आंध्र में सक्रिय आतताई तोड़ रहे मंदिर और मूर्तियां, आखिर किसकी है साजिश?

    दिनांक 05-जनवरी-2021
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डॉ अंशु जोशी

आंध्र के डायरेक्टर जनरल आफ पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 2020 में ही आंध्र प्रदेश में मूर्तियों या मंदिरों को तोड़ने के 228 मामले रजिस्टर हुए हैं, जबकि 2019 में ऐसे मामलों की संख्या 305 थी। ये अपने आप में विचलित करने वाली जानकारी है।
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इक्तीस दिसंबर तथा एक जनवरी को जब पूरा देश आंग्ल नव वर्ष मना रहा था, तभी आंध्र प्रदेश से चौंकाने वाली खबर सामने आयी। पहले विजियानगरम के चार सौ साल पुराने रामतीर्थ मंदिर में श्री राम की मूर्ति तोड़ी गयी और फिर रविवार को विजयवाड़ा स्थित सीता माता मंदिर से खबर आयी कि माता सीता की मूर्ति को भी मूर्ति भंजकों द्वारा तोड़ा गया है। जब इन मामलों पर पूरे देश की नजरें लगीं और छानबीन शुरू हुई तब और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आये।

आंध्र के डायरेक्टर जनरल आफ पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 2020 में ही आंध्र प्रदेश में मूर्तियों या मंदिरों को तोड़ने के 228 मामले रजिस्टर हुए हैं, जबकि 2019 में ऐसे मामलों की संख्या 305 थी। ये अपने आप में निश्चित ही विचलित करने वाली जानकारी है। जहां वर्तमान मुख्यमंत्री जगन रेड्डी इसे राजनीतिक साजिश बता रहे हैं तो वहीं उनके विरोधी, टीडीपी के प्रमुख तथा पूर्व मुख्य मंत्री चंद्रबाबू नायडू इसे जगन रेड्डी द्वारा आंध्र और तेलंगाना में बड़े पैमाने पर किये जा रहे कन्वर्जन रूपी षड़यंत्र का ही हिस्सा बता रहे हैं।

कन्वर्जन के लिए कुख्यात हो रहा आंध्र प्रदेश
आंध्र प्रदेश में वर्षों से बड़े पैमाने पर ईसाई मिशनरियां हिन्दुओं को ईसाई बनाने के एजेंडे पर काम कर रही हैं। जगन के पिता तथा राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वाय एस आर रेड्डी के शासनकाल में  चर्च खूब फलेफूले और बड़ी संख्या में कन्वर्जन किया गया। अब जगन पर भी हिन्दुओं को ईसाई बनाने की चली आ रही मुहिम को फास्ट ट्रैक पर डालने के आरोप लग रहे हैं। कई लोग इस तथ्य को नहीं जानते कि रेड्डी परिवार स्वयं ईसाई है। जगन की पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने हाल ही में यह स्वीकारा भी था कि आंध्र में ईसाई मिशनरियां हिन्दुओं को ईसाई बनाने के लिए पैसों का इस्तेमाल करती हैं साथ ही आंध्र सरकार भी इसके लिए लोगों को प्रेरित करती है।

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सर्वधर्म समभाव का भाव रखने वाले, संविधान में अपने आप को पंथनिरपेक्ष घोषित करने वाले देश में इस प्रकार की घटनाएं और साजिश निश्चित ही शोचनीय है। जहां एक ओर अयोध्या में राम मंदिर बन रहा है, तो वहीं आंध्र में सैकड़ों वर्षों पूर्व स्थापित मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं। ये कौन कर रहा है और क्यों ? इसकी तथ्यपरक पड़ताल अत्यंत आवश्यक है। साथ ही हिन्दुओं को ईसाई बनाने के मामले और मुहिम किसी से छिपे नहीं है।

ये मुहिम न सिर्फ समाज के लिए खतरनाक है, उन लोगों के लिए भी खतरनाक है जिन्हें हिन्दू धर्म के विरुद्ध भड़काकर या तरह-तरह के लालच देकर ईसाई बना दिया जाता है। ऐसे भी कई मामले सामने आये जिनमें कन्वर्ट लोगों ने ये स्वीकार किया कि उन्हें हिन्दू धर्म के विरुद्ध भड़काया भी गया और कई तरह के लालच भी दिए गए जिसके चलते उन्होंने अपना धर्म परिवर्तित कर लिया। किन्तु बाद में उन्हें समझ आया कि वे किस तरह मिशनरी के मुहिम का शिकार हुए। इनमें से कई पुन: हिन्दू धर्म में लौट भी आये। किन्तु कई ऐसे हैं जो कन्वर्जन के शिकार बन के रह गए हैं।

कन्वर्जन की साजिश सिर्फ धार्मिक आस्था से नहीं जुड़ी, इनका बहुत बड़ा प्रभाव देश के राजनीतिक, सामजिक और आर्थिक ताने बाने पर पड़ता है। विदेशी मिशनरियां कई वर्षों से भारत में काम कर रही हैं। आखिर क्या कारण है कि यह लोगों को कन्वर्जन के लिए तरह तरह के प्रलोभन देती हैं? यदि इनका लक्ष्य सेवा है तो ये सिर्फ सेवा क्यों नहीं करतीं ? पहले लोगों के धर्म बदलने के पीछे क्यों पड़ती हैं?

क्यों हिन्दुओं को ईसाई बनाने की मुहिम चलाती हैं ? क्यों वनवासियों को उनकी संस्कृति से काट विदेशी चोगा पहनाती हैं? यह बिल्कुल सही बात है कि सेवा की आड़ में इनका असल उद्देश्य वोट बैंक की राजनीति करना है। इसमें इनका साथ देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नेक्सस काम करता है, जो इनकी फंडिंग से लेकर तरह-तरह के मुहिमों में सहायता करता है। इनके द्वारा कन्वर्ट हुए लोग फिर न सिर्फ अपनी संस्कृति से, अपनी जड़ों से कट जाते हैं, वे इस राष्ट्र को तोड़ने में अपनी भूमिका तलाशने लगते हैं। हिन्दू मूर्तियां और मंदिर तोड़े जाने के उदाहरण हमारे सामने है।

मुद्दा मूर्ति तोड़ने का नहीं है। मुद्दा है भारत की उस विरासत, उस संस्कृति पर प्रहार का जो वसुधैव कुटुम्बकम की बात करती है , जो सभी मत-पंथों को सामान भाव से देखती है। इसलिए आंध्र में जो हो रहा है, उसका विश्लेषण कर उचित कार्रवाई करना आवश्यक हो जाता है। मत-पंथ की आड़ में कन्वर्जन का यह खतरनाक खेल बंद किया जाना चाहिए।
(लेखिका जे.एन.यू में सहायक प्रध्यापक हैं)

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