लखनऊ विश्वविद्यालय : समस्या समाधान का सशक्त माध्यम बनी 'स्टूडेंट ओपीडी'

    दिनांक 07-जनवरी-2021
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लखनऊ विश्वविद्यालय में चिकित्सालयों की तरह ‘स्टूडेंट ओपीडी’ का कार्यक्रम शुरू किया गया है. इस कार्यक्रम में सप्ताह में एक दिन विश्वविद्यालय के एक शिक्षक छात्र – छात्राओं की समस्याओं को सुनकर उसका समाधान करते हैं. संवाद स्थापित करने का यह अनूठा प्रयोग कोरोना काल में अत्यंत कारगर साबित हुआ. छात्र – छात्राओं से संवाद स्थापित करने के लिए विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक ट्वीटर हैंडल पर भेजी गई शिकायतों का भी संज्ञान ले रहे हैं .
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विश्वविद्यालयों में कई बार ऐसा देखा गया है कि छात्रों और शिक्षकों के बीच संवाद ना हो पाने के कारण असहज स्थिति उत्पन्न होती है. कई बार तो छात्र आन्दोलन तक की नौबत आ जाती है. लखनऊ विश्वविद्यालय पिछले कुछ माह से लगातार ‘स्टूडेंट फ्रेंडली’ बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है. छात्र – छात्राओं के हितों को ध्यान में रखते हए लखनऊ  विश्वविद्यालय में ‘स्टूडेंट ओपीडी’ शुरू की गई है. इस ‘स्टूडेंट ओपीडी’ के नाम से चलने वाले कार्यक्रम में यह तय किया गया है कि सप्ताह में एक दिन एक शिक्षक एक घंटा तक केवल छात्र – छात्राओं की समस्याओं को सुनकर उसका निराकरण करेंगे.

लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर आलोक राय बताते हैं कि “ इसका ‘कांसेप्ट’ चिकित्सालय में चलने वाली ओपीडी से लिया गया है जहां पर लोग उपचार के लिए डाक्टर के पास जाते हैं. ठीक उसी तरह से लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र – छात्राओं को अपनी समस्या के समाधान के लिए इधर – उधर भटकना ना पड़े इसलिए ‘स्टूडेंट ओपीडी’ की व्यवस्था शुरू की गई. इसमें शिक्षक सप्ताह में एक दिन एक घंटे तक सभी स्टूडेंट्स की समस्या को गंभीरता पूर्वक सुनकर उसका समाधान करते हैं.”

इसके अतिरिक्त लखनऊ विश्वविद्यालय ने छात्र – छात्राओं से बेहतर संवाद स्थापित करने के लिए सोशल मीडिया के सभी माध्यमों का उपयोग शुरू कर दिया है. लखनऊ विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी ट्विटर आदि सोशल मिडिया प्लेटफार्म पर उपलब्ध हैं. ट्विटर हैंडल पर भी छात्र – छात्राओं के द्वारा अगर कोई शिकायत दर्ज कराई जाती है तो  उसका त्वरित गति से निराकरण किया जा रहा है.

लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर आलोक राय ने बताया कि “ कोरोना काल में यह देखा गया कि छात्रावास में रहने वाले स्टूडेंट्स की अपनी कुछ निजी समस्याएं भी थीं. वो लोग घर से दूर थे.  कोरोना के शुरुआती दिनों में लोगों के मन में एक डर भी था. ‘स्टूडेंट ओपीडी’ में इस प्रकार की निजी समस्याओं पर चर्चा करके समाधान निकाला गया. इस ओपीडी कार्यक्रम से परिसर में संवादहीनता की स्थिति समाप्त हुई है. परस्पर चर्चा का वातावरण निर्मित हुआ है. स्टूडेंट्स को अपनी समस्या के निराकरण के लिए इधर – उधर भटकना नहीं पड़ता है. सोशल मीडिया पर भी अगर किसी ने कोई समस्या बताई है तो उस पर भी शीघ्र ही विचार किया जाता है. अगर किसी  स्तर पर कोई असंतुष्ट है तो वह कुलपति कार्यालय में भी संपर्क कर सकता है.”