मेवाड़ की धरोहर-सांगा का तेज, प्रताप का शौर्य

    दिनांक 19-जनवरी-2021
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तेज सिंह तरुण
मेवाड़ का इतिहास अगर देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि राणा सांगा जैसे अद्भुत व्यक्तित्व का धनी और कोई नहीं है। शायद ही कोई ऐसा वीर, बहादुर शासक हुआ, जिसके शरीर पर अस्सी घाव (एक हाथ, एक पांव, एक आंख न रहे और पूरा शरीर घावों से छलनी) हों, फिर भी उसने राजसिंहासन पर बैठने के बाद निरंतर युद्ध लड़ा हो। विश्व प्रसिद्ध खानवा का युद्ध इन्हीं युद्धों में से एक है। यह महाराणा सांगा ही थे, जिन्होंने उत्तर-पश्चिम से प्रवेश करती मुगल सेनाओं व दिल्ली के सुल्तानों से भारत को बचाने के लिए निरंतर संघर्ष किया। सुप्रसिद्घ इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने ठीक ही लिखा है, ''महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) वीर, उदार, कृतज्ञ, बुद्धिमान और न्यायपरायण शासक थे। अपने शत्रु को कैद कर छोड़ देना और उसे उसका राज्य वापस कर देना सांगा जैसे उदार और वीर पुरुष का ही कार्य था।'' ओझा आगे लिखते हैं कि वह एक सच्चे क्षत्रिय थे। उन्होंने कितने ही शहजादों, राजाओं आदि को अपनी शरण में आने पर अच्छे से रखा और आवश्यकता पड़ने पर उनके लिए युद्ध भी किया। ऐसा कोई सोच सकता है? नहीं, कदापि नहीं, पर सांगा ऐसे ही थे। निश्चित ही उनके व्यक्तित्व की यह विशेषता हम सभी भारतीयों के लिए गर्व की बात है।
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यह सर्वविदित है कि संकटों में पले होने के कारण सांगा निडर, साहसी, वीर और एक अच्छे योद्धा बन गये थे। स्मरण रहे कि सांगा को महाराणा बनने के लिए अपने ही दो पराक्रमी भाइयों से घोर संघर्ष करना पड़ा था, लेकिन महाराणा बनने के उपरांत उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे सबके थे, सब उनके थे। इस नीति ने सांगा को लोकप्रिय और शक्तिमान बना दिया, जिसके फलस्वरूप वे एक के बाद एक सफलता प्राप्त करते गये। कुछ ही दिनों में वे देश के सर्वशक्तिशाली हिन्दू राजा बन गए। मेवाड़ एक विशाल साम्राज्य का रूप ले चुका था। राजपूताने के लगभग सभी शासकों ने उनकी अधीनता स्वीकार कर ली थी या मैत्रीपूर्ण संबंधों के कारण उनके ध्वज के नीचे थे। यह नजारा जब स्वयं बाबर ने भी खानवा के युद्ध में देखा तो वह भी हतप्रभ रह गया। इतिहासकार ओझा ने बहुत ठीक लिखा है कि सांगा भारतवर्ष के अन्तिम हिन्दू राजा थे, जिनके सेनापतित्व में सब राजपूत जातियां विदेशियों (तुकोंर्) को भारत से निकालने के लिए एकजुट हुईं। स्वयं बाबर लिखता है, ''राणा सांगा अपनी वीरता और तलवार के बल से बहुत बड़ा हो गया था।''
यही कारण है खानवा के युद्ध की पराजय भी उनके शौर्य और पराक्रम से भरे व्यक्तित्व की आभा को कम नहीं कर सकी। उनकी इसी महानता को ध्यान में रखते हुए स्वयं बाबर ने युद्ध से पूर्व कहा था कि राणा सांगा के विरुद्ध युद्ध करना सांप के बिल में हाथ डालने के बराबर है। बाबर की इस मनोदशा का ही परिणाम था कि वह पूरी तैयारी व सतर्कता के साथ युद्ध में उतरा और विजयी रहा। इसके विपरीत सांगा प्रारंभ से अब तक प्राप्त निरंतर सफलताओं के कारण निश्िंचत थे और बाबर को हल्के में लिया, जिसके कारण उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा था।
मेरा यहां यह मानना है कि सांगा ने हाथी की जगह घोड़े को काम में लिया होता तो बात कुछ और ही होती। इसके अलावा एक और बात थी, सांगा घायलावस्था में जब हाथी से गिरे, उस समय कोई तुरन्त सेना की बागडोर संभाल लेता तो भगदड़ न मचती और न ही पराजय मिलती। झाला अज्जा जैसे शूरवीर ने सांगा का दायित्व लिया किंतु कुछ विलम्ब हो गया था और स्थितियां बदल गईं। पर राणा सांगा के अद्भुत व्यक्तित्व में कोई कमी नहीं आई। वे भारतीय इतिहास के सितारे थे और आज भी हंै। ये सांगा ही थे, जिन्हांेने मुगलों को भारतीय शक्ति एवं शौर्य से परिचित कराया। आगे चलकर अकबर को भी मेवाड़ के संघर्ष व स्वाभिमान के आगे झुकने को मजबूर होना पड़ा था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि राणा सांगा इतिहास की एक अमर विभूति के रूप में जाने जाएंगे।
सांगा के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र रतनसिंह एवं उनसे छोटे भाई विक्रमादित्य व उदयसिंह महाराणा बने पर मेवाड़ अपने उस गौरव को प्राप्त न कर सका। प्रताप के पिता उदय सिंह ने इस दृष्टि से कुछ प्रयास किए पर वह बात नहीं बन सकी जो सांगा के समय थी। राजस्थान के अन्यान्य क्षेत्र, जो पहले मेवाड़ के झंडे की नीचे थे, धीरे-धीरे बाबर, हुमायूं और अकबर के समर्थन में चले गये। इससे मेवाड़ के विस्तार एवं शक्ति पर तो प्रभाव पड़ा, लेकिन एक बात जो उल्लेखनीय है वह यह कि यहां के लोगांे के मूल स्वभाव में कोई फर्क नहीं आया। महाराणा उदयसिंह के बाद जब प्रताप ने मुगलों से संघर्ष का बीड़ा उठाया तो सर्वत्र फिर वही बलिदानी हवा चल पड़ी।
कारण स्पष्ट था कि राजतिलक के बाद प्रताप ने न दिन देखा न रात, अनवरत भ्रमण कर मेवाड़ की खोई शक्ति को पुन: संगठित करना शुरू कर दिया। मात्र चार वर्ष की अल्पावधि में अर्थात् 1576 में तो उन्होंने विश्व प्रसिद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल शक्ति को नाकों चने चबवा दिये। यह प्रथम अवसर था, जब प्रताप ने अपने शौर्य, पराक्रम और कौशल का युद्ध भूमि में सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। नवीन स्रोतों के आधार पर यहां यह लिखना भी समीचीन होगा कि हल्दीघाटी के युद्ध में प्रारम्भ से अंत तक प्रताप का पलड़ा ही भारी रहा। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत इस कथन की पुष्टि करते हैं। स्वयं अकबर के दरबारी लेेखक अल बदायूंनी, जो हल्दीघाटी युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी था, दबी जुबान से स्वीकारते हुए लिखता है कि 'वापसी के समय रास्ते में लोगों को यह समझाना कठिन हो गया कि युद्ध में किसकी विजय हुई।'
यदि प्रताप चाहते तो देश के अन्य शासकों की तरह ही राजमहलों का सुख-भोग सकते थे। यही नहीं, मेवाड़ के गौरवशाली अतीत एवं भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर तो अन्यों की तुलना में अधिक सम्मान के साथ जी सकते थे। किन्तु उन्हांेने ऐसा नहीं किया। इस सबके कारण ही वे आज देशभर के लिए प्रात: स्मरणीय हैं। इसका मूल कारण था उनके भीतर बसा स्वातंत्र्य प्रेम, स्वाभिमान और शौर्य। इन्हीं गुणों ने प्रताप के यश को बढ़ाया। वे जब तक रहे एक स्वतंत्र शासक के रूप में रहे। अकबर की प्रलोभन आदि की राजनीति के सभी अस्त्र खाली गये। उनकी जनप्रियता के तो कहने ही क्या। स्वयं अकबर सहित उनके दरबारी भी प्रताप को सम्मान की दृष्टि से देखते थे। कहते हैं कि प्रताप की मृत्यु का समाचार जब अकबर के पास पहुंचा तब वह उदास एवं स्तब्ध-सा हो गया। अकबर की उदासी एवं स्तब्धता को वहां उपस्थित कवि दूरसा आढ़ा ने जिन शब्दों में व्यक्त किया उसका भाव था, ''हे राणा प्रताप सिंह। तेरी मृत्यु पर शाह अकबर ने दांतों तले जीभ दबाई और आंसू टपकाये, क्योंकि तूने अपने घोड़े को दाग नहीं लगने दिया, अपनी पगड़ी को किसी के आगे नहीं झुकाया।'' अंत में यही कहा जा सकता है कि पूरे राष्ट्र में मेवाड़ ही एक ऐसा प्रदेश था, जिसने 1527 से 1707 तक मुगलों के खिलाफ अनवरत संघर्ष किया और अपनी गौरव गाथा में कई अनमोल पृष्ठ जोडे़। महाराणा सांगा और प्रताप को कोई झुका न सका। सन्धि प्रस्ताव आए, पर स्वीकारे नहीं। दोनों ने महलों के सुख-भोग की जगह कंदराओं में भी आनन्द की अनुभूति की और स्वतंत्रता व स्वाभिमान की अलख जगाए रखी। यही कारण है कि प्रत्येक भारतवासी मेवाड़ को सदैव नमन करता है और करता रहेगा। (लेखक स्वतंत्र व्याख्याता हैं)