लेखनी से उकेरा महाराणा का 'प्रताप'

    दिनांक 19-जनवरी-2021
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डॉ. जे.के. ओझा
महाप्रतापी प्रताप विश्व पटल भारतीय जनमानस के देदीप्यमान नक्षत्र हैं। उनकी महानता, उच्चता, आदर्श का स्तवन साहित्यकारों, इतिहासकारों, कलाकारों, दार्शनिकों ने बड़ी अच्छी तरह से किया है। प्रत्येक क्षेत्र में, प्रत्येक भाषा में, प्रत्येक काल में प्रताप की वीरता पर लिखने वालों ने उनका मान बढ़ाया है। बंगाल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र सभी राज्यों के साहित्यकारों एवं इतिहासकारों ने 'प्रताप' पर अपनी लेखनी चलाई है। कविराज श्यामलदास ने अपने ग्रन्थ 'वीर विनोद' में प्रताप पर विस्तृत लेखन कार्य कर, भावी पीढ़ी को इस ओर बढ़ने व लिखने को प्रेरित किया। कविताओं, डिंगल, पिंगल गीतों, नाटकों, शोध, निबंधों अथवा राजस्थान पर मध्यकालीन भारत पर लिखी पुस्तकों में प्रताप को लेकर काफी लेखन कार्य किया गया है। महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने राजपूताने का इतिहास एवं उदयपुर राज्य का इतिहास लिखा। उसके प्रथम भाग में से प्रताप संबंधी लेखन को लेकर 1984 में 'वीर-शिरोमणि महाराणा प्रताप' (सचित्र) प्रकाशित कराई।
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यह पुस्तक वैदिक यंत्रालय, अजमेर से प्रकाशित हुई। इसके अलावा 1987 में कविराव मोहन ने 'प्रताप-यश-चंद्रिका' पुस्तक लिखी जो श्री भूपाल मुद्रण-यन्त्रालय, उदयपुर से मुद्रित हुई। 1983 में निहाल चंद एण्ड कंपनी की ओर से 'भारत के महापुरुष' पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसके संपादक पं़ रमाशंकर त्रिपाठी हैं। यह पुस्तक 'प्रताप' के जीवन को सामने रखती है। लोकायत शोध संस्थान, जोधपुर से राजेन्द्र बोड़ा की 'महाराणा प्रताप' का प्रकाशन हुआ। 1976 में राजेन्द्र शंकर भट्ट की पुस्तक मेवाड़ के महाराणा और अकबर स्फटिक संस्थान, जयपुर से प्रकाशित हुई। इसमें लेखक ने स्रोतों के आधार पर कई नवीन तथ्य उजागर किये। डॉ़ देवीलाल पालीवाल ने 'महाराणा प्रताप स्मृति ग्रन्थ' नामक पुस्तक में विभिन्न हस्तियों से प्रताप संबंधी विविध विषयों पर आलेख एवं दुर्लभ सामग्री को 1969 में प्रकाशित कर, एक स्तुत्य कार्य किया। यह ग्रन्थ साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर से प्रकाशित हुआ। इसी भांति डॉ़ देवीलाल पालीवाल ने प्राचीन डिंगल काव्य में 'महाराणा प्रताप' पुस्तक लिखी जो अरुणिमा प्रकाशन, उदयपुर से 1966 में प्रकाशित हुई। बाबू गंगा प्रसाद गुप्त द्वारा रचित 'महाराणा प्रताप' पुस्तक काशी से 1913 में प्रकाशित हुई। प्रो़ एस़ आऱ शर्मा ने 'महाराणा प्रताप' पुस्तक अंग्रेजी में लिखी जो 1954 में वी़ वी़ आऱ इंस्टीट्यूट से प्रकाशित हुई।
डॉ. जी़ एऩ शर्मा एवं एम़ एऩ माथुर ने 'महाराणा प्रताप एण्ड हिज टाईम्स' नामक पुस्तक में नामचीन इतिहासकारों के शोध निबंधों को संपादित कर, महाराणा प्रताप स्मारक समिति, उदयपुर से 1988 में प्रकाशित किया। 1980 मं् साहित्य संस्थान, राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर से डॉ़ देवीलाल पालीवाल द्वारा संपादित 'हल्दीघाटी युद्ध' पुस्तक प्रकाशित हुई। बलवन्त सिंह रचित 'प्रात: स्मरणीय प्रताप' पुस्तक महाराणा प्रताप की 434वीं जयन्ती पर प्रकाशित हुई जिसके प्रकाशक क्रांति कार्यालय, रेन बसेरा, उदयपुर हैं। इसी तरह 1972 में प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा डॉ़ रघुवीर सिंह द्वारा लिखित पुस्तक 'महाराणा प्रताप' प्रकाशित हुई। बलवन्तसिंह महेता व जोध सिंह महेता द्वारा अंगे्रजी भाषा में लिखित 'प्रताप, द पेट्रीअट' 1969 में द प्रताप इंस्टीट्यूट ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च, भूपाल नोबल्स कॉलेज, उदयपुर से छपी। 1983 में 'महाराणा प्रताप: जीवनी, महत्व व देन' पुस्तक कु. डॉ़ रघुवीर सिंह द्वारा लिखित पंचशील प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित हुई।
डॉ़ देव कोठारी एवं डॉ़ ललित पाण्डेय द्वारा संपादित 'महाराणा प्रताप और उनका युग' पुस्तक 1991 में साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर द्वारा प्रकाशित की गई। डॉ़ देवीलाल पालीवाल की 'महाराणा प्रताप महान' पुस्तक 1996 में राजस्थानी साहित्य संस्थान, जोधपुर से प्रकाशित हुई। डॉ़ पालीवाल की ही एक अन्य पुस्तक 'महाराणा प्रताप महान जीवन वृत्त और कृतित्व' पुस्तक राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर से 1998 ई़ में प्रकाशित हुई।
देवी सिंह मंडावा ने 'स्वतंत्रता के पुजारी महाराणा प्रताप' पुस्तक की रचना की जो 2012 में अरिहन्त प्रकाशन, जोधपुर से तो डॉ़ पूरन सहगल ने 'लोक साहित्य के महानायक महाराणा प्रताप' 2012 में मध्य भारतीय इतिहास अनुसंधान प्रतिष्ठान, ग्वालियर से प्रकाशित हुईं। डॉ़ लक्ष्मीनारायण नन्दवाना रचित 'अपराजित महाराणा प्रताप' 2008 में ज्योति किरण रामश्री चेरिटेबल ट्रस्ट हिरण मगरी, उदयपुर से प्रकाशित है। डॉ़ हुकमसिंह भाटी द्वारा संपादित 'युग पुरुष महाराणा प्रताप' पुस्तक प्रताप शोध प्रतिष्ठान, भूपाल नोबल्स संस्थान उदयपुर से 1991 में छपी। 2002 में महाराणा प्रताप स्मारक समिति, उदयपुर से 'महाराणा प्रताप से संबंधित स्रोत एवं स्थान' पुस्तक के सम्पादक सज्जनसिंह राणावत, प्रो. के़ एस. गुप्ता, स्वरूप सिंह चूंडावत हैं। यहीं से सज्जन सिंह राणावत, प्रो. के़ एस. गुप्ता द्वारा सम्पादित ग्रन्थ 'बहुआयामी प्रताप' 2010 में प्रकाशित हुआ। ओमप्रकाश की पुस्तिका 'प्रताप गाथा' 2011 में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति, उदयपुर से प्रकाशित हुई। एम़ एऩ माथुर, डॉ. गोपीनाथ शर्मा, सज्जन सिंह राणावत द्वारा संपादित 'महाराणा प्रताप के प्रमुख सहयोगी' का प्रकाशन 1997 में राजस्थान ग्रंथागार, जोधपुर से हुआ। चन्दन सिंह की 'छापली और महाराणा प्रताप' 2007 में उदयपुर से प्रकाशित हुई। प्रो. के़ एस. गुप्ता की लिखी पुस्तक 'महाराणा प्रताप कुम्भलगढ़ से चावण्ड' 2008 में महाराणा प्रताप स्मारक समिति, चावण्ड से प्रकाशित हुई। यह पुस्तक मौलिक स्रोतों के आधार पर नवीन तथ्यों से भरपूर है और प्रताप के बारे में सोचने के लिए एक नई दृष्टि प्रदान करती है।
इस पुस्तक की समीक्षा करते हुए डॉ़ ईश्वर सिंह राणाावत ने लिखा,''प्रो. के़ एस. गुप्ता ने प्रताप के जन्म स्थान कुम्भलगढ़ से मृत्यु स्थल चावंड तक की विभिन्न घटनाओं को आठ अध्यायों में यथा पूर्व पीठिका, नीति निर्धारण काल (1572-1576), संघर्ष का सूत्रपात, काल, प्रताप की राजधानी चावण्ड, भ्रान्तियां एवं वास्तविकता, सृजनात्मक कार्य को समेटा है। इसमें अनेक अनछुए पहलुओं पर प्रथम बार प्रकाश डाला गया है। राजनीतिक घटनाओं के साथ ही इसमें प्रताप के सृजनात्मक कायार्ें एवं भ्रान्तियों को कसौटी पर रख वास्तविकता बताने का सराहनीय प्रयास हुआ है। इतना ही नहीं 'प्रताप एवं अकबर की सोच पर नए तथ्य उजागर किए हैं। प्रताप से संबंधित अनुसंधान कार्य इस पुस्तक का आधार स्तम्भ है।''
प्रताप ने सेनानायक के रूप में डंूगरपुर एवं गोडवाड़ अभियानों में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी थी। प्रो. गुप्ता की यह मान्यता उपयुक्त प्रतीत होती है कि इसी कारण जब महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद जगमाल, जो मेवाड़ की गद्दी पर बैठ गया था, को हटा कर प्रताप को राज गद्दी पर बिठाने में सामन्तों को कोई कठिनाई नहीं आई। इस प्रक्रिया को लेखक ने एक परम्परा का निर्वाह एवं अन्याय के प्रतिकार से भी अधिक उसके प्रति अटूट विश्वास को माना है। प्रो. गुप्ता यह सिद्ध करने में सफल हुए हैं कि संवेदनशील प्रताप ने भी इस घटना को एक संदेश के रूप में लिया। अगर उसे विश्वास पर खरा उतरना था, तो उसके लिए उसे परम्परा का पालन करते हुए स्वतंत्रता और संस्कृति की रक्षा करनी थी, जनता को खोया हुआ विश्वास उसे पुन: दिलाना था। इस ग्रन्थ की एक विशेषता प्रताप की अकबर के विरुद्ध कूटनीतिक सफलता को दर्शाना है। अकबर की मान्यता थी कि मेवाड़ की अस्त-व्यस्त स्थिति के उपरान्त भी प्रताप से युद्ध करना आसान नहीं है। अत: उसने मेवाड़ को घेरने की नीति अपनाई। लेकिन महाराणा ने अकबर के भेजे राजपूत दूतों को इस बात का विश्वास दिला दिया कि जब तक वह स्वतंत्र हैं, मुगल दरबार में राजपूतों के साथ सम्माजनक व्यवहार किया जायेगा और जिस दिन वह अधीनता स्वीकार कर लेंगे, मुगल दरबार में राजपूतों की स्थिति दयनीय हो जायेगी। बाद की घटनाओं को देखें तो यह निश्चित हो जाता है कि इन शिष्टमंडलों के नेताओं में यह बात घर कर गई और इससे वे प्रभावित हुए। इसलिए अनेक बार प्रताप के प्रति उनके रुख पर सवालिया निशान भी लगे। लेखक का यह भी मत है कि अकबर ने प्रताप के चरित्र को समझने में भूल की, क्योंकि समस्याओं से कतराना प्रताप के स्वभाव में नहीं था। वे तो उसका सामना करने के लिए तत्पर रहते थे। समस्याएं उन्हें चिंतित करने की अपेक्षा दृढ़ता प्रदान करती थीं। प्रताप ने ऐतिहासिक घटनाओं का मनन किया। इस प्रकार प्रो. के़ एस. गुप्ता ने अपनी पुस्तक में प्रताप की परिवर्तन की स्थिति का सही आकलन किया है। पुस्तक में विस्तार से प्रताप की युद्ध नीति के बारे में बताया गया है। पुस्तक में वर्णित है कि कैसे धन-बल और शस्त्र बल से अकबर की सेना का मुकाबला करने हेतु जन सहयोग के साथ ही प्रताप ने सामरिक नीति में परिवर्तन कर छापामार युद्ध का श्रीगणेश किया। इसके साथ ही छोटे राज्य मुगल शक्ति से भयभीत थे। फिर भी प्रताप ने अपनी नीति का एक प्रमुख सूत्र विभिन्न शक्तियों से संबंध स्थापित करने का रखा।
पुस्तक में प्रताप संबंधी भ्रान्तियों पर भी पर्याप्त प्रकाश डालकर उनका निवारण करने का प्रयास किया गया है। लेखक ने भगवन्त दास के साथ अमर सिंह को मुगल दरबार में भेजने की घटना को कपोल कल्पित सिद्ध किया है। इसी प्रकार उदाहरण देकर यह सिद्ध किया कि महाराणा मुगलों से संघर्ष में कभी अकेले नहीं रहे। उन्हें राजस्थान के अनेक राज्यों का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सहयोग मिलता रहा। चक्रपाणि के मुहर्तमाला ग्रन्थ से स्पष्ट है कि अनेक शासक प्रताप के प्रति समर्पित थे। अत: डॉ. गुप्ता ने इस बात को केवल भ्रान्ति माना कि संघर्ष में प्रताप अकेले थे प्रताप ने तथ्यों के आधार पर राज्यविहीन मुगल विरोधी शक्तियों जैसे राव चन्द्रसेन मारवाड़, बून्दी का दूदा, मानसिंह सोनगरा व भांण सोनगरा, ग्वालियर के रामशाह तंवर से सहयोग प्राप्त किया। राजस्थानी शासक जैसे- बांसवाड़ा, देवलिया (प्रतापगढ़), सिरोही, ईडर, जालोर आदि। कई इतिहासकार प्रताप की अकबर विरोधी नीति को राष्ट्रीय एकता में बाधक मानते हैं। इस पर भी इस पुस्तक में तार्किक आधार पर लिखा गया है। ये तथाकथित विद्वान भूल जाते हैं कि अकबर एक विदेशी आक्रान्ता था, जिसका एकमात्र उद्देश्य अपने साम्राज्य का अधिक से अधिक प्रसार करना था। लेखक ने अनेक प्रश्न उठाए हंै। जैसे- क्या आक्रमणकारी को देश से धकेलना तत्कालीन शासकों का कर्तव्य नहीं था? कोई भी शासक अकबर के राज्य मंडल का सदस्य क्या इसलिए बना कि इससे देश की सेवा कर सकेंगे? अपने संकीर्ण लाभ के लिए क्या कायरता का परिचय नहीं दिया? क्या दासता को भी गौरव का प्रतीक मानना होगा? उपरोक्त इतिहासवेत्ता अकबर की 'पंथ निरपेक्षता' की नीति की प्रशंसा करते हैं, क्या यह उसकी पंथ निरपेक्षता थी कि उसने उदयपुर का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा? हल्दीघाटी युद्ध में मुस्लिम मानसिकता स्पष्ट हो जाती है, जब बदायूंनी शत्रु अथवा मित्र राजपूत सैनिकों में भेद नहीं कर पाया तब उसके अपनी समस्या आसफ खां, जो सेनानायक मानसिंह के बाद सवार्ेच्च पद पर था, के सामने रखने पर उससे यह निर्देश मिला है कि ''तीर चलाते जाओ, जो भी मरेगा काफिर मरेगा और इसका लाभ इस्लाम को होगा। '' क्या ये घटनाएं अकबर की 'पंथ निरपेक्ष नीति' के अनुकूल थीं? अधीनस्थ राजपूतों के साथ जिस प्रकार का दुर्व्यवहार किया जाता था, वह 'दलपत विलास' पुस्तक व अन्य स्रोतों से स्पष्ट हो जाता है। 1568 में चित्तौड़ पर अधिकार करने के बाद 30 हजार से अधिक असैनिक जनता, जिसमें बच्चे, वृद्ध, नारी सभी थे, की नृशंस हत्या क्या अकबर के प्रति विश्वास उत्पन्न कर सकती है? इन प्रश्नों के उत्तर प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रभावशाली रूप से दिये गए हंै। प्रताप का अगर कोई दोष था, तो यही कि वे मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे। उन्होंने स्वतंत्रता एवं संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष में त्याग, बलिदान, शौर्य एवं साहस का परिचय दिया। इसीलिए वह समस्त भारतीय जनता के हृदय सम्राट हो गए और प्रात: स्मरणीय मानकर उनका सम्मान किया जाने लगा। डॉ. गुप्ता ने तथ्यों का तार्किक विश्लेषण कर नई जानकारियां देने का प्रयास किया है। वे प्रताप से संबंधित अन्य भ्रान्तियों का निराकरण एवं अन्य विषयों की तरफ ध्यान आकर्षित करने में भी सफल रहे हैं, जो शोध अध्येताओं को भविष्य में प्रताप पर किये जाने वाले अनुसंधान के लिए नई दिशा देंगे। डॉ़ श्रीकृष्ण 'जुगनू' की 'महाराणा प्रताप का युग' 2010 में आर्यावर्त संस्कृति संस्थान, दिल्ली से प्रकाशित हुई है। प्रस्तुत ग्रंथ में डॉ. जुगनू ने कई नए तथ्य उजागर करते हुए प्रताप कालीन ताम्रपत्र आदि से सुसज्जित शोधपरक पुस्तक की रचना की है। डॉ़ चन्द्रशेखर शर्मा की पुस्तक 'राष्ट्र रत्न महाराणा प्रताप' 2008 में आर्यावर्त संस्कृति संस्थान, दिल्ली से प्रकाशित है। इन ग्रन्थों का अध्ययन करने के बाद स्पष्ट है कि सभी लेखकों ने प्रताप की महानता, स्वातंत्र्यप्रियता, वीरता को अपनी लेखनी के माध्यम से देश-समाज के सामने रखने का प्रयास किया है।
(लेखक आऱ पी. जी. कॉलेज, भीण्डर, राजस्थान में प्राचार्य हैं)