पतंग पर सेकुलर पाबंदी!

    दिनांक 21-जनवरी-2021
Total Views |
     देवांशु झा
जल्लीकट्टू, जन्माष्टमी और दीपावली के बाद सेकुलरों ने मकर संक्रांति को भी अपनी सूची में जोड़ लिया है। गत दिनों राजस्थान की गहलोत सरकार ने लोगों से अपील की कि वे मकर संक्रांति पर पतंगें न उड़ाएं।
44_1  H x W: 0

राजस्थान सरकार द्वारा विभिन्न अखबारों में प्रकाशित करवाया गया विज्ञापन

जल्लीकट्टू, जन्माष्टमी और दीपावली के बाद सेकुलरों ने मकर संक्रांति को भी अपनी सूची में जोड़ लिया है। गत दिनों राजस्थान की गहलोत सरकार ने लोगों से अपील की कि वे मकर संक्रांति पर पतंगें न उड़ाएं। तर्क दिया गया कि पतंगों के मांझे से कटकर पक्षियों की जान चली जाती है। इस संबंध में एक विज्ञापन छपवाया गया। विज्ञापन को देखकर कोई एक क्षण को सोच भी सकता है कि आह कैसी दया है, कैसी अपार करुणा.. तथागत का ध्यान आता है।

वैसे पक्षियों की पीड़ा तो शुद्ध सनातनी पीड़ा है। यहां तो कपोत की रक्षा के लिए सम्राट अपना पूरा शरीर ही दान कर गए थे। आज भी सनातनियों के बीच पक्षियों को भोजन-पानी देने, उनकी जीवनरक्षा करने का भाव अत्यंत गहरा है। समस्या केवल यह है कि कांग्रेस का सारा प्रेम, सारी चिंता, सारे आग्रह, सारे आह्वान केवल हिंदू पर्व-त्योहारों पर ही होते हैं। उन आग्रहों में हमारी परंपरा का गला घोंट देने का दुराग्रह होता है। जैसे, दीपावली पर पटाखे चले तो प्रदूषण फैल गया..। इसलिए पटाखे मत चलाइए! जल्लीकट्टू पर पशुओं के साथ दौड़ लगी तो पशु पीड़ित हो गए। इसलिए जल्लीकट्टू बंद कर दीजिए! दही-हांडी की ऊंचाई इतनी हुई तो क्यों हुई..गोविंद गिर कर चोटिल हो गया। उसे कम कर दीजिए! अव्वल यह कि जब पूरा पर्व ही खून-खच्चर से भर उठा तब इनकी बोलती बंद हो गई। मुंह पर ताला लग गया। न कोई आह्वान, न कोई अपील। अपील कर दी तो फतवे जारी हो जाएंगे। फतवे की फांस कौन झेले?

बकरीद पर लाखों-लाख बकरियां, गाय, भैंस, ऊंट काट कर खून के नाले बहा दिए जाते हैं तब कांग्रेसी नेता और अन्य सेकुलर आंखें बंद कर लेते हैं। बापू के पक्के चेले हो जाते हैं। बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो। मुर्गे और कबूतरों की कौन कहे..

साल में एक बार आने वाली दीपावली पर पटाखों से प्रदूषण नहीं फैलता। और दही-हांडी की ऊंचाई अधिक होने से किसी जीव को कष्ट नहीं पहुंचता। मगर जहां राजनीति का आधार ही अल्पसंख्यक तुष्टीकरण हो..वहां मकर संक्रांति पर पतंगों के उड़ाए जाने से भी समस्या होने लगती है।   

क्रिसमस और न्यू ईयर पर पटाखे चलते हैं तो प्रदूषण नहीं फैलता! यह पूरी दुनिया में मनाया जाने वाला पर्व है! मगर एक साधारण सनातनी हिंदू दीपावली पर अपनी प्रसन्नता के लिए पटाखे नहीं चला सकता। तब वह देश वातावरण, पर्यावरण इन सब पर संकट बन कर छा जाता है। आप कल्पना कीजिए कि मकर संक्रांति पर पतंगों के उड़ाए जाने से पक्षियों के घायल होने की इक्की-दुक्की घटनाओं पर इनका दिल भर आया और सामूहिक कत्लोगारत पर इनके मुंह से चूं तक निकली। भला क्यों?

बात बस इतनी-सी है कि कांग्रेसी सेकुलरवाद में हिंदू परंपराओं को नष्ट कर देने का हठ है। दीपावली पर पटाखे न चलाओ.. जल्लीकट्टू पर पशुओं के साथ मत दौड़ो..दही-हांडी पर हांडी को ज्यादा ऊपर न लटकाओ.. मकर संक्रांति पर पतंगें न उड़ाओ। हां, बकरीद और क्रिसमस पर जम कर मांस, मच्छी, तीतर बटेर काटो, दावत उड़ाओ। गले मिलो, खाओ मौज करो। तब पशु-पक्षियों को कष्ट नहीं होता! कई बार यह सब देखना हमें चकित करता है। कुछ दिनों पहले तक हिंदू समाज इन आह्वानों पर गंभीरता से विचार भी किया करता था लेकिन धीरे-धीरे वह इस कुचक्र को समझने लगा कि ये तो नितांत ही एकतरफा और हिंदू भावना विरोधी हैं। अगर पशुवध या पक्षियों की पीड़ा से किसी को दुख होता है, वह समग्रता में होना चाहिए। जहां पशु-पक्षियों की नृशंस हत्या होती है, उसका एक विकृत उल्लास होता है। उन्हें काटा जाता है, आनंद मनाया जाता है। गोया, वह कोई पुरुषार्थ का प्रदर्शन हो.. किंतु दुर्भाग्य से तब सेकुलर खेमे में सन्नाटा छाया रहता है।

मकर संक्रांति पर पतंगों का उड़ाया जाना एक प्राचीन परंपरा है, जिसके साथ अनगिनत स्मृतियां और आनंद के क्षण जुड़े होते हैं। उसमें उल्लास का स्वच्छ आलोक होता है। पतंगों को उड़ाए जाने के दौरान पक्षियों के घायल होने की छिटपुट घटनाएं होती भी हैं तो प्लास्टिक के धागों से होती हैं। तो, उन धागों का निर्माण बंद किया जाए। साल में एक बार आने वाली दीपावली पर पटाखों से प्रदूषण नहीं फैलता। और दही-हांडी की ऊंचाई अधिक होने से किसी जीव को कष्ट नहीं पहुंचता। मगर जहां राजनीति का आधार ही अल्पसंख्यक तुष्टीकरण हो..वहां मकर संक्रांति पर पतंगों के उड़ाए जाने से भी समस्या होने लगती है।