महंत रामचन्द्र दास परमहंस जी महाराज: आंदोलन को दिशा देने वाले संत

    दिनांक 28-जनवरी-2021   
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महंत रामचन्द्र दास परमहंस विलक्षण प्रतिभा के धनी तो थे ही, उनका नेतृत्व कौशल भी अद्भुत था। कई अवसर आए जब लगा कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन दिशा से भटक जाएगा, लेकिन परमहंस जी ने उसे संभाला
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संवाददाता संमेलन को संबोधित करते हुए  महंत रामचन्द्र दास परमहंस जी महाराज। साथ में है श्री अशोक सिंहल (दाएं)

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को आगे कैसे बढ़ाया जाए और किन-किन लोगों को इससे जोड़ा जाए, इसे लेकर दिगंबर अखाड़े में एक बैठक हुई। इसमें अशोक सिंहल जी, महंत रामचन्द्र दास परमहंस जी, दाऊ दयाल खन्ना के अलावा अन्य प्रमुख लोग भी मौजूद थे। बैठक में काफी सोच-विचार के बाद परमहंस जी ने कहा कि गोरक्षपीठ श्रीराम जन्मभूमि के लिए लड़ती रही है। महंत अवेद्यनाथ जी का हमारे साथ जुड़ाव भी रहा है। इसलिए यदि यह पीठ आंदोलन से जुड़ जाए तो हमें बहुत संबल मिलेगा। परमहंस जी के विचार पर सबने सहमति जताई और अगले दिन सभी लोग गोरक्षपीठ पहुंच गए। इसमें परमहंस जी, अशोक जी और दाऊ दयाल खन्ना भी थे।

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परमहंस जी ने महंत अवेद्यनाथ जी से अध्यक्ष पद स्वीकार करते हुए आंदोलन की बागडोर संभालने का निवेदन किया। तब अवेद्यनाथ जी ने अपनी आशंका जताई। उन्होंने कहा कि मैं हिन्दू समाज के सबसे निर्बल परिवार के यहां बैठकर खाता हूं, चाहे वह हरिजन हो या सफाई कर्मचारी। छुआछूत को नहीं मानता। ऐसा न हो कि आंदोलन में वैरागियों की उपस्थिति से कोई विवाद हो और समाज में फूट पैदा हो। लेकिन सभी ने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसा कुछ नहीं होगा। इसके बाद श्रीराम मुक्ति समिति बनी, जिसके अध्यक्ष महंत अवेद्यनाथ जी, उपाध्यक्ष परमहंस जी व नृत्यगोपाल दास जी, दाऊ दयाल खन्ना महामंत्री तथा ओंकार भावे मंत्री बने। इस तरह से आंदोलन की शुरुआत हुई और यह निर्णय हुआ कि दिल्ली में संतों का एक बड़ा कार्यक्रम किया जाए।

दिल्ली में आयोजित धर्म संसद में यह निर्णय लिया गया कि विहिप श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाएगी। पहली बार जब सीतामढ़ी से अयोध्या तक राम-जानकी यात्रा निकली तो परमहंस जी ने शंखनाद किया, ‘‘आगे बढ़ो, जोर से बोलो जन्मभूमि का ताला खोलो।’’ साथ ही कहा कि अगर ताला नहीं खुला तो वह आत्मदाह करेंगे। इस उद्घोषणा से आंदोलन को बहुत बड़ा आधार मिला। बड़ी संख्या में लोग इस आंदोलन से जुड़ गए। आंदोलन व्यापक हुआ तो परमहंस जी ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि पर लगा ताला कोई भी तोड़ सकता है, लेकिन हमें ऐसा नहीं करना है। यह काम 60 करोड़ हिन्दू समाज की संगठित शक्ति द्वारा कराना है। एक व्यक्ति के द्वारा नहीं। वह यह कहकर आंदोलन में उत्साह का संचार करते कि श्रीराम जन्मभूमि का मंदिर टूटा, क्योंकि उस समय हिन्दू समाज असंगठित था। इसलिए देशभर में जन-जन के बीच जाकर हमें हिन्दुओं को संगठित करना है। श्रीराम ने उत्तर से दक्षिण तक देश को एक सूत्र में बांधा है। इस तरह, उन्होंने आंदोलन को दिशा दिखाई है। वह कहते थे कि श्रीराम उत्तर प्रदेश में जन्मे इसलिए रामचंद्र कहलाए। वही जब पंजाब में गए तो राम सिंह, तमिलनाडु में रामचंद्रन, आंध्र प्रदेश में रामाराव, कर्नाटक में रमन्ना और केरल में रामम हो गए। लेकिन राम एक ही थे। राम की संस्कृति, उनका रूप और जीवन भारत के जन-जन में समाया हुआ है, हमें उसे ही जगाना है। इससे जो शक्ति खड़ी होगी, उसी से श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बनाना है।

परमहंस जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। ऐसे अनेक अवसर आए जब लगा कि आंदोलन बिखर जाएगा, किंतु हर बार उन्होंने अपने नेतृत्व कौशल व दूरदर्शिता का परिचय दिया। एक समय तो केंद्र सरकार ने आंदोलन को दिशाभ्रमित करने का प्रयास किया। प्रधानमंत्री ने एक बैठक बुलाई थी, जिसमें परमहंस जी भी गए थे। जब उन्हें लगा कि चर्चा गलत दिशा में जा रही है, तब उन्होंने एक शिगूफा छोड़ा, ‘‘आप जल्दी तय करो और हमें विदा करो, क्योंकि मुझे एक प्रेस कांफे्रंस में जाना है जिसमें अशोक सिंहल जी भी होंगे। वहां मुझे श्रीराम जन्मभूमि के विषय में बताना है।’’ सबको लगा कि बैठक की बातें कहीं वह मीडिया को न बता दें। अत: चर्चा वहीं खत्म हो गई।

33 साल उनके साथ रहने के दौरान मैंने कभी उन्हें पढ़ते नहीं देखा, लेकिन ऐसा कोई विषय नहीं था, जिस पर वे अधिकृत रूप से नहीं बोलते होंगे। एक बार साकेत महाविद्यालय में परमहंस जी ने रस पर जो तथ्यात्मक व्याख्यान दिया उसे सुनकर बड़े-बड़े विद्वान भी दंग रह गए। एक बार रामायण मेले में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल सूरजभान मुख्य अतिथि थे। उन्होंने श्रीराम के जीवन पर कुछ टिप्पणी की। परमहंस जी ने उसका उत्तर दिया। तब सूरजभान ने क्षमा मांगते हुए उनके चरण स्पर्श कर कहा, ‘‘मैं अपने शब्द वापस लेता हूं।’’ संत समाज और संप्रदायों में उन्हें विशेष सम्मान हासिल था। एक बार परमहंस जी के साथ उत्तर भारत से कुछ लोग शृंगेरी के शंकराचार्य जी के पास गए और आंदोलन में उनके आशीर्वाद, मार्गदर्शन व सहयोग की इच्छा जताई। परमहंस जी ने इस विषय को जिस प्रकार रखा, शंकराचार्य जी को कहना पड़ा कि वे साथ हैं। उनकी तार्किक क्षमता भी अद्भुत थी, जिससे वे बिगड़ी बात को भी संभाल लेते थे। केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, उस समय शिलादान की बात चल रही थी। परमहंस जी उसका नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने दोपहर में खाना खाते समय कहा, ‘‘मैं बहुत दुखी हूं।’’ संयोग से उसी दिन शाम को कुछ पत्रकार आ गए।

उन्होंने कहा कि अगर यह काम नहीं होगा तो मैं रसायन खाकर अपने प्राण छोड़ दूंगा। इस बात ने अयोध्या के साथ सारे देश को हिलाकर रख दिया। दरअसल, शिलादान के पीछे उनकी एक गहरी रणनीति थी। वह एक शिलादान करना चाहते थे। अगर वह अपने इरादे से डिग जाते तो मुद्दा वहीं खत्म हो जाता। बाद में प्रशासन ने वह शिला ले ली, जो आज भी जन्मभूमि पर रखी हुई है। अशोक जी और परमहंस जी की निकटता पर कहा जा सकता है कि दोनों की आत्मा एक थी। कई अवसर आए जब परमहंस जी को लगा कि किसी बात पर मत भिन्नता हो रही है, लेकिन अशोक जी से बात करने के बाद वह संतुष्ट हो जाते थे। अशोक जी को जब आगे का रास्ता नहीं सूझता, तो वे कहते कि परमहंस जी के पास चलते हैं। यानी दोनों एक-दूसरे के पूरक बनकर आंदोलन को आगे बढ़ाते रहे। दोनों के बीच अवेद्यनाथ जी महाराज सेतु का काम करते थे। अवेद्यनाथ जी के साथ परमहंस जी का संबंध बाल सखा जैसा था। जिस समय परमहंस जी का शरीर शांत हुआ, अशोक जी ने पत्रकारों से कहा कि जब मेरी मां का निधन हुआ था तब भी उतना दुख नहीं हुआ था, जितना मुझे आज परमहंस जी के जाने से हुआ है। परमहंस जी ने सतचंडी यज्ञ करने का संकल्प लिया था, जो पूरा नहीं हो सका था। अशोक जी ने इस यज्ञ को पूरा करवाया।