किसानों का नाम लेकर अराजकता की खेती

    दिनांक 30-जनवरी-2021   
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खेती-किसानी की आड़ में 26 नवंबर, 2020 को उपद्रव का जो जमावड़ा राजधानी की दहलीज पर जमाया गया था उसका भांडा इस 26 जनवरी को फूट गया।
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खेती-किसानी की आड़ में 26 नवंबर, 2020 को उपद्रव का जो जमावड़ा राजधानी की दहलीज पर जमाया गया था उसका भांडा इस 26 जनवरी को फूट गया।
लालकिले की प्राचीर पर तिरंगे के अपमान के बाद देशभर में उठी रोष की लहर में वे सारे तर्क बह गए जो कथित किसानों को आगे कर ‘इच्छाधारी’ आंदोलनकारियों ने गढ़े थे।
भाजपा का विरोध, प्रधानमंत्री का विरोध, संसद का विरोध, न्यायपालिका का विरोध.. हर मौके, मुद्दे और मंच पर भारत से बैर-विरोध के लिए पल-पल नारे और बैनर बदल लेने वाले चेहरों को ‘इच्छाधारी’ नहीं तो और क्या कहें? इन देशविरोधी लामबंदियों को अब यह देश पहचानने लगा है।
इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि जिसे लोकतांत्रिक आंदोलन का नाम दिया गया वास्तव में वह ढकोसला भर था। कुछ लोगों को इस पर आपत्ति हो सकती है किन्तु सत्य वही है, क्योंकि लोकतंत्र की परिधि में आंदोलन सिर्फ शब्द या ठप्पे से बड़ी चीज है।
दिल्ली दंगों की पृष्ठभूमि रचता शाहीनबाग का सड़क धरना या अन्नदाता के नाम पर अराजक उपद्रव, इस तरह के राजनीतिक प्रयोगों को आप हिंसक हुल्लड़बाजी कहें तो कहें, यह ‘आंदोलन’ कतई नहीं है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी आंदोलन के लिए कुछ कसौटियां, कुछ मापदंड होते हैं। उदाहरण के लिए-
आंदोलन की पहली आवश्यकता है-मुद्दा
इसकी दूसरी जरूरत है-जनाधार
तीसरी महत्वपूर्ण शर्त है-नेतृत्व
और चौथी रेखांकित की जाने वाली बात है-निर्दिष्ट प्रक्रिया का पालन।
पहले बात मुद्दे की। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि दस-दस बार सरकार से ‘कथित’ किसानों की वार्ता विफल होने का कारण क्या है! यही कि मुद्दे के नाम पर शून्य बुद्धिजीवियों में से कोई यह बताने की स्थिति में नहीं है कि जब किसान से कुछ लेने की बजाय फसल बेचने की अतिरिक्त वैकल्पिक व्यवस्था दी जा रही है तो उसका घाटा हो कैसे रहा है! यह नागरिकता संशोधन कानून की उस विपरीत व्याख्या जैसा ही है, जहां नागरिकता देने वाले कानून को लोगों की नागरिकता छीनने वाले कदम की तरह प्रचारित कर दिल्ली में दंगा भड़काने की पटकथा लिखी गई थी।
कथित आंदोलन से चूंकि मुद्दा नदारद है इसलिए इस जमावड़े का जनसमर्थन भी उनके तंबुओं और आकाओं के प्रभाव क्षेत्र तक सिमटा हुआ है। मुद्दा वास्तव में होता तो विश्व के सबसे बड़े
‘कृषक’ देश की आधी से ज्यादा (खेती-किसानी पर निर्भर) जनसंख्या इस अभियान से जुड़ चुकी होती। परंतु यहां मामला उलटा था, कृषि क्षेत्र में पूंजीपतियों की आहट का हौआ खड़ा किया गया और विरोध करने के लिए संसाधन भी पूंजीपति बिचौलियों की मदद से जुटाए गए। विसंगति की पराकाष्ठा यह थी कि जनसमर्थन छोड़िए, जो फर्जी किसान नेता या संगठन विरोध का झंडा उठाए थे उनमें से कोई भी ऐसा नहीं था जो पूर्व में उन्हीं सुधारों की मांग न कर चुका हो जो सुधार कृषि बिल के माध्यम से सरकार ने किए हैं।
तीसरी बात आंदोलन की अगुआई की। ध्यान देने वाली बात है कि नेतृत्व के नाम पर हन्नान मुल्ला से लेकर योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण तक अराजक जमावड़े के पैरोकारों में कोई भी किसान नहीं है। उलटा, ये ऐसे चेहरे हैं जिनके मित्र, परिचित, संपर्क के मीडिया घराने और राजनीतिक दल अलग-अलग मुद्दों पर साथ कदमताल करते दिखते हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि दिल्ली की सीमाओं पर जिस ‘जमघट’ को भाजपा विरोधी हर नेता अपना बताता था, उपद्रव के बाद ऐसा हरेक नेता बजाय जिम्मेदारी लेने के, गायब हो गया।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलन की चौथी और सबसे बड़ी कसौटी है उसकी प्रक्रियाओं का पालन। असहमति के लिए सहमत होना, गुंजाइश रखना, यह लोकतंत्र का आधारभूत लक्षण है। किन्तु जब इसी व्यवस्था को सीढ़ी बनाकर सिर्फ अपनी बात कहने और बाकी सबको हथियार और ताकत के बूते कुचलने वाले तत्व लोकतंत्र के लालकिले जैसे प्रतीकों पर चढ़ आएं तो उपद्रव को आंदोलन कहने की और उत्पातियों के साथ नरमी बरतने की कोई गुंजाइश नहीं बचती। याद कीजिए, भारत के सेकुलर-वामपंथियों के पिछले सप्ताह के वे बयान जब अमेरिका के कैपिटल हिल में रिपब्लिकन हुड़दंग को उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था की हत्या बता दिया था। आज यही बयानवीर गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा को ‘आंदोलन’ का आक्रोश बताने में जुटे हैं!
बहरहाल, गणतंत्र दिवस पर हुए उत्पात ने साबित कर दिया कि जिसे हाशिए पर पड़े किसानों के ‘गांधीवादी’ आंदोलन का लबादा ओढ़ाया गया था वह आंदोलन नहीं ‘उन्माद की खेती’ का वामपंथी, सेकुलर, इस्लामी प्रयोग था, जिसमें खालिस्तानी उन्माद को जोड़ा
गया था।
कहना जरूरी नहीं कि भारतीय लोकतंत्र को अपमानित करने का सपना पालने वालों को यह समीकरण भारी पड़ने वाला है, क्योंकि शत्रु चाहे जितने हों, जब राष्टÑ एक होता है तो हर चक्रव्यूह बिखर जाता है। @hiteshshankar