हां, मुझे ‘इस्लामोफोबिया’ है!

    दिनांक 20-जनवरी-2021
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कर्नल मूल भार्गव (से.नि.)

जब भी कोई किसी आतंकवादी घटना की निंदा करता है या उसके विरोध में लेख लिखता है, तो उनके आका इसे ‘इस्लामोफोबिया’ कहकर उस पर पर्दा डालने का प्रयास करते हैं। इसके पीछे के गणित को समझने की जरूरत

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फ्रांस के राष्ट्रपति, जिन्होंने जिहादियों के विरुद्ध अभियान छेड़ रखा है, के विरोध में प्रदर्शन करते इंडोनेशिया के मुसलमान। (फाइल चित्र)


इस्लामी जिहादियों के घृणित कत्लेआम के विरोध में किसी भी कार्रवाई या वक्तव्य को अक्सर ‘इस्लामोफोबिया’ शब्द से बदनाम करने और दबाने का प्रयास किया जाता है। अरे भाई, ‘फोबिया’ का मतलब होता है ‘डर’। जब लोग जिहादियों को फ्रांस की सड़कों पर किसी का गला काटते देखेंगे, तो ‘इस्लामोफोबिया’ होगा ही। जब सीरिया में इस्लाम के नाम पर महिलाओं से बलात्कार और उनकी नीलामी देखेंगे या कश्मीर में रातों-रात कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुए अत्याचार देखेंगे, तो ‘इस्लामोफोबिया’ होगा ही। जब लोग श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के बच्चों के कत्ल या संभाजी के ऊपर हुए घृणित अत्याचार की कहानी सुनेंगे, तो  ‘इस्लामोफोबिया’ होगा ही। जब लोग 9/11 की दहशतगर्दी और 26/11 के मुंबई हमले के वीडियो देखेंगे, तो ‘इस्लामोफोबिया’ होगा ही। जब इन सब कत्ल और अपराध करने वालों के मुंह से ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे सुनेंगे तो ‘इस्लामोफोबिया’ होगा या नहीं होगा? हां, मुझे तो ‘इस्लामोफोबिया’ है, और बड़ा जबरदस्त है। और किसी भी शांति पसंद व्यक्ति को ऐसी हरकतें देखकर ‘इस्लामोफोबिया’ होना ही चाहिए।

और ये हत्यारे यूं ही नहीं बन जाते। इन्हें बाकायदा मजहबी  आकाओं द्वारा मानसिक रूप से तैयार किया जाता है और राजनीतिक आकाओं द्वारा हिंसक हथियार और संरक्षण दिया जाता है। चाहे दिल्ली में अंकित सक्सेना के हत्यारे हों या बल्लभगढ़ में निकिता के, उनके पीछे कोई ‘ताहिर खान’ या नेता चचा होता है। चाहे पुलवामा के आतंकी हों या ओसामा बिन लादेन, उनके पीछे कोई ‘इमरान खान’ या ‘परवेज मुशर्रफ’ होता है। चाहे ग्रीस में गला काटने वाले हों या लंदन में बम विस्फोट करने वाले, उनके पीछे कोई ‘एर्दोगन’ या ‘महातिर मोहम्मद’ होता है।

जब महातिर मोहम्मद जैसे 92 साल के मुस्लिम नेता या एर्दोगन जैसे इस्लामिक राष्ट्र के नेता और उन जैसे अनेक मुस्लिम नेता खुलकर इस्लाम के नाम पर की जा रहीं हत्या के समर्थन में आ जाएं तो फिर छुपाने को क्या रह जाता है? इसलिए अब थोथले तर्क देना बंद करें और आतंकवाद के असली मकसद को समझने का प्रयास करें

तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता और मुस्लिम मतों के लालची राजनेता इस बात को सदा से छुपाते आए हैं। जब संचार साधनों का इतना विकास नहीं हुआ था तब वे ऐसा कर भी पाते थे। और अगर कभी एकाध बार इस बात पर हंगामा हो भी जाए तो वे अनाप-शनाप तर्क देकर इसको दबा दिया करते थे। प्रयास अब भी हो रहे हैं। पर अब उन्हीं के शागिर्द उन्हें झूठा साबित करने में लगे हैं। अब इस्लामिक हत्यारे कत्ल करते हैं तो उनके ये वैचारिक आका उसको छुपा नहीं पाते और वह सारे विश्व में कुछ ही घंटों में सब तस्वीरों और वीडियो के जरिए अकाट्य सबूतों के साथ फैल जाता है। लेकिन हत्यारों को इससे खास फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उन्हें मौलवी द्वारा दिखाई गई जन्नत नजर आ रही होती है।

उनके वैचारिक आका उनकी इन करतूतों को कभी पश्चिमी सभ्यता, तो कभी हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों, तो कभी किसी राष्ट्रवादी राजनेता के मत्थे मढ़ने का अपना काम जारी रखते हैं। ठीक उसी तरह जैसे नालायक बच्चों के मां-बाप अपने बच्चों के अपराध को पड़ोसियों के मत्थे मढ़ने की कोशिश करते हैं। इस क्रूरता का अमेरिका या फ्रांस से कोई लेना-देना नहीं है। इस क्रूरता का किसी विशेष घटना या संगठन से भी कोई लेना-देना नहीं है। इस्लाम शायद इकलौता मजहब है जिसमें किसी पशु का गला काटने को त्योहार के रूप में मनाया जाता है। अर्थात् बालपन से ही मुस्लिम बच्चों के लिए गला रेतना एक त्योहार रूपी उल्लास भर है। फिर वह गला पशु से मानव का कब बन जाता है, पता ही नहीं चलता।

जहां अन्य लोकतंत्रों के अध्यक्ष सर्वधर्म समभाव की बात करते हैं, वहीं एर्दोगन, इमरान खान, महातिर मोहम्मद या रफसंजानी जैसे नेता खुलेआम इस्लामिक कातिलों को संरक्षण देते हैं और उन्हें साधन भी मुहैया कराते हैं। और उनके वामपंथी आका किसी एक वर्ग के नेता द्वारा दिए गए एक वक्तव्य या लेख को भी ‘इस्लामोफोबिया’ का नाम दे देते हैं। वे यह तर्क देना बंद करें कि ऐसा करने वाले इस्लाम को नहीं जानते। आप होते कौन हैं इस्लाम की व्याख्या करने वाले? मैं इस्लाम की व्याख्या अबू बकर बगदादी, जो इस्लामिक शिक्षा में पीएचडी था, की ठीक मानूं या कोट-पैंट पहने उस नेता या पत्रकार की व्याख्या मानूं जिसे मस्जिद में घुसने भी नहीं दिया जाता? जब महातिर मोहम्मद जैसे 92 साल के मुस्लिम नेता या एर्दोगन जैसे इस्लामिक राष्ट्र के नेता और उन जैसे अनेक मुस्लिम नेता खुलकर इस्लाम के नाम पर की जा रहीं हत्या के समर्थन में आ जाएं तो फिर छुपाने को क्या रह गया? जब इस्लाम के नाम पर काटे गए गले के विरोध में एक भी मुस्लिम सड़क पर न उतरे पर एक कार्टून दिखाए जाने पर हर देश और शहर में हिंसक हुजूम दिखाई दे तो फिर छुपाने को क्या रह जाता है? इसलिए अब ये थोथले तर्क सुनाना बंद कीजिए और यह मानिए कि दुनिया के शांति पसंद लोगों को ‘इस्लामोफोबिया’ होना बिल्कुल स्वाभाविक है। उन्हें बच्चा समझ के काल्पनिक बातों से बहकाना बंद करें और वास्तव में खड़े ‘इस्लामोफोबिया’ के दैत्य का संहार करने में मदद करें। 

इस्लामिक राष्ट्रों के नेताओं ने अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। उन्होंने बिना लाग-लपेट के यह स्पष्ट कर दिया है कि इस्लाम ही उनकी प्राथमिकता है और उसके नाम पर निर्दोर्षों के गले काटने वाले का भी वे बेशर्मी से समर्थन करेंगे। ऐसा नहीं चल सकता कि इस्लामिक राष्ट्र तो अन्य मत-पंथों और देशों के खिलाफ खुलकर बोलें और कानून बनाएं, जबकि अन्य पंथों की जनसंख्या वाले देशों पर वामपंथी विचारक और इस्लामिक राष्ट्र असहिष्णुता का ठप्पा लगाएं। ऐसे कत्लेआम के विरुद्ध असहिष्णु बनना ही अब एक इलाज है। और सड़क पर एक कत्ल करने वाले व्यक्ति को जेल में भेजने से कुछ नहीं होगा। उस क्रूर मानसिकता की जड़ में जाकर उसका अंत करना होगा। वह प्रथा जो बचपन से त्योहार के रूप में गला काटना सिखाए, उसे समाप्त करना होगा। कुरान और मस्जिदों से जो कत्लेआम की शिक्षा दी जाती है, उसे सख्ती से बंद किया जाए। जो राष्ट्र ऐसे कुकृत्यों को सीधे या परोक्ष रूप से समर्थन दें, उनके विरुद्ध सीधी सैनिक कार्रवाई होनी चाहिए। अगर सड़क पर गले काटने से आतंकवादियों को रोकना है तो लोकतांत्रिक ताकतों के गले में झूठे मानवाधिकार के रूप में पड़ी जंजीरें काटनी होंगी। संयुक्त राष्ट्र और सेकुलर  देशों को कट्टरवादी इस्लामिक देशों के प्रति कड़े कदम उठाने पड़ेंगे और वहां से निर्यात होने वाली जिहादी मानसिकता को सख्ती से रोकना पड़ेगा।

जो भी मुसलमान चाहते हैं कि अन्य मत-पंथ के लोग  ‘इस्लामोफोबिया’ से बचें, उन्हें सबसे पहले अपने मजहब में सुधार लाना होगा। जो बुद्धिमान मुस्लिम हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि विश्व के 85 प्रतिशत शरणार्थी मुसलमान ही क्यों हैं? क्यों वे अपने देशों को छोड़ कर भाग रहे हैं और दूसरों के दरवाजों पर भीख मांग रहे हैं? शरण को कोई भी अपना अधिकार न समझे। यह सेकुलर देशों की केवल उदारता है और वे इसे किसी भी दिन बंद करने का हक रखते हैं। इसलिए ‘इस्लामोफोबिया’ का आलाप बंद कीजिए और ‘कट्टर’ इस्लाम को सच्चे इस्लाम से अलग करिए।
    (लेखक रक्षा विशेषज्ञ हैं)