सामने का युद्ध किया जाए तो दूसरा पक्ष मारो और भागो की नीति जिसे आधुनिक युद्ध रणनीतिकार 'गुरिल्ला' नीति कहते हैं? का पक्षधर था। मुगलों की सैनिक संख्या और उनकी क्षमताओं को देखते हुए अनुभवी व्यक्तियों ने दूसरे पक्ष का समर्थन किया।
इस प्रकार दो स्पष्ट विचारधाराओं के बीच जिस प्रकार प्रताप ने युद्ध नीति का समन्वय किया, वह अत्यधिक आश्चर्यजनक है। प्रताप लोसिंग से रवाना हो हल्दीघाटी के क्षेत्र में पहुंचे और 18 जून, 1576 को प्रात: ही मुगल सेना पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध को हल्दीघाटी युद्ध की संज्ञा दी जाती है।
मुगल सेना में भगदड़
बदायूंनी के अनुसार पहाड़ के पश्चिम की ओर से निकल कर मुगलों की अग्रिम पंक्ति पर मेवाड़ सेना ने आक्रमण किया। यह आक्रमण इतना जोरदार था कि अग्रिम पंक्ति पूर्णरूप से पराजित हुई। हरावल में नियुक्त सैयद हाशिम के नेतृत्व वाली सेना पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई। लूणकरण के नेतृत्व वाली सेना, जो वामपार्श्व में थी, भेड़ों के झुण्ड के समान भाग खड़ी हुई। वह अपनी जीवन रक्षा के लिए दक्षिणी पार्श्व की तरफ दौड़ी। सेना में अफरा-तफरी मच गई। मुगल व प्रताप के राजपूत सैनिकों के पहनावे के एक जैसा होने से उनमें भेद करना संभव नहीं हो रहा था। बदायूंनी ने अपनी समस्या मीर बख्शी आसफ खां के समक्ष रखी कि मित्र व शत्रु को कैसे पहचाना जाए। इस पर आसफ खां ने उत्तर दिया कि ''तीर चलाते जाओ, राजपूत किसी भी पक्ष का हो, उसके मारे जाने से इस्लाम को तो लाभ होगा ही।'' उधर मेवाड़ सेना के दूसरे भाग, जो स्वयं राणा के नेतृत्व में था, ने घाटी से निकलकर गाजी खां की सेना पर आक्रमण किया और सेना को तहस-नहस करते हुए मध्य भाग तक पहुंच गए। इस आक्रमण की तीव्रता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि सीकरी के शेखजादे भाग निकले। गाजी मुल्ला ने थोड़ा प्रतिरोध जताया, परन्तु चोट लगने पर वह अपने साथियों के साथ यह कहते हुए भाग गया कि यह परम्परा तो पैगम्बर के समय से ही है। मेवाड़ी सेना के आक्रमण का वेग इतना तीव्र था कि मुगल सैनिक बनास के दूसरे किनारे से 10-15 कि़मी़ तक भागकर अपनी जान बचा पाए। इस प्रकार मुख्य युद्ध खमनोर के पास में हुआ। युद्ध में इतना रक्तपात हुआ कि सारा क्षेत्र रक्तमय हो गया। तभी इस स्थल को रक्त तलाई के नाम से जाना जाता है।
युद्ध की तीव्रता का वर्णन करते हुए अबुल फजल ने लिखा है कि वहां जान सस्ती और इज्जत महंगी हो गयी थी। बदायूंनी ने माना कि रामशाह तंवर ने ऐसी वीरता का प्रदर्शन किया कि जिसका वर्णन करना उसकी लेखन क्षमता से बाहर है। मानसिंह के हरावल के राजपूत, जो बाएं भाग में थे, तथा आसफ खां भी जान बचाने की खातिर भाग निकला। बदायंूनी ने स्वीकार किया कि अगर सैयद थोड़े टिके नहीं होते तो मुगलों को पराजय का सामना करना पड़ता। युद्ध में प्रताप और मानसिंह का भी आमना-सामना हुआ और मानसिंह प्रताप के भाले के वार से हाथी के हौदे में छिप जाने की वजह से बच सका। हालांकि उसके हाथी का महावत मारा गया। भागते हाथी को वश में करने के लिए मानसिंह महावत की जगह बैठ गया। हाथी के युद्ध क्षेत्र से भाग जाने से ही मानसिंह सुरक्षित बच पाया।
इस संघर्ष में प्रताप के घोड़े चेतक को भी पैर में चोट आई। प्रताप को मुगल सेना ने घेर लिया। लेकिन प्रताप ने संतुलन बनाए रखा तथा अपनी शक्ति का अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। मुगल सेना के बलिष्ठ पठान बहलोल खां ने अपनी पूरी ताकत से प्रताप पर वार किया। प्रताप ने सतर्कता से उस वार को बेकार ही नहीं किया अपितु पलटकर ऐसा वार किया कि बहलोल खां को जिरहबख्तर व घोड़े सहित दो फांक में चीर डाला। प्रताप के हाथियों ने भी मेवाड़ी सेना के अनुरूप कमाल का प्रदर्शन किया जैसा कि अबुल फजल ने माना है कि सैनिक जिस वीरता से लड़े, उसी वीरता का प्रदर्शन हाथियों ने भी किया।
अब मुगल पुन: व्यवस्थित होकर युद्ध करने की तैयारी कर रहे थे, तब प्रताप ने युद्ध को मैदान की बजाय पहाड़ की ओर मोड़ने का प्रयास किया। उनकी सेना के दोनों भाग एकत्रित हो पहाड़ों की ओर मुड़े और अपने गन्तव्य स्थान पर पहुंचे। उस वक्त तक मुगल सेनाओं को रोके रखने के लिए झाला मान के नेतृत्व में कुछ सैनिकों ने मोर्चा संभाला। झाला मान ने अपना जीवन का उत्सर्ग करके भी अपका उत्तरदायित्व का निर्वाह किया। उधर मुगल सेना ने डर के कारण प्रताप की सेना का पीछा नहीं किया। बदायूंनी ने इसके तीन प्रमुख कारण बताए हैं। एक तो प्रचण्ड गर्मी। उसने लिखा कि उस समय ऐसी गर्मर्ी थी कि दिमाग पिघल जाए।
दूसरा कारण मुगल सेनाएं इतनी थक चुकी थी कि उनमें अब लड़ने का साहस व सामर्थ्य नहीं बचा था। तीसरा मुख्य कारण थीं कि उन्हें इस बात का डर था कि प्रताप की सेना घात लगाए बैठी होगी और पीछा करते हुए अचानक आक्रमण हुआ तो कोई जीवित नहीं बच सकेगा। अत: प्रताप का पीछा करने की बजाय अपने शिविर में लौट जाना ही उन्हें श्रेयस्कर लगा। इस प्रकार हल्दीघाटी का युद्ध दोपहर तक ही समाप्त हो गया। इस बीच राणा पूंजा के नेतृत्व में भीलों ने मुगलों के शिविर पर आक्रमण कर दिया था। सारी खाद्य सामग्री लूट ली। मुगल शिविर की स्थिति इतनी खराब हो गई कि सैनिकों को खाने के लाले पड़ने लगे। घायल सैनिकों की सेवा सुश्रुषा तथा युद्ध की समीक्षा करने के बजाय उनके लिए जीवित सैनिकों के खाने की चिंता करना आवश्यक हो गया। प्रताप की सेना के भय के कारण शिविर में रात बिताना भी उनके लिए भारी हो गया और इसलिए वे दूसरे दिन प्रात:काल गोगुन्दा के लिए रवाना हो गये। वहां भी सैनिकों को प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। मेवाड़ की सेना के अचानक आक्रमण को रोकने के लिए जगह-जगह आड़ खड़ी की गईं। शिविर के पास दीवारें इतनी ऊंची बनाई गई ताकि घुड़सवार उनको फांद न सके। उनको एक तरह से कैदी जैसा जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। प्रताप ने उनके रसद मार्ग को भी काट दिया। सैनिक खाद्य सामग्री के अभाव में अपने जानवरों को मारकर उदरपूर्ति कर रहे थे। इसका असर सैनिकों के स्वास्थ्य पर पड़ने लगा। गोगुन्दा को खाली करने के अतिरिक्त मुगलों के पास अन्य कोई विकल्प नहीं रहा। जैसे ही मुगलों की सेना गोगुन्दा से हटी, महाराणा ने पुन: गोगुन्दा को अधीन कर लिया। इस प्रकार युद्ध का पटाक्षेप हुआ।
इतिहासकारों में हल्टीघाटी युद्ध के परिणाम को लेकर मतभेद दृष्टिगोचर होता है। समकालीन राजस्थानी इतिहासकारों का विश्लेषण समकालीन फारसी इतिहासकारों का आलोचनात्मक अध्ययन एवं समकालीन परिस्थितियों का विवेचन स्पष्ट रूप से मुगलों की करारी हार और प्रताप की सफलता की ओर इंगित करते हैं। इसके अलावा खेड़ा शिलालेख (1585) (वि़ सं़ 1642 ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी) से स्पष्ट है कि प्रताप ने मानसिंह पर विजय पाने के उपलक्ष्य में रणछोड़ के मन्दिर के पुजारी को चार हल भूमि भी प्रदान की थी। इसी प्रकार जगदीश मन्दिर प्रशस्ति के श्लोक सं़ 40 में मुगलों की हार का उल्लेख है। प्रतापकालीन सनद पट्टे व ताम्रपत्र भी प्राप्त हुए हैं, जिसमें से अधिकांश हल्दीघाटी युद्ध के कुछ मास के पश्चात् ही प्रदान किये गये थे। इनसे महाराणा का प्रभाव क्षेत्र सिद्ध होता है। मृगेश्वर ताम्रपत्र में प्रताप का क्षेत्र व प्रसार तो वर्तमान पाली जिले में होना निश्चित होता है। यह ताम्र पत्र कान्हा सांदू को दिया गया था जिसमें हल्दीघाटी युद्ध में वीरता का प्रदर्शन किया गया था। इसी प्रकार संथाणा, मोही, पीपली ओडा, लाखोला के ताम्र पत्रों से स्पष्ट होता है कि युद्ध के पश्चात् ऐसे क्षेत्रों को प्रताप ने अपने राज्य में मिला लिया था जिन पर युद्ध के पूर्व मुगलों का कब्जा था। इसी प्रकार राजरत्नाकर, राणा रासो राजप्रशस्ति महाकाव्य आदि मेवाड़ से सम्बन्धित विभिन्न रचनाओं में प्रताप की ही विजय दर्ज है।
इसमें रत्तीभर सन्देह नहीं कि इस प्रकार के साधनों में अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन की संभावना रहती है, परन्तु यह हार को विजय में परिणत कर देने जैसी नहीं होती। खानवा की हार को किसी ने न तो सांगा की जीत कहा और न ही अनिर्णायक युद्ध माना। इसी प्रकार 1568 में अकबर के चित्तौड़ अधिकार को किसी भी राजस्थानी इतिहासकार ने झुठलाया नहीं है। अत: यह दोष उपर्युक्त ग्रन्थों व प्रशस्तियों के निर्माता अथवा उत्कीर्णकर्ताओं पर भी नहीं लगाया जा सकता। हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप ने भारतीय नीति शास्त्रों में वर्णित युद्ध के अनुरूप अपनी रणनीति तैयार की थी। नीति कुछ इस प्रकार थी। अचानक तेज गति से आक्रमण तथा शत्रु को धोखे में रखना। गति को युद्ध का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व माना गया है।
मान्यताओं के अनुसार शत्रु पर तीव्र गति के साथ अचानक आक्रमण होना चाहिए। जब तक वह संभले और प्रतिकार प्रारंभ करे, तब तक शत्रु पक्ष को अत्यधिक हानि का सामना करना पड़े। नीतिकारों का यह भी मानना है कि आक्रमण के समय व स्थान के बारे में शत्रु को बेखबर रखा जाए तथा आक्रमण ऐसे स्थान पर किया जाए जहां शत्रु को इसकी बहुत कम आशा प्रतीत होती है। हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप की रणनीति कुछ ऐसी ही रही।
प्रताप के गोगुन्दा से लोसिंग पहुंचने की खबर से मानसिंह अनभिज्ञ था। वह तो प्रताप की गतिविधियों से भी बेखबर था। मेवाड़ी सेना का पहला आक्रमण मुगलों के लिए अप्रत्याशित था। वह इतना तेज था कि मुगलों का हरावल एकदम छिन्न-भिन्न हो गया। जैसे ही प्रथम आक्रमण के बाद मुगल सेना व्यवस्थित हुई तो प्रताप ने युद्ध को खुले मैदान से हटाकर पहाड़ी क्षेत्र में मोड़ना चाहा। अगर मानसिंह प्रताप के नये चुने स्थान पर लड़ने का प्रयास करता तो संपूर्ण मुगल सेना की जान को खतरे में डाल देता। परिस्थितियों को देखें तो प्रताप की विजय हुई। अगर ऐसा नहीं होता तो भावी मुगल संघर्ष में उनके अनुयायी ही उनका नेतृत्व स्वीकार नहीं करते। इस युद्ध के करीब 50 वर्ष पूर्व खानवा युद्ध की हार के पश्चात् सांगा बाबर से लड़ने के लिए चन्देरी की ओर रवाना हुए। परन्तु उनके सामन्तों ने उनके नेतृत्व में लड़ने के बजाय सांगा को ही विष देकर मार डाला। युद्ध में हार से नेतृत्व का मनोबल भी कम हो जाता है तथा उसके अधीन लड़ने में सैनिक भी हतोत्साहित हो जाते हैं। हल्दीघाटी युद्ध के लगभग 40 वर्ष बाद प्रताप के उत्तराधिकारी अमरसिंह ने लम्बे संघर्ष के बाद 1615 में मुगलों से संधि कर ली। यह संधि मेवाड़ के लिए अपेक्षाकृत सम्मानजनक थी फिर भी समझौता कर लेने से उसकी स्थिति मेवाड़ में सम्मानजनक नहीं रही। प्रताप का तो शासक बनने के बाद पहला ही युद्ध था इसमें हार जाने पर किसी भी स्थिति में उनका नेतृत्व स्वीकार नहीं होता।
फारसी इतिहासकारों के लेखन और कथनों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करें तो भी स्पष्ट हो जाएगा कि इस युद्ध में प्रताप का पलड़ा भारी रहा। अबुल फजल ने माना है कि ऊपरी रूप से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी हार हुई है, लेकिन वास्तविक रूप से हम जीते।
अत: फजल का कथन मुगलों की करारी हार को छिपाना मात्र था। बदायूंनी, जो स्वयं युद्ध में मौजूद था, ने मेवाड़ी सेना के प्रथम आक्रमण की तीव्रता का तो विवरण दिया है। बदायूंनी स्वीकार करता है कि जब वह मुगल दरबार में जा रहा था तो रास्ते में जहां कहीं भी मुगलों की जीत के बारे में कहता, लोग उसका मजाक उड़ाते।
स्वयं अकबर को भी मानसिंह द्वारा भेजी गई सूचनाओं पर विश्वास नहीं हुआ। उसने महमूद खां को वास्तविक स्थिति का पता लगाने को भेजा। युद्ध के पश्चात् मानसिंह व आसफ खां को किसी भी प्रकार का पारितोषिक मिलने की बजाय उनकी दरबार में उपस्थिति पर पाबन्दी लगा दी गई, क्योंकि मान सिंह युद्ध भूमि से जान बचाकर भाग निकला था। बाद में मानसिंह मुगल सेना के साथ मेवाड़ गया किन्तु उसे सेनानायक बनाकर नहीं भेजा गया। 1568 में चित्तौड़ विजय पर अकबर ने फतहनामा जारी किया था किंतु हल्दी घाटी युद्ध के पश्चात् ऐसा कुछ नहीं किया गया। इन सबसे स्पष्ट है कि प्रताप को शानदार सफलता मिली। उनकी यशोगाथा दूर-दूर तक फैली और मित्रों की संख्या में भी वृद्धि होने लगी। भले ही हल्दी घाटी का युद्ध कुछ घंटे का था, इसमें मरने वालों की संख्या 500 के करीब थी। लेकिन युद्ध का महत्व दूसरी अवधि अथवा उसमें मारे गए हुए मृतकों की संख्या से नहीं अपितु परिणाम व प्रभाव से निर्मित होता है। इस युद्ध का महत्व इसी में है कि मुगल साम्राज्य की स्थापना के पश्चात पहली बार मुगल सेना को राजस्थान में हार का सामना करना पड़ा तथा उसके अजेय होने का भ्रम टूट गया।
(लेखक मोहनलाल सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर में प्रोफेसर व इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे हैं)