ज्ञान और समरसता का प्रताप

    दिनांक 19-जनवरी-2021
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डॉ. मनोरमा उपाध्याय
प्रताप भारतीय इतिहास में संस्थापित ऐसा नाम है जो शक्ति, साहस एवं मातृभूमि प्रेम का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। महाराणा प्रताप से संबंधित 'महान वृत्तांतों' (खमनौर का युद्ध) से हम सभी भलीभांति परिचित हैं, किन्तु हमें उन 'सूक्ष्म वृत्तांतों' को भी जानना होगा जो प्रताप के वास्तविक रूप में इतिहास योगदान को परिलक्षित करते हैं। उत्तर-आधुनिक इतिहास लेखन में 'सूक्ष्म-वृत्तांतों' का अत्यधिक महत्व है, जो आधारभूत हैं तथा युगीन तत्वों को जन्म देते हैं। इतिहास का निर्माण इन्हीं से होता है। प्रताप ने न केवल शक्तिशाली मुगल साम्राज्य से ही लोहा लिया, वरन् तत्कालीन मेवाड़ में 'विरोध एवं स्वतंत्रता की अवधारणा' को स्थापित किया जो आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा बनी। कर्नल जेम्स टॉड के विवरण को जब भारत के अन्य क्षेत्रों में पढ़ा गया, तो प्रताप एक प्रेरणादायी राष्ट्रीय व्यक्तित्व बन कर उभरे। तत्कालीन मुगल सत्ता को चुनौती देना एक दुष्कर कार्य था, किंतु प्रताप ने न केवल मुगलों के प्रति प्रतिरोध की नीति को ही अपनाया, वरन् मुगल सेना को कभी पूरे मेवाड़ पर अधिकार करने का अवसर नहीं दिया। अकबर द्वारा कई बार आक्रमण के उपरान्त मेवाड़ का कुछ हिस्सा स्वतंत्र ही बना रहा।
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उन्होंने समाज के उपान्तिक वर्ग एवं उपाश्रयी वर्ग - भीलों की सहायता से अपनी स्थिति को न केवल सुदृढ़ किया, वरन् प्रतिकूल परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाया। चित्तौड़ एवं आसपास के इलाके छिन जाने के बाद प्रताप ने 'पहाड़ी कृषि एवं उत्पादन' की नीति को अपनाया तथा कुछ विशिष्ट व्यापारिक मागार्ें पर नियंत्रण स्थापित करके आर्थिक सुदृढ़ीकरण का वातावरण तैयार किया।
प्रताप की इतिहास को सबसे बड़ी देन उस प्राचीन ज्ञान के संरक्षण की है, जो पीढि़यों से शास्त्रीय साहित्य में संचित था। चक्रपाणि मिश्र ने 'विश्व-वल्लभ' की रचना कर जल-संचय, वृक्षायुर्वेद, भवन-मंदिर निर्माण के प्राचीन ज्ञान को संरक्षित किया। वराहमिहिर, नारह, शाड्ंगघर आदि के ज्ञान को जनोपयोगी एवं युगानुकूल बनाकर प्रस्तुत किया। जिस प्रकार ज्ञान को आज हम 'हाइड्रोलॉजी' एवं 'हॉर्टीकल्चर' के नाम से जानते हैं,उस ज्ञान को संरक्षित एवं जनोपयोगी बनाने का कार्य चक्रपाणि मिश्र द्वारा प्रताप के आदेश पर किया गया। वहीं विज्ञान एवं तकनीक का विकास वह क्षेत्र है, जो प्रताप के संबंध में लिखे गए हजारों पृष्ठों में नहीं मिलता।
प्रताप ने अकबर के विरुद्ध पठान-राजपूत गठजोड़ का निर्माण किया। मुगलों के विरुद्ध उन्होंने हाकिम खां सूर एवं जालौर के ताज खां तथा बूंदी, सिरोही, ईडर, जोधपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि क्षेत्रों से राजपूतों का समर्थन प्राप्त किया। बूंदी के सुरजन हाड़ा के पुत्र दूदा, डूंगरपुर के रावल आसकरण का पुत्र सहसमल, सिरोही के राव सुरताण का सहयोग प्राप्त किया।
मुगल सत्ता के विरुद्ध प्रताप ने प्रतिरक्षा की नीति अपनाई। उनका मानना था कि लंबे समय तक युद्ध जारी रखकर तथा छापामार पद्धति अपनाकर शत्रु के मनोबल को तोड़ा जा सकता है। जैसा कि प्रो़ आऱ पी़ व्यास ने लिखा है,''राणा की नई नीति रक्षात्मक थी। इसका मूल उद्देश्य मेवाड़ राज्य पर मुगल आधिपत्य को रोकना तथा राज्य में जन-धन की रक्षा करते हुए आक्रमणकारी को अधिकाधिक क्षतिग्रस्त करना था। अपनी रक्षा हेतु यदा-कदा मुगल शासित प्रदेशों पर आकस्मिक आक्रमण करना, मेवाड़ के रास्तों से आते-जाते शाही काफिलों की लूट-पाट करके आवश्यक धन प्राप्त करना और शत्रु के दबाव को कम करने के लिए उपयुक्त साधन जुटाना, इस नीति का उद्देश्य रहा। नीति का मुख्य उद्देश्य संपूर्ण पर्वतीय भाग की किलेबंदी करना, शत्रु का राज्य में प्रवेश होने से रोकना, प्रवेश हो जाने पर उसे अधिकाधिक हानि पहुंचाना जिससे त्रस्त होकर वह वापस लौट जाए। छापामार युद्ध प्रणाली से शत्रु की सैनिक चौकियां उखाड़ दी जाएं तथा उन्हें वापस भागने पर बाध्य किया जाए।''
जैसा कि सामान्य भ्रम है कि गोगुंदा की पहाडि़यों में भटकने वाले प्रताप की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, यह विचार उचित नहीं है। जीवाशाह की जमा खर्च की बहियों तथा भामाशाह की बहियों से स्पष्ट है कि प्रताप के पास धन की लगातार कमी नहीं थी। 'आइने -अकबरी' तथा डॉ. हुकुम सिंह भाटी के लेख 'नैणसी मुणोत की ख्यात' से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रताप ने पूरी आर्थिक व्यवस्था का पुनर्निर्माण किया। चावड़ को नई राजधानी बनाया (जो उन्होंने छप्पन के राठौड़ से जीता था) तथा उस पास के जागरा, आवड़, थार, राहंग, कुंभलनेर, मछावली, भंडेर, नाहेसर के पहाड़ी क्षेत्रों को खेती योग्य बनाया। चावड़ के निकट क्षेत्रों में तांबा, चांदी, तथा जस्ता एवं लोहा प्रचुर मात्रा में था जिसका खनन किया गया। साथ ही गुजरात तथा मालवा जाने वाले व्यापारिक मागार्ें को सुरक्षित किया गया। सामंतों को पहाड़ी क्षेत्रों में नई जागीरें प्रदान की गईं तथा केन्द्रीकृत प्रशासन तथा सैन्य व्यवस्था का निर्माण किया गया। भीलों के मध्य 'कीका' के रूप में विख्यात प्रताप ने भीलों को अपने समकक्ष समझा एवं तद्नुसार सम्मान प्रदान किया। अमरकाव्य के इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि उदयसिंह द्वारा प्रताप को प्रतिदिन एक पेटिया (कच्चा खाना) भेजा जाता था। प्रताप भीलों के साथ बैठकर उसका उपयोग करते थे। प्रताप की इस उदार नीति एवं सम्मान प्रदर्शन ने भीलों की स्वामिभक्ति सुनिश्चित कर ली। उस समय इस जनजाति को सम्मानजनक स्थान दिलवाना प्रताप का एक बड़ा योगदान था। प्रताप के काल में भीलों का योगदान सर्वविदित है। यहां तक कि मेवाड़ के ध्वज में भीलों का अंकन है तथा राजा के प्रथम टीके का अधिकार भी भीलों को ही था।
स्त्रियों के प्रति प्रताप का दृष्टिकोण एक घटना से स्पष्ट होता है। साहित्यिक स्रोतों से ज्ञात होता है कि प्रताप ने खानखाना
की स्त्रियों को ना केवल सम्मानपूर्वक वापस भेजा, वरन् उन्होंने वस्त्राभूषण भी भेंट किए।
प्रताप ने विज्ञान एवं तकनीकी के विकास को भी प्रोत्साहित किया। चक्रपाणि द्वारा लिखित  'वृक्षायुर्वेद' में कृषि विज्ञान के उदाहरण मिलते हैं। वृक्षों के प्रकार, खाद के प्रकार, खाद का निर्माण, वृक्षों में रोगों का उपचार, वृक्षों को फलदार बनाने के प्रयोगों का विस्तृत विवरण इस अध्याय में मिलता है। उदाहरण के तौर पर मिश्र लिखते हैं कि कुछ पौधे बीजों से उत्पन्न होते हैं, कुछ लताओं से और कुछ दोनों से -
बीजोंद्वभवा: काण्डमवाच्छचन्यि
लता द्रमाद्या:।
उक्तास्तथान्यैपि च बीजकाण्ड भवाविभेद कथयामि तेजा।
जैसे आम, चंपा, महुआ, कैथ, जामुन, पुनाग, बिल्व, नकुल, कचनार, आदि बीजों से ही रोपित होते हैं जबकि चमेली, तम्बूलिका, केतकी इत्यादि डालियों से। मिश्र किस पौधे को कितना जल दिया जाना चाहिए, इसका विवरण भी देते हैं।
तिल का तेल, कबूतर की बीट, बकरी की बीट, पशु वसा एवं रक्त का प्रयोग वे खाद के रूप में करने का वर्णन करते हैं जिससे मृतप्राय: वृक्षों को भी जीवन दिया जा सकता है। वे कुणिप जल का उपयोग भी बताते हैं। उपरोक्त सभी वस्तुएं शर्करा, फोस्फोरस, प्रोटीन एवं फैटी एसिड्स का निर्माण करती हैं, जो एक अत्यधिक समृद्ध जैविक खाद का निर्माण करती है। कीटनाशक के रूप में धुएं एवं ध्वनि की विधि भी बताते हैं।
आधुनिक मृदा-विभाजन जैसा ही मृदा विभाजन मिश्र की रचना है। यह ''मृदा विज्ञान'' की प्राचीनता को भी दर्शाता है। मृदाओं के भेद के साथ ही उनका रासायनिक निर्माण भी लिखा गया है। जैसे-मलिन, पाण्डुर्य, श्यामल, धवल, अरुण एवं पीत तथा उनके रासायनिक तत्व हैं-अक्षारीय, क्षारीय, लवण, कटु, तिक्त एवं कास्य।
इसी प्रकार जल प्राप्ति के विभिन्न उपाय-'उदकार्गलनिरूपम्' में निहित हैं। जैसे अर्जुन, साल, बरगद, जामुन आदि वृक्षों को निकट जल प्राप्त होता है। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं। साथ ही जल को शुद्ध करने के उपाय भी मिलते हैं जिन्हें आजकल ''फाइटोकेमिस्ट्री'' के अंतर्गत रखा जाता है। साथ ही जलाशय निर्माण का भी विस्तृत वर्णन है। इस प्रकार प्रताप का इतिहास को योगदान न केवल एक योद्धा तथा शासक के रूप में था, वरन् प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के संरक्षक के रूप में भी अद्वितीय है।
( लेखिका जोधपुर स्थित महिला पी. जी. महाविद्यालय की प्राचार्य हैं)