आपदा से निपटने की ठोस नीति बने

    दिनांक 10-फ़रवरी-2021
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डॉ. राजेश्वर उनियाल

यदि बाढ़ केवल पर्यावरणीय कारणों एवं बांध आदि बनाने के कारण आ रही हैं, तो फिर इस प्रकार की आपदाएं अधिकतर उत्तराखंड, वह भी केवल गढ़वाल के क्षेत्र विशेष में ही क्यों आती हैं? जरूरी है, ऐसे हादसों का ठीक से अध्ययन कर ऐसी ठोस नीति बनाई?जाए ताकि बाढ़ से पूर्व नदियों का सुचारू रवाह सुनिश्चित हो सके

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वैसे तो पहाड़ी नदियों में छोटे-मोटे सैलाब निरंतर आते रहते हैं, परंतु उनमें से कुछ ऐसे प्रलयकारी होते हैं, जो इतिहास के पन्नों में अंकित हो जाते हैं। इनमें से उत्तराखंड के जिला चमोली में ही केवल गत सवा सौ साल में पांच ऐसी बाढ़ आई हैं, जिन्होंने उत्तराखंड में जन-धन का काफी नुकसान किया है। इनमें से सात वर्ष पूर्व 16-17 जून 2013 को आई केदारनाथ की तबाही की याद अभी ताजा ही है। पहले जो बाढ़ आती थीं, उनमें प्राकृतिक संसाधनों की भले ही हानि होती रही हो, लेकिन उस समय जन-धन का इतना नुकसान नहीं होता था, क्योंकि तब मनुष्य विकास से पहले अपनी सुरक्षा, प्रकृति की पूजा और नियमों का पालन करता था। वैसे भी पहले पहाड़ों में गांव अधिकतर पहाड़ों की चोटियों पर ही बसे होते थे। लेकिन जैसे-जैसे गांव व नगर आदि नदियों के निकट बसने लगे तो नुकसान बढ़ने लगा। गत 7 फरवरी को जोशीमठ में बाढ़ आई तो उसकी जानकारी तुरंत ही समस्त विश्व को हो गयी और सरकार बचाव कार्य में जुट भी गई। लेकिन सवा सौ साल पहले 1894 में जब विरही की बाढ़ आई थी, उसकी जानकारी तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को केवल एक तार से मिल पाई थी।

हुआ यह था कि 1893 में चमोली के निकट विरही नदी में एक चट्टान आने के कारण वहां पानी ठहर गया, जिससे एक ताल बनता गया, जिसे गौणा ताल कहते थे। अंग्रेजों को यह ताल बहुत पसंद आया और उन्होंने इसे पर्यटक स्थल बनाना प्रारंभ किया, यहां एक तारघर भी खोल दिया। लेकिन ताल में पानी भरता गया और एक साल बाद 1894 में ताल कुछ टूट गया, जिससे वहां भयंकर बाढ़ आ गई। लेकिन तारघर होने के कारण यह सूचना तुरंत उच्चाधिकारियों को पहुंचा दी गई, जिससे हरिद्वार के बाद मैदानी क्षेत्र तो बचा लिए गए, परंतु एक समय गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर गढ़वाल का महल और नगर बाढ़ में स्वाहा हो गए। बाद में श्रीनगर शहर मैदानी स्थल में बसाया गया था। 1894 में गौणा ताल केवल एक चौथाई ही फूटा था, जबकि शेष ताल 1970 में बहा। इसके ठीक सात साल बाद एक बार फिर, लेकिन अंतिम बार 1977 में यहां भयंकर बाढ़ आई थी, जिसमें बाकी बचा सारा ताल फूट गया था। पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने 1977 में इस विरह की बाढ़ का विस्तृत लेखा-जोखा प्रकाशित किया था। इस क्षेत्र में उसके बाद 2013 में केदार घाटी में मन्दाकिनी गंगा और अब जोशीमठ के पास रैणी गांव के पास धौली गंगा में ग्लेशियर फटने से बाढ़ आई है। यह ग्लेशियर तपोवन स्थित ऋषि गंगा बांध परियोजना को भी बहा ले गया, जिसमें अनेक लोगों के मरने और लगभग 175 के अभी तक लापता होने का समाचार है।

ज्ञात हो कि रैणी गांव विश्वविख्यात चिपको आंदोलन की प्रणेता श्रीमती गौरा देवी का गांव है। 1970 के आसपास श्रीमती गौरा देवी अपने गांव के जंगल के पेड़ों को कटने से बचाने हेतु गांव की महिलाओं के साथ पेड़ों से चिपक कर खड़ी हो गई थीं। बाद में यही अभियान चिपको आंदोलन के नाम से विश्वविख्यात हो गया। गौरा देवी जंगल को अपना मायका मानती थीं। उनका कहना था कि जैसे हम ससुराल आकर भी मायके की चिंता करते हैं, वैसे ही हमें अपने जंगल मायका समझकर बचाने होंगे। चूंकि गौरा देवी अनपढ़ व साधारण ग्रामीण महिला थीं, इसलिए उन्हें वह मान-सम्मान नहीं मिल पाया, जिसकी वह हकदार थीं।  लेकिन कई सामाजिक संस्थाओं के साथ ही अब उत्तराखंड राज्य बनने के बाद गौरा देवी के नाम से कई सरकारी सम्मान प्रदान  किए जा रहे हैं।

इस प्रकार की प्राकृतिक विपदाएं ना आएं, इस संबंध में पर्यावरणविद एवं विशेषज्ञ केवल वन दोहन, बांध और भौतिक विकास आदि को दोषी ठहराकर अपने पारंपरिक कर्तव्य का निर्वाह कर लेते हैं, जबकि विरही और मंदाकिनी में आए प्रलय कहीं और संकेत करते हैं। यह प्राकृतिक दोहन की अपेक्षा नियति का खेल था। कई मौकों पर बांधों ने जल प्रवाह के वेग को विराम भी दिया है। 2013 में ही केदारनाथ के साथ गंगोत्री से भी बाढ़ अपना प्रकोप दिखाना चाह रही थी, परंतु उस समय विश्वविख्यात टिहरी बांध ने उस वेग को अपने में समा लिया था, जिससे काफी नुकसान होने से बच गया था।

सृष्टि का प्रारम्भ ही जल प्रलय के बाद हुआ है। तब से लेकर अब तक बाढ़ व भूकंप आदि नियमित रूप से आते ही रहे हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि बाढ़ केवल पर्यावरणीय कारणों एवं बांध आदि बनाने के कारण आ रही हैं, तो फिर इस प्रकार की आपदाएं अधिकतर उत्तराखंड, वह भी केवल गढ़वाल के क्षेत्र विशेष में ही क्यों आती हैं? जिस प्रकार का विकास कार्य गढ़वाल क्षेत्र में हो रहा है, ठीक वैसा ही विकास उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र तथा हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर या पूर्वोत्तर भारत के पर्वतीय प्रदेशों में भी हो रहा है, फिर ये आपदाएं किसी विशेष क्षेत्र में ही क्यों?

बाढ़ एवं भूकंप आदि सदियों से प्राकृतिक एवं दैविक प्रकोप माने जाते रहे हैं। हां, वन दोहन, बांध और भौतिक विकास आदि के कारण जन-धन का नुकसान अधिक होता है। आप बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक एवं दैविक विपदाओं को रोक नहीं सकते हैं, लेकिन जिस प्रकार से मुंबई महानगरपालिका 2005 के जल प्रलय के बाद प्रत्येक वर्ष बरसात से पहले पूरी मुंबई के गटरों व नहरों आदि की साफ-सफाई कर आपदा के कुप्रभाव को काफी हद तक बचा लेती है, अच्छा हो कि हम भी केवल लोगों व सरकार को कोसने की परंपरा को निभाने के बजाय, पहाड़ों के नदीय तट की साफ-सफाई हेतु कोई ठोस दीर्घकालीन नीति बनाएं। अतएव इस दिशा में हमें भी स्वच्छ गंगा और गंगा स्पर्श जैसी कोई सार्थक एवं रचनात्मक परियोजना चलानी होगी।