19 जनवरी, 1990 की वह रात

    दिनांक 24-जनवरी-2021
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 अग्निशेखर


कश्मीरी हिन्‍दू दड़बों में सहमी मुर्ग़ियों की तरह दुबके पड़े हैं। कभी सांस टूटती है, कभी नब्ज़। अगर ये लोग अचानक नारेबाज़ी बंदकर के हम पर टूट पड़े तो दस-पंद्रह मिनट में अतीत बन जाएंगे। पूरा जंगलराज है। कोई शासन नहीं। पुलिस नहीं। मुख्यमंत्री नहीं...
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काल का चक्र निर्बाध घूमता है। लौट-लौट आते हैं वर्ष, महीने और उनकी तिथियां। तिथियों से जुड़ीं हमारी यादें, हर्ष-विषाद लौट आते हैं। ऐसी ही एक डरावनी तारीख का नाम है-19 जनवरी। वर्ष, 1990 की कोख से निकली एक अविस्मरणीय काली रात। एक फासीवादी रात उतरी थी कश्मीर के आकाश से। एक साथ हज़ारों हज़ार भुतही आवाज़ें निकालती, चीख़ती,  चिल्लाती,  हुआं हुआं करती, भौंकती, चिंघाड़ती, दहाड़ती हुई रात। क्रुद्ध और पगलाई हुई रात। एक आसुरी रात।


कल्पना कीजिए, उस रात, उस घड़ी आप हमारी जगह थे। बाहर बर्फानी ठंड है।आप खिड़की दरवाज़े बंद करके घर में बैठे हैं। बाल बच्चे, माँ बाप घर में हैं। पत्‍नी रसोई में है। बच्चे बातों में मशगूल हैं। सहमी हुई धीमी आवाज़ में रेडियो अथवा टीवी चल रहा है या आप घर के किसी सदस्य के काम से लौट आने की बाट जोह रहे हैं। या घर में कोई बीमार है। कराह रहा है। कोई गर्भवती बच्चा जन रही है। या आप सोए हैं। किसी को डाँट रहे हैं। या प्यार कर रहे हैं। घर के किसी कमरे में आपकी जवान बेटी या बहु कुछ लिख पढ़ रही है। या आप दूसरे दिन की कोई योजना बना रहे हैं। और सहसा बाहर लकवा मार देने वाला शोर सुनाई पड़ता है। जैसे तमाम कश्मीरी हिंदुओं के घरों की छतें किसी सुनामी ने एकसाथ हवा में उड़ा दी हों।

अब इन बिना छतों के घरों में आग के दहकते मूसल गिरने वाले दहशत पैदा करने का जश्न है। उत्सव विनाशलीला का। गली मुहल्लों में यमदूत घूम घूमकर हुड़दंग मचा रहे हैं। उछल उछलकर नारे गुंजा रहे हैं। सड़कें पीट रहे हैं। छड़ियों से, डंडों से दुकानों, बिजली के खम्भों को पीटा जा रहा है।

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सीटियां बज रही हैं। और घरों के भीतर काठ हो गए भट्टों की मुट्ठियों में जान भिंची हुई है। मस्जिदों से नारे गूँज रहे हैं- ‘असि छु बनावुन पाॅकिस्तान..बटव रोस्तुय बटन्यव सान !’.. हम पाकिस्तान  बनाएंगे...बिना भट्टों के भट्टनियां ले जाएंगे...यह ऐसे घृणित  और अफसोसनाक  नारे हैं जिन्हें सुनकर अनेक संवेदनशील मुसलमान भी शर्मिंदा हुए होंगे। निश्चित रूप से।


भट्टनियां ले जाएंगे ? भट्टों को मार डालेंगे ? ऐसा पाकिस्तान बनाएंगे ? घरों के भीतर बिजली बुझा दी जाती है। माताएं सीना पीट रही हैं। पुरुष घर के बंद दरवाज़ों के पीछे सामान लदे सन्दूक या और कोई अवरोधक सटा कर रख रहे हैं।

खिड़कियों को कसकर बंद किया जा रहा है। ऐसा करते हाथ थरथरा रहे हैं। टाँगें काँप रही हैं। बच्चों को समझा बुझाकर चुप रहने को कहा जा रहा है। उनके चेहरों पर भय है। आँखें रुआँसा हैं। बाहर को आए होंठ हिल रहे हैं। जवान बेटियों के चेहरे सूख गए हैं। पलक झपकते ही घर अनिष्ट की शंकाओं से काल कोठरी में बदल गया है।


 अभी पंद्रह ही दिन पहले 4 जनवरी के उर्दू रोज़ाना अखबार "आफताब" में हिज़्बुल मुजाहिद्दीन की प्रेस विज्ञप्ति  में साफ तो था जिहाद का ऐलान है और कश्मीरी पंडितों से कश्मीर  छोड़कर चले जाने की धमकी भी  थी। कुछ लोग अपनी अक्ल पर तरस खा रहे थे...हमने उस बयान को गम्भीरता से क्यों नहीं लिया।


 दोनों दोनों हाथ हवा में उठ रहे हैं...झोलियां फैलाई जा रही हैं..अस्फुट बुदबुदाहट है.. हे माता खीरभवानी ! हे नन्दिकेश्वर भैरव ! हे महादेव ! दया करो महागणेश  ! रक्षा करो त्रिपुरा !

 बाहर शोर और हुड़दंग थमने का नाम नहीं ले रहा। चारों ओर...शोर..शोर..आलमगीर शोर..यहां क्या चलेगा ? निज़ामे मुस्तफ़ा...ऐ काफ़िरो, ऐ जाबिरो,कश्मीर हमारा छोड़ दो...! भारतीय कुत्तो ,वापस जाओ ! इंडियन डाॅग्स, गो बैक ! अगर कश्मीर में रहना होगा, अल्ला हो अकबर कहना होगा...असि छु बनावुन पाॅकिस्तान..बटव रोस्तुय बटन्यव सान !’  हम पाकिस्तान  बनाएंगे... बिना भट्टों के भट्टनियां ले जाएँगे।


जिस किसी के घर में फोन है, वह अपने फोन वाले रिश्तेदार से पूछ रहा है , वहां का हाल। पुलिस थानों में फोन की घंटियां बज रही हैं। कहते हैं, वे लाचार हैं। पर्याप्त पुलिस बल नहीं है। अफसरों   के घरों में भी कश्मीरी पंडितों के फोन बज रहे हैं। कोई जवाब  नहीं।

 जल्दी-जल्दी में जवान बेटियों को छिपाने की भागदौड़ है। कोई घर की ढलानवाली छत के नीचे  रखे कोयले की  बोरियों के पीछे बेटियों को ले जाता है। कोई घर में सूखी लकड़ी के ढेर के पीछे उन्हें छिपने को कहता है। कोई  पिछवाड़े कमरे में संदूकों के पीछे सुरक्षित कोना तलाशता है।


कोई तहाकर रखी लिहाफों के पीछे बहु या बेटी को जा छिपने के निर्देश देता है। किसी किसी बाप ने  बेटे या बेटियों को चाक़ू या ब्लेड भी दिया। अंतिम विकल्प के रूप में। इतिहास किस तरह दोहराता है ख़ुद को। कपोल कल्पना सी लगने वाली विभाजन की ऐसी कितनी त्रासद कहानियां वास्तविक रही होंगी !

  "बटन हुंद बयोल,खो'दायन गोल !" खुदा भट्टों का बीज नासे...उन्हें नेस्तनाबूत करे। नारे  हवा में तैरते हैं।


 ऐसा कैसे हो सकता है, समझ में नहीं आ रहा था। कुछ राजनीतिक विश्लेषक  थे जो इस विस्फोटक  परिस्थिति के निर्माण के पीछे विगत अनेक वर्षों के साम्प्रदायिक घटनाक्रम के पनपने के प्रति सरकारों की लापरवाही  देख रहे थे।


 बाहर अंधेरा कितना घना और भयावह हुआ जा रहा था। चुपचाप द्वार खोलकर बहु-बेटी, बूढ़े माँ बाप लेकर घर से भागने का विकल्प भी न था। फिर आदमी ऐसे में जाए तो कहाँ जाए !


खतरा बाहर भी था। खतरा भीतर भी था। दहशत का यह कैसा इह-लौकिक अध्यात्म था कि क्षणांश में बाहर और भीतर का भेद ही मिट गया था। सभी कश्मीरी पंडित अभेद की अवस्था में आ गए थे। अभेद की यह अवस्था अकल्पनीय थी। इसलिए अविस्मरणीय भी।

 
आवाज़ें लगातार आरोह और अवरोह पर थीं। शायद अब थमने वाला हो यह जुनून। शायद अब हो गया। शायद अब कल जारी रखेंगें। शायद ईश्वर कोई चमत्कार करेगा। शायद अभी बादल छाएँगे। शायद तेज़ बारिश होगी..तड़़—तड़़-तड़़ और सब भाग खड़े होंगे घरों को। शायद...। लेकिन आकाश में बादल तो थे ही नहीं। फिर यह कैसी आवाज़ रही होगी...! कहीं पटाखों की लड़ियां जलाई गयी होंगी। नहीं, ऐसा कुछ नहीं था। यह उन्मादी नारों का बारूद फटा होगा हवा में।
 

तमाम कश्मीरी हिन्‍दू दड़बों में सहमी मुर्ग़ियों की तरह दुबके पड़े हैं। कभी सांस टूटती है, कभी नब्ज़। अगर ये लोग अचानक नारेबाज़ी बंदकर के हम पर टूट पड़े तो दस-पंद्रह मिनट में अतीत बन जाएंगे। पूरा जंगलराज है। कोई शासन नहीं। पुलिस नहीं। मुख्यमंत्री नहीं।...अन्यसिज़ क्वलय खोदायस हवालॅ..अंधे की बीबी खुदा हवाले...
     

 हवा में किसी साम्प्रदायिक कटाक्ष पर कभी पागल तालियां बजती हैं। कभी गालियां उछलती हैं। तालियों और गालियों में भी भेद मिट गया है। यहां भी अभेद है। हे आचार्यों के आचार्य महामाहेश्वर अभिनवगुप्त, इस अभेद की कल्पना तुमने भी न की होगी।


इतने में कहीं कहीं किसी किसी भट्ट घरों  की छतों पर दूर से फेंके पत्थर गिरने लगे। माताएं फिर एकबार  छातियां पीटने लगीं। कुछ बेहोश भी हो गयीं।


अक्सर घरों में बिजली बुझाकर अंधेरे में ही सहमे लोग एक दूसरे से बात कर रहे थे। बात सुनकर ही उनके वहां होने का सबूत मिलता था। यह घने अंधेरे में एक दूसरे को देखने की नयी दिव्य दृष्टि थी। आतंक को भेदकर सुदूर देखने की दृष्टि !

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गहन अंधेरे में चीज़ें साफ़ दिख रही थीं। घबराये पिता को एकबार बेटे वीरजी की याद आयी। गनीमत है उसे टिकलाल टपलू की  हत्या  के कुछ दिन बाद ही घर से गुप्त रूप से बहन के पास नागपुर भेज दिया था। कम से कम हमारे परिवार में से वही एक बचेगा। एक कलाकार के नाते उसने टिकलाल के शव को शीतलनाथ मंदिर  से शमशान तक ले जाने वाले ट्रक को फूलों से सजाने में मदद की थी। यही कुसूर था। कितनी बार  उसे मारने के इरादे से अजनबी लड़के आते रहे...वीर जी कहाँ  है..उसके साथ काम था..एक साइन बोर्ड लिखवाना था।


 हरिसिंह हाई स्ट्रीट के पिछवाड़े नागाम, बड़गाँव से माइके आई प्रभावती दहलीज़ पर बम धमाके में घायल होकर दम तोड़ती है। रघुनाथ मंदिर मोहल्ले के अशोक कुमार की सथू बरबरशाह में एक मोची अकारण ही हत्या करता है। विचारनाग के महंत केशवनाथ को मंदिर में तैनात पुलिस कर्मी ही गोली मारकर मौत की नींद सुला देता है।


13  सितंबर को घर के बाहर गोलियों से छलनी किए गए वक़ील टिकलाल टपलू  की हत्या ने सबकी चूलें हिलाकर रख दी थीं। फिर जज नीलकंठ गंजू। फिर अनंतनाग में प्रसिद्ध वकील, लेखक और सामाजिक नेता प्रेमनाथ भट्ट की हत्या अल्पसंख्यक भट्टों के लिए एक खुली डैड-वारेंट  थी। भट्टो, तनू टुर जाना ए दिन रै गए थोड़े।
 

   हुंह, सिरफिरे कहीं के! इनके कहने या सोचने भर से ऐसा होगा क्या ! यहां क़ानून का राज नहीं है क्या ? सरकार जब हरकत में आएगी, तो छटी का दूध याद आएगा। ओह्ह...! घनघोर नारे फ़ौजियों की तरह क़दमताल कर रहे प्रतीत हो रहे हैं। क्या अब टूट पड़ने की कोई अंतिम तैयारी हो रही है...। नए जोश से नारे गूँज रहे हैं- यहाँ क्या चलेगा ? निज़ामे मुस्तफ़ा !...मस्जिदों के लाऊड-स्पीकरों से अब जंगी तराना बजता है - ख़ून-ए- शहीदां रंग लाया/ फ़तह का परचम लहराया / जागो जागो सुबह हुई। रूस ने बाज़ी हारी  है / हिन्द पे लरज़ा तारी है/ अब कश्मीर की बारी है/ जागो जागो सुबह हुई...


ज़ाहिर है कि तराने में अफ़ग़ानिस्तान की धरती  से सोवियत रूस की कम्युनिस्ट फ़ौज  को वापस खदेड़ने का प्रसंग है। यह तालिबान की जीत है। बताया जा रहा है कि रूस के सुरुख ग़ुब्बारे फूट गए हैं। इसे इस्लाम की जीत से ज़्यादा एक स्वायत्त और सम्प्रभु देश अफ़ग़ानिस्तान की जीत के रूप में देखा जाना चाहिए था।...रात गहराती जा रही थी। घरों में जीवित मुर्दे बराबर काँप रहे थे।

 इस तराने को मैंने एकबार श्रीनगर से बारामुला जाने वाली बस में भी बजते सुना था। तब कई वामपंथी मित्रों के गुमान के बारे में ख़याल आया था। जिहाद किसी को नहीं छोड़ता। ईरान में आयतुल्ला खुमैनी की सरबराही में कितने कम्युनिस्ट लेखक, पत्रकार और चिन्तक चुन चुनकर मार दिए गए थे।


   उस दिन बस में सहम गया था मैं। आँखें मूँदकर सोए होने की नौटंकी की थी। सिंहपोरा, पटन पहुँचते ही मैंने बस से उतरकर राहत की साँस ली थी।...इधर रात कितनी लंबी हो चली थी ! कट ही न रही थी। ख़ूँख़ार रात। सबके जीवन की शायद अंतिम रात थी। सोच रहे थे सब। शायद घरों में सबके होने की अंतिम रात...। यह उन्नीस जनवरी की रात एक कालरात्रि बन कर आई थी।...क्या यह कोई भीमकाय पिछलपाई है जो कश्मीर का चप्पा-चप्पा घूम रही है। सब का अनुभव है कि गिनती की साँसें बचीं थीं। और पथराई आँखों से पल पल मरते हुए बाहर से मचलती हुई आवाज़ें आ रही थीं- अलम-ए-यहूद उखाड़ेंगे/ कुफ़्र के पर्दे फाड़ेंगे/ दीन के झंडे गाड़ेंगे/ जागो जागो सुबह हुई।

 
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इसके साथ ही साथ नारे गुंजाए जाते  : ऐ काफ़िरो,ऐ जाबिरो, कश्मीर हमारा छोड़ दो...फिर उसी जंगी तराने पर वापस सुई अटकती : जाग उठो अहले कश्मीर/हाथों में लेकर शमशीर/बदलो जम्मू की तक़दीर/जागो जागो सुबह हुई...तराने में जम्मू के उल्लेख से उस दिन भी रमेश मेहता, डाॅ आदर्श, निर्मल विनोद, किरन बख़्शी, छत्रपाल, अशोक जैरथ जैसे साहित्यिक मित्र तथा जम्मू के अन्य कई लंगोटिये भी भरसक याद आए थे।


आज इतने दशकों के बाद भी वह अविस्मरणीय 19 जनवरी, 1990 की रात किसी कश्मीरी पंडित की स्मृति से नहीं उतरती। यह उनके सामूहिक निर्वासन की भयावह स्मृति है। मातृभूमि से यह उनका निष्कासन दिवस है। इस तिथि के साथ बदलता है उनका निर्वासन संवत्। कोई कह सकता है कि ऐसी त्रासद स्मृति को भूल जाना चाहिए। इससे क्या चिपके रहना। किसी के लिए यह कहना कितना सरल है ! ऐसा कहने वाले बुद्धिजीवियों को क्या पता कि कश्मीर से जान बचाकर भागते हुए यह रात भी हमारे साथ आई है ! यह रात हमारे शरीर की करोड़ों कोशिकाओं में बसी हुई है। हमारी नसों में तैरते रक्त में है यह रात।
 

अब आप ही बताओ कि कैसे जीते जी हम इन यादों से अलग हों...। यह  रात जोड़ती है, हमें मातृभूमि के साथ। हमारी वापसी के द्वार बंद हैं। हम अलगाववादियों के लिए काफ़िर हैं। मुखबिर हैं। भारतीय हैं। वे नहीं चाहते कि हम वापस लौटें। हमारे जीनोसाइड का चक्का वापस घूमे या घुमाया जाए। ऐसे में फ़िलहाल  यह दुखदायी काली अंधेरी रात ही एक रास्ता है। एक सुरक्षित और गोपनीय टनल है। इससे होकर प्रति वर्ष हम अपनी प्यारी मातृभूमि में प्रवेश करते हैं। ढूँढते हैं अपने उस सदियों पुराने कश्मीर को जो आज वहाँ नहीं है। वो घर, खेत-खलिहान, वो गली-मोहल्ले,  नदी, झीलें कुछ भी नहीं है साबूत वहाँ आज। हत्या हुई है कश्मीर की। परम्पराओं और मान्यताओं की। नए नामकरणों और नये इतिहास लेखन की मंशा किसी से नहीं छिपी है।
 

फिर भी यह रात हमें जोड़ती है कल्पनाओं में बची-बसी मातृभूमि के साथ। उसकी निरंतरता के साथ। उसके पेड़ पक्षियों, नदी सरोवरों, पर्वतों के साथ। उसकी धूप, वर्षा, बर्फ़, हवाओं के साथ। उसके इतिहास, काव्यदर्शन, लोकसाहित्य के साथ। संगीत के साथ। दर्शन और कलाओं के साथ। क्योंकि...क्योंकि...वो सब हमारे पूर्वजों का ख़ून पसीना है।

  (लेखक वरिष्‍ठ साहित्‍यकार एवं कश्‍मीर मामलों के विशेषज्ञ हैं)