पंचायतचुनाव : महाअघाड़ी को महाआघात

    दिनांक 29-जनवरी-2021
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राजेश प्रभु सालगांवकर

महाराष्ट्र के पंचायत चुनाव में भाजपा ने राज्य की सत्ता को चलाने वाले महाअघाड़ी गठबंधन की  शिवसेना, राष्टÑवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ा। उद्धव ठाकरे की शिवसेना पहुंची तीसरे स्थान पर

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महाराष्ट्र के पंचायत चुनाव में मतदाताओं ने राज्य में सत्तारूढ़ महाअघाड़ी गठबंधन (शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस) को सबक सिखाने का काम किया है। पंचायत चुनाव को लोगों ने राज्य सरकार के प्रति गुस्सा उतारने का अवसर माना। यही कारण है कि लोगों ने सत्तारूढ़ गठबंधन को नकार कर भाजपा को पहले स्थान पर रखा है। उल्लेखनीय है कि पंचायत चुनाव में 14,202 सीटों में से भाजपा ने 6,074 सीटों पर विजय प्राप्त की है। इनमें से 564 सीट पर भाजपा प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए हैं। लेकिन सत्तारूढ़ शिवसेना और राकांपा के नेता भाजपा की इस जीत को नकार रहे हैं। उनका तर्क है कि ज्यादातर पंचायतों में शिवसेना-राकांपा समर्थक सरपंच होंगे। लेकिन भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल कह रहे हैं कि भाजपा समर्थक सरपंच ज्यादा होंगे। चुनावी विश्लेषक भी मान रहे हैं कि भाजपा समर्थित सरपंच ज्यादा होंगे।

उल्लेखनीय है कि इस बार पंचायत में जो लोग चुने गए हैं, उनमें से ही किसी को सरपंच चुना जाएगा, जबकि इससे पहले भाजपा के शासन में सीधे जनता ने ही सरपंचों को चुना था। इस चुनाव में भाजपा विरोधी सभी दलों ने भाजपा को हराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसके बावजूद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इसके कई कारण हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण है राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार के तीन कृषि सुधार कानूनों का विरोध। इन कृषि कानूनों के कारण राज्य के किसानों को अपनी उपज का अच्छा मूल्य मिल रहा है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने इन कानूनों का विरोध किया, जिसे लोगों ने पसंद नहीं किया। दूसरा कारण है राज्य सरकार द्वारा पूर्ववर्ती फडणवीस सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना ‘जलयुक्त शिवार’ को बंद करना।  इस चुनाव में राकांपा करीब 3,100 सीटों के साथ दूसरे क्रमांक पर है, वहीं शिवसेना लगभग 2,800 सीटों के साथ तीसरे क्रमांक पर है। कर्ई सालों से हारती आ रही कांग्रेस  2,100 सीटें जीतकर थोड़ा आनंद का अनुभव कर रही है। इस चुनाव ने शिवसेना के ग्रामीण पार्टी होने का गुब्बारा फोड़ दिया है और शिवसेना एवं राकांपा की मदद से कांग्रेस में थोड़ी जान आ गई है। एक बात यह भी दिखी कि भाजपा को पछाड़ने के लिए उसके विरोधियों ने विकास की बात न करके समाज में जाति का जहर घोलने का काम किया। शिवसेना को हिंदुत्व से दूर जाकर मुस्लिम तुष्टीकरण का सहारा लेना पड़ा। राज्य की जनता इन सब चीजों को बहुत ही गहराई से देख रही है और उसी का नतीजा है कि उसने गठबंधन को सबक सिखाया है। इस चुनाव में 2,500 निर्दलीय प्रत्याशी जीते हैं। यह संख्या कांग्रेस के जीते प्रत्याशियों से ज्यादा है। 

ग्रामीणों की नई पहल

दरअसल महाराष्ट्र में पंचायत चुनाव दलगत आधार पर नहीं होते हैं, बल्कि विभिन्न दलों के समर्थक चुनाव लड़ते हैं। जनता को साफ पता रहता है कि अमुक प्रत्याशी किस दल का समर्थक है। इसी आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है कि किस दल का प्रदर्शन कैसा रहा। दलगत द्वेष के कारण कई बार विकास कार्य बाधित हो जाते हैं। इसको देखते हुए इस बार कई पंचायतों ने तय किया कि वे निर्दलीय प्रत्याशियों को चुनेंगीं। यही कारण है कि 850 जगहों पर निर्विरोध चुनाव हुआ। इनमें से बहुत बड़ी संख्या में 21 से 25 आयु वर्ग के युवा हैं। इसलिए लोग मान रहे हैं कि यह चुनाव शिवसेना और उसके साथियों के लिए खतरे की घंटी बजा चुका है। 
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)