साहित्य ने किया है इस शौर्य को नमन

    दिनांक 19-जनवरी-2021
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डा. मनोहरसिंह राणावत
सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रघुवीर सिंह के अनुसार, महाराणा प्रताप की वीरगाथा ने अंग्रेजी साम्राज्य से जूझने वाले भारत के क्रांतिकारियों को भी प्रेरणा और स्फूर्ति प्रदान की थी। महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी लिखा है, ''जब तक संसार में वीरों की पूजा होती रहेगी तब तक महाराणा प्रताप का उज्ज्वल और अमर नाम लोगों को स्वतंत्रता और देशाभिमान का पाठ पढ़ाता रहेगा।'' अमर शहीद गणेशशंकर विद्यार्थी ने 'प्रताप' समाचार पत्र के संपादकीय में लिखा, ''जब तक यह देश है और जब तक संसार में दृढ़ता, उदारता, स्वतंत्रता और तपस्या का आदर है, तब तक हम क्षुद्र प्राणी ही नहीं, सारा संसार आपको (प्रताप को) आदर की दृष्टि से देखेगा।''
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संपूर्ण भारत में अंग्रेजी भाषा और शिक्षा प्रणाली के अधिकाधिक प्रसार से स्वाधीनता प्राप्ति की लालसा को अप्रत्यक्ष रूप से बल मिला। इस कार्य में कर्नल जेम्स टॉड का विशेष और महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जब भारत के अन्य प्रांतोंं के अंग्रेजी भाषाविदों ने टॉड की 'एनाल्स ऐंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' को पढ़ा, तब मुगलों के साथ महाराणा प्रताप के आजीवन सफल संघर्ष की वीरगाथा संपूर्ण देश में फैल गई और उससे प्रभावित होकर भारत की अनेक भाषाओं के प्रमुख साहित्यकार प्रताप की ओर आकर्षित हुए। उनके जीवन प्रसंगों को लेकर उन्होंने अपनी-अपनी भाषाओं में अनेक प्रेरक नाटक, उपन्यास, कहानियां और काव्य रचे।
कर्नाटक
राणा प्रताप के संबंध में कन्नड़ भाषा में अनेक ग्रंथों की रचना हुई है। वासुदेवय्या ने अपनी पुस्तक 'आर्य कीर्ति' में प्रताप के जीवन का हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत किया है। लि़ वे. गलगनाथ का उपन्यास 'राणा प्रताप सिंह' सारे कर्नाटक में लोकप्रिय हुआ। सा़शि़ मरुलरुया के नाटक 'राणा' को भी रंगमंच पर बहुत ख्याति मिली। चित्तौड़ के शासकों और प्रताप के बलिदान से प्रभावित होकर ही 1824 में कर्नाटक में सर्वप्रथम कित्तूर की रानी चेनम्मा आजादी के लिये अंग्रेजों से लड़ने को तैयार हुई थीं। तदनंतर कर्नाटक में स्वाधीनता के लिये जो संघर्ष चला, उसमें स्थानीय नेताओं ने प्रताप और शिवाजी को अपना आदर्श माना व उनके त्याग और बलिदान की गाथा को गाकर जन जागृति पैदा की। श्री नागेश हत्वार के अनुसार राणा प्रताप के त्याग, बलिदान, राष्ट्रप्रेम आदि गुणों का प्रभाव कर्नाटक की जनता पर उतना ही गहरा पड़ा, जितना कि अन्य प्रदेशों पर।
महाराष्ट्र
राजपूतों का भारतीय इतिहास में विशेष स्थान होने के कारण अनेक मराठी विचारकों ने जीवनी और इतिहास विधाओं में राजपूत इतिहास का अध्ययन किया। जीवनी में महाराणा प्रताप को स्थान मिला और महाराष्ट्र में उनके जीवन के आधार पर मराठी में अनेक नाटक, उपन्यास और काव्य ग्रंथ रचे गए। अ.वा़ वरवे ने 'महाराणा प्रताप सिंह' प्रबंध काव्य में प्रताप की पत्नी को भी उनके समान महत्वपूर्ण स्थान दे उनकी वीरता का वर्णन किया है। ह़. कुलकर्णी के 'प्रतापी प्रताप सिंह' और ग़. बोडस के 'राणा प्रताप' नाटकों की रचना तथा दुर्गादास तिवारी का 'महाराणा प्रताप सिंह', ना़. गद्रे लिखित 'महाराणा प्रताप सिंह' प्रबंध काव्य प्रमुख हैं। लोक हितवादी द्वारा 1892 में प्रकाशित 'उदेपुरचा इतिहास' ग्रंथ इतना लोकप्रिय हुआ कि दो वर्ष में इसके दो संस्करण प्रकाशित हुए। महाराणा प्रताप पर 1930 तक लिखे गए वीर रस के नाटकों, उपन्यासों, प्रबंध काव्यों और ऐतिहासिक ग्रंथों ने महाराष्ट्र के जनजीवन में नव चेतना का संचार किया और स्वतंत्रता सेनानियों को भी प्रेरणा दी। स्वातंत्र्य वीर सावरकर और उनके सहयोगी कवि गोविन्द ने स्वयं स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। गोविन्द ने अपने भारत प्रशस्ति काव्य में राणा प्रताप को भारत के श्रेष्ठ पुरुषों में माना है। 19वीं सदी के अंतिम दशक में महाराष्ट्र में विशद् आयोजन के रूप में गणेशोत्सव मनाया जाने लगा था। तब उन समारोहों के अवसर पर शिवाजी के साथ ही महाराणा प्रताप का चित्र भी प्रदर्शित किया जाने लगा था।
गुजरात
गुजराती साहित्यकारों ने भी प्रताप की देशभक्ति, स्वाभिमान, मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिये संघर्ष पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। कवि नर्बद ने मेवाड़ के इतिहास और महाराणा प्रताप के बारे में जानकारी दी थी। तदनंतर गुजराती साहित्यकार मणिभाई भूलाभाई पटेल, गणपतराम राजाराम भट्ट और जयन्तिलाल महेता ने क्रमश: 'अश्रुमति', 'प्रतापसिंह', 'प्रताप' और 'मेवाड़ का सिंह' आदि नाटकों की रचना की। जूनी धंधादारी रंगभूमि संस्था ने प्रताप पर लिखे नाटकों को गुजरात के अनेक नगरों में मंचित किया। बसंत ने 'शौर्य तर्पण' (1908) ना़ वि़ ठक्कर ने 1906 में 'हल्दीघाटी नू युद्ध' और छगनलाल ने 1946 में 'प्रतापी प्रताप' उपन्यास की रचना की। आंध्रप्रदेश में तेलुगु साहित्यकारों ने भी प्रताप को तेलुगु भाषा में पर्याप्त स्थान दिया है। लक्ष्मी नरसिम्हा के 'राजस्थान कथावली' ग्रंथ में हिन्दुस्थान के प्रमुख वीरों में प्रताप के बारे में विस्तृत विवरण है। शिवशंकर शास्त्री ने बांग्ला उपन्यास 'राजपूत जीवन संध्या' का तेलुगु में अनुवाद किया था। बेदुला सत्यनारायण शास्त्री, श्रीपद कामेश्वर राव और जी़ वी़ सुब्बा राव ने राणा प्रताप पर नाटक लिखे। प्रो. के़ वी़ आऱ नरसिम्हा के अनुसार महाराणा प्रताप हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अग्रज हैं। उनके जीवन पर लिखे गये नाटक, उपन्यासों आदि से स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरणा मिली है।
बंगाल
टॉड की 'एनाल्स ऐंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' का सर्वप्रथम बंगाल के शिक्षाविदों और साहित्यकारों ने अध्ययन किया। टॉड द्वारा प्रताप पर लिखे रोचक विवरण ने बंगाल के लेखकों को सर्वाधिक प्रभावित किया। बंगाल में सर्वप्रथम के़ दास गुप्ता ने टॉड के आधार पर 'राजपूत काहेना' ग्रंथ की बांग्ला भाषा में रचना की। इसमें राजपूताना के प्रमुख शासकों का विवरण है। तदनन्तर रमेशचन्द्र दत्त ने 1879 में 'राजपूत जीवन संध्या' उपन्यास की रचना की। यह उपन्यास प्रताप को ही प्रमुख पात्र बना कर लिखा गया है। हरनचन्द्र रक्षित और दामोदर मुखर्जी ने भी प्रताप को आधार बनाकर उपन्यास लिखे। ये सभी उपन्यास बंगाल में बहुत लोकप्रिय हुए।
1879 में ज्योतीन्द्रनाथ टैगोर ने 'अश्रुमति' नाटक की रचना की। 1905 में द्विजेन्द्रलाल राय ने 'राणा प्रताप' नाटक लिखा। इसमें महाराणा प्रताप का चित्तौड़ छोड़ना, कंुभलमेरू के पहाड़ों में निवास, अकबर द्वारा प्रताप को अधीनता स्वीकार करने हेतु दबाव और अन्त में हल्दीघाटी युद्ध, मानसिंह से मनमुटाव, प्रताप के भाई की भूमिका आदि का विवरण है। एस़ मुखोपाध्याय के अनुसार ''यह बांग्ला साहित्य की उन कुछ रचनाओं में से एक है जिन्होंने बंगाल के लोगों में असली देशभक्ति जगाई।'' इस प्रकार महाराणा प्रताप की वीर गाथा भारत के गुजरात, कर्नाटक, आन्ध्र, महाराष्ट्र और बंगाल जैसे दूरस्थ प्रदेशों के जनसाधारण में फैल गई और स्वाधीनता एवं स्वतंत्रता की साधना के लिये प्रेरित कर तदर्थ बलिदान करने के लिये प्रेरित किया।
यह मान्यता निराधार है कि राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को महाराणा प्रताप से कोई प्रेरणा नहीं मिली क्योंकि केसरीसिंह स्वयं क्रान्तिकारी स्वतंत्रता सेनानी था और महाराणा प्रताप से पूर्णतया प्रभावित था। तभी तो उसने मेवाड़ के तत्कालीन स्वाभिमानी महाराणा फतहसिंह को 1903 के दिल्ली दरबार में सम्मिलित होने से विमुख करने हेतु चेतावनी लिख भेजी थी-
पग-पग भय्या पहाड़,
धरा छोड़ राख्यो धरम।
इन्सू महाराणा मेवाड़,
हिरदे वसिया हिन्द रे॥
धण धलिया धमसांणा
(तोई) राणा सदा रहिया निडर।
(अब) पेखतां फुरमांण,
हलचल किम फतमल हुवै॥
यानी पांव पैदल पहाड़ों में विचरते रहे। धरती छोड़कर भी उन्होंने अपना धर्म रखा। इसी कारण महाराणा और मेवाड़ भारत देश के हृदय में बस गये। अत्यधिक घमासान युद्ध के समय भी राणा सदैव निडर रहे।
अंग्रेजी साम्राज्य से स्वतंत्रता के लिये संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों ने भी महाराणा प्रताप के जीवन तथा आदर्श से प्रेरणा ली। अत: अंग्रेजी शासन के पुलिस दल के साथ उड़ीसा में बूढ़ी बलम नदी के तट पर हुए यतीन मुकर्जी (बाघा जतीन) और उनके साथियों के संघर्ष वाले स्थल को बांग्ला के क्रांतिकारी कवि काजी नजरुल इस्लाम ने नव भारत का हल्दीघाटी कहा है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के शब्दों में—
उदयेर पथे कार वाणी।
भय नाइ ओ रे भय नाइ॥
नि:शेषे प्राणि ये करिबे दान।
क्षय नाइ तार क्षय नाइ॥
यानी सूयादय के पूर्व पथ से यह वाणी सुनाई पड़ी- ओ ! कोई भय नहीं कोई भय नहीं है। सर्वस्व त्यागकर जो अपने प्राणों की भी आहुति दे देता है, उसका कोई क्षय नहीं होता अर्थात् वह अमरत्व को प्राप्त हो जाता है।
(लेखक श्री नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ (उ.प्र.) के निदेशक हैं)