ग्रहण का विज्ञान

    दिनांक 20-जनवरी-2021
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प्रो. भगवती प्रकाश
सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के पीछे बड़ा विज्ञान है। इसका वर्णन प्राचीन भारतीय साहित्य में विस्तार से किया गया है। इससे पता चलता है कि हमारे पूर्वज कितने बड़े खगोलशास्त्री थे और उनके पास हर तरह की विधा की जानकारी थी 
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सूर्य ग्रहण का एक दृश्य

समाज में अंधविश्वास है कि राहु और केतु नामक राक्षसों द्वारा सूर्य व चंद्रमा को ग्रस्त कर  लेने के कारण सूर्य और चंद्र ग्रहण होता है। लेकिन इस अंधविश्वास से परे प्राचीन भारतीय वाङ्मय में सूर्य और चंद्र ग्रहण का उन्नत खगोल-सम्मत विमर्श है। शास्त्रों में चंद्रमा व पृथ्वी के परिक्रमा मार्गों द्वारा एक-दूसरे को काटने से बनने वाले दो कटान बिंदुओं के खगोलसिद्ध चाप या संपात बिंदुओं को राहु-केतु कहा गया है। अमावस्या और पूर्णिमा पर इनकी सूर्य से निकटता पर ग्रहण होता है। आधुनिक खगोल भौतिकीय विमर्श भी यही है। दो रेखाओं द्वारा एक-दूसरे को काटने से बनने वाले ‘कटान बिंदु’ चाप या संपात कहलाते हैं। चंद्र व पृथ्वी के भ्रमण मार्ग वृत्ताकार/ अण्डाकार हैं, जहां एक वृत्त के दूसरे को काटने के बिंदु ‘कटान बिंदु’ चाप या संपात कहलाते हैं।

आधुनिक खगोल भौतिकीय विमर्श

आधुनिक खगोल भौतिकीविदों के अनुसार राहू व केतु चंद्र के परिक्रमा पथ व सूर्य के क्रान्तिवृत्त के दो कटान बिंदुओं के चाप या संपात 5 अरब वर्ष पूर्व सौर मंडल के निर्माण के उपरांत कभी चंद्र के परिक्रमा पथ में हुए किसी भीषण ऊर्जापात से उत्पन्न 5 डिग्री के धरातलीय झुकाव से उत्पन्न हुए हैं। ग्राहम जोन्स आदि खगोल भौतिकीविदों ने कंप्यूटर प्रतिरूपणों (सिमुलेशंस) से स्पष्ट किया है कि इस ऊर्जापात के अभाव में चंद्र के परिक्रमा पथ में यह 5 डिग्री झुकाव नहीं आने पर राहू-केतु कहे जाने वाले दो कटान बिंदु नहीं बनते, लेकिन तब प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को अनिवार्यत: अर्थात् प्रतिवर्ष 12-12 सूर्य व चंद्र ग्रहण होते।

एरिजोना विश्वविद्यालय के खगोल भौतिकीविद् कावेह पहलेवन के अनुसार, ‘‘5 अरब वर्ष पूर्व हमारे सौर मंडल के निर्माण व चंद्र की उत्पत्ति के उपरांत कभी चंद्रमा के परिक्रमा पथ में उपजे इस अप्रत्याशित झुकाव के अभाव में पृथ्वी के परिक्रमा पथ अर्थात् क्रांतिवृत्त पर कटान बिंदु रूपी राहू-केतु के अस्तित्व में नहीं आते। लेकिन, तब पृथ्वी व चंद्र को अनेक उल्कापातों का सामना करना पड़ता।’’ विज्ञान की शीर्षस्थ पत्रिका ‘नेचर’ के 25 नवंबर के अंक में प्रकाशित ड्यूक विश्वविद्यालय की खगोल भौतिकीविद् रॉबिन केनप के लेख ‘दी मून्स टिल्ट फार गोल्ड’ के अनुसार पृथ्वी की ऊपरी सतह पर उपलब्ध स्वर्ण, प्लेटिनम आदि लौह प्रिय श्रेणी की मूल्यवान धातुएं भी तब पृथ्वी की अतल गहराइयों में ही मिल पाती जो आज भू-सतह के नीचे मिल जाती हैं। जापानी खगोल भौतिकीविद् ग्राहम जोन्स के 2017 के कंप्यूटर साइम्यूलेशन आधारित लेख ‘‘मिस्टरी आॅफ दी मून्स टिल्टेड आॅरबिट’’ के अनुसार भी कथित रहस्यपूर्ण व भीषण ऊर्जापात से चंद्र विमंडल वृत्त में आए धरातलीय झुकाव के अभाव में राहू-केतु रूपी उत्तरी व दक्षिणी कटान बिंदुओं का निर्माण संभव नहीं था। चंद्रमा के 24,00,000 किमी के परिक्रमा वृत्त की तुलना में, 390 गुने बडेÞ 94 करोड़ किमी के पृथ्वी के परिक्रमा वृत्त को चंद्रमा के परिक्रमा वृत्त के लिए, इस झुकाव के बिना काटना संभव नहीं था। और इस कटान अभाव में राहु-केतु की उत्पत्ति अकल्पनीय है। परिक्रमा पथों को काटने से राहू के कथित विच्छेद से बने आरोही और अवरोही दो पात के रूप में राहू व केतु के निर्माण का पौराणिक विमर्श यही है।

राहु-केतु रूपी कटान बिंदुओं का उत्पत्ति काल
पांच अरब वर्ष पूर्व चंद्र की उत्पत्ति हो जाने के बाद चंद्र के परिक्रमा मार्ग में भीषण ऊर्जापात-जनित इस 5 डिग्री धरातलीय झुकाव की खगोल-भौतिकी के अनुमान के अनुरूप ही भारतीय पौराणिक विमर्श में भी क्रांतिवृत्त के विभाजन से राहू-केतु रूपी दो संपातों की उत्पत्ति का कथन है। पौराणिक विमर्शों के अनुसार 1़ 95 अरब वर्ष पूर्व घटित यह घटना वर्तमान श्वेत वाराह कल्प के आरंभ से लेकर इसी कल्प में 47़ 72 करोड़ वर्ष पूर्व आरंभ हुए चाक्षुष मन्वन्तर की रही हो सकती है। 

ग्रहण गणना की भारतीय परंपरा
ग्रहण का विमर्श वैदिक संहिताओं, वाल्मीकी रामायण, महाभारत एवं प्रमुख खगोल ग्रंथों में उपलब्ध है। महाभारत में द्वारिकावासियों ने सूर्य ग्रहण की अग्रिम गणना करके ही कुरुक्षेत्र के लिए द्वारिका से प्रस्थान किया होगा। ‘गोल परिभाषा’ नामक ग्रंथ में भी राहु व केतु का यही विमर्श उद्धृत है-

विमण्डले भवृत्तस्य सम्पात: पात उच्यते।
एवं चन्द्रस्य यौ पातौ तत्राद्यौ राहुसंज्ञक:
द्वितीय: केतुसंज्ञस्तौ ग्राहकौ चन्द्रसूर्ययो:॥

अर्थ: सूर्य का विमंडल वृत्त क्रांतिवृत्त या भवृत्त और चंद्र का भ्रमण वृत्त चंद्र विमंडल वृत्त कहलाता है। क्रांतिवृत्त के चंद्र विमंडल वृत्त को काटने से बने कटान बिंदुओं या संपात (पात) स्थानों में उत्तरी कटान बिंदु राहु तथा दक्षिणी संपात बिंदु केतु कहलाता है।

भारतीय वाङ्मय में ग्रहण संबंधी विमर्श

ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के सूर्य सिद्धांत से लेकर आर्यभट्ट, वराहमिहिर और भास्कराचार्य के ग्रहण विमर्श अग्रानुसार हैं-
सूर्य ग्रहण : सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा के आने पर सूर्य का एक भाग छिप जाने पर आंशिक सूर्य ग्रहण और कुछ देर के लिए सूर्य के पूरी तरह से चंद्रमा के पीछे छिप जाने पर पूर्ण सूर्य ग्रहण होता है।
चंद्रग्रहण : पूर्णिमा की रात में सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी के आने पर सूर्य की रोशनी चंद्रमा पर नहीं पड़ने पर चंद्र ग्रहण होता है। सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा के एक रेखा में आने पर पूर्णिमा की रात में आंशिक अथवा पूर्ण चंद्र ग्रहण होता है।

पौराणिक व आधुनिक खगोलीय विमर्श में समानता
प्राचीन वाङ्मय व आधुनिक खगोलशास्त्र के अनुसार चंद्रमा के परिक्रमा मार्ग में आए झुकाव से चंद्र विमंडल वृत्त एक बार क्रांतिवृत्त को काटकर दक्षिण से उत्तर एवं दूसरी बार उत्तर से दक्षिण की ओर जाता है। इन कटावों के आरोही पात को राहू एवं अवरोही पात को केतु कहते हैं। ये क्रांतिवृत्त पर आमने-सामने 180 डिग्री के अंतर पर ही रहते हैं। अमावस्या अथवा पूर्णिमा को इनके सूर्य के पास होने से सूर्य ग्रहण एवं चंद्र ग्रहण होता है।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)