आंदोलन में सतत सहयोग

    दिनांक 28-जनवरी-2021   
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आचार्य गिरिराज किशोर न केवल राम जन्मभूमि आंदोलन में लिए जाने वाले फैसलों को व्यावहारिक रूप से परिणति तक पहुंचाने का दायित्व संभालते थे, बल्कि आंदोलन से जुड़े लोगों को अनुशासित भी रखते थे
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श्री अशोक सिंहल के साथ आचार्य गिरिराज किशोर (दाएं)

विश्व हिन्दू परिषद ने 1982-83 में भारत माता, गंगा माता एकात्मता यात्रा शुरू की थी। आचार्य गिरिराज किशोर इसकी व्यवस्था की दृष्टि से विहिप में आए थे। एक तरह से इस यात्रा के सूत्रधार मोरोपंत जी और अशोक जी रहे। इस एकात्मता यात्रा के तत्काल बाद ही राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू हो गया। अशोक जी जहां भिन्न-भिन्न विधाओं के लोगों को अपने साथ जोड़ते थे, वहीं आचार्य जी उनको संभालते थे। इस क्रम में कई बार आचार्य जी की वाणी कठोर हो जाती थी। हालांकि वह कोमल हृदय व्यक्ति थे, लेकिन किसी काम को करवाने और अनुशासन बनाए रखने के लिए कभी-कभी कठोर भी हो जाते थे। अमूमन आचार्य जी मातृ-पितृ-गुरु-भातृ तुल्य स्नेह देकर लोगों को संगठित रखते थे। वह अशोक जी के साथ परछाई की तरह रहते।

अशोक जी लगातार प्रवास पर रहते थे तथा संतों से मिलकर उनके विचार लेते थे। लेकिन जो निर्णय होता था, उसे क्रियान्वित करने के लिए जिन संसाधनों की जरूरत होती, उसकी व्यवस्था आचार्य जी ही करते थे। उन्होंने जनसंघ में लंबा समय बिताया था। इसलिए स्वभाविक रूप से राजनीतिक क्षेत्र के अपने संबंधों से उन्हें निरंतर सहयोग मिलता था। मीडिया क्षेत्र में उनके संबंधों का लाभ भी इस आंदोलन को मिला। आचार्य जी भानुप्रताप शुक्ल, विष्णु हरि डालमिया, श्रीचंद दीक्षित जैसे प्रमुख हस्तियों के संपर्क में रहे। इनके अलावा, कुछ ऐसे लोग भी थे जो अयोध्या आंदोलन को अच्छे अनुष्ठान के रूप में देखते थे। आचार्य जी उन्हें भी जोड़कर रखते और उनका सहयोग लेते थे। जब वे दिल्ली में होते तो नियमित रूप से लोगों से मिलते थे। उनका यह क्रम जीवन पर्यंत जारी रहा। लोक व्यवहार में वह माहिर थे। कोई भी आंदोलन मीडिया के सहयोग के बिना संभव नहीं होता। इसे समझते हुए उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन को मीडिया से जोड़ा ताकि इसे जन-जन तक पहुंचाया जा सके। कौन किस कार्य के लिए उपयुक्त होगा, यह अशोक जी बताते थे, लेकिन इसे व्यावहारिक रूप में परिणति तक कैसे पहुंचाया जाए, इसकी चिंता आचार्य जी ही करते थे।

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दिल्ली में रहते हुए उन्होंने मीडिया से अपने संबंध पत्रकार वार्ता तक ही नहीं रखे, बल्कि पत्रकारों के सुख-दुख में शामिल होकर उनके साथ पारिवारिक संबंध भी स्थापित किए। उस समय के बड़े लेखक जो भले ही हमारे विचारों से सहमत या असहमत थे, उन सब के साथ आचार्य जी के अच्छे संबंध थे। वह सभी से सहयोग लेते थे। इसी का परिणाम यह हुआ कि 1994 में विश्व संवाद केंद्र नाम से जब ट्रस्ट बना तो भानु जी उसके प्रस्थापक बने। इस ट्रस्ट में आचार्य जी और श्री सुदर्शन जी भी थे। यही नहीं, ट्रस्ट के लिए भूमि लेने में भी आचार्य जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विश्व संवाद केंद्र की वजह से मीडिया में हमारा स्थान बना।

आचार्य गिरिराज किशोर विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री भी रहे और उनके कार्यकाल में ही दिल्ली छात्र संघ में विद्यार्थी परिषद को पहली बार विजय हासिल हुई थी।

आचार्य जी मैनपुरी (एटा) के रहने वाले थे। वहां के तत्कालीन संघचालक डॉ. रामेश्वर दयाल जी उनके बाल सखा थे। तमाम व्यस्तताओं के बावजूद दोनों जीवन के अंतिम समय तक एक-दूसरे से मिला करते थे। आचार्य जी अलीगढ़ में भी प्रचारक रहे। वे वहां के लोगों के बराबर संपर्क में रहते थे जिसमें डॉ. नित्यानंद जी के साथ निकट का संबंध था। वे वर्ष में जरूर उनसे मिलते थे। उन्होंने बचपन के शाखा संबंधों को जीवन भर निभाया। जब उनका शरीर शांत हो गया तो उनके निधन पर आडवाणी जी श्रद्धासुमन अर्पित करने पधारे और एक संस्मरण सुनाया। आडवाणी जी के अनुसार, भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान के प्रचारकों को भारत में समायोजित किया गया। आडवाणी जी को राजस्थान के भरतपुर में भेजा गया। वहां उनकी मुलाकात आचार्य जी से हुई थी। तब से यह संबंध चला आ रहा है।