साहित्य और संस्कृति में पर्यावरण चिंतन

    दिनांक 21-जनवरी-2021
Total Views |
आशुतोष सिंह

भारतीय संस्कृति और साहित्य में पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी अनेक बातें मिलती हैं। हमारे पर्व प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन को बढ़ावा देते हैं, वहीं प्राचीन भारतीय साहित्य में भी प्रकृति को बचाने के संदेश दिए गए हैं

a46_1  H x W: 0

वट सावित्री पर वट वृक्ष की पूजा करतीं महिलाएं। यह पर्व पर्यावरण रक्षा का संदेश देता है।

अनादिकाल से पर्यावरण संरक्षण का भाव भारतीय चिंतन के केंद्र में रहा है। भारतीय वैदिक साहित्य में कुछ पुराणों के नाम अग्नि, वायु, वरुण इत्यादि के नाम पर रखे गए हैं। इनका उद्देश्य है अग्नि, वायु व वरुण के महत्व को बताना, ताकि समाज पर्यावरण संरक्षण को धर्म की आज्ञा और इसमें अपने योगदान को ईश्वरीय सेवा के समान माने। वैदिक ऋषियों ने सर्वप्रथम पर्यावरण पर चिंतन करते हुए सृष्टि को प्रारंभिक अवस्था में जिस रूप में देखा, उसका वर्णन ऋग्वेद की ऋचाओं (नासदासीत्रो सदासीत्तदानी... 10/129, 1-7) में उपलब्ध होता है। यहां ऋषि कहते हैं कि सृष्टि के आरंभ में न सत् था न असत्। फिर ब्राह्मण ग्रंथ (पृ. 158) में भी पुन: प्रश्न उठाया गया कि कौन जानता है यह सब? और कौन उसका वर्णन  कर सकता है? किंतु इसके संपूर्ण समाधान के लिए ऋग्वेद संहिता में मंत्र है-हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे... (ऋग्वेद, 10/121/1)। इसमें सृष्टि के विकास-क्रम को बताया गया है कि सर्वप्रथम जीवों का स्वामीभूत हिरण्यगर्भ अस्तित्व में आया और उसी से सृष्टि का अविच्छिन्न विकास हुआ आदि-आदि। विज्ञान के अनुसार प्रकृति सदैव तीन रूपों में विद्यमान रहती है-कण, प्रतिकण एवं विकिरण। चाहे वह सृष्टि उत्पत्ति का समय हो या अन्य कोई समय। वैदिक सिद्धांत के अनुसार प्रकृति में मूल तीन वर्ग, ‘त्रय: कृण्वति भुवनस्य रेत’ (ऋग्वेद, 7/33/7) विद्यमान हैं। ये हैं वरुण, मित्र और अर्यमा। इनकी संयुक्त सत्ता को अदिति कहा गया है, जो अनादि एवं अखंड सत्ता है। व्यक्तिगत रूप से ये आदित्य कहाते हैं। ये अनादि शाश्वत सत्ता के अंगभूत हैं।

वैदिक अवधारणाओं के अनुसार सृष्टिकाल से दृश्य जगत तक भौतिक पदार्थ पांच अवस्थाओं में निष्क्रमण करते हैं। भारतीय वैदिक व पौराणिक साहित्य चिंतन में प्राकृतिक घटकों से कल्याण की अभिलाषा को स्वस्ति कहा गया है। इस पर आचार्य सायण एवं नैरुक्त का विचार है कि अप्राप्य वस्तु की प्राप्ति योग है एवं प्राप्ति का संरक्षण क्षेम है (ऋग्वेद, 5/51/11)। अतएव सहज-सुलभ व सरल प्राकृतिक घटकों का सुरक्षित रहना स्वस्ति है। इस प्रकार पर्यावरण को संरक्षित रखने की उदात्त भावनाएं हमें अनेक स्थलों पर देखने को मिलती हैं।

प्राचीन वैदिक ऋषियों व विद्वानों ने उन समस्त पर्यावरणीय उपकारक तत्वों को देवसम्य बताकर उनके महात्म्य को अभिव्यक्त तो किया ही है, साथ ही साथ मानवीय जीवन में उनके पर्यावरणीय महत्व को भी स्वीकार किया है। इन देवताओं के लिए मनुष्य का जीवन ऋणी हो गया और वैदिक व शास्त्रीय परिकल्पनाओं व अवधारणाओं ने मानव को पितृऋण और ऋषिऋण के साथ-साथ देवऋण से भी उन्मुक्त होने की ओर संकेत किया है। वे देवऋण से मुक्त होने के लिए भी कर्तव्य करें। ऋषियों ने उसके लिए यह मर्यादा व सीमाएं स्थापित की हंै। पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए जिन देवताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है उनमें सूर्य, वायु, वरुण (जल) एवं अग्नि देवताओं से रक्षा की कामना की गई है। ऋग्वेद (1/158/1, 7/35/11) तथा अथर्ववेद (10/9/12) में दिव्य, पार्थिव और जलीय देवों से कल्याण व मंगल की कामेच्छा स्पष्ट रूप से उल्लिखित है।

मत्स्य पुराण में कहा गया है कि दस कुंओं के बराबर एक बावड़ी होती है, 10 बावड़ी के बराबर एक तालाब, 10 तालाबों के बराबर एक पुत्र और 10 पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है।

पर्यावरण के घटकों में समन्वय होना ही सुख, शांति व समृद्धि का आधार है। प्राकृतिक घटकों में सुख, शांति, वैभव व समृद्धि की भावनाएं अनेक स्थलों पर हमें उपलब्ध होती हैं। जैसे-पृथ्वी हमारे लिए कंटकहीन और उत्तम रहने योग्य हो (ऋग्वेद, 7/35/3 तथा यजुर्वेद, 36/13)। हमारे दर्शन के लिए अंतरिक्ष शांतिप्रिय हो (ऋग्वेद, 10/35/5)। वह आकाश जिसमें बहुत पदार्थ रखे जाते हैं, हमारे लिए सुखगामी हो (ऋग्वेद, 7/35/2)। भास्कर अपने विस्तृत तेज के साथ हमारे लिए सुख करने वाला हो (ऋग्वेद, 10/35/8)। सूर्य हमारे लिए सुखकारी तपे (यजुर्वेद, 36/10), चंद्रमा हम लोगों के लिए सुखरूप हो (ऋग्वेद, 7/35/7)। नदी, समुद्र और जल हमारे लिए सुखगामी हो (ऋग्वेद, 7/35/8)। पीने का जल और वर्षा का जल हमारे लिए कल्याणकारी हो (यजुर्वेद, 36/12)। जलधाराएं तुम्हारे लिए अमृत वस्तुएं बरसाएं (अथर्ववेद, 8/6/5)। ज्योतिर्मय अग्नि हम लोगों के लिए सुखमयी हो (ऋग्वेद, 7/35/4)। इसी प्रकार पर्यावरण के विभिन्न घटकों के लिए शुभ आकांक्षाएं की गई हैं। जैसे- शीघ्र चलने वाली वायु हम लोगों के लिए सब ओर से सुखरूप होकर बहे (ऋग्वेद, 7/35/4)। पवन हमारे लिए सुखकारी चले (यजुर्वेद, 36/10)। पूर्व आदि चारों दिशाएं व विदिशाएं हमारे लिए सुखरूप हों (ऋग्वेद, 7/35/8)। समस्त दिशाएं हमें मित्रवत सुख दें (अथर्ववेद, 19/15/16)। विशेष दीप्ति वाली उष्माएं हमारा कल्याण करें (ऋग्वेद 7/35/10)। दिन और रात्रि हमारे लिए सुखकारी हो (यजुर्वेद 36/11)। हम दिन और रात में अभय रहें (अथर्ववेद, 19/15/16)। मेघ हम प्रजाजन के लिए शांतिप्रद हों (ऋग्वेद, 7/35/10)। बिजली और गरज के साथ शब्द करते हुए पर्जन्य (मेघ) देव की वर्षा कल्याणकारी हो (यजुर्वेद, 36/10)। आज वैज्ञानिकों ने भी मौसम में बदलाव को नियंत्रित करने में बादलों की भूमिका को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। टेक्सास ए एंड एम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शाइमा नसीरी ने अपने शोध में कहा है, ‘‘मध्यम स्तर के बादल छोटी-छोटी बूंदों और बर्फ के कणों का निर्माण करते हैं।’’                    
पर्यावरण अध्ययन व पर्यावरण संरक्षण भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं, 

रीझि-खीझि गुरुदेव सिष सखा सुविहित साधू।
तोरि खाहु फल होई भलु तरु काटे अपराधू।।
अर्थात् तुलसीदास ने वृक्ष से फल खाना तो उचित माना, लेकिन वृक्ष को काटना अपराध माना है। श्रीराम ने भी 14 वर्ष का वनवास अपने सौभाग्य के कारण माना जो उनके प्रकृति प्रेम को इंगित करता है। उन्होंने वनवास अवधि के मध्य स्थानीय राजाओं के प्रलोभनों अर्थात् रात्रि विश्राम के प्रस्तावों को ठुकराया और अपनी इस अवधि में प्रकृति की गोद में बैठना स्वीकार किया। भगवान श्रीकृष्ण का बाल्यकाल प्रकृति की गोद में बीता। उन्होंने तो पग-पग पर पर्यावरण संरक्षण के संकेत दिए।

550 ई.पू. के लगभग महाराज सिद्धार्थ के पुत्र वर्धमान ने भी प्रकृति को ईश्वर का साकार प्रतिबिम्ब माना। उन्होंने कहा है कि प्रकृति बिना किसी स्वार्थ व भेदभाव के सृष्टि के समस्त प्राणियों की समस्त मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। ये वर्धमान ही अपने इस प्रकृति प्रेम व प्रकृति के प्रति वचनबद्धता के कारण महावीर स्वामी बने। इन्होंने अपने मत जैन मत की पूजा-पद्धति में पवित्र साल वृक्ष को जोड़ा और महावीर स्वामी बनकर जैन मत के मूलभूत सिद्धांतों को प्रतिपादित किया। जैन मत में साल वृक्ष को ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है। 600 ई.पू. के लगभग महाराज शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ को जब वास्तविक जीवन का बोध हुआ तो वे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए निकल पड़े। उन्होंने आश्रय एक वृक्ष के नीचे लिया और यहीं से उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। वह पीपल वृक्ष था जिसे बोधिवृक्ष भी कहा जाता है।

भारतीय संस्कृति का एक-एक पर्व पर्यावरण संरक्षण व प्रकृति प्रेम की ओर संकेत करता है। चाहे वह रक्षाबंधन हो या मकर संक्रांति या हरियाली तीज। उत्तर भारत का प्रसिद्ध लोक पर्व ‘वट अमावस्या’ है। इसमें सुहागिन माताएं वट वृक्ष की आराधना व पूजन करती हैं। वट पूजन से हमारी माताएं यह आस्थावादी संकेत संपूर्ण जगत को देती हैं कि इस वृक्ष के पूजन से पति परमेश्वर को लंबी आयु मिलेगी इसलिए इसे मत काटो। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि दस कुंओं के बराबर एक बावड़ी होती है, 10 बावड़ी के बराबर एक तालाब, 10 तालाबों के बराबर एक पुत्र है और 10 पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है-

दश कूप समा वापी, दशवापी समोहद्र:।
दशहृद सम: पुत्रो, दशपुत्रो समो द्रुम:।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे पूर्वजों ने कदम-कदम पर प्रकृति रक्षा की सीख दी है।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं)