स्वर्णिम भविष्य की आहट

    दिनांक 28-जनवरी-2021
Total Views |
स्वामी अवधेशानंद गिरि

श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर बनने से पूरे भारत में एक नई ऊर्जा दौड़ेगी और यही ऊर्जा हमारे भविष्य को स्वर्णिम बनाने वाली है
r_1  H x W: 0 x

राम भारत की कालजयी मृत्युंजयी संस्कृति के उच्चतम प्रतिमान और वैदिक हिंदू धर्म संस्कृति के प्राण हैं! वेदों में ब्रह्म की जिस नाम-रूप, गुणधर्म और अवस्थाओं का जो प्रतिपादन है, राम स्वयं उसकी साकार सत्ता हैं। श्रीराम परात्पर ब्रह्म हैं! आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने जिस दिव्य-भव्य राम मंदिर की आधारशिला रखी है, उसमें मुझे भारत के स्वर्णिम भविष्य की दिव्य-आभा के दर्शन हो रहे हैं। भगवान प्रभु श्रीराम के पावन चरित्र में समस्त उच्चताएं, दिव्यताएं और श्रेष्ठताएं समाहित हैं! राम भारत की सनातन संस्कृति के दिव्य-आलोक है जहां उच्चतम, मूल्य, पर्व-परम्पराओं और सिद्धांत नित्य प्रकाशित हैं!


pj_1  H x W: 0 अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर बने ऐसा अनेक सन्त-सत्पुरुषों का संकल्प था, किन्तु रामत्व की सकारता भौतिकीय उत्कर्ष में नहीं, अपितु राम के दिव्यातिदिव्य गुणों के अनुशीलन में है। हम राम को अपने अंत:करण में उतार कर देखें। राम जैसा पुत्र, पिता, भाई और पति बनकर देखें। जिस प्रकार का दिव्य जीवन राम ने जिया है उसका अवगाहन करके देखें तभी रामत्व की सार्थकता है।

आज विश्व के समक्ष विकृत पर्यावरण की जो चुनौती है उसे राम की भांति प्रकृति केंद्रित जीवन जीकर ठीक किया जा सकता है। देश में सामाजिक असमानता एक गंभीर समस्या है, और सामाजिक समरसता का राम से बड़ा कोई अन्य उदाहरण हमारे समक्ष नहीं है। पिता की आज्ञा पर राम अयोध्या के राजमहल से वन की ओर निकले तो उन्होंने पूरे मार्ग में किसी राजपुरुष से सहायता नहीं ली। निषाद की सहायता से उन्होंने नदी पार की। इतना ही नहीं, राम जब तक चित्रकूट नहीं पहुंच गए तब तक निषादराज उनके साथ रहे। जिस कुटिया में राम रहे उसका भी निर्माण निषाद राज ने ही किया था। राम राजसी सुख छोड़कर लम्बे समय तक दलितों, वंचितों और वनवासियों के मध्य रहे, उन्हें न्याय दिलाया और अपने रामत्व को सार्थक किया। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिला सशक्तिकरण एक बड़ा विषय है। श्रीराम ने अहिल्या जैसी उपेक्षिता नारी, जो पति के श्राप के कारण पाषाणवत जीवन व्यतीत कर रही थी, को न  केवल प्राणवंत किया, अपितु मानवोचित सम्मान भी दिया। राम स्वयं चलकर शबरी जैसी उपेक्षित और दलित महिला के घर गए और उनके जूठे बेर खाए। रावण से युद्ध उन्होंने सीता को छुड़ाने भर के लिए नहीं किया, अपितु अधर्म और सामाजिक असमानता को समाप्त करने के लिए राम ने रावण जैसे आतताई का वध कर उसका उद्धार किया। धर्म और अधर्म की लड़ाई में राम चाहते तो अपनी अयोध्या, अपने ननिहाल अथवा अन्य किसी राज्य का सहयोग ले सकते थे किंतु उन्होंने उपेक्षित जीवन-यापन करने वाले वानरों को अपना सहयोगी बनाया; प्रशिक्षित किया और मानवीय प्रयत्न से सागर में सेतु बनवाने जैसा विचित्र और अद्भुत पुरुषार्थ सिद्ध किया।  सुग्रीव, अंगद, हनुमान, जामवंत जैसे वानरों और रीक्षों को साथ लेकर उन्होंने धर्म की संस्थापना की और उपेक्षित वर्ग को भी गौरव प्रदान किया।

प्रधानमंत्री जी ने राम की सार्वभौमिक और सर्व-स्वीकार्यता की बात करते हुए कहा कि मंदिर गिरा दिए गए, धार्मिक प्रतीक नष्ट कर दिए गए, किन्तु भगवान श्रीराम लोगों के ह्रदय में चिरकाल से चैतन्य रहे! जीवन का ऐसा कोई ऐसा आयाम नहीं है, जहां हमारे राम प्रेरणा न देते हों। भारत की ऐसी कोई भावना नहीं है, जिसमें प्रभु राम झलकते न हों।

सारांशत:  प्रभु श्रीराम का चरित्र इतना प्रेरक है कि उन्हें आश्रय बनाकर भारत अपना नैतिक और चारित्रिक उत्थान कर सकता है। सामाजिक असमानता की खाई को समाप्त कर सकता है ,परिवार और संस्कारों की रक्षा कर सकता है और विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हो सकता है। एतदर्थ समाज, देश, सरकार का यह उत्तरदायित्व है कि राम मंदिर के साथ-साथ उनके जीवन के प्रत्येक पहलू पर शोध करके उन्हें राष्ट्र के आदर्श के रूप में पुन:स्थापित करे और प्रत्येक व्यक्ति, परिवार, समाज का यह कर्तव्य है कि राम के चरित्र का अनुगमन और अनुशीलन करे।
 भगवान श्रीराम परम आदर्श हैं। उनके जीवन का अनुशीलन अनेक समस्याओं का एकमेव समाधान और अनेक रोगों की एकमेव औषधि है। रामचरित्र का अनुशीलन, अनुगमन  और अनुपालन सर्वथा हितकर और श्रेयस्कर है!
(लेखक जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामंडलेश्वर हैं)