जम्मू-कश्मीर: अब भी सालता है घर से उजड़ने का दर्द

    दिनांक 24-जनवरी-2021
Total Views |
  जवाहरलाल कौल

 1990 का 19 जनवरी वह मनहूस दिन था, जब कश्मीरी पंडितों को अपनी जान बचाने के लिए घाटी से पलायन करना पड़ा। लगभग 4,00000 कश्मीरी पंडित अभी भी अपने ही देश में शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं

n1_1  H x W: 0
 
  
अपनी जान और सम्मान को बचाने के लिए आतंकित कश्मीर घाटी के हिंदुओं का अपने घरों-गांवों से पलायन करने को तीन दशक से भी अधिक समय बीत चुका है। तब से काफी कुछ बदल चुका है। देश में भी और जम्मू-कशमीर में भी। राज्य का विभाजन हो गया है, लद्दाख को उससे अलग कर दिया गया है। जम्मू-कश्मीर में इस समय केंद्रीय  शासन है। 2019 में हमारी संसद ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करके पूरी तरह राज्य पर भारतीय संविधान लागू कर दिया है। लगता है कि हालात बहुत कुछ बदले हैं और जम्मू-कशमीर के लोगों के लिए भी सुदिन आगे हैं। जो लोग बरसों पहले घाटी छोड़ चुके हैं, उनकी दूसरी पीढ़ी प्रौढ़ हो चुकी है और तीसरी पीढ़ी अपने माता-पिता से प्रश्न पूछ रही है कि हमें किस अपराध के लिए निष्कासित किया गया था? ऐसे प्रश्न अक्सर अनुत्तरित ही रहते हैं, क्योंकि वे बूढ़े मां-बाप अपना दर्द अपनी तीसरी पीढ़ी को देना नहीं चाहते या इसलिए कि वे स्वयं भी नहीं जानते कि उनके साथ ऐसा क्यों किया गया। सात दशक से भी पहले जब भारत का विभाजन हुआ था और करोड़ों लोग अपने घरों से भाग कर आए थे शरणार्थी बनकर अपने भविष्य के बारे में अनिश्चित, अपने नए पड़ोसियों के बारे में भी आशंकित। उन्होंने  नई परिस्थितियों में जीना सीखा। हर प्रकार के संघर्ष करके अपने पांव पर फिर से खड़े होने का सामर्थ्य अर्जित किया। लेकिन वे पलायन की पीड़ा को नहीं भूले। वे इस तर्क के साथ संतोष करना सीख गए कि देश का विभाजन हमारे नेताओं ने ही स्वीकार किया था और करोड़ों लोगों की यह त्रासदी तो होनी ही थी। लेकिन आजादी के 42 वर्ष पश्चात् कश्मीरी पंडितों के अपने ही देश में पलायन और उत्पीड़न का कोई औचित्य भी तो नहीं है। उसे भूलने का कोई बहाना भी नहीं है। उनकी त्रासदी अविस्मणीय हो गई है।

भारत के राष्ट्रीय नेताओं ने देश के विभाजन का विकल्प तो चुना परंतु उसके तातकालिक परिणामों का डट कर सामना करने की कभी मन से कोशिश नहीं की। बेमन से की गई कार्रवाइयों से बात बनने के बदले बिगड़ती ही चली गई। अजादी के पश्चात् भी अंग्रेजों को सुरक्षा और राजनीतिक स्तर पर देश के मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति दे दी। ब्रिटेन में बैठी सरकार ने अपने प्रतिनिधि गवर्नर जनरल और हमारे प्रधानमंत्री के माध्यम से पहले जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को तब तक टालने का काम किया जब तक कि पाकिस्तन हमला न करे। फिर पाकिशतानी आक्रमणकारियों के फूरी तरह खदेड़ने से पहले ही भारत को युद्धविराम के लिए मजबूर कर दिया, ताकि कश्मीर का मामला समाप्त ही न हो। वह भारत के लिए नासूर बन जाए। इस बीच हमारी केंद्रीय सरकारों ने जम्मू-कश्मीर में एक ऐसी सरकार को स्थापित कराया जो न तो लेकतंत्र में विश्वास करती थी, न ही उसका भारत की पंथनिरपेक्षता में कोई विश्वास था। पाकिस्तान के साथ न जाते हुए भी शेख अब्दुल्ला ने सत्ता में आते ही एक सांप्रदायिक शासन स्थापित किया, जिसमें भारत से दूरी बनाए रखने की पूर्वनियोजित नीति थी। कुछ ही वर्षों में शेख ने भारत से जम्मू-कश्मीर को अलग रखने के संवैधानिक रास्ते तलाशने आरंभ कर दिए। अनुच्छेद 370 अलगाववाद को कश्मीर की स्थाई समस्या का बनने का बड़ा आधार था। जम्मू के साथ दुश्मनों का सा व्यवहार करने के पीछे भी यही सांप्रदायिक अलगाववाद ही था। ऐसे माहौल में कोई लोकतांत्रिक सरकार तो नहीं चल सकती थी ,उसमें एक व्यक्तिवादी अधिनायकवाद भी संभव था। इसलिए एक सांप्रदायिक व्यवस्था के लिए वातावरण शेख अब्दुल्ला के पहले दौर से आरंभ हो गया था, जिसे आने वाले शासकों ने और भी हवा दी। शेख के ही शासनकाल में कश्मीर घाटी में प्रतियोगी अलगाववाद की भूमिका तैयार हो चुकी थी। प्रतियोगी अलगाववाद अलगाववादी गुटों में आपसी प्रतियोगिता होती है। जमाते इस्लामी का प्रवेश भी इस सांप्रदायिक प्रतियोगिता में हुआ और उसी के साथ हिज्बुल मुजाहिद्दीन आतंकवादी गुट का भी।


n1_1  H x W: 0

यह ऐसा दौर था, जिसमें सांप्रदायिकता पुश्तैनी राजनीतिकों के हाथ से खिसक कर आतंकवादी संगठनों के हाथों में चली गई। शेख अब्दुल्ला और जमाते इस्लामी के बीच टकराव का मुख्य कारण यही था कि पकिस्तान ने अब तक आतंकवाद को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला कर लिया था। भारत विरोधी आंदोलन को राजनीतिक नेताओं के हथों से छीन कर सीधे जिहादी गुटों के हवाले करने की नीति तैयार हो गई थी। 1988 तक इस नीति को जमीन पर आजमाने का समय आ गया था। स्पष्ट है कि आतंकवादी गुटों को कुछ ऐसा करना था जिससे एक तो पारंपरिक राजनीति से लोगों का मोहभंग हो जाए और दूसरे यह कि अंतरराष्टÑीय स्तर पर भारत सरकार के लिए गंभीर स्थिति पैदा हो जाए। कश्मीर घाटी को भारत समर्थक सभी तत्वों से मुक्त कराने की मुहिम में ही कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाना सबसे आसान लक्ष्य मना गया। यह समाज पुश्तैनी तौर पर सरकारी नौकरियों पर निर्भर रहा है, क्योंकि जमीनें पहले ही छिन गई थीं और राज्य में उद्योग लगाने का अभियान भी कब का नाकाम हो चुका था। इसलिए कश्मीरी पंडितों को घाटी से निष्कासित करने के पीछे दो महत्वपूर्ण लक्ष्य थे- पहला, यह कि कश्मीरी हिंदू को स्वाभाविक रूप से भारत समर्थक समाज माना जाता था। इस समाज के पलायन से कश्मीर हिंदू-विहीन बन जाएगा और आतंकवादी गुटों को यह दावा करने का मौका मिलेगा कि कश्मीर पर भारत का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। दूसरा लक्ष्य था कि अलगाववादी गुटों की ताकत दिखाने के लिए कश्मीरी पंडितों को हिंसा का शिकार बनाने से मनोवैज्ञानिक तौर पर राज्य में भारत सरकार की पकड़ ढीली हो जाएगी।

pjk_1  H x W: 0

  1989 के अंतिम महीने तक पंडितों के विरुद्ध एक व्यापक आक्रमण के लिए दो-तीन चरणों में कार्रवाई पहले से ही पूरी हो चुकी थी। जब जज नीलकंठ गंजू और फिर दूरदर्शन के निदेशक लस्सा कौल की सरेआम हत्या की गई थी तब तक लक्ष्य केवल कश्मीरी पंडितों में आतंक फैलाना ही था। लेकिन जब गुल शाह के शासनकाल में जम्मू में मस्जिद बनाने के बहाने दक्षिण कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के घर जलाने की वारदात हुई वह दरअसल आने वाले घटनाक्रम का पूर्वाभास था। लेकिन सदियों से जिस सांप्रदायिक सहयोग के साथ कश्मीर घाटी में हिंदू और मुसलमान रहते आए थे उससे एकदम विपरीत आचरण के लिए कश्मीरी पंडित समाज तैयार नहीं था। उन्हें इस बात का विश्वास नहीं था कि ऐसी स्थिति आएगी जिसमें वे चिल्लाते रहेंगे, बचाव के लिए  पुकारते रहेंगे, लेकिन कोई भी, न पड़ोसी, न सरकारी अफसर, न राजनीतिक नेता और न ही भारत सरकार उनकी पुकार सुनने को तैयार होंगे। यह ऐसी स्थिति थी जहां कश्मीरी पंडित समाज को उन सबने, जो सुरक्षा देने के लिए उत्तरदायी थे, मरने के लिए छोड़ दिया था। कश्मीर घाटी से पूरे अल्पसंख्यक समाज को धार्मिक आधार पर निष्कासित होने देने की यह ऐतिहासिक भूल थी। लेकिन किसी भी ऐतिहासिक भूल को पहचानने और उसका निराकरण करने में भूल इससे भी बड़ी हो सकती है। निराश और डरे हुए लोग रातों-रात घर-बार छोड़ने की तैयारियों में जुट गए, क्योकि उन्हें पोस्टर चिपकाकर लाउडस्पीकरों के माध्यम से बता दिया गया था कि उनके पास तीन ही विकल्प हैं- जिहाद में काफिर के सामने दो ही विकल्प होते हैं या तो कलमा पढ़ो और धर्म बदलो या मरने को तैयार हो जाओ, लेकिन यहां तीसरा विकल्प भी था भाग जाओ। इन आदेशों को पीड़ित समाज गंभीरता से ले, इसके लिए किसी पंडित की लाश गली में फेंक दी जाती थी, यह जताने के लिए कि आदेश न मानने का परिणाम क्या होगा। तत्कालीन भारत सरकार ने जगमेहन को राज्यपाल बना कर तो भेजा, लेकिन उनकी महत्वपूर्ण सिफरिशों पर गंभीरता नहीं दिखाई। जगमोहन के लिए आतंकित पंडितों को आतंक से बचाने के लिए घाटी से बाहर ले जाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं था। जम्मू या दिल्ली में बरसों तक अपने लिए न्याय की प्रतीक्षा करते करते अनेक लोग रोजी-रोटी की तलाश में देश के अन्य नगरों में चले गए हैं, कुछ तो नौकरी की तलाश में देश से बाहर चले गए हैं, लेकिन वह टीस कभी नहीं जाएगी जो 31 साल से रह-रह कर सालती रहती है और न यह अभिलाषा कि फिर अपनी जमीन पर अपने गांव में अपने ही घर में रहने का सपना पूरा हो जाए।

इन दिनों जम्मू-कश्मीर में औद्योगिकीकरण के अनेक कार्यक्रम चल रहे हैं। इन्हें देखते हुए निर्वासित कश्मीरी पंडितों में भी घरवापसी की आस जगी है।   (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)