जल-आन्दोलन : जमीन को तर करती सड़कें

    दिनांक 21-जनवरी-2021
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डॉ. क्षिप्रा माथुर
बारिश में अक्सर सड़कों पर ढेरों पानी जमा होने के दृश्य खूब दिखाई देते हैं। सोचिए, अगर यह पानी प्यासी धरती की कोख में जाए तो भूजल स्तर को ऊपर लाने में कितनी मदद मिलेगी। इसकी सफल और बेहद कारगर तकनीक तैयार करके दिखाई है जयपुर निवासी प्रो. पृथ्वी सिंह कांधल ने
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आम सड़क (पीछे) पर जमा बारिश का पानी, प्रोफेसर पृथ्वी सिंह कांधल  (प्रकोष्ठ में) की तकनीक से बनी ‘ पोरस एस्फाल्ट’ की सड़क (आगे) से देखते-देखते जमीन में समा जाता है

शहरों-कस्बों-गांवों की हर वह सड़क मुझे सालती है जिसे कच्ची मिट्टी छोड़े बगैर, दोनों किनारों तक डामर से पाट दिया जाता है। जहां परम्परा को फीतों के नाप ने इसलिए तोड़ दिया, क्योंकि यहां इंच-इंच की कीमत लगाई जाने लगी। फुटपाथ बनाने के बहाने मिट्टी या पत्थर के चौकों के बीच सीमेंट की सीलबंदी कर दी गई। आएदिन टूटने-फूटने वाली सड़क को ठीक करने के बहाने उस पर एक के बाद एक परत चढ़ती जाती है और सड़कें मकानों से ऊंची हो जाती हैं।

हमारी सांसों के मुफ्त सिलेण्डर, यानी पेड़ों तक को नहीं बख्शतीं ये सड़कें। जब बनाई जाती हैं तो अक्सर पेड़ों की जड़ों तक खींच ली जाती हैं, बिना यह ख्याल किए कि बगैर खाद-पानी कैसे पनपेगा कोई पेड़। उन्हें उखाड़ कर या काट कर अपने पैर पसारती इन सड़कों की सबसे तकलीफदेह बात यह है कि कई इलाकों के शहरी निकायों और पंचायतों में सड़कों की साज-संभाल में बरती जाने वाली कोताही के बीच यह जुमला आज भी कायम है कि ’सड़कों में गड्डे हैं कि गड्डों में सड़कें।’ गड्डों की भराई के बाद भी उसके निशान वहां से गुजरते हर राहगीर, हर पहिए को महसूस होते हैं। इन फटी या पैबन्द वाली सड़कों की ठोकरों से जो गिरते-संभलते हैं, उन्हें बखूबी मालूम है कि इन खतरों का मोल जान देकर भी चुकाना पड़ सकता है। और कई बार ऐसे जख्म भी मिलते हैं जो कभी नहीं भरते।

तरक्की के रास्ते
देश को आज उस रास्ते की तलाश है जो इनसान को अपनी जड़ों से जोड़ दे, जो सालों-साल टिका रहे, जो कुदरत से नाता कायम रखे। और तरक्की के सफर की शुरुआत जÞमीन से ही होती है। जÞमीन से जÞमीन का नाता सड़कें ही कायम करती हैं, वही दुनियावी दूरियां भी मिटाती हैं। बस इसी मायने में हमारी सड़कें बेशकीमती हैं। मगर हमें इन्हें बनाने और दुरुस्त करने में तकनीकी बेपरवाही की जो कीमत देनी पड़ रही है, वह बहुत बड़ी है। अब देश में पांचवीं विज्ञान, तकनीक, नवाचार नीति आ रही है जिसका जिÞक्र जÞमाने भर में होने वाला है, लेकिन हम तकनीक के बिगाड़ में कहां से कहां आ पहुंचे हैं, इसका एक नमूना हैं हमारी सड़कें।

श्रीनगर को कन्याकुमारी से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग-44 देश की सबसे लम्बी सड़क है। पूरे हिन्दुस्थान में करीब 58 लाख किलोमीटर सड़कें बिछी हुई हैं। हम सड़क की बिछावन में दुनिया में दूसरे पायदान पर हैं। मगर इस बात पर फख्र तब होना चाहिए जब हम यह कहने के काबिल हों कि हमारी सड़कें सुरक्षित भी हैं। पूरे देश को एक धागे में पिरोने वाले राजमार्गों की सड़कों की भरपूर हिफाजत के बावजूद वहां भी गड्डों की भराई पर करोड़ों रु. का सालाना खर्च हो जाता है। और आम आदमी तो ज्यादातर आम सड़कों पर ही चलता है। यही आम सड़कें हर साल इतने लोगों की जान ले लेती हैं।

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जयपुर के गांधीनगर रेलवे स्टेशन पर लगा बोर्ड, जो बताता है कि वहां प्रो. कांधल की तकनीक से पार्किंग की सड़क बनाई गई है  (फाइल चित्र)

‘पोरस एस्फाल्ट’ से बनने वाली पार्किंग डिजाइन की सतह आम सड़क जैसी ही नजर आएगी , लेकिन इसमें 77 मिलीमीटर एस्फाल्ट बिछा होता है जो छननी की तरह काम करता है। इसके नीचे 225 मिलीमीटर पत्थरों की मोटी परत बिछाई जाती
है। यहां से पानी नीचे की मिट्टी में पहुंच जाता है

हमारे रास्ते दुनिया में सबसे जानलेवा रास्तों में शुमार हो चुके हैं। तकनीकी तौर पर आसमानी उड़ानें भरने वाले दौर में जब सड़कें बनती हैं तो इतनी उम्मीद तो की ही जाती है कि वे ज्यादा वक्त तक टिकी रहेंगी, पानी की संगत में नहीं उधडेÞंगी, तेज ताप में पिघलेंगी नहीं और जिस जÞमीन पर बिछी होंगी, उस पर हवा-पानी भी बरकरार रखेंगी। दुनिया के तमाम अमीर देशों की तरक्की में सबसे बड़ा हाथ वहां की मजबूत सड़कों का है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी ने एक मौके पर कहा था कि उनका देश अमीर इसलिए नहीं है कि वहां की सड़कें अच्छी हैं बल्कि सड़कें अच्छी होने की वजह से ही यह देश अमीर हो पाया है। नाजÞ करने की बात यह है कि अमेरिका जैसे देश की सड़कों की बेहतरी में भी एक भारतीय का हाथ है जोे अपनी जानकारी की चाबी अब भारत को ही सौंपना चाहते हैं। लेकिन बात सिर्फ मजÞबूत सड़कों की नहीं, बल्कि हमारी प्यास बुझाने की भी है, जिसका रिश्ता भी सड़कों से ही है।

सड़क तकनीक की तह
दुनिया का सबसे बड़ा एस्फाल्ट सड़क शोध संस्थान अमेरिका के अलबामा राज्य के आबर्न विश्वविद्यालय में है। यहां के सहनिदेशक रह चुके श्री पृथ्वी सिंह कांधल को इस जाने-माने संस्थान में प्रोफेसर एमेरिटस का दर्जा हासिल है। उम्र के एक पड़ाव पर आकर कुछ सालों पहले वे भारत वापस आकर बसे हैं। यहां उन्होंने देश की सड़कों को दुरुस्त करने और तकनीकी खामियों को दूर करने का बीड़ा उठाया तो उनका सामना यहां के तकनीकी संस्थानों, ठेकेदारों, सिविल अभियांत्रिकी के जानकारों और नौकरशाही से हुआ। उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि शोध, शिक्षा और समझ के स्तर पर कमी का खामियाजÞा पूरा देश भुगत रहा है। इस खाई को पाटना बेहद जÞरूरी है। अस्सी के दशक में पेनसिलवेनिया स्टेट के फ्रेंकलिन इंस्टीट्यूट और वहां मुख्य बिटुमन इंजीनियर रहे प्रोफेसर कांधल के बनाए फॉर्मूले को अमेरिका में काम में लिया जाने लगा। वहां पार्किंग डिजाइन में इसका प्रयोग बड़े पैमाने पर हुआ और सतह का सारा पानी जÞमीन में जाने लगा। इसके बाद तो इस फॉर्मूले का इस्तेमाल दुनिया भर में होने लगा। केलिफोर्निया राज्य में इन्हीं ‘पोरस सड़कों’ का इस्तेमाल कर तूफान में कहर मचाने वाले पानी के प्रबन्धन सम्बन्धी 150 परियोजनाएं बनाई गइं।

आने वाले बीस साल में देश की 40 फीसदी आबादी के प्यासे रहने का अंदेशा है। बरसते पानी को सहेजना, बूंद-बूंद बचत आदत में लाना, खेती में पानी की बर्बादी रोकना, पानी को फिर से इस्तेमाल में लाना और  साथ ही पानी के पारम्परिक स्रोतों की साज- संभाल करना हमारी नीतियों में झलकने तो लगा है लेकिन सड़क
के जÞरिए पानी की बचत पर कोई पुख्ता सोच,
नीति और अनुमान अभी मौजूद नहीं है


भारत के शहरी इलाकों में यदि इस तकनीक का उपयोग हो तो आस-पास की इमारतों से पाइप के जÞरिए छतों का पानी इस तरह बनी सार्वजनिक पार्किंग में छोड़ा जा सकता है। ‘पोरस एस्फाल्ट’ से बनने वाली पार्किंग डिजाइन की सतह आम सड़क जैसी ही नजÞर आएगी लेकिन इसमें 77 मिलीमीटर एस्फाल्ट बिछा होता है जो छननी की तरह काम करता है। इसके नीचे 225 मिलीमीटर पत्थरों की मोटी परत बिछाई जाती है। यह परत बरसात का पानी कुछ वक्त के लिए जमा करके रखती है और यहां से नीचे की मिट्टी में इन पत्थरों से धीरे-धीरे पानी अपना रास्ता तलाश लेता है। यूं कई शहरों में बारिश के पानी को सहेजने के लिए मकान बनाते वक्त ही इसका जरूरी इन्तजाम किए जाने को कहा गया है जिसकी नाफरमानी ही होती रही है। सड़कों की बनावट पर अभी से गौर करें तो तेजी से बसती हुई बस्तियों में बनाए जाने वाली बड़ी-बड़ी पार्किंग वाली जगहें बारिश के पानी को जमीन में जाने का रास्ता देने के काबिल हो सकती हैं। सरकारी पार्किंग की जगहों को भी छननीदार एस्फाल्ट तकनीक से बनाकर पानी सहेजने की मुहिम से जोड़ दिया जाए तो हमारी जल-शक्ति में जरूर इजाफा हो सकेगा। देश के सबसे साफ-सुथरे रेलवे स्टेशन का खिताब पाने वाले जयपुर शहर के गांधीनगर रेलवे स्टेशन पर नमूने के तौर पर ऐसा पार्किंग स्थल प्रोफेसर कांधल की पहल और उन्हीं की निगरानी में बनाया भी गया जिसके नतीजे हमारी जÞमीन-जलवायु में भी इसकी कामयाबी पर मोहर लगाते हैं।

सड़क-सफर की प्यास
नीति आयोग ने आगाह कर ही दिया है कि देश के 21 बड़े शहरों की कोख में पानी नहीं बचा है और आने वाले बीस साल में देश की 40 फीसदी आबादी के प्यासे रहने का अंदेशा है। बरसते पानी को सहेजना, बूंद-बूंद बचत आदत में लाना, खेती में पानी की बर्बादी रोकना, पानी को फिर से इस्तेमाल करने के तरीकों पर काम करना और साथ ही पानी के पारम्परिक स्रोतों की साज- संभाल करना हमारी नीतियों में झलकने तो लगा है लेकिन सड़क के जÞरिए पानी की बचत पर कोई पुख्ता सोच, नीति और अनुमान अभी मौजूद नहीं है। बीते दौर में बनी बावड़ियां और तालाबों की तकनीक भी इतनी भरोसे की थी कि बरसात का पानी बच भी जाता, आस-पास के सारे इलाकों की नमी भी कायम रहती और आड़े वक्त में यह सहेजा हुआ पानी ही प्यास बुझाने का जÞरिया भी बनता।

शहरों की सड़कें हों या गांवों की, अब पर्यावरण की फिक्र के बगैर विकास के कदम आगे बढ़ाना देश-दुनिया की सेहत के खिलाफ है। शहरी इलाकों के गली-मुहल्लों में बिछाई जाने वाली नई सड़कें पोरस यानी छननीदार बनाई जा सकती हैं। पहले से बनी सड़कों के दोनों किनारों की खुदाई कर वहां ‘पोरस एस्फाल्ट’ बिछा दिया जाए तो भी पानी को जमीन में जाने का रास्ता मिल जाएगा। अभी के मुकाबले इस काम में करीब 17 फीसदी खर्च जरूर ज्यादा आएगा, लेकिन इस तरीके से सड़क पर गिरने वाला 95 फीसदी पानी सड़क को उधेडेÞ बगैर जÞमीन में जाएगा। तकनीकी पकड़ की यह जमापूंजी अब देश के लिए काम आए तो ये एक मायने में जल-क्रान्ति ही होगी।

प्रोफेसर कांधल कहते हैं कि माने लें, करीब छह बीघा यानी 18,540 वर्ग गज वाली शहरी कॉलोनी की सड़कों और यहां बने अंदाजन 73 मकानों की छतों पर जो 640 मिलीमीटर बरसात का पानी गिरेगा वह करीब 50 लाख लीटर होगा। यह पानी ‘पोरस एस्फाल्ट’ के जÞरिए जÞमीन की कोख में जाएगा। यानी यदि करीब 300 लोग इस कॉलोनी में रहते हों तो हर व्यक्ति के हिसाब से रोज करीब 45 लीटर पानी की बचत होगी। भले ही हम अतीत को ना मिटा पाएं लेकिन जो भी कुछ नया तामीर हो उनमें यह ख्याल हो कि देश को सही रास्ते पर लाना है तो सड़कों की बात बड़े और छोटे सभी सदनों में करनी होगी।