हिंदू दर्शन में पर्यावरण चिंतन

    दिनांक 29-जनवरी-2021
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डॉ़ ओम प्रभात अग्रवाल

जैव विविधता के संरक्षण और उसके मानव के साथ सहअस्तित्व को अनेक दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण समझा गया है। इस संबंध में हिंदू धर्मशास्त्रों में अनेक आख्यान हैं। नृसिंह अवतार की कथा इस बात की प्रतीक है कि सहअस्तित्व और स्वस्थ संबंध मानव को अनेक आपदाओं के प्रति सुरक्षित कर सकते हैं
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हमारे शास्त्रों में तुलसी पूजन का विशेष महत्व बताया गया है और यह पर्यावरण के प्रति श्रद्धा रखने की सीख देता है
पर्यावरण को लेकर आज फिर से नया विमर्श उभरता दिख रहा है। इस विषय ने समस्त जनमानस को उद्वेलित किया हुआ है और वैज्ञानिकों के मस्तक पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। पर्यावरण का अर्थ है-वह प्राकृतिक परिवेश जिसमें मनुष्य अपना जीवन व्यतीत करता है। इसीलिये इसके तीन मुख्य अंग हैं- धरती, गगन एवं अंतरिक्ष। इनमें से भी मनुष्य का निवास पृथ्वी पर होने के कारण, उन प्राकृतिक अवयवों की भी गणना करनी होगी जो पृथ्वी पर उपस्थित हैं यानी मृदा, जल, पृथ्वी का हरित आच्छादन अर्थात् जंगल, जैव विविधता तथा वायुमंडल। अब चूंकि मानव जीवन इन सभी पर निर्भर है अत: उसके सुखी, शांत एवं स्वस्थ होने के लिये अनिवार्य शर्त होगी कि ये सभी अवयव भी सुखी, शांत एवं स्वच्छ हों और इसीलिये पर्यावरण संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

कालांतर में मानव अत्यधिक सुविधा भोग वाली आधुनिक जीवनशैली को अपनाने पर उसका कुपरिणाम भुगतने को विवश हो गया। आज बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के कारण धु्रवों की बर्फ पिघल रही है जिससे जल स्तर में वृद्धि होने से वह समुद्र तटीय भूमि को लीलने लगता है तथा तीव्रता से पिघलते हिमनद सदानीरा नदियों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। मृदा प्रदूषण के कारण उपज भी निरंतर घटती जा रही है। इन परिस्थितियों में यह देखना समीचीन होगा कि पर्यावरण के प्रति हिंदू दृष्टि क्या है। क्या हिंदू दर्शन प्रदूषण की समस्या के युक्तियुक्त विश्लेषण में समर्थ है? क्या उसके आधार पर भविष्य के लिये दिशानिर्देश निश्चित किये जा सकते हैं? ऋग्वेद में कहा गया है-

मधुमती रोष धीर्दयाव आपो, मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम
क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो, अस्त्वरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम
अर्थात् वनस्पतियां शुद्ध और प्रभावकारी हों, आकाश स्वच्छ हो, अंतरिक्ष स्वच्छ हो,सभी दिक्पाल प्रसन्न रहें। हिन्दू दर्शन में वस्तुत: प्रकृति को ईश्वर का रूप माना गया है। स्वामी प्रकाशानन्द का कथन है कि समस्त ब्रह्माण्ड एक ही परम तत्व, परमात्मन से उपजा है और इसीलिये प्रकृति ईश्वर रूप है और ब्रह्माण्ड के प्रत्येक अवयव पर समान रूप से अपनी कृपा बरसाती है।

गीता में श्री कृष्ण कहते हैं-
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्घिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।। (गीता 7/4)
(पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्घि, अहंकार- ये सब मेरी ही प्रकृतियां हैं।)
गीता में ही अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं-

वायुर्यमोऽग्निर्वरूण: शशांक:
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च  (7/39)
(आप वायु हैं तथा परम नियंता भी। आप अग्नि, जल तथा चन्द्रमा भी हैं। आप आदि जीव ब्रह्मा हैं और प्रपितामाह भी हैं)। इससे स्पष्ट है कि ईश्वर ही प्रकृति है और प्रकृति सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी उन्हीं से उपजा है। वस्तुत: वैदिक विद्वानों के मतानुसार मनुष्य के जीवन के चार आयाम हैं-आत्मानुशासन, सामाजिक सम्पर्क, प्राकृतिक परिवेश अथवा पर्यावरण तथा ईश्वर। ये सब मिलकर एक सम्पूर्ण जीवन पद्धति का निर्माण करते हैं। सभी आयामों के एक ही इकाई से आबद्ध होने के कारण वे एक-दूसरे से प्रभावित होते रहते हैं। अत: यदि मनष्ुय इनमें से एक से भी संघर्ष की स्थिति में आता है तो अवश्य ही समय के साथ अन्यों से भी संघर्षरत हो जाता है।  इस प्रकार कालांतर में सम्पूर्ण जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में, एक आयाम पर भी चोट करने से चारों पर आघात होता है, बेशक समग्र प्रभाव को परिलक्षित होने में कुछ समय लगे। पर्यावरण प्रदूषण के दुष्प्रभावों का हिंदू दार्शनिक आधार यही है। इसके अनुसार स्पष्ट है कि अतिशय सुविधाभोग की लालसा से प्रकृति पर जो आघात लगा, उसने समस्त जीवन को संकटग्रस्त एवं अस्त-व्यस्त कर दिया।

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उपरोक्त स्थिति को स्वामी विवेकानन्द इस प्रकार स्पष्ट करते हैं- ‘‘प्रकृति के सभी क्रियाकलाप नियमों में आबद्ध हैं जिन्हें तोड़ा नहीं जा सकता। यदि तुम तोड़ते हो तो सम्पूर्ण सृष्टि का अंत हो जायेगा।’’

प्रकृति के ईश्वर रूप होने एवं जीवन के चार आयामों में से किसी एक पर भी चोट पहुंचने से सम्पूर्ण जीवन पद्धति के अस्त-व्यस्त हो जाने संबंधी हिंदू अवधारणा का एक बड़ा अच्छा उदाहरण अहिल्या की पौराणिक कथा है। इंद्र की कामेच्छा के कारण गौतम ऋषि का आत्मानुशासन भंग होता है और क्रोध उत्पन्न होता है। उससे जीवन का दूसरा आयाम, ईश्वर प्रभावित होता है तथा एक अन्य आयाम, पर्यावरण को भी आघात लगता है। नारी अहिल्या इसका परिणाम भुगतने को विवश होती है और निर्जीव प्रस्तर में परिवर्तित हो जाती है। अब चूंकि प्रस्तर, प्रकृति ही है और इसीलिये ईश्वर रूपी भी है, वह अंतत: परम तत्व परमात्मन के प्रतीक श्रीराम के पादस्पर्श मात्र से पुन: जीवंत हो उठता है। हिंदू दर्शन की पर्यावरण संबंधी एक अन्य अवधारणा यजुर्वेद के इस सूक्त से स्पष्ट होती हैं-

ईशावास्यं इदं सर्वं, यत्किंच जगत्यां जगत
तेन त्यक्तेन भुंजिथा:, मा गृध: कस्यस्विद् धनम।।
इस सूक्त का स्वतंत्र अनुवाद कुछ इस प्रकार होगा-‘समस्त प्रकृति राममय है, उसका उपभोग त्याग की भावना से करो, दूसरों के भाग पर डाका डालने का प्रयास न करो।’ स्पष्टत: अधिक से अधिक सुविधा प्राप्ति के लिये प्रकृति का आवश्यकता से अधिक दोहन किसी अन्य के भाग पर डाका डालने के समान ही है। कुछ इसी प्रकार की भावना गीता के इस श्लोक में भी व्यक्त हुई है-

इष्टानभोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभावित:
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो, यो भुड्क़्ते स्तेन एव स:
‘यदि कोई व्यक्ति किसी से कुछ प्राप्त करता है परंतु लौटाता नहीं है तो वह चोर सदृश है। अर्थात यदि हम ममतामयी प्रकृति से कुछ प्राप्त कर फिर लौटाते नहीं तो हम चोर सदृश हैं। या कहें कि यदि हम जंगलों को काटते तो हैं परंतु नए पेड़ नहीं रोपते तो हमारी स्थिति चोर के सदृश होगी। दर्शन गं्रथों में प्रकृति के ईश्वर रूप होने संबंधी मान्यता के कारण ही हिंदुओं ने सदैव प्रकृति के विभिन्न अवयवों—सूर्य, चंद्र, सागरों, नदियों और पर्वतों की पूजा की और केला, बरगद, पीपल, तुलसी जैसी वनस्पतियों को सदैव पवित्र माना। शांति पाठ में वनस्पतियों तक के लिये प्रार्थना है।

प्रकृति संबंधी उपरोक्त अवधारणायें बार-बार पौराणिक आख्यानों में प्रकट हुई हैं। कतिपय उदाहरण निम्नलिखित हैं-
  1.  छांदोग्य उपनिषद् में एक कथा है सत्यकाम और जाबाला की। माता जाबाला बालक सत्यकाम को लेकर शिक्षा के लिये गुरु के पास जाती हैं। गुरु उसे प्रारंभिक शिक्षा देने के बाद चार सौ गायों के साथ वन में भेज देते हैं इस निर्देश के साथ कि, जब गायों की संख्या प्रजननोपरांत एक सहस्र हो जाए तभी आश्रम में लौटें। गुरु का आशय स्पष्ट था-वन में यथेष्ट समय व्यतीत कर प्रकृति के सान्निध्य में स्वयं शिक्षा प्राप्त करना। वन में विचरते हुये सत्यकाम की मुलाकात हंस, मद्गू, अग्नि और वृषभ से होती है और ये सभी उसे ब्रह्मज्ञान देते हैं। स्पष्ट है कि आख्यान प्रकृति को आदरणीय गुरु के रूप में मान्यता देता है। महर्षि दत्तात्रेय ने भी सर्प, वृषभ और मकड़ी से ज्ञान प्राप्त किया था।

  2. राम का प्रकृति प्रेम अद्वितीय है। रावण ने सीता का अपहरण कर लिया है और उन्हें मुक्त कराने के लिये राम को लंका पर चढ़ाई करनी है। परंतु बीच में समुद्र का प्रसार है। राम के बाण में वह शक्ति है कि वह समुद्र का समस्त जल सोख ले और तब मार्ग मिल जायेगा। लक्ष्मण ऐसा करने के लिये राम से कहते भी हैं। परन्तु ऐसा करना प्रकृति पर आक्रमण होता जो वेद विहित नहीं है। अत: राम तीन दिन तक निरंतर समुद्र की अभ्यर्थना करते हैं। उसके बाद भी जब समुद्र मार्ग नहीं देता तभी वह कुपित होकर शर-संधान करते हैं जिससे घबराकर समुद्र सशरीर उपस्थित होता है और समस्या का हल बताता है।

  3. रामकथा से ही एक और उदाहरण। सीता स्वर्ण मृग की मांग करती हैं। समझा जा सकता है कि स्वर्ण मृग तो प्रतीक है मनुष्य के लालच एवं उसके चलते प्रकृति पर अधिकार प्राप्ति की चाह का। उसका वध कर प्रभु मानवता को प्रकृति के साथ स्वस्थ संबंध बनाने का संदेश देते हैं।

  4. लीलाधर कृष्ण द्वारा कालिया नाग का वध भी संभवत: यही संदेश देता है कि नदियों को स्वच्छ और निर्मल रखो। उनमें कालिया नाग जैसे प्रदूषक तत्वों को मत पनपने दो। इससे तुम सुखी और स्वस्थ रहोगे।

  5. श्री कृष्ण के बाल्यकाल के गिरिराज पर्वत आख्यान से भी यही संदेश मिलता है कि पर्यावरण को सदैव अपने पक्ष में रखो तो अनेक आपदाओं से स्वत: मुक्ति मिलेगी।

  6. आजकल जैव विविधता अत्यधिक चर्चा में है। कोरोना के संदर्भ में यह विषय बार-बार उभरा है। वैज्ञानिकों के एक दल का अनुमान है कि चमगादड़ों की घटती जनसंख्या (चीनियों को उन्हें खाने का शौक है) के कारण कोविड-19 वायरस मानवों के समीप आया और तब ‘स्पिल ओवर’ की प्रक्रिया में मनुष्य में प्रवेश कर गया। वास्तव में जैव विविधता के संरक्षण और उसके मानवों के साथ सहअस्तित्व को अनेक दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण समझा गया है और इस संबंध में हिंदू धर्मशास्त्रों में अनेकों आख्यान हैं। नृसिंह अवतार की कथा प्रतीकात्मक रूप में इस संबंध को दृढ़तापूर्वक रेखांकित करती है और संदेश देती है कि इस प्रकार का सहअस्तित्व और स्वस्थ संबंध मानवों को अनेक आपदाओं के प्रति सुरक्षित कर सकता है। वास्तव में हिंदू दर्शन विश्व के विकास का ब्लू प्रिंट है और वह भी पर्यावरण को अक्षत रखते हुये। अथर्ववेद के भूमि सूक्त में कहा गया है-

‘इस धारदार कुदाल से मैं आप (पृथ्वी) के उत्खनन द्वारा कुछ प्राप्त कर रहा हूं पर इस प्रक्रिया में आपके मर्मस्थल पर चोट न पहुंचे।’ दूसरे शब्दों में-मैं आपको अतिशय उत्खनन के प्रति सुरक्षित रख रहा हूं। आज जो अतिशय उत्खनन से धरित्री के गर्भ में संचित प्राकृतिक संपदा, धातुयें, पेट्रोलियम आदि के समाप्त होने का खतरा मनुष्य जाति पर मंडरा रहा है-यह आत्मनियंत्रण उसी का उत्तर है। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति ऐसे स्वस्थ दृष्टिकोण के कारण ही हिंदू समाज ने भरपूर ऐश्वर्यशाली जीवन जिया, परंतु पर्यावरण का संकट कभी खड़ा नहीं हुआ। यही आज की भी आवश्यकता है।

लेखक महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक में रसायन विभाग और रसायन खंड इंडियन साइंस कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं केंद्रीय हिन्दी समिति के सदस्य रह चुके हैं)