शेरदिल सेवाभावी भामाशाह

    दिनांक 19-जनवरी-2021
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के. छगनलाल बोहरा
भामाशाह वह महान व्यक्ति थे जिनके व्यक्तित्व और कतृर्त्व से यह शब्द स्वयं एक महान सम्मान का सूचक बन गया है। वर्तमान में 'भामाशाह सम्मान' ऐसा ही एक प्रतिष्ठित सम्मान है। कोई नाम, कोई व्यक्ति यूं ही सम्मान का सूचक नहंी बन जाता। इसके पीछे होता है उस व्यक्ति का कोई महान त्याग, तपस्या, स्वामिभक्ति, देशभक्ति और प्रशासनिक कुशलता जैसे गुणांे से युक्त तपोपूत जीवन।
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उज्ज्वल वंश परंपरा
भगवान महावीर के उत्तरवर्ती एक आचार्य रत्नसूरी के उपदेशांे से प्रभावित राजपूताना के अनेक क्षत्रियांे ने मांस-मदिरा त्याग कर जैन मत स्वीकार कर लिया था जो ओसवाल कहलाए। इसी ओसवाल वंश में भामाशाह का जन्म 28 जून, 1548 को रणथम्भौर दुर्ग के किलेदार कावडि़या ओसवाल भारमल की पत्नी कर्पूरदेवी की कोख से हुआ। बचपन से ही उन्हें अपने माता-पिता से जैन संस्कारांे के साथ-साथ शस्त्र-विद्या, घुड़सवारी, सैन्य संचालन और राज काज की शिक्षा प्राप्त हुई। वीरता, उदारता, देशभक्ति और स्वामिभक्ति के गुण उनमंे अपनी वंश परंपरा से प्राप्त थे जो जीवन-पर्यन्त उनके हर कार्य मंे परिलक्षित होते हैं।
दासीपुत्र बनवीर को हटाकर उदयसिंह जब मेवाड़ के महाराणा बने तब उन्होंने भारमल को परिवार सहित चित्तौड़ बुला कर मेवाड़ राज्य का कोषाधिकारी नियुक्त कर दिया और एक लाख की जागीर प्रदान कर अपनी सेवा में रख लिया। इन्हीं वषार्ें मंे भामाशाह और उदयसिंह के ज्येष्ठ पुत्र प्रताप की आपस में मित्रता हो गई, जो आजीवन रही। भारत की दो महान विभूतियांे का यह संयोग भविष्य की महान घटनाओं की पृष्ठभूमि थी। कुंवर प्रताप के व्यक्तित्व में बचपन से ही सहज मिलनसारिता के गुण विद्यमान थे। वे गुणग्राहक थे, कुंभलगढ़ के अपने प्रारंभिक जीवन तथा चित्तौड़ मंे किले के नीचे रहते हुए उन्होेेंने समाज के सभी वर्ग के लोगों से सहज, सरल, समरस संबंध विकसित किए। भील जनजाति के लोग उन्हें अपना आत्मीय मान ''कीका'' अर्थात् पुत्र के संबोधन से पुकारते थे। उस काल मंे उनका यही ''राणा कीका'' संबोधन जन- साधारण में अधिक प्रचलित रहा। युद्ध काल मंे अकबर भी उन्हें इसी नाम से संबोधित करता था।
मेवाड़ की आर्थिक उन्नति
भामाशाह के रूप मंे प्रताप को बहुत ही योग्य, विश्वसनीय और कुशल प्रशासक सहयोगी के रूप मंे प्राप्त हुआ, जिन्होंने वंश परंपरा से प्रताप के दादा राणासंागा, पिता उदयसिंह और पुत्र अमरसिंह तक पूर्ण स्वामिभक्ति के साथ अपना सर्वस्व देश के लिए समर्पित कर दिया। 1567 में चित्तौड़ पर अकबर के आक्रमण के समय भामाशाह के पिता कावडि़या भारमल ने चित्तौड़ में ही रहने का निर्णय कर युद्ध करते हुए प्राणोत्सर्ग किया। भामाशाह अपनी माता कर्पूरदेवी और छोटे भाई ताराचंद सहित युवा प्रताप के सहयोगी के रूप में महाराणा उदयसिंह के साथ उदयपुर के पहाड़ांे मंे गोगुंदा आ गए। जहां फाल्गुन पूर्णिमा होली के दिन 1572 मंे उदयसिंह की मृत्यु के बाद प्रताप का राज्याभिषेक होने पर उनके प्रमुख सहयोगी सरदार के रूप में खजांची का कार्यभार संभाला। अपने वित्तीय कौशल से भामाशाह ने मेवाड़ की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। अकबर के आक्रमण के कारण चित्तौड़ मंे हुए तीसरे जौहर और महाराणा उदयसिंह के उदयपुर के पहाड़ों मंे आ जाने की वजह से मेवाड़ राज्य की जो आर्थिक वृद्धि बाधित हो गई थी, उसे प्रताप और भामाशाह की कुशल जोड़ी ने पुन: सुदृढ़ता प्रदान कर अकबर के निकट भविष्य में पुन: संभावित आक्रमण के लिए पर्याप्त तैयारी कर ली। हिंदू ही दूसरे हिंदू को दबा कर अकबर का गुलाम बनाने के प्रयास मंे लगा हुआ था। ऐसे विषम और विपरीत कालखंड मंे भामाशाह जैसे बुद्धिमान, कुशल प्रशासक, और वीर योद्धा ने अपना सभी कुछ देशहित में प्रताप पर न्योछावर कर विश्व के सामने एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। राजा भगवानदास, मानसिंह और मिर्जा खानखाना ने कई तरह के प्रलोभन दिए और कर्मचंद बछावत आदि-आदि के उदाहरण देकर उन्हें अकबर की सेवा में लाने का प्रयास किया, परंतु उनकी स्वामिभक्ति प्रताप और मेवाड़ के प्रति सदैव पर्वत की तरह अविचलित रही।
हल्दीघाटी युद्ध और भामाशाह
18 जून, 1576 को हल्दीघाटी मंे एक हिंदू क्षत्रिय मानसिंह अपनी और अपने फूफा म्लेच्छ अकबर की सारी सैनिक शक्ति लेकर अपने पिता और पूर्वजों के स्वामी रहे मेवाड़ राजवंश के उत्तराधिकारी हिंदू कुल गौरव महराणा प्रताप को पकड़ कर अकबर का गुलाम बनाने आ खड़ा हुआ था। दूसरी ओर दोनांे भाई, भामाशाह और ताराचंद प्रताप के सहयोगी और सजग प्रहरी की तरह महाराणा के पीछे खड़े थे। दोनांे भाइयांे ने जम कर तलवार के जौहर दिखाए। पहले ही हमले में मुगल सेना तितर-बितर होकर भेड़-बकरियों की तरह बनास नदी के पार भाग खड़ी हुई।
सर्वस्व समर्पण
महाराणाा प्रताप के आदेश से पूरे युद्धकाल मंे मेवाड़ मंे खेती-बाड़ी, व्यापार आदि निषिद्ध था, ताकि मुगल सेना को किसी प्रकार से रसद प्राप्त न हो सके। ऐसी स्थिति मंे मेवाड़ के लिए धन जुटाने हेतु भामाशाह ने युक्ति निकाली और मालवा के मुगल इलाकों मंे धावे मारने निकल पड़े। उन्होंने रामपुरा, भाणपुरा, मंदसौर, मालपुरा आदि शाही थानांे पर धावे मार कर वहां के जागीरदारों शाही थानेदारों से दंड वसूल कर भारी धनराशि एकत्र की। धनराशि लेकर वे चूलियां ग्राम मंे महाराणा की सेवा मंे उपस्थित हुए। स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने हेतु उन्होंने 25 लाख रुपए की धनराशि, 20,000 अशर्फियां और अन्य युद्ध सामग्री महाराणा को भेंट की। प्रताप ने भावविभोर हो भामाशाह को गले लगा लिया और कहा, ''स्वतंत्रता संग्राम की इस विकट घड़ी मंे आपका यह सर्वस्व समर्पण अद्भुत है। आपका यह त्याग और देशहित में सर्वस्व समर्पण विश्व कभी भूलेगा नहीं। आपका यश अमर रहेगा।'' भामाशाह के सर्वस्व समर्पण जैसा प्रेरक उदाहरण विश्व मंे अद्वितीय है। युगों तक नई पीढि़यांे को मार्ग दिखाने वाला है। प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया, उन्हें उसी वक्त मेवाड़ राज्य का प्रधान अर्थात् महामंत्री नियुक्त किया। प्रताप द्वारा अत्यंत सम्मानपूर्वक दिया गया यह पद वंश परंपरा से भामाशाह के उत्तराधिकारियों के ही पास रहा। इस संबंध में एक तत्कालीन कवि द्वारा कहा गया यह दोहा बहुत प्रसिद्ध है-
भामो परधानो करे, रामो कीधो रद्द। मुगलां बाहर करण नूं मिलिया आय मरद्द॥
भामाशाह की आक्रामक नीति
भामाशाह द्वारा समर्पित धनराशि से सेना और सैन्य सामग्री एकत्रित कर अकबर को खदेड़ने की जो योजना प्रताप ने बनाई, उसका प्रारंभ दिवेर से किया गया। अब तक जो रक्षात्मक युद्ध नीति थी, उसके स्थान पर आक्रामक नीति अपना कर अकबर पर आक्रमण किया गया जिससे दुश्मन स्वयं भयभीत हो भाग जाए। महाराणाा प्रताप, कुंवर अमरसिंह और अनेक वीरों सहित भामाशाह और छोटे भाई ताराचंद स्वयं इस अभियान में शामिल हुए। कुंवर अमरसिंह के भाले के एक ही वार से अकबर का चाचा सुल्तान खां भाले सहित जमीन में गड़ गया। मुगल सेना के अनेक योद्धा प्रताप और भामाशाह के हाथों मारे गए। भामाशाह और ताराचंद ने युद्ध मंे अद्भुत पराक्रम दिखाया। शाही सेना अपने सेनापतियों की ऐसी दुर्दशा देख सिर पर पांव रख भाग खड़ी हुई। इस युद्ध के समाचार मात्र से अनेक शाही थानों के थानेदार और सैनिक अपनी जान बचाकर अजमेर की तरफ भाग निकले। प्रताप का यह विजय अभियान भामाशाह के सहयोग से सारे मेवाड़ से मुगल सेना को खदेड़ कर चावण्ड मंे सुरक्षित राजधानी स्थापित करने तक जारी रहा। मेवाड़ में एक कहावत बहुत प्रचलित है जिसने इस बात को गलत साबित कर दिया कि राजधानी जीत लिए जाने मात्र से देश जीत लिया गया। युद्ध के समय महाराणा राजधानी छोड़कर सुरक्षित पहाड़ों में चले जाते और वहीं से संघर्ष जारी रखते। अत: कहावत हो गई, 'जठे राणाजी वठेई उदयपुर'
नवनिर्माण और भामाशाह
गहन वन और पर्वतों से घिरे शत्रु आक्रमणांे से सुरक्षित चावण्ड मंे प्रताप ने अपनी राजधानी स्थापित की और मेवाड़ के प्रधान महामंत्री के रूप में भामाशाह ने आर्थिक सुदृढ़ता, नवनिर्माण, कृषि का विकास, खदानों आदि के कुशल प्रबंधन से राजस्व बढ़ाने की एक सुव्यवस्थित शासन प्रणाली प्रारंभ की। जावरमाता की खदानों से चांदी प्राप्त कर राजकोष को संपन्न किया गया। राजपरिवार के लिए महलों और कर्मचारियांे के लिए भवनों के निर्माण सहित चावण्डा माता का मंदिर और जैन मंदिरांे का निर्माण कराया गया। विद्वानांे द्वारा उन्नत कृषि और जल प्रबंधन, ज्योतिष, आयुर्वेद आदि विद्याआंे के विकास के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखवाए गए। कला कौशल की उन्नति के लिए कलाकारांे को सम्मान और आश्रय दिया गया। चित्रकारी की चावण्ड शैली विकसित हुई।
भामाशाह के प्रधानमंत्रित्व काल में शांति और सुशासन से मेवाड़ की श्रीवृद्धि होेने लगी। लेकिन इसी बीच एक दिन वह हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। चावण्ड मंे ही 18 जनवरी, 1597 को महाराणा प्रताप ने इस दुनिया को छोड़ दिया। उनका जाना भामाशाह के लिए अत्यंत दु:खदायी था। उस विषम परिस्थिति में भी भामाशाह ने धैर्य नहीं खोया, उनकी स्वामिभक्ति अविचलित रही। प्रताप के बिछोह को भी उन्होंने अपनी ताकत बनाया। प्रताप के जीवन की साधना को आगे बढ़ाया।
प्रताप के अंतिम समय में उनके हृदय में था कि मेरी मृत्यु के बाद कहीं संघर्ष के कष्टों से घबरा कर मेरा उत्तराधिकारी अमरसिंह मुगलों के हाथ में मेवाड़ की स्वतंत्रता बेच न दे, तब भामाशाह और अन्य सरदारों ने उनके सम्मुख प्रतिज्ञा ली थी कि हम अपने जीतेजी कभी मेवाड़ को परतंत्र नहीं होने देंगे, हम आपके इस स्वतंत्रता संघर्ष को सदैव कायम रखेंगे, मेवाड़ को सुखी-समृद्ध और शक्तिशाली बनाएंगे। भामाशाह द्वारा दिलाए गए इस विश्वास के बाद ही प्रताप ने शांतिपूर्वक अपनी देह का त्याग किया। प्रताप से किए गए इस वादे को पूरा करने के लिए वे पुन: कर्मपथ पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ने लगे। वे मेवाड़ को चहुंओर से सुरक्षित, शक्तिशाली और समृद्ध बनाने के प्रयत्न में जुट गए। उदयपुर में महलों का निर्माण करवा कर राजपरिवार और महाराणा अमरसिंह पुन: उदयपुर आकर यहीं से राज्य का संचालन करने लगे। अमरसिंह ने उन्हें बचपन से अपने पिता के साथ मेवाड़ के लिए संघर्षरत और अपना सर्वस्व न्योछावर करते देखा था अत: उनके प्रति पूर्ण: विश्वास और अपने पिता की ही तरह उनका सम्मान करते थे। भामाशाह भी अपने समस्त जीवन के अनुभव, बुद्धिबल और सामर्थ्य से मेवाड़ के चहुंमुखी विकास के लिए अपने शेष जीवन के अंतिम क्षण तक लगे रहे। उदयपुर के चारों ओर पर्वत घाटियों की किलाबंदी, किलों की मरम्मत और सुदृढ़ीकरण, खेती और सिंचाई की सुव्यवस्था, व्यापार वाणिज्य के लिए उचित वातावरण और विश्वास, वनों और खदानों का उचित प्रबंधन कर उन्होंने राजकोष के लिए राजस्व का समुचित प्रबंध किया। मेवाड़ राज्य के प्रधान का पद वंश परंपरा से भामाशाह के उत्तराधिकारियों के पास लंबे काल तक रहा।
11 जनवरी, 1600 को इस विलक्षण महापुरुष ने अपने कर्मशील जीवन की कीर्तिपताका को दानवीरों के श्रेष्ठ यश को आकाश में ऊंचा स्थापित कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। उदयपुर के आहाड़ स्थित राजपरिवार के समाधिस्थल महासतियां में उनकी समाधि (छतरी) आज भी भामाशाह के सम्मान की मौन साक्षी है।
(लेखक राजस्थान विद्यापीठ में अध्यापन एवं भारतीय इतिहास सकंलन योजना के संगठन मंत्री है)