श्री रामचरितमानस की शोध कथा और गीता प्रेस के भगीरथ प्रयास

    दिनांक 20-जनवरी-2021
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डॉ. संतोष कुमार तिवारी

गीता प्रेस ने न केवल काफी शोध के बाद रामचरित मानस का प्रकाशन किया, बल्कि इसे घर-घर तक पहुंचाया। गीता प्रेस से पहले भी इस ग्रंथ का प्रकाशन हुआ, लेकिन मूल्य के बहुत अधिक होने के कारण यह आम लोगों तक नहीं पहुंच सका
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गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित सुंदरकाण्ड 
रामचरितमानस के गुटका संस्करण का आवरण
 कल्याण (1938), वर्ष 13 अंक 1 का आवरण। इसी अंक में गीता प्रेस से रामचरितमानस पहली बार छपा


गोस्वामी तुलसीदास ने आम बोल-चाल की भाषा में रामचरितमानस लिखा, जिसे जन-जन व घर-घर तक पहुंचाने का कार्य किया गीता प्रेस ने। गीता प्रेस, गोरखपुर ने 1938 से रामचरितमानस का प्रकाशन शुरू किया। इसके पहले भी रामचरिमानस उपलब्ध था, लेकिन महंगा होने के कारण आम आदमी की पहुंच से दूर था। 1883 में चंद्रप्रभा छापाखाना, बनारस से छपी प्रति (मानस अनुशीलन, लेखक शंभु नारायण चौबे, पृष्ठ-8, नागरी प्रचारणी सभा, वाराणसी) का मूल्य चार रुपये था। वहीं, गीता प्रेस द्वारा 1945 में प्रकाशित रामचरितमानस (गुटका संस्करण, कुल पृष्ठ 678) का मूल्य मात्र 50 पैसे था। 2019 में इस संस्करण का मूल्य बढ़ कर 60 रुपये हो गया। गीता प्रेस ने पहली बार 1938 में भावार्थ सहित रामचरितमानस प्रकाशित किया था। यह ‘कल्याण’ का वर्ष 13, अंक एक था। बाद में पहली बार 1939 में इसका गुटका संस्करण छपा, जिसमें भावार्थ नहीं था। तब से अब तक इस संस्करण की एक करोड़ से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं।


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श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार पर 1992 में जारी डाक टिकट

रामचरितमानस के प्रकाशन से पूर्व गीता प्रेस ने करीब 5 साल (1933-1938) तक इस विषय पर गहन शोध कराया था। इसी कारण गीता प्रेस के रामचरितमानस का पाठ सबसे शुद्ध पाठ माना जाता है। रामानन्द सागर ने ‘रामायण’ धारावाहिक बनाने से पहले ‘वाल्मीकि रामायण’ (संस्कृत), ‘कृत्तिवास’ (बांग्ला रामायण) व ‘कंबन’ (तमिल रामायण) के हिंदी अनुवाद तथा रामचरितमानस (हिंदी) का अध्ययन किया था। वे शोध कार्य के लिए गीता प्रेस, गोरखपुर भी गए थे और वहां कुछ दिन ठहरे भी थे। उनके धारावाहिक ‘रामायण’ ने 16 अप्रैल, 2020 को विश्व रिकॉर्ड बनाया। इस दिन दुनियाभर में 7.70 करोड़ लोगों ने इसे देखा था। गोस्वामी तुलसीदास ने 16वीं सदी के अंत में रामचरितमानस की रचना की थी, जबकि ‘वाल्मीकि रामायण’ करीब 3,000 साल पहले संस्कृत में लिखी गई थी। मानस की प्राचीन लीथो प्रति 1762 ई. की है, जो केदार प्रभाकर छापाखाना, काशी में छपी थी। इसमें चौपाइयां अलग-अगल पंक्तियों में न होकर मिलाकर छपी हैं। रामचरितमानस की दूसरी प्रति 1810 ई. की है, जिसकी छपाई संस्कृत यंत्रालय, काशी में हुई थी तो तीसरी प्रति 1839 में मुकुंदीलाल जानकी छापाखाना, कलकत्ता से छपी। कहने का तात्पर्य यह कि 1762 से पहले रामचरितमानस या उसके अंश हस्तलिखित पाण्डुलिपि के रूप में ही उपलब्ध थे। ये मूल मानस या अन्य पाण्डुलिपियों की नकल थे। इस कारण लेखन में कुछ त्रुटियां भी हुई होंगी। 

गीता प्रेस की स्थापना 1923 में हुई। 1926 से मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ का प्रकाशन शुरू हुआ, जिसके आदि संपादक ब्रह्मलीन श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (1892-1971) उपाख्य भाईजी थे। गीता प्रेस ने रामचरितमानस के प्रकाशन का फैसला किया तो भाईजी ने प्राचीन पाण्डुलिपियों की खोज की। इस क्रम में 1933 में वे तुलसीदास की जन्मस्थली राजापुर (चित्रकूट) जाने वाले थे, पर व्यस्तता व अस्वस्थता के कारण उन्होंने गंभीरचंद दुजारी जी व चिम्मनलाल गोस्वामी जी को राजापुर भेजा, जहां उन्हें अयोध्याकाण्ड की हस्तलिखित पाण्डुलिपि मिली। दोनों ने इसकी नकल की, फिर श्रावणकुंज (अयोध्या) गए और बालकाण्ड की हस्तलिखित पाण्डुलिपि की नकल की। ये बातें गंभीरचंद दुजारी जी के वयोवृद्ध पुत्र व जाने-माने लेखक हरिकृष्ण दुजारी जी ने बतार्इं। वे गीता प्रेस में अवैतनिक कार्य करते थे। तमाम सामग्री एकत्र कर दोनों गोरखपुर आए। इस बीच, चिम्मनलाल जी के पिता की तबीयत बहुत खराब हो गई और उन्हें बीकानेर जाना पड़ा। उनके साथ पं. नन्ददुलारे वाजपेयी भी गए, जो गीता प्रेस में ही काम करते थे। वे हिंदी व संस्कृत के विद्वान थे। दोनों ने बीकानेर में पाण्डुलिपियों पर विचार-विमर्श, चिंतन और शोध किया। इस दौरान वे भाईजी के संपर्क में रहे, जो अपने राजस्थान में पैतृक निवास रतनगढ़ में थे और वहीं से ‘कल्याण’ का संपादकीय कार्य देख रहे थे। 

हरिकृष्ण दुजारी जी ने बताया कि रामचरितमानस की कई पाण्डुलिपियां ढूंढी गर्इं। उत्तर प्रदेश में लखीमपुर जिले के धौरहरा स्थित दुलही ग्राम से सुन्दरकाण्ड की जो पाण्डुलिपि मिली, उसे संभवत: तुलसीदास ने हाथ से लिखा है। 1938 में भाईजी के नेतृत्व में चिम्मनलाल गोस्वामी और नन्ददुलारे वाजपेयी ने ‘कल्याण’ का मानसांक निकला। हरिकृष्ण बताते हैं कि 928 पृष्ठों वाले मानसांक की 40,600 प्रतियां छपी थीं, जो तुरंत बिक गर्इं। इस कारण ‘कल्याण’ के सभी नियमित ग्राहकों को भी प्रतियां नहीं भेजी जा सकीं। इसलिए उसी वर्ष 10,500 प्रतियां फिर छापी गर्इं। उसी वर्ष मानसांक के दो परिशिष्ट भी निकाले गए। इन्हें मिला कर मानसांक 1122 पृष्ठ का हो गया। उस समय ‘कल्याण’ का वार्षिक मूल्य चार रुपये तीन आना अर्थात 4.18 रुपये था। पूरे वर्ष में ‘कल्याण’ के 1762 पृष्ठ छपे। इसमें गीता प्रेस को हजारों रुपये का नुकसान हुआ, लेकिन भाईजी ने इसकी भरपाई अपने स्रोतों और मित्रों के माध्यम से की। मानसांक में रामचरितमानस और तुलसीदास पर कई लेख भी छपे हैं।

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पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर पर 1973 में जारी डाक टिकट।

रामचरितमानस एक काव्य है। इसलिए इसके चिंतन और शोध में संगीत का ज्ञान भी जरूरी है। भाईजी को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का भी ज्ञान था। उन्होंने कुछ समय महान शास्त्रीय संगीतज्ञ श्रीविष्णु दिगम्बर पलुस्कर (1872-1931) से शिक्षा ली थी। पलुस्कर जी से उनका संपर्क मुंबई प्रवास के दौरान हुआ था। चिम्मनलाल गोस्वामी को भी गायन का ज्ञान था और उनका स्वर बहुत अच्छा था। रामचरितमानस में सात काण्ड हैं। इनके अंतर्गत 27 श्लोक, 4608 चौपाई, 1074 दोहे, 207 सोरठा और 86 छन्द हैं। इसमें से हर श्लोक, चौपाई आदि पर कई-कई बार भाईजी, चिम्मनलाल गोस्वामी और पं. नन्ददुलारे वाजपेयी ने विचार-विमर्श किया। मानसांक में ‘सम्पादक का निवेदन’ शीर्षक से भाईजी ने लिखा है: ‘‘श्री गोस्वामीजी के हाथ का लिखा ग्रन्थ तो कहीं मिला नहीं; और हस्तलिखित अथवा मुद्रित जितने भी नए पुराने संस्करण मिले, उन सभी में पाठ भेद की प्रचुरता मिली। ऐसे भी अनेक पाठ भेद हैं जिनमें अर्थ में महत्वपूर्ण अंतर पड़ जाता है। इसमें किसी की नीयत पर सन्देह दोषारोपण नहीं किया जा सकता है।’’

तुलसीदास की रचनाएं
रामचरितमानस के अतिरिक्त गीता प्रेस ने गोस्वामी तुलसीदास की अन्य रचनाएं, यथा-वैराग्य संदीपनी, बरवै रामायण, रामाज्ञा प्रश्न, कवितावली, दोहावली, गीतावली, विनयपत्रिका, जानकी-मंगल, पार्वती-मंगल, हनुमान चालीसा, हनुमान बाहुक आदि भी प्रकाशित की हैं।

क तो मूल से नकल करने वालों में चूक हो गई हो। दूसरा, गोस्वामी तुलसीदास ने कविता को और भी सुन्दर और पूर्ण बनाने के ख्याल से जहां-तहां, जिसमें कि सब लोगों का चित्त उसकी ओर आकर्षित हो, पाठ को बदला हो। बहुत खोजने और जांच-पड़ताल करने पर समय की दृष्टि से हमें तीन प्रतियां पुरानी मिलीं- एक श्रीअयोध्याजी के श्रावणकुंज का बालकाण्ड जो संवत् 1661 का लिखा है, दूसरा राजापुर का अयोध्याकाण्ड, जो कि श्री गोस्वामीजी के हाथ का लिखा कहा जाता है। और तीसरा दुलही का सुन्दरकाण्ड जो संवत् 1672 का लिखा है और श्रीगोस्वामीजी के हाथ का लिखा कहा जाता है। उसकी लिपि भी गोस्वामीजी की लिपि से मिलती है। बहुत सुन्दर अक्षर हैं। अतएव बाल, अयोध्या और सुन्दर, इन तीनों काण्डों का उपर्युक्त तीनों के आधार पर और शेष चार काण्डों को श्री भागवतदासजी की प्रति के आधार पर पाठ संशोधन और राजापुर की प्रति में प्राप्त व्याकरण के अनुसार सम्पादन करके एक छपने योग्य प्रति पं. चिम्मनलाल गोस्वामी एम.ए., और श्री नन्ददुलारे वाजपेयी एम.ए. ने मिलकर तैयार की। मानसांक में दोहे, चौपाइयों का अर्थ भी छापा गया है। वह न तो केवल शब्दार्थ है और न ही विस्तृत टीका। उसे भावार्थ कहना चाहिए।’’


भारत में पहला छापाखाना
भारत में पहला छापाखाना पुर्तगाल से गोवा आया था। इसे 1556 में सेंट पॉल कॉलेज में लगाया गया। इसमें पुर्तगाली भाषा में ईसाई मत के प्रचार के लिए पुस्तकें छपती थीं। गोवा तब एक पुर्तगाली उपनिवेश था। कुछ समय बाद गोवा के सेंट एग्नेस  कॉलेज में एक और छापाखाना शुरू हुआ। इसमें भारतीय भाषाओं में पुस्तकें छपने लगीं। इसमें मराठी में फादर टामस स्टीफेंस की ‘क्राइस्ट पुराण’ छपी।


मानसांक के पृष्ठ संख्या 1122 पर भाईजी ने लिखा है- ‘‘मानसांक के सम्पादन में हमें बहुत सज्जनों से सहायता मिली है। इनमें महात्मा श्री अंजनीनन्दनशरण जी से जो सहायता मिली है, वह अकथनीय है। मानस के पाठ निर्णय में और उसका भावार्थ लिखने में आपकी (पुस्तक) ‘मानस-पीयूष’ से सबसे बढ़कर सहायता प्राप्त हुई है। श्रावणकुंज और श्री भागवतदासजी की अविकल नकल की हुई प्रतियों को मांगते ही कई बार आपने यहां भेजकर हमें अनुग्रहीत किया है। आप सरीखे सच्चे भक्तों की कृपा ही हमारा सहारा है। इसके अतिरिक्त पं. रामबहोरी जी शुक्ल एम.ए., पं. चन्द्रबली जी पाण्डेय एम.ए., महात्मा बालकराम जी विनायक, राय श्रीकृष्णदास जी, पं. हनुमानजी शर्मा प्रभृति ने सामग्री-संग्रह आदि में बड़ी सहायता दी है। सम्पादन कार्य में मेरे सम्मान्य मित्र श्रीगोस्वामी जी और श्रीवाजपेयी जी से सहायता मिली ही है। आदरणीय बन्धु पं. शांतुन बिहारी जी द्विवेदी, भाई माधव जी और श्री देवधर जी से बड़ा सहारा मिला है। अपने अपने ही हैं, इनका नाम भी बड़े संकोच के साथ ही लिखा गया है, केवल व्यवहार दृष्टि से।’’

समुद्र का प्रलाप
पिछले साल ‘कल्याण’ के वर्तमान संपादक श्री राधेश्याम खेमका जी से बातचीत के दौरान यह पूछा कि रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड की एक चौपाई में कहा गया है कि ‘ढोल गंवार सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’ क्या आप इस बात से सहमत हैं? इस पर राधेश्याम खेमका जी का उत्तर था- ‘‘पूरे संदर्भ में देखें तो यह समुद्र का प्रलाप है, न कि समाज के लिए कहा गया है। हमारे हिंदू धर्म में नारी को बहुत ऊंचा और सम्मानित दर्जा दिया गया है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।’ अर्थात् जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं।


अपनी पुस्तक ‘कल्याण पथ: निर्माता और राही’ (पृष्ठ संख्या 222) में डॉ. भगवती प्रसाद सिंह लिखते हैं, ‘‘रामचरितमानस के प्रचार में गीता प्रेस का सर्वाधिक योगदान है। मानस के विभिन्न संस्करण प्रकाशित कर करोड़ों की संख्या में उसकी प्रतियां देश-विदेश पहुंचाने का श्लाघनीय प्रयास उसके द्वारा हुआ है। रामचरितमानस का प्रथम संस्करण ‘कल्याण’ के विशेषांक के रूप में ही प्रकाशित हुआ। इसमें प्रामाणिक और शुद्ध पाठ देने की भरसक चेष्टा की गई है। मानसांक की एक विशिष्ट उपलब्धि इसके चित्र भी हैं। इसमें जितने रेखा चित्र एवं रंगीन चित्र दिये गए हैं, उतने शायद ही मानस के किसी संस्करण में हों। अब तक इस लोक विश्रुत ग्रंथ (रामचरितमानस) के जितने भी संस्करण निकले हैं, गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित संस्करण उनमें सर्वोत्कृष्ट और समाहृत है। पोद्दारजी ने उसके पाठ संपादन में वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ ही साहित्यिक दृष्टि को भी यथोचित महत्व दिया है, उसकी विशद भूमिका इसका प्रमाण है।’’

चिम्मनलाल गोस्वामी ने भाईजी के काम को आगे बढ़ाया
श्री चिम्मनलाल गोस्वामी (1900-1974) हिंदी, अंग्रेजी व संस्कृत के विद्वान थे। वे 1933 में भाईजी के व्यक्त्वि से आकृष्ट होकर बीकानेर से गोरखपुर आ गए। 1934 में गीता प्रेस के अंग्रेजी मासिक ‘कल्याण-कल्पतरु’ के प्रथम संपादक बने, पर ‘कल्याण’ के काम में भी सहयोग देते रहे। 1939 से सहायक संपादक के तौर पर उनका नाम भी ‘कल्याण’ में छपने लगा। उनके संपादकत्व में ‘कल्याण-कल्पतरु’ के 10 विशेषांक निकले। ये थे- ईश्वरांक, गीतांक, वेदांतांक, श्रीकृष्णांक, भगवान्नमांक, धर्म-तत्व-अंक, योगांक, भक्त-अंक, श्री कृष्णलीला-अंक व गो-अंक। भाईजी के ब्रह्मलीन होने पर ‘कल्याण’ के संपादकत्व का भार भी गोस्वामी जी के कंधों पर आ गया। उनके संपादकत्व में ‘कल्याण’ के तीन विशेषांक निकले- श्रीरामांक, श्रीविष्णु-अंक और श्रीगणेशांक। उन्होंने गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस का शुद्ध पाठ देने में तो महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ही थी, इसके अलावा, रामचरितमानस की टीका, संपूर्ण भागवत और गीता तत्वविवेचनी का भी अंग्रेजी में अनुवाद किया। साथ ही वाल्मीकि रामायण (संस्कृत) का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया था। जब वे उत्तरकाण्ड का एक तिहाई अनुवाद कर चुके थे, तभी बीमार पड़ गए, फिर उनका अवसान हो गया। उनके कार्यकाल के दौरान गीता प्रेस से संस्कृत और अंग्रेजी में जितना साहित्य पत्रिका रूप में या पुस्तक रूप में छपता था, उसकी शुद्धता एवं प्रामाणिकता का अधिकांश श्रेय गोस्वामी जी के परिश्रम को है।

मानसांक में इस काव्य ग्रंथ का हिंदी भावार्थ भाईजी ने किया। बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद चिम्मनलाल गोस्वामीजी ने किया। आज गीता प्रेस नौ भाषाओं हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, बांग्ला, उड़िया, गुजराती, तेलुगु, कन्नड़ और नेपाली में रामचरितमानस प्रकाशित कर रहा है। असमिया भाषा में भी प्रकाशन की तैयारी है। पाठकों की सुविधा के लिए गीता प्रेस ने रामचरितमानस के सातों काण्डों को अलग-अलग पेपरबैक संस्करण में भी प्रकाशित किया है।  गीता  प्रेस के अतिरिक्त एक संगठन है गीता सेवा ट्रस्ट। इसके एप (ँ३३स्र२://ॅ्र३ं२ी५ं.ङ्म१ॅ/ंस्रस्र) पर रामचरितमानस सहित गीता प्रेस की 200 से अधिक पुस्तकें मुफ्त पढ़ी जा सकती हैं। इस पर धीरे-धीरे गीता प्रेस की अन्य पुस्तकें भी अपलोड हो रही हैं। इस समय गीता प्रेस 1700 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित करता है।    (लेखक झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं)