मेवाड़ी कूटनीति -अकबर सेर तो प्रताप सवा सेर

    दिनांक 19-जनवरी-2021
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मनीष श्रीमाली
दो राज्यों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने तथा युद्ध को टालने में जो प्रमुख तत्व सहायक होता है वह है राजनय या राजा की कूटनीति। कूटनीति दो राज्यों के संबंधों के निर्धारण एवं दिशा देने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रताप एवं अकबर के बीच व्यवहार में कूटनीति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। मेवाड़ में प्रताप के राज्याभिषेक 1568 से 1572 तक के समय में मेवाड़-मुगल संबंधों में किसी प्रकार की हलचल नहीं दिखाई देती। प्रताप के राज्याभिषेक के साथ ही अकबर का ध्यान पुन: मेवाड़ की ओर गया। हल्दी घाटी से पूर्व का काल मेवाड़-मुगल संबंधों में कूटनीति की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण समय था। यहां प्रताप एक अद्भुत एवं अद्वितीय नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरे जो मेवाड़ के सबसे कठिन एवं नाजुक समय में अपनी कूटनीतिक प्रतिभा के दम पर उसे संकट से उबारने में सफल हो सके।
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अपने राज्याभिषेक के बाद के चार साल की कालावधि में प्रताप ने अकबर की कूटनीति का समुचित रूप से विश्लेषण कर लिया था। उन्हें बाद में इसका पर्याप्त लाभ मिला। अकबर, जिसने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया था, निश्चित ही एक बेहद चतुर एवं कुटिल कूटनीतिज्ञ था। कुछ इतिहासकार अकबर की हिंदू राजाओं से वैवाहिक संबंध स्थापित करने की राजपूत नीति को मजहबी सहिष्णुता की नीति से जुड़ा मानते हैं। वहीं आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव, विंसेंट स्मिथ तथा इक्तिदार आलम खां अकबर की राजपूत नीति को तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की जरूरत मानते हैं। प्रताप ने कूटनीति से कार्य करते हुए सर्वप्रथम उन्हीं कारणों को अपनी कमजोरी बनने से रोका। यह कारण था राजपूताना के राज्यों का शक्ति संतुलन बिगड़ना। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में या दो राज्यों के बीच के संबंधों में शक्ति संतुलन का सिद्धांत बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
तत्कालीन राजपूताना के संबंध में शक्ति संतुलन के सिद्धांत को समझने के लिए हमें राजपूताना को दो भागों में विभाजित करना होगा—उत्तरी राजपूताना एवं दक्षिणी राजपूताना। अकबर की साम्राज्यवादी नीतियों के कारण कई राज्यों का शक्ति संतुलन विकृत होने लगा था जिसमें से एक उत्तरी राजपूताना के राज्य भी थे। अकबर की राजपूताना में सर्वप्रथम घुसपैठ भी इसके उत्तरी भाग में ही हुई थी, जहां 1562 से पूर्व तक उत्तरी राजपूताना के राज्य शक्ति संतुलन के सिद्धांत को बनाए रखने में सफल रहे थे। राजपूताना के राज्यों की राजनीति में पहला महत्वपूर्ण परिवर्तन 1562 में दिखाई देता है जब अकबर द्वारा आमेर के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किया जाता है। इस वैवाहिक संबंध की वजह से उत्तरी राजपूताना का शक्ति संतुलन बिगड़ चुका था। आमेर का मुगलों से गठबंधन होने की वजह से वह इतना शक्तिशाली हो गया था कि अब उत्तरी राजपूताना में ऐसा कोई राज्य नहीं था जो उसका सामना कर सके। उत्तरी राजपूताना के दूसरे राज्य आपसी संघर्ष एवं आंतरिक कलह को दबाने में नाकाम रहने की वजह से कमजोर हो चुके थे।
वहीं मेवाड़ की स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। मेवाड़ में प्रताप जैसा कुशल व्यक्तित्व था जिसने इन कमजोरियों से मेवाड़ को उबारा। मेवाड़ की कूटनीति की सबसे महत्वपूर्ण जीत शक्ति संतुलन के सिद्धांत को बनाए रखना था। अकबर मेवाड़ के शक्ति संतुलन को नष्ट करके उसे कमजोर करने का प्रयास करता है। अत: उसने मेवाड़ के पड़ोसी राज्यों को उससे अलग-थलग करने का प्रयास किया इसके लिए वह हस्तक्षेप, युद्ध, संधियां, फूट डालने एवं मध्यवर्ती राज्यों को अपनी ओर मिलाने की कोशिश करता है। हर प्रकार की युक्ति अपनाने के बावजूद अकबर को मुंह की खानी पड़ती है। यहां प्रताप भी अकबर की कूटनीति का जवाब उसी की भाषा में देते हैं। प्रताप की सक्रियता की वजह से ही अकबर दक्षिणी राजपूताना में कोई भी राजनीतिक लाभ प्राप्त नहीं कर सका। प्रताप के कूटनीतिक दांवपेच की वजह से अकबर के विरुद्ध विरोध के कई केंद्र उभरे, जैसे- सिरोही, जालौर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, ईडर आदि। जहां अकबर मेवाड़ पर आक्रमण करता तो अन्य स्थानों पर विद्रोह प्रारंभ हो जाता जिससे स्वत: ही मेवाड़ का दबाव कम हो जाता। प्रताप की राजनयिक कुशलता की दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि ने मेवाड़ को किसी भी आंतरिक संघर्ष में नहीं उलझने दिया, सभी सामंतों को एकजुट रखा। इस वजह से अकबर दक्षिण राजपूताना में घुसपैठ नहीं कर सका। यह प्रताप की पहली और सर्वाधिक महत्वपूर्ण कूटनीतिक विजय थी।
मेवाड़ एवं उसके आस-पास के क्षेत्र में अकबर कोई भी राजनीतिक लाभ प्राप्त करने में सफल नहीं हो सका। अत: अकबर ने प्रताप का राज्याभिषेक होते
ही पुन: कूटनीतिक प्रयास प्रारंभ किए। अकबर ने प्रताप को अपने अधीन करने हेतु शिष्टमंडल की नीति का प्रयोग किया। शिष्टमंडल की यह कूटनीति किसी प्रकार का सम्मानजनक समझौता करने की नहीं, अपितु प्रताप को अपने अधीन एक सामंत बनाने की नीति से प्रभावित प्रतीत होती है। इसके निम्न कारण दिखाई देते हैं-सर्वप्रथम, मालदेव ने अकबर से शांतिपूर्ण समझौते का प्रयास किया था, किंतु अकबर उसके प्रत्यक्ष रूप से दरबार में उपस्थित होकर अधीनता स्वीकार करने के अतिरिक्त किसी भी बात पर सहमत नहीं हुआ था। दूसरा, अकबर के मेवाड़ अभियान से पूर्व किसी प्रकार के राजनय संबंध का अभाव दिखाई देता है और वह बिना किसी ठोस कारण के हमला कर देता है। यहां ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि मेवाड़ के तीसरे शाके 1568 के चार वर्ष बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि अकबर ने मेवाड़ के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करने हेतु प्रयास प्रारंभ कर दिए? यहां केवल नए शासक से मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने की नीति नहीं अपितु इससे कहीं बढ़कर अपना वर्चस्व स्थापित करने की नीति थी।
यहां अकबर के लिए मेवाड़ का प्रश्न केवल भूमि विजय की नीति से बढ़कर था। भले ही प्रताप के पास 300 वर्ग मील का पर्वतीय क्षेत्र था पर मेवाड़ अपनी सामरिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं नैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। जहां एक ओर मेवाड़ दिल्ली-गुजरात के सामरिक एवं व्यापारिक मार्ग पर स्थित था। वहीं उसके जस्ते की खानें थीं तथा इसका उत्पादन महाराणा लाखा एवं उनसे पूर्व भी हो रहा था। मुगल उस धातु से अपरिचित थे अत: उसे पाने की चाह भी थी। अकबर की नीति यह थी कि पहले बड़े राज्य को पराजित करो, आस-पास के छोटे राज्य स्वयंमेव आत्मसमर्पण कर देंगे। अत: मेवाड़ अधीनता स्वीकार करता तो दक्षिण राजपूताना का शक्ति संतुलन स्वत: ही नष्ट हो जाता। अंतिम किंतु सबसे प्रभावी कारण नैतिक दृष्टि से मेवाड़ का स्वतंत्रता संघर्ष अन्य राज्यों के लिए भी विद्रोह की प्रेरणा का स्रोत बन सकता था। ऐसा अकबर के जीवन काल में ही दिखाई देता है कि हल्दी घाटी मुगल प्रतिरोध का प्रतीक बन गई थी।

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मेवाड़ की अधीनता अकबर के लिए अत्यावश्यक थी। अत: अपने शिष्टमंडल की कूटनीति के रूप में प्रताप के पास कुल चार दूत भेजे थे। अकबर का पहला शिष्टमंडल प्रताप के राज्याभिषेक के सात माह बाद आता है तथा इसके बाद जो भी दूत आते हैं, उनके आगमन एवं अकबर के जीवन के घटनाक्रम को देखें तो अकबर की अचानक मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने की नीति की वास्तविकता उजागर होती है। अकबर के दूत मंडल भेजने की नीति विशुद्ध रूप से गुजरात अभियान से प्रभावित थी, न कि मित्रता स्थापित करने के भावावेग से। अकबर के गुजरात अभियान पर निकलते ही उसे मेवाड़ की सामरिक स्थिति का ज्ञान हो गया था। जैसे-जैसे अकबर आगे बढ़ा, उसे मेवाड़ के आस-पास के क्षेत्रों पर प्रताप के प्रभाव तथा मेवाड़ द्वारा स्थापित शक्ति संतुलन का पूर्णत: भान हो गया। अकबर के समस्त शिष्टमंडल गुजरात अभियान के दौरान ही भेजे गए थे। अकबर की शिष्टमंडल कूटनीति में भी दो पैंतरे दिखाई देते हैं। पहला, मेवाड़ को अपने स्वजातीय से ही विलग करने का प्रयास तथा दूसरा, मेवाड़ को घेरने की नीति। प्रताप के समक्ष पहले शिष्टमंडल के रूप में जलाल खां कोरची आता है। तत्पश्चात् मानसिंह, भगवंतदास एवं टोडरमल आते हैं। अकबर जानता था कि या तो मेवाड़ अधीनता स्वीकार करेगा या फिर विरोध करेगा। इन दोनों ही स्थितियों में अकबर को लाभ होगा। मेवाड़ अगर विरोध करेगा तो वह अपने स्वजातीय को ही अपना शत्रु बना लेगा जिससे राजपूताना में उसकी स्थिति कमजोर हो जाएगी। सर्वप्रथम, प्रताप ने इस नाजुक स्थिति को बेहद कुशलता एवं चतुराई से संभाला। प्रताप ने सभी शिष्टमंडलों का अच्छे नीतिज्ञ शासक के समान स्वागत किया और उन्हें पूर्ण आदर-सम्मान प्रदान किया। टोडरमल प्रताप की आवभगत से इतना प्रभावित हुआ कि उसने दिल्ली जाकर प्रताप का सकारात्मक पक्ष रखा। वहीं अकबर की प्रताप को घेरने की नीति के तहत मानसिंह एवं भगवंतदास, दोनों ही सेना के साथ मेवाड़ आए। इसी कारण राजेंद्र शंकर भट्ट ने मानसिंह के दूत के रूप में मेवाड़ आने को भी उसके पहले अभियान की संज्ञा दी है। प्रताप शासक के साथ-साथ एक कुशल राजनय की भूमिका निभा रहे थे। दूत मंडलों का ससैन्य मेवाड़ में प्रवेश करना, एक प्रकार से आक्रमण करने जैसा ही कृत्य था किंतु प्रताप ने युद्ध टालने की नीति को ध्यान में रखते हुए, उसको आक्रमण नहीं माना बल्कि एक अतिथि के रूप में उनका स्वागत किया। इस प्रकार प्रताप ने बड़े ही धैर्य, सहिष्णुता और चतुराई से सारे मामले को संभाला। प्रताप के समक्ष दूसरी बड़ी चुनौती अकबर के साम-दाम-दंड-भेद से पूरित प्रस्तावों का इस प्रकार जवाब देना था कि यथासंभव युद्ध टालने की नीति कायम रह सके।
धर्मशास्त्रों एवं राजनीतिक शास्त्र का समुचित अध्ययन करने से प्रताप राजनय के कार्यों से भली-भांति परिचित थे। वे जानते थे कि राजनय का प्राथमिक और एकमात्र कर्तव्य अपने देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है तथा जहां तक संभव हो सके, इस उद्देश्य की प्राप्ति शांतिपूर्ण तरीके से करना है। अत: उन्होंने बड़े धैर्य से अकबर के प्रस्तावों को सुना, बगैर विरोध प्रदर्शित किये जहां अपने गौरवशाली वंश की मर्यादा का भान कराया तो वहीं दिलासा देकर दूतमंडलों को आशापूर्ण किंतु अनिश्चित मानसिक स्थिति में विदा भी किया। यह कौशल प्रताप की अद्वितीय कूटनीतिज्ञता के गुण से परिचित कराता है। प्रताप प्राचीन राजनीतिक विचारों एवं सिद्धांतों से पूर्णतया परिचित तो थे, साथ ही यथार्थवादी भी थे।
अकबर अपने दरबार के सबसे योग्य व्यक्तियों को भेजने के बाद भी प्रताप को अपने अधीन करने में सफल नहीं हो सका। हम शिष्टमंडल की भूमिका पर गौर करें तो पता चलता है कि यहां दूत की भूमिका केवल एक राजा के संदेश को दूसरे राजा तक पहुंचाने की नहीं थी, बल्कि वह एक छद्म रूप में राजा का गुप्तचर भी था। इस दृष्टि से प्रताप बहुत ही परिपक्व साबित हुए थे।
 (लेखक मोहनलाल सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर में इतिहास विभाग में वरिष्ठ शोधार्थी हैं)