अलौकिक संत बने प्रेरणास्रोत

    दिनांक 28-जनवरी-2021   
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श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में स्वामी वामदेव जी महाराज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आंदोलन के दौरान जब भी विषम परिस्थितियां आर्इं, स्वामी वामदेव जी महाराज ने श्री अशोक सिंहल का मार्गदर्शन किया और सहज तरीके से उनकी समस्याओं का हल निकाला
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स्वामी वामदेवजी महाराज

 पूज्य स्वामी वामदेव जी महाराज 1986 में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े। आंदोलन के दौरान ऐसे कई अवसर आए, जब फैसला लेना कठिन लगा, उस परिस्थिति में अशोक जी उनके पास जाते थे। वामदेव जी समस्या सुनते थे और मुस्कुराकर सहज भाव से उसका हल निकाल देते थे। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में वामदेव जी का बहुत बड़ा योगदान रहा।

1989-90 की बात है जब मुलायम सिंह ने कहा था कि अयोध्या में एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता, उस समय वामदेव जी महाराज मेरे घर पर कुछ शिष्यों के साथ ठहरे हुए थे। हमें कहीं जाना था। मैंने महाराज जी से कहा कि हम गाड़ी से चलेंगे, लेकिन मेरा सुझाव है कि आप वेश बदल लें। मैं आपके लिए धोती, कुर्ता और टोपी लेकर आता हूं। हम लोग भी मारवाड़ी सेठ के वेश में आपके साथ चलेंगे। लेकिन उन्होंने वेश बदलने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘हम अपने काम के लिए नहीं जा रहे हैं, जिसके काम के लिए जा रहे हैं, वही हमारी रक्षा करेगा।’’ हम गाड़ी से उनके साथ चल पड़े। रास्ते में पुलिस ने हमारी गाड़ी रोकी। वामदेव जी ने पुलिस अधिकारियों को बस एक नजर देखा। उनके तेज के आगे पुलिस अधिकारी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। उन्हें समझ में ही नहीं आया कि क्या करें और क्या नहीं। उन्होंने गाड़ी को जाने दिया।

एक बार कुछ लोगों ने वामदेव जी महाराज को प्रलोभन देने का प्रयास किया। इसमें मुझे भी शामिल किया गया। उन्होंने मुझसे कहा कि महाराज जी से कहो कि वे जहां, जितना योगदान के लिए कहेंगे, हम करेंगे। मैंने कहकर इंकार कर दिया कि ऐसा करने की मेरी हिम्मत नहीं है। 

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5 दिसंबर, 1992 की बात है। रात के करीब 11 बज रहे थे। हम अयोध्या के चार धाम मंदिर में थे। छोटी छावनी में वामदेव जी के साथ मैं और उनके दो शिष्य ओम चैतन्य और त्यागी जी महाराज संतों के पद गा रहे थे। वामदेव जी महाराज रामायण की चौपाइयां और बिन्दु जी महाराज के पद गा रहे थे। कुल मिलाकर वह आनंद की स्थिति में थे।

6 दिसंबर को जब ढांचा गिरा, वे मंच पर आसीन थे। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में वामदेव जी महाराज का जुड़ाव प्रारंभ से ही रहा। किसी के पास भी जाना हो या मुसलमानों से बातचीत करनी हो, हर जगह वे अशोक जी के साथ खड़े रहते थे।
वे कहते थे- अशोक जी हमारे सेनापति हैं, जहां ले चलेंगे हम चलेंगे। वे अशोक जी से बहुत स्नेह करते थे। एक दिन उन्होंने कहा, ‘‘मुझे नहीं मालूम था कि देश में विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन हिन्दू समाज के लिए कार्य कर रहे हैं। मैं बहुत देर से आया। कदाचित् पहले आ जाता तो बहुत काम करता। अब मेरा शरीर उतना साथ नहीं दे रहा है। फिर भी जब तक मेरा शरीर रहेगा मैं विहिप, रा.स्व.संघ और हिन्दू समाज के लिए काम करूंगा।’’

पूरे संत समाज में उनका विशिष्ट स्थान तो था ही, पंजाब में भी उनका विशेष प्रभाव था। जिस समय पंजाब में आतंकवाद था, स्वामी सत्यमित्रानंद जी महाराज की अगुवाई में उन्होंने एक यात्रा निकाली थी। हिन्दू और सिख समाज में सामंजस्य स्थापित करने के लिए वामदेव जी ने बहुत काम किया। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में उनके अलावा श्री रामाचार्य जी महाराज, जगद्गुरु शंकराचार्य श्री वासुदेवानंद जी महाराज, शांतानंद जी महाराज, महामंडलेश्वर विद्यानंद जी महाराज जैसे अलौकिक संत भी थे।